6 जुलाई 1892 को दादाभाई नौरोजी ने ब्रिटिश संसद में पहुंचकर इतिहास रचा। जानिए कैसे उनकी जीत भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की वैचारिक नींव बनी।
नई दिल्ली/ लंदन: इतिहास में कुछ तारीखें केवल कैलेंडर का हिस्सा नहीं होतीं, बल्कि वे आने वाली पीढ़ियों के लिए उम्मीद और बदलाव का प्रतीक बन जाती हैं। 19वीं सदी के आखिर में जब भारत ब्रिटिश शासन के अधीन था, तब शायद ही किसी ने कल्पना की होगी कि एक भारतीय उसी साम्राज्य की संसद में जाकर उसके सामने भारत के अधिकारों की आवाज बुलंद करेगा।
6 जुलाई 1892 को दादाभाई नौरोजी नेब्रिटेन की House of Commons के लिए चुनाव जीतकर इतिहास रच दिया। वे ब्रिटिश संसद में पहुंचने वाले पहले भारतीय और पहले एशियाई बने।
यह जीत केवल एक संसदीय सीट हासिल करने की कहानी नहीं थी, बल्कि उस भारतीय आत्मविश्वास की शुरुआत थी जिसने आगे चलकर पूरे स्वतंत्रता आंदोलन को वैचारिक मजबूती दी।
साधारण परिवार में जन्म
दादाभाई नौरोजी का जन्म 4 सितंबर 1825 को तत्कालीन बॉम्बे (आज का मुंबई) में एक पारसी परिवार में हुआ था। उनके पिता नौरोजी पलांजी दोर्दी पारसी पुजारी थे, लेकिन दादाभाई जब केवल चार वर्ष के थे, तभी उनके पिता का निधन हो गया।
इसके बाद उनकी मां मानेकबाई ने बेहद कठिन परिस्थितियों में उनका पालन-पोषण किया।
उनकी मां ने आर्थिक चुनौतियों के बावजूद उनरी शिक्षा से कभी समझौता नहीं किया। बॉम्बे के प्रसिद्ध Elphinstone Institution (बाद में Elphinstone College) से दादाभाई मौरोजी ने अपनी शिक्षा प्राप्त की। पढ़ाई में उनकी प्रतिभा इतनी उत्कृष्ट थी कि वे जल्द ही कॉलेज के सबसे मेधावी छात्रों में गिने जाने लगे।
पहले भारतीय प्रोफेसरों में शामिल
शिक्षा पूरी करने के बाद दादाभाई नौरोजी ने उसी Elphinstone College में गणित और प्राकृतिक दर्शन (Natural Philosophy) पढ़ाना शुरू किया।
वे उन शुरुआती भारतीयों में शामिल थे जिन्हें किसी ब्रिटिश शैक्षणिक संस्थान में प्रोफेसर बनने का अवसर मिला। उस दौर में लगभग सभी महत्वपूर्ण शिक्षण पद अंग्रेजों के पास होते थे। ऐसे समय में किसी भारतीय का इस पद तक पहुंचना अपने आप में बड़ी उपलब्धि थी।
सामाजिक सुधारों की मजबूत आवाज
दादाभाई नौरोजी महज़ एक राजनेता या अर्थशास्त्री नहीं, बल्कि एक समाज सुधारक भी थे। उन्होंने महिलाओं की शिक्षा, विधवा पुनर्विवाह और सामाजिक सुधारों पर खुलकर बात की।
पारसी समाज में आधुनिक शिक्षा और सुधारवादी विचारों को बढ़ावा देने के लिए उन्होंने कई संस्थाओं से जुड़कर काम किया।
उन्होंने गुजराती भाषा में ‘रास्त गोफ्तार’ (Rast Goftar) नामक समाचार पत्र की शुरुआत की। इस पत्र के माध्यम से वे सामाजिक कुरीतियों, शिक्षा और राजनीतिक जागरूकता पर लगातार लेख लिखते थे। उनकी लेखनी सरल थी, लेकिन उसके पीछे गहरी वैचारिक स्पष्टता दिखाई देती थी।
व्यापार के बहाने पहुंचे इंग्लैंड
1855 में दादाभाई नौरोजी व्यवसायिक कार्यों के सिलसिले में पहली बार इंग्लैंड पहुंचे। वे पारसी व्यापारिक कंपनी Cama & Co. से जुड़े थे। हालांकि कुछ समय बाद उन्होंने कंपनी छोड़ दी और अपनी खुद की व्यापारिक फर्म Dadabhai Naoroji & Co. की स्थापना की।
इंग्लैंड में रहते हुए उन्होंने महसूस किया कि भारत के बारे में ब्रिटिश जनता और सांसदों को बहुत कम जानकारी है। अधिकांश लोग यह मानते थे कि ब्रिटिश शासन भारत के विकास के लिए काम कर रहा है। नौरोजी ने इस धारणा को बदलने का निश्चय किया।
यहीं से उनका राजनीतिक और बौद्धिक संघर्ष शुरू हुआ। उन्होंने London Indian Society और बाद में East India Association की स्थापना की, ताकि ब्रिटिश समाज और संसद के सामने भारत की वास्तविक स्थिति रखी जा सके।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के निर्माण में भूमिका
1885 में जब भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना हुई, तब दादाभाई नौरोजी उसके सबसे प्रमुख नेताओं में शामिल थे। वे कांग्रेस के शुरुआती वैचारिक स्तंभों में गिने जाते हैं।
वे तीन बार कांग्रेस के अध्यक्ष बने—
- 1886 (कलकत्ता अधिवेशन)
- 1893 (लाहौर अधिवेशन)
- 1906 (कलकत्ता अधिवेशन)
1906 के कांग्रेस अधिवेशन में उन्होंने पहली बार स्पष्ट रूप से “स्वराज” को भारत का लक्ष्य बताया। उस समय तक कांग्रेस की मांगें मुख्य रूप से प्रशासनिक सुधारों तक सीमित थीं, लेकिन नौरोजी ने स्वशासन की अवधारणा को राष्ट्रीय आंदोलन के केंद्र में ला दिया।
“Drain Theory” की शुरुआत
Dadabhai Naoroji का सबसे बड़ा योगदान उनका प्रसिद्ध “Drain Theory” (धन-निकासी सिद्धांत) माना जाता है।
उन्होंने वर्षों तक सरकारी आंकड़ों, व्यापारिक रिकॉर्ड और ब्रिटिश बजट का अध्ययन किया। इसके बाद उन्होंने यह निष्कर्ष निकाला कि भारत गरीब इसलिए नहीं है क्योंकि उसके पास संसाधनों की कमी है, बल्कि इसलिए क्योंकि ब्रिटेन व्यवस्थित रूप से भारत की संपत्ति बाहर ले जा रहा है।
उनके अनुसार भारत की कमाई कई माध्यमों से ब्रिटेन भेजी जा रही थी—
- ब्रिटिश अधिकारियों के वेतन और पेंशन
- ईस्ट इंडिया कंपनी तथा बाद में ब्रिटिश सरकार का प्रशासनिक खर्च
- सेना पर होने वाला व्यय
- ब्रिटिश कंपनियों का मुनाफा
- व्यापार से होने वाली आय का विदेश जाना
नौरोजी ने इसे “Un-British Rule in India” कहा। उनका तर्क था कि यदि यही व्यवस्था ब्रिटेन में लागू होती, तो वहां की अर्थव्यवस्था भी कमजोर पड़ जाती।
बाद में उन्होंने अपने शोध और विचारों को “Poverty and Un-British Rule in India” नामक प्रसिद्ध पुस्तक में विस्तार से प्रस्तुत किया। यह पुस्तक भारतीय आर्थिक राष्ट्रवाद की आधारशिला मानी जाती है।

ब्रिटिश संसद तक पहुंचने का कठिन सफर
Dadabhai Naoroji का मानना था कि यदि भारत की आवाज सीधे ब्रिटिश संसद तक पहुंचेगी, तभी वास्तविक बदलाव संभव होगा। इसलिए उन्होंने ब्रिटेन की राजनीति में प्रवेश करने का फैसला किया।
उन्होंने पहली बार 1886 में ब्रिटिश संसद का चुनाव लड़ा, लेकिन बेहद कम अंतर से हार गए। नस्लीय पूर्वाग्रह भी उनके खिलाफ था। कई विरोधी उन्हें “Black Man” कहकर प्रचार करते थे और यह कहते थे कि कोई भारतीय ब्रिटिश संसद का सदस्य नहीं बन सकता।
लेकिन नौरोजी ने हार नहीं मानी। लगातार जनसंपर्क, भाषणों और अपने स्पष्ट विचारों के दम पर उन्होंने दोबारा चुनावी मैदान में उतरने का निर्णय लिया।
6 जुलाई 1892 का ऐतिहासिक दिन
लगातार प्रयासों के बाद आखिरकार 6 जुलाई 1892 को दादाभाई नौरोजी ने इतिहास रचा। वे ब्रिटेन की Liberal Party के उम्मीदवार के रूप में Central Finsbury (लंदन) संसदीय सीट से चुनाव जीतकर House of Commons पहुंचने वाले पहले भारतीय और पहले एशियाई बने।
उन्होंने अपने प्रतिद्वंद्वी Conservative Party के उम्मीदवार एडमंड स्टाइनकॉफ (Edmund Steinkopff) को केवल 5 वोटों से हराया। यह जीत केवल एक चुनावी सफलता नहीं थी, बल्कि उस दौर में नस्लीय भेदभाव और औपनिवेशिक मानसिकता पर एक बड़ा प्रहार भी थी। ब्रिटिश अखबारों ने इसे ऐतिहासिक घटना बताया, जबकि भारत में इस जीत को राष्ट्रीय गौरव के रूप में देखा गया।
संसद में भारत की आवाज बने नौरोजी
ब्रिटिश संसद पहुंचने के बाद Dadabhai Naoroji ने अपना अधिकांश समय भारत से जुड़े मुद्दों को उठाने में लगाया। उन्होंने बार-बार कहा कि ब्रिटिश शासन भारत के आर्थिक संसाधनों का शोषण कर रहा है और भारतीयों को प्रशासन में उचित प्रतिनिधित्व नहीं दिया जा रहा।
उन्होंने संसद में भारतीय सिविल सेवा (ICS) की परीक्षा भारत में भी आयोजित करने की मांग उठाई ताकि भारतीय युवाओं को समान अवसर मिल सकें। उस समय यह परीक्षा केवल इंग्लैंड में होती थी, जिसके कारण अधिकांश भारतीय उम्मीदवार उसमें भाग ही नहीं ले पाते थे।
गांधी, गोखले और जिन्ना पर नौरोजी का गहरा प्रभाव
Dadabhai Naoroji का प्रभाव केवल उनके समकालीन नेताओं तक सीमित नहीं रहा। महात्मा गांधी जब कानून की पढ़ाई के लिए लंदन गए, तब उन्होंने नौरोजी से मुलाकात की और उन्हें अपना मार्गदर्शक माना। गांधी अपने पत्रों में उन्हें सम्मानपूर्वक “Dear Grand Old Man of India” कहकर संबोधित करते थे।
गोपाल कृष्ण गोखले ने भी आर्थिक और राजनीतिक सोच के मामले में नौरोजी से काफी प्रेरणा ली।
यहां तक कि मोहम्मद अली जिन्ना भी अपने शुरुआती राजनीतिक जीवन में दादाभाई नौरोजी के चुनाव अभियान से जुड़े थे और उनकी संसदीय शैली से प्रभावित हुए।
यही कारण है कि नौरोजी को भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की पहली पीढ़ी का सबसे प्रभावशाली वैचारिक नेता माना जाता है।
स्वराज की मांग को नई दिशा
1906 में कलकत्ता में आयोजित भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन की अध्यक्षता करते हुए दादाभाई नौरोजी ने पहली बार स्पष्ट शब्दों में कहा कि भारत का लक्ष्य “स्वराज” होना चाहिए।
हालांकि उस समय स्वराज का अर्थ ब्रिटिश साम्राज्य के भीतर स्वशासन था, लेकिन इसी विचार ने आगे चलकर पूर्ण स्वतंत्रता की मांग का आधार तैयार किया।
उन्होंने कहा कि किसी भी राष्ट्र का विकास तभी संभव है जब उसके लोगों को अपने शासन पर अधिकार मिले। उनके इस विचार ने कांग्रेस की दिशा बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
अंतिम वर्ष और निधन
उम्र बढ़ने के साथ Dadabhai Naoroji सक्रिय राजनीति से धीरे-धीरे दूर होने लगे, लेकिन भारत के प्रति उनकी चिंता कभी कम नहीं हुई। वे लगातार लेखन, सार्वजनिक भाषणों और सामाजिक कार्यों के माध्यम से राष्ट्र को दिशा देते रहे।
30 जून 1917 को मुंबई में 91 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ। उस समय भारत अभी भी ब्रिटिश शासन के अधीन था, लेकिन स्वतंत्रता आंदोलन तेजी से आगे बढ़ रहा था। जिन विचारों की नींव नौरोजी ने रखी थी, वही आगे चलकर स्वतंत्र भारत की राह बने।
इतिहास में दादाभाई नौरोजी की विरासत
दादाभाई नौरोजी केवल पहले भारतीय सांसद नहीं थे। वे उस पीढ़ी के नेता थे जिसने भारतीय राष्ट्रवाद को वैचारिक आधार दिया। उन्होंने ब्रिटिश शासन की आर्थिक नीतियों का वैज्ञानिक विश्लेषण किया, भारतीयों के राजनीतिक अधिकारों की मांग उठाई और दुनिया को बताया कि भारत की गरीबी कोई प्राकृतिक स्थिति नहीं, बल्कि औपनिवेशिक शोषण का परिणाम है।
6 जुलाई 1892 की उनकी ऐतिहासिक जीत केवल एक संसदीय चुनाव की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस भारतीय की कहानी है जिसने साम्राज्य की सबसे शक्तिशाली संसद में खड़े होकर अपने देश की आवाज बुलंद की।
Dadabhai Naoroji ने साबित किया कि विचारों की ताकत किसी भी साम्राज्य से बड़ी हो सकती है। यही कारण है कि उन्हें आधुनिक भारतीय राष्ट्रवाद का अग्रदूत और स्वतंत्रता आंदोलन का वैचारिक शिल्पकार माना जाता है।
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