मेघालय का बेहदीनख्लाम त्योहार क्यों है खास? जानिए इसके इतिहास, धार्मिक महत्व, अनोखी परंपराओं और जवाई में होने वाले चार दिवसीय उत्सव की पूरी कहानी।
जवाई, मेघालय: बारिश की पहली फुहारों के बीच जब देश के अधिकांश हिस्सों में लोग खेती की तैयारी में जुटे होते हैं, उसी समय मेघालय के पश्चिम जयंतिया हिल्स जिले का छोटा-सा शहर जवाई (Jowai) रंग, संगीत, पारंपरिक अनुष्ठानों और सामुदायिक उत्साह से भर उठता है।
यहां हर वर्ष जुलाई में मनाया जाने वाला बेहदीनख्लाम (Behdienkhlam) केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि सदियों पुरानी सांस्कृतिक विरासत, कृषि परंपरा और आस्था का जीवंत उत्सव है।
इस वर्ष भी जुलाई में इसकी शुरुआत के साथ हजारों स्थानीय लोग और पर्यटक जवाई पहुंचे, जहां चार दिनों तक पारंपरिक अनुष्ठान, विशाल लकड़ी-बांस की संरचनाओं की शोभायात्राएं और सामुदायिक आयोजन देखने को मिल रहे हैं।
मेघालय के प्नार (Pnar) या जयंतिया समुदाय का यह सबसे बड़ा धार्मिक-सांस्कृतिक पर्व उत्तर-पूर्व भारत की उन परंपराओं में शामिल है, जो आज भी आधुनिकता के बीच अपनी मूल पहचान बनाए हुए हैं। इस उत्सव में लोग अच्छी फसल, समुदाय की खुशहाली और बीमारियों से सुरक्षा की प्रार्थना करते हैं।

क्या है Behdienkhlam का अर्थ?
“Behdienkhlam” शब्द प्नार भाषा के दो शब्दों से मिलकर बना है। ‘Behdein’ का अर्थ है “दूर भगाना” और ‘Khlam’ का अर्थ “महामारी, बीमारी या प्लेग” से है। अर्थात इसका शाब्दिक अर्थ हुआ “बीमारियों और महामारी को दूर भगाना।”
माना जाता है कि प्राचीन समय में जब हैजा (Cholera) और अन्य संक्रामक रोग लोगों के लिए बड़ी चुनौती थे, तब समुदाय ने प्रकृति और ईश्वर से सुरक्षा की प्रार्थना के रूप में इस उत्सव की शुरुआत की।

कहां मनाया जाता है यह उत्सव?
बेहदीनख्लाम मुख्य रूप से मेघालय के West Jaintia Hills जिले के Jowai शहर में मनाया जाता है। हालांकि जैंतिया हिल्स के अन्य इलाकों में भी यह पर्व आयोजित होता है, लेकिन जवाई का आयोजन सबसे बड़ा और सबसे प्रसिद्ध माना जाता है। यहां देश-विदेश से पर्यटक भी इस अद्भुत सांस्कृतिक अनुभव को देखने पहुंचते हैं।
कौन मनाता है यह त्योहार?
यह पर्व मुख्य रूप से प्नार (Pnar) समुदाय मनाता है, जिन्हें कई स्थानों पर जैंतिया (Jaintia) भी कहा जाता है। यह समुदाय मेघालय की प्रमुख जनजातियों में शामिल है और परंपरागत नियामत्रे (Niamtre) आस्था का पालन करता है।
Niamtre कोई संगठित धर्म नहीं, बल्कि प्रकृति, पूर्वजों और सर्वोच्च शक्ति के प्रति श्रद्धा पर आधारित पारंपरिक जीवन-दर्शन है। इसमें जंगल, नदियां, धरती और पूर्वजों को विशेष सम्मान दिया जाता है। बेहदीनख्लाम इसी धार्मिक परंपरा का सबसे बड़ा सार्वजनिक उत्सव माना जाता है।
कैसे हुई Behdienkhlam की शुरुआत?
Behdienkhlam की शुरुआत की कोई निश्चित लिखित ऐतिहासिक तिथि उपलब्ध नहीं है, क्योंकि यह परंपरा सदियों से मौखिक रूप में चली आ रही है। इतिहासकारों का मानना है कि यह उत्सव उस समय विकसित हुआ, जब कृषि पूरी तरह मानसून पर निर्भर थी और संक्रामक बीमारियां गांवों में भारी तबाही मचाती थीं।
तब लोगों का विश्वास था कि सामूहिक प्रार्थना, धार्मिक अनुष्ठान और सामाजिक एकता के माध्यम से वे ईश्वर से सुरक्षा और अच्छी फसल का आशीर्वाद प्राप्त कर सकते हैं। धीरे-धीरे यह परंपरा पूरे प्नार समाज की सांस्कृतिक पहचान बन गई।
खेती और मानसून से गहरा संबंध
Behdienkhlam हर वर्ष बुवाई (Sowing Season) पूरी होने के बाद मनाया जाता है। यह वह समय होता है जब किसान खेतों में बीज बो चुके होते हैं और अच्छी वर्षा तथा भरपूर फसल की कामना करते हैं।
इसी कारण इस उत्सव में प्रकृति, वर्षा, धरती और कृषि का विशेष महत्व दिखाई देता है। लोग मानते हैं कि यदि समुदाय एकजुट होकर प्रार्थना करे तो आने वाला कृषि वर्ष समृद्ध रहेगा और गांव महामारी तथा प्राकृतिक आपदाओं से सुरक्षित रहेगा।
चार दिनों तक चलता है उत्सव
बेहदीनख्लाम सामान्य त्योहारों की तरह केवल एक दिन का आयोजन नहीं है। यह लगभग चार दिनों तक चलने वाला उत्सव है, जिसमें हर दिन अलग-अलग धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियां होती हैं। इस वर्ष भी यह त्योहार 6-9 जुलाई के बीच मनाया जा रहा है।
उत्सव की शुरुआत धार्मिक अनुष्ठानों से होती है। समुदाय के धार्मिक प्रमुख, जिन्हें Daloi कहा जाता है, पारंपरिक विधि से पूजा-अर्चना कर पूर्वजों और स्थानीय देवताओं का आह्वान करते हैं। इसके बाद पूरे समुदाय की भागीदारी वाले कार्यक्रम शुरू होते हैं।
घर-घर जाकर बुरी शक्तियों को भगाने की परंपरा
Behdienkhlam की सबसे अनोखी परंपराओं में से एक है गांव के पुरुषों द्वारा बांस की लंबी छड़ों के साथ घर-घर जाना। वे प्रतीकात्मक रूप से घरों की छतों और दीवारों पर बांस से प्रहार करते हैं। इसका उद्देश्य किसी को नुकसान पहुंचाना नहीं होता, बल्कि यह माना जाता है कि इससे बीमारी, महामारी और नकारात्मक शक्तियां गांव से बाहर चली जाती हैं।
यह अनुष्ठान सामुदायिक सुरक्षा और एकजुटता का प्रतीक माना जाता है और सदियों से लगभग उसी स्वरूप में निभाया जा रहा है।
महिलाओं की महत्वपूर्ण भूमिका
हालांकि Behdienkhlam के सार्वजनिक जुलूसों और पारंपरिक नृत्यों में मुख्य रूप से पुरुष भाग लेते हैं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि महिलाओं की भूमिका कम है।
महिलाएं अपने घरों में पूर्वजों की आत्माओं के सम्मान में विशेष भोजन तैयार करती हैं, धार्मिक अर्पण करती हैं और परिवार की समृद्धि के लिए प्रार्थना करती हैं। प्नार समाज में यह कार्य अत्यंत पवित्र माना जाता है और उत्सव की धार्मिक प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
‘रॉट‘ इस उत्सव की सबसे बड़ी पहचान
बेहदीनख्लाम की सबसे आकर्षक परंपराओं में ‘रॉट’ (Rot) का विशेष स्थान है। रॉट विशाल लकड़ी और बांस से बनाई गई रंग-बिरंगी संरचनाएं होती हैं, जिन्हें स्थानीय लोग कई दिनों की मेहनत से तैयार करते हैं। इन पर पारंपरिक कला, फूलों, कपड़ों और धार्मिक प्रतीकों से सजावट की जाती है।
जवाई के अलग-अलग मोहल्ले (Daloi या Raids) अपने-अपने रॉट तैयार करते हैं। उत्सव के अंतिम दिन हजारों लोग इन्हें कंधों पर उठाकर पूरे शहर में पारंपरिक संगीत और ढोल-नगाड़ों के साथ जुलूस निकालते हैं।
यह केवल धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि सामुदायिक एकता, कला और सांस्कृतिक पहचान का भी प्रतीक माना जाता है।

ऐतनार में होता है सबसे बड़ा आयोजन
Behdienkhlam का सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव Aitnar नामक पवित्र मैदान में होता है। पूरे शहर से निकले रॉट यहां एकत्र किए जाते हैं। हजारों दर्शकों की मौजूदगी में पारंपरिक अनुष्ठानों के बाद इन विशाल संरचनाओं को ‘Wah Aitnar’ नामक जलाशय में प्रतीकात्मक रूप से विसर्जित किया जाता है।
स्थानीय मान्यता है कि इसके साथ ही गांव से महामारी, नकारात्मक शक्तियां और दुर्भाग्य भी जल के साथ विदा हो जाते हैं। यही क्षण पूरे उत्सव का सबसे भावनात्मक और रोमांचक दृश्य माना जाता है।
लकड़ी की गेंद से खेला जाने वाला अनोखा खेल
बेहदीनख्लाम की एक और खास पहचान है दाद-लावाकोर (Dad-Lawakor) यह पारंपरिक खेल केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि धार्मिक महत्व भी रखता है।
इसमें भारी लकड़ी की गेंद (Wooden Ball) को दो टीमें मैदान में एक-दूसरे की दिशा में धकेलने का प्रयास करती हैं। यह खेल आधुनिक फुटबॉल और रग्बी की याद दिलाता है, लेकिन इसके नियम और उद्देश्य पूरी तरह पारंपरिक हैं।
स्थानीय लोगों का विश्वास है कि जिस क्षेत्र की टीम यह खेल जीतती है, वहां उस वर्ष अच्छी फसल और समृद्धि आती है। यही कारण है कि हजारों लोग इस मुकाबले को देखने के लिए एकत्र होते हैं।

धार्मिक अनुष्ठानों की विशेष भूमिका
उत्सव के दौरान Daloi और अन्य पारंपरिक धार्मिक प्रमुख विशेष पूजा-अर्चना करते हैं। वे समुदाय की समृद्धि, वर्षा, अच्छी खेती और रोगों से सुरक्षा की कामना करते हैं।
पूरे आयोजन में पशु बलि जैसी प्राचीन परंपराओं के स्थान पर अब कई स्थानों पर प्रतीकात्मक धार्मिक अनुष्ठानों को प्राथमिकता दी जा रही है। इससे यह उत्सव समय के साथ बदलते समाज के अनुरूप भी विकसित हुआ है, जबकि इसकी मूल सांस्कृतिक पहचान आज भी बरकरार है।
उत्तर-पूर्व भारत की सांस्कृतिक पहचान
मेघालय के लिए Behdienkhlam केवल धार्मिक पर्व नहीं बल्कि सांस्कृतिक पहचान का सबसे बड़ा प्रतीक है। जैसे असम का बिहू, नागालैंड का हॉर्नबिल फेस्टिवल और मणिपुर का याओशांग प्रसिद्ध है, उसी तरह जैंतिया समुदाय के लिए बेहदीनख्लाम सबसे महत्वपूर्ण उत्सव माना जाता है।
यह पर्व उत्तर-पूर्व भारत की सांस्कृतिक विविधता और जनजातीय परंपराओं को देश-दुनिया के सामने प्रस्तुत करता है। यही कारण है कि हर वर्ष बड़ी संख्या में देशी-विदेशी पर्यटक इस आयोजन को देखने मेघालय पहुंचते हैं।
मेघालय पर्यटन विभाग भी इस पर्व को राज्य की सांस्कृतिक धरोहर के रूप में बढ़ावा देता है। उत्सव के दौरान जवाई के होटल, होमस्टे और स्थानीय बाजार पर्यटकों से भर जाते हैं।
इससे स्थानीय हस्तशिल्प, पारंपरिक भोजन, लोक संगीत और छोटे व्यापारियों को भी आर्थिक लाभ मिलता है। पिछले कुछ वर्षों में सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म के कारण बेहदीनख्लाम की लोकप्रियता अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंची है।
आधुनिक दौर की चुनौतियां
आज बदलती जीवनशैली, शहरीकरण और युवाओं का बड़े शहरों की ओर पलायन पारंपरिक त्योहारों के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर रहा है। इसके बावजूद प्नार समुदाय अपने रीति-रिवाजों और सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित रखने के लिए लगातार प्रयास कर रहा है।
मेघालय सरकार, स्थानीय सामाजिक संगठन और धार्मिक संस्थाएं मिलकर नई पीढ़ी को इस पर्व के महत्व से परिचित करा रही हैं ताकि आने वाले वर्षों में भी यह परंपरा जीवित रह सके।
क्यों आज भी खास है बेहदीनख्लाम?
बेहदीनख्लाम हमें यह संदेश देता है कि किसी भी समाज की असली ताकत उसकी एकजुटता, प्रकृति के प्रति सम्मान और सांस्कृतिक विरासत में छिपी होती है। सदियों पहले महामारी से सुरक्षा और अच्छी फसल की कामना के साथ शुरू हुआ यह उत्सव आज भी उसी भावना के साथ मनाया जाता है।
जब पूरा गांव एक साथ मिलकर बुरी शक्तियों को विदा करने और खुशहाली का स्वागत करने की कामना करता है, तब यह केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं रह जाता, बल्कि सामूहिक विश्वास और सामाजिक एकता का उत्सव बन जाता है। यही कारण है कि Behdienkhlam Festival आज भी मेघालय ही नहीं, बल्कि पूरे भारत की सबसे अनोखी और जीवंत सांस्कृतिक परंपराओं में गिना जाता है।
