Thursday, 16 July 2026
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Jalalabad Rename News: योगी सरकार ने बदला जलालाबाद का नाम, अब कहलाएगा परशुरामपुरी, जानिए इतिहास और फैसले की पूरी कहानी

शाहजहांपुर के जलालाबाद का नाम बदलकर परशुरामपुरी करने पर यूपी कैबिनेट की मंजूरी। जानिए इतिहास, सरकार का तर्क और आगे की प्रक्रिया।

लखनऊ, उत्तर प्रदेश: सोमवार (6 जुलाई) को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अध्यक्षता में हुई उत्तर प्रदेश कैबिनेट की बैठक में शाहजहांपुर जिले के जलालाबाद नगर का नाम बदलकर “परशुरामपुरी” करने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी गई।

सरकार का कहना है कि यह फैसला केवल नाम बदलने तक सीमित नहीं है, बल्कि उस क्षेत्र की प्राचीन सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान को पुनर्स्थापित करने की दिशा में उठाया गया कदम है।

इस फैसले के बाद एक बार फिर यह बहस शुरू हो गई है कि आखिर जलालाबाद का इतिहास क्या है, इसका मुगल सम्राट अकबर से क्या संबंध है और भगवान परशुराम के नाम पर इसका नाम बदलने के पीछे सरकार का तर्क क्या है।

योगी कैबिनेट का अहम फैसला

सोमवार को लखनऊ में हुई उत्तर प्रदेश मंत्रिपरिषद की बैठक में जलालाबाद का नाम बदलकर परशुरामपुरी करने के प्रस्ताव को मंजूरी दी गई। यह प्रस्ताव लंबे समय से स्थानीय जनप्रतिनिधियों और कुछ सामाजिक संगठनों द्वारा उठाया जा रहा था।

कैबिनेट की मंजूरी के बाद राज्य सरकार अब इस प्रस्ताव को अंतिम स्वीकृति के लिए केंद्र सरकार के पास भेजेगी। भारत में किसी शहर या कस्बे का आधिकारिक नाम बदलने की प्रक्रिया राज्य सरकार की सिफारिश और केंद्र की स्वीकृति के बाद पूरी होती है।

मंजूरी मिलने के बाद सभी सरकारी दस्तावेजों, रेलवे, डाक विभाग, राजस्व अभिलेखों और प्रशासनिक रिकॉर्ड में नया नाम लागू किया जाएगा।

कहाँ स्थित है जलालाबाद?

आपको बता दें कि, Jalalabad उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर जिले की एक महत्वपूर्ण तहसील है। यह क्षेत्र लंबे समय से कृषि, व्यापार और स्थानीय बाजारों का प्रमुख केंद्र माना जाता है। इसके आसपास बड़ी संख्या में ग्रामीण आबादी निवास करती है और यह प्रशासनिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण क्षेत्र है।

हालांकि राष्ट्रीय स्तर पर जलालाबाद का नाम बहुत अधिक चर्चित नहीं रहा, लेकिन स्थानीय इतिहास और धार्मिक परंपराओं में इसकी अलग पहचान मानी जाती है।

जलालाबाद नाम कैसे पड़ा?

सरकारी और ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार वर्तमान Jalalabad का नाम मुगल शासनकाल में पड़ा था। माना जाता है कि सम्राट अकबर (1556-1605) के शासनकाल के दौरान उनके दरबार के प्रभावशाली अमीर जलाल खान के नाम पर इस क्षेत्र का नाम जलालाबाद रखा गया।

कुछ स्थानीय ऐतिहासिक स्रोतों में यह भी उल्लेख मिलता है कि उस समय प्रशासनिक पुनर्गठन के दौरान कई बस्तियों और कस्बों के नाम मुगल अधिकारियों, सूबेदारों या सैन्य सरदारों के नाम पर रखे गए थे। जलालाबाद भी उसी प्रक्रिया का हिस्सा माना जाता है।

यही कारण है कि वर्तमान सरकार का तर्क है कि यह नाम अपेक्षाकृत बाद के काल में दिया गया था, जबकि इस क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान इससे कहीं अधिक प्राचीन है।

“परशुरामपुरी” नाम की असल वजह

उत्तर प्रदेश सरकार का कहना है कि Jalalabad क्षेत्र का संबंध स्थानीय मान्यताओं के अनुसार भगवान परशुराम से जुड़ा हुआ है। इस इलाके में भगवान परशुराम से जुड़े कई प्राचीन धार्मिक स्थल, मंदिर और लोक परंपराएं मौजूद हैं।

स्थानीय लोगों का एक बड़ा वर्ग लंबे समय से मांग करता रहा कि नगर का नाम उसकी प्राचीन धार्मिक पहचान के अनुरूप रखा जाए। सरकार का कहना है कि “परशुरामपुरी” नाम उसी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत को सम्मान देने के उद्देश्य से चुना गया है।

कैबिनेट नोट में भी इस बात पर जोर दिया गया कि स्थानीय पहचान और सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करना सरकार की प्राथमिकताओं में शामिल है।

पहले भी बदले जा चुके हैं शहरों के नाम

उत्तर प्रदेश में पिछले कुछ वर्षों के दौरान कई प्रमुख शहरों और स्थानों के नाम बदले जा चुके हैं।

सबसे चर्चित उदाहरण हैं—

इलाहाबाद से प्रयागराज (2018)

अक्टूबर 2018 में उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने इलाहाबाद का नाम बदलकर प्रयागराज कर दिया। सरकार का तर्क था कि यह शहर प्राचीन काल से “प्रयाग” के नाम से जाना जाता था, जहां गंगा, यमुना और पौराणिक सरस्वती का संगम है।

मुगल सम्राट अकबर ने 16वीं शताब्दी में यहां किला बनवाने के बाद इसका नाम “इलाहाबाद” रखा था। राज्य सरकार ने कहा कि नाम परिवर्तन का उद्देश्य शहर की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान को पुनर्स्थापित करना है।

हालांकि इस फैसले को लेकर राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर समर्थन के साथ-साथ विरोध भी देखने को मिला।

फैजाबाद से अयोध्या (2018)

नवंबर 2018 में योगी सरकार ने फैजाबाद जिले का नाम बदलकर अयोध्या कर दिया। सरकार ने कहा कि अयोध्या भगवान श्रीराम की जन्मभूमि और भारत की प्राचीन धार्मिक-सांस्कृतिक विरासत का केंद्र है, इसलिए पूरे जिले की पहचान भी उसी नाम से होनी चाहिए।

फैजाबाद नाम 18वीं शताब्दी में अवध के नवाबों के शासनकाल में प्रचलित हुआ था। नाम बदलने के पीछे सरकार ने ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व को प्रमुख कारण बताया। बाद में राम मंदिर निर्माण और तीर्थ पर्यटन के विकास के साथ अयोध्या की नई पहचान को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी बढ़ावा मिला।

मुगलसराय जंक्शन से पंडित दीनदयाल उपाध्याय जंक्शन (2018)

अगस्त 2018 में भारतीय रेलवे ने मुगलसराय जंक्शन का नाम बदलकर पंडित दीनदयाल उपाध्याय जंक्शन कर दिया। यह निर्णय उत्तर प्रदेश सरकार के प्रस्ताव और केंद्र सरकार की मंजूरी के बाद लागू हुआ।

यह स्टेशन भारत के सबसे व्यस्त रेलवे जंक्शनों में से एक है। नामकरण का कारण भारतीय जनसंघ के सह-संस्थापक और प्रख्यात विचारक पंडित दीनदयाल उपाध्याय को सम्मान देना बताया गया। 11 फरवरी 1968 को इसी स्टेशन के पास उनकी रहस्यमय परिस्थितियों में मृत्यु हुई थी।

सरकार ने इसे उनकी स्मृति को स्थायी सम्मान देने का कदम बताया, जबकि विपक्ष ने इसे इतिहास बदलने की राजनीति करार दिया।

इसके अलावा कई जिलों, रेलवे स्टेशनों और स्थानीय निकायों के नाम बदलने के प्रस्ताव भी समय-समय पर सामने आते रहे हैं।

योगी सरकार का कहना है कि इन परिवर्तनों का उद्देश्य ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान को पुनर्जीवित करना है, जबकि विपक्ष इसे राजनीतिक एजेंडा बताता रहा है।

नाम बदलने की प्रक्रिया कैसे पूरी होगी?

उत्तर प्रदेश कैबिनेट की मंजूरी के बाद यह प्रस्ताव अब केंद्र सरकार के पास भेजा जाएगा। भारत में किसी भी शहर, कस्बे या जिले का आधिकारिक नाम बदलने के लिए राज्य सरकार की सिफारिश के बाद केंद्रीय गृह मंत्रालय (Ministry of Home Affairs) अंतिम स्वीकृति देता है। गृह मंत्रालय संबंधित मंत्रालयों, भारतीय डाक विभाग, भारतीय रेलवे, सर्वे ऑफ इंडिया और अन्य केंद्रीय एजेंसियों से राय लेने के बाद अधिसूचना जारी करता है।

स्वीकृति मिलने के बाद सरकारी रिकॉर्ड, राजस्व अभिलेख, रेलवे स्टेशन, डाकघर, नगर निकाय, स्कूल-कॉलेजों के दस्तावेज, आधारभूत प्रशासनिक रिकॉर्ड और सरकारी वेबसाइटों पर नया नाम “परशुरामपुरी” दर्ज किया जाएगा। इस पूरी प्रक्रिया में कुछ महीने लग सकते हैं।

चुनाव से पहले फैसले के राजनीतिक मायने

यह फैसला ऐसे समय आया है जब उत्तर प्रदेश में अगले विधानसभा चुनावों की तैयारियां तेज होने लगी हैं। इसलिए राजनीतिक विश्लेषक इसे केवल प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि एक बड़े राजनीतिक संदेश के रूप में भी देख रहे हैं।

भारतीय जनता पार्टी लंबे समय से सांस्कृतिक विरासत, धार्मिक स्थलों और ऐतिहासिक पहचान को अपने राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बनाती रही है। प्रयागराज, अयोध्या और पंडित दीनदयाल उपाध्याय जंक्शन जैसे नाम परिवर्तन के बाद अब जलालाबाद का परशुरामपुरी बनना भी उसी श्रृंखला का हिस्सा माना जा रहा है।

हालांकि सरकार ने स्पष्ट किया है कि यह निर्णय किसी राजनीतिक लाभ के लिए नहीं बल्कि स्थानीय जनभावनाओं और ऐतिहासिक पहचान को सम्मान देने के उद्देश्य से लिया गया है।

उत्तर प्रदेश में नाम बदलने की बढ़ती परंपरा

पिछले कुछ वर्षों में उत्तर प्रदेश में कई स्थानों के नाम बदले जा चुके हैं। सरकार का कहना है कि इन परिवर्तनों का उद्देश्य भारतीय सांस्कृतिक विरासत को सम्मान देना है।

विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसे निर्णय केवल प्रशासनिक नहीं होते बल्कि समाज, इतिहास, संस्कृति और राजनीति चारों क्षेत्रों को प्रभावित करते हैं। यही कारण है कि हर नाम परिवर्तन राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन जाता है।

ये भी पढ़ें :- 60 Years of Shiv Sena: एक कार्टूनिस्ट जिसने बदल दी महाराष्ट्र की राजनीति, जानें शिवसेना के बनने और टूटने की कहानी

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MD Faijan

MD Faijan

लेखक

मोहम्मद फैजान न्यूज़ ऑफ द डे में पत्रकार हैं, जहाँ वे खेल, मनोरंजन, राजनीति और अंतरराष्ट्रीय मामलों को कवर करते हैं। इससे पहले वे यूट्यूब चैनल स्पोर्ट्स यारी में सोशल मीडिया एग्जीक्यूटिव के रूप में कार्य कर चुके हैं, जहाँ उन्होंने डिजिटल कंटेंट मैनेजमेंट और ऑडियंस एंगेजमेंट का व्यावहारिक अनुभव प्राप्त किया। भारत के छत्तीसगढ़ राज्य के कोरिया जिले से संबंध रखने वाले फैजान आधुनिक मीडिया कार्यप्रणालियों की अच्छी समझ रखते हैं और कहानी कहने के विभिन्न रूपों में गहरी रुचि रखते हैं।

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