Friday, 19 June 2026
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Stockholm Syndrome: जब बंधक को ही होने लगे किडनैपर से लगाव, जानिए क्या है स्टॉकहोम सिंड्रोम और इसके लक्षण

1973 की एक बैंक डकैती से जन्मा Stockholm Syndrome, जो आज भी मनोविज्ञान के लिए एक रहस्य बना हुआ है। जानिए पीड़ित और अपहरणकर्ता के बीच की इस जटिल मानसिक प्रतिक्रिया की असल वजह।

नई दिल्ली: फर्ज़ कीजिए, किसी बैंक में डकैती हो जाए, अपराधी लोगों को बंधक बना लें और कई दिनों तक उन्हें अपनी कैद में रखें। फिर जब पुलिस उन बंधकों को बचाने पहुंचे, तो वे उन्हीं अपराधियों का बचाव करने लगें।

सुनने में यह किसी फिल्म की कहानी लग सकती है, लेकिन वास्तविक दुनिया में ऐसा हो चुका है। इसी असामान्य व्यवहार ने जन्म दिया एक ऐसे शब्द को, जिसने दशकों से मनोवैज्ञानिकों, अपराध विशेषज्ञों और आम लोगों की जिज्ञासा को बढ़ाया हुआ है। यह शब्द है Stockholm Syndrome.

यह एक ऐसी स्थिति को दर्शाता है जिसमें कोई व्यक्ति अपने अपहरणकर्ता, बंधक बनाने वाले या अत्याचारी के प्रति सहानुभूति, भावनात्मक जुड़ाव या समर्थन महसूस करने लगता है।

पहली नजर में यह व्यवहार समझ से परे लगता है, लेकिन मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि यह कई बार अत्यधिक तनाव और भय की परिस्थितियों में विकसित होने वाली एक जटिल मानसिक प्रतिक्रिया हो सकती है।

आखिर कहां से आया Stockholm Syndrome का नाम?

इस शब्द की कहानी 1973 में स्वीडन की राजधानी स्टॉकहोम से शुरू होती है।

दरअसल, 23 अगस्त 1973 को एक अपराधी जान-एरिक ओल्सन (Jan-Erik Olsson) स्टॉकहोम के “क्रेडिटबैंकन बैंक” में घुसा और हथियार के बल पर बैंक कर्मचारियों को बंधक बना लिया।

बाद में उसके एक सहयोगी Clark Olofsson को भी वहां लाया गया। कुल चार बैंक कर्मचारी लगभग छह दिनों तक बैंक के वॉल्ट में बंधक बने रहे।

पूरे स्वीडन की नजर इस घटना पर थी। पुलिस लगातार बंधकों को छुड़ाने की कोशिश कर रही थी। आखिरकार 28 अगस्त को अभियान चलाकर सभी बंधकों को सुरक्षित मुक्त करा लिया गया। लेकिन इसके बाद जो हुआ, उसने लोगों को हैरान कर दिया।

बंधकों ने अदालत और मीडिया के सामने अपने अपहरणकर्ताओं के प्रति सहानुभूति दिखाई। कुछ बंधकों ने कहा कि उन्हें अपराधियों से ज्यादा डर पुलिस की कार्रवाई से लग रहा था। यहां तक कि एक महिला बंधक ने बाद में अपहरणकर्ताओं की कानूनी मदद के लिए धन जुटाने का भी प्रयास किया।

यहीं से “Stockholm Syndrome” शब्द अस्तित्व में आया।

लेकिन ऐसा क्यों होता है?

मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, जब कोई व्यक्ति लंबे समय तक भय, अनिश्चितता और जीवन-मृत्यु जैसी स्थिति में फंस जाता है, तो उसका मस्तिष्क जीवित रहने की रणनीतियां विकसित करने लगता है।

यदि अपहरणकर्ता उस दौरान बंधक को भोजन दे, पानी दे या उसे नुकसान न पहुंचाए, तो पीड़ित व्यक्ति उन छोटे-छोटे व्यवहारों को दया या सुरक्षा के रूप में देख सकता है।

धीरे-धीरे उसके मन में यह भावना विकसित हो सकती है कि वही व्यक्ति उसकी सुरक्षा का स्रोत है जो वास्तव में उसे कैद करके रखे हुए है।

कुछ विशेषज्ञ इसे “Survival Mechanism” यानी जीवित रहने की मानसिक रणनीति मानते हैं।

क्या Stockholm Syndrome कोई मानसिक बीमारी है?

दिलचस्प बात यह है कि Stockholm Syndrome दुनिया भर में प्रसिद्ध होने के बावजूद आधुनिक मनोचिकित्सा में आधिकारिक मानसिक रोग नहीं माना जाता है।

यह न तो Diagnostic and Statistical Manual of Mental Disorders (DSM-5) में शामिल है और न ही विश्व स्वास्थ्य संगठन की आधिकारिक मानसिक रोग वर्गीकरण सूची में।

कई विशेषज्ञों का तर्क है कि यह एक जटिल व्यवहारिक प्रतिक्रिया है, कोई स्पष्ट रूप से परिभाषित बीमारी नहीं। फिर भी अपराध विज्ञान, मनोविज्ञान और सामाजिक अध्ययन में इसका उल्लेख अक्सर किया जाता है।

किन परिस्थितियों में विकसित होती है यह समस्या?

विशेषज्ञों के अनुसार कुछ परिस्थितियां ऐसी होती हैं जहां Stockholm Syndrome जैसी प्रतिक्रिया देखने को मिल सकती है:

  • अपहरण या बंधक संकट
  • घरेलू हिंसा
  • मानव तस्करी
  • जबरन कैद
  • संप्रदायों (Cults) में मानसिक नियंत्रण
  • लंबे समय तक चलने वाला भावनात्मक शोषण

हालांकि हर पीड़ित में ऐसी प्रतिक्रिया विकसित हो, यह जरूरी नहीं है।

Stockholm Syndrome के संभावित संकेत

इससे जुड़े कुछ व्यवहारिक संकेत भी सामने आते हैं –  

  • अपहरणकर्ता या अत्याचारी के प्रति सहानुभूति
  • उसके बचाव में तर्क देना
  • उसके प्रति भावनात्मक लगाव महसूस करना
  • बचावकर्ताओं या पुलिस के प्रति अविश्वास
  • अत्याचार को कम करके दिखाना
  • शोषक के व्यवहार को उचित ठहराना

मनोवैज्ञानिक चेतावनी देते हैं कि इन संकेतों का अर्थ हमेशा Stockholm Syndrome नहीं होता, क्योंकि हर व्यक्ति का आघात (Trauma) अलग तरीके से प्रकट हो सकता है।

पैटी हर्स्ट का मामला

Stockholm Syndrome की चर्चा जब भी होती है, तब अमेरिकी मीडिया हस्ती Patty Hearst का नाम अक्सर सामने आता है।

1974 में पैटी हर्स्ट का अपहरण एक उग्रवादी समूह ने कर लिया था। कुछ महीनों बाद वह उसी संगठन के साथ बैंक डकैती में शामिल दिखाई दीं।

इस घटना ने दुनिया भर में बहस छेड़ दी कि क्या उन्होंने स्वेच्छा से अपराधियों का साथ दिया या वे मनोवैज्ञानिक दबाव और बंधक स्थिति के प्रभाव में थीं।

यह मामला आज भी अपराध मनोविज्ञान की सबसे चर्चित घटनाओं में गिना जाता है।

मानव तस्करी के मामलों में भी चर्चा

मानव तस्करी जैसे गंभीर मामलों में भी पीड़ित, कई बार अपने शोषकों के खिलाफ गवाही देने से हिचकिचाते हैं। यह लंबे समय तक नियंत्रण, भय और भावनात्मक निर्भरता के कारण पीड़ित व्यक्ति अपने शोषक से भावनात्मक रूप से जुड़ सकता है।

हालांकि विशेषज्ञ यह भी चेतावनी देते हैं कि हर मानव तस्करी पीड़ित पर Stockholm Syndrome का लेबल लगाना गलत होगा। प्रत्येक मामले की परिस्थितियां अलग होती हैं।

क्या घरेलू हिंसा में भी नजर आता है Stockholm Syndrome?

कई बार ऐसी घटनाएं सामने आती हैं जिसमें घरेलू हिंसा का शिकार व्यक्ति अपने हिंसक साथी को छोड़ने के बजाय उसके साथ बना रहता है। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के मामलों में भी Stockholm Syndrome जैसे तत्व दिखाई दे सकते हैं, जहां पीड़ित व्यक्ति अत्याचारी के प्रति भावनात्मक लगाव विकसित कर लेता है।

हालांकि आधुनिक शोधकर्ता अक्सर इसे “Trauma Bonding” यानी आघात आधारित भावनात्मक बंधन भी कहते हैं।

फिल्मों में प्रभाव

Stockholm Syndrome ने फिल्मों, वेब सीरीज, उपन्यासों और टीवी कार्यक्रमों को भी प्रभावित किया है।

कई कहानियों में ऐसे किरदार दिखाए जाते हैं जो अपने अपहरणकर्ता या शोषक से भावनात्मक रूप से जुड़ जाते हैं।

बर्लिन सिंड्रोम (2017)

Berlin Syndrome (2017) एक Psychological Thriller फिल्म है जिसमें एक ऑस्ट्रेलियाई फोटोग्राफर को बर्लिन में एक व्यक्ति द्वारा कैद कर लिया जाता है।

फिल्म में दिखाया गया है कि लंबे समय तक कैद और अलगाव के कारण पीड़िता में डर, भ्रम और भावनात्मक निर्भरता जैसे जटिल मनोवैज्ञानिक बदलाव विकसित होते हैं। फिल्म नियंत्रण, शक्ति और मानसिक आघात के प्रभावों को गहराई से दर्शाती है।

हाईवे (2014)

2014 में रिलीज हुई बॉलीवुड फिल्म Highway को भारत में स्टॉकहोम सिंड्रोम की चर्चा से अक्सर जोड़ा जाता है। फिल्म में Alia Bhatt द्वारा निभाया गया किरदार वीरा, अपहरण के बाद धीरे-धीरे अपने अपहरणकर्ता Randeep Hooda के प्रति भावनात्मक जुड़ाव महसूस करने लगता है।

हालांकि कई मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि फिल्म को सीधे तौर पर स्टॉकहोम सिंड्रोम का उदाहरण कहना पूरी तरह सही नहीं होगा। उनके अनुसार यह कहानी ट्रॉमा, भावनात्मक मुक्ति और व्यक्तिगत स्वतंत्रता जैसे विषयों को भी दर्शाती है।

फिर भी लोकप्रिय संस्कृति में Highway को स्टॉकहोम सिंड्रोम से जोड़कर सबसे अधिक चर्चा की जाती है।

द पॉकीप्सी टेप्स (2007)

The Poughkeepsie Tapes को अक्सर स्टॉकहोम सिंड्रोम जैसी मनोवैज्ञानिक प्रतिक्रियाओं की चर्चा में संदर्भित किया जाता है, हालांकि फिल्म सीधे इस विषय पर आधारित नहीं है।

इसमें एक सीरियल किलर अपने पीड़ितों को लंबे समय तक नियंत्रित और मानसिक रूप से तोड़ता है, जिससे कुछ मामलों में पीड़ितों का व्यवहार जटिल भावनात्मक निर्भरता जैसा दिखता है। यह अवधारणा स्टॉकहोम सिंड्रोम से मिलती-जुलती मानी जाती है।

मनी हाइस्ट (2017-वर्तमान)

नेटफ्लिक्स की मशहूर वेब सीरीज Money Heist में Denver और Mónica (Stockholm) का रिश्ता स्टॉकहोम सिंड्रोम की चर्चा का सबसे प्रसिद्ध उदाहरण माना जाता है।

Bank of Spain की डकैती के दौरान Mónica शुरिआत में एक बंधक होती है, लेकिन समय के साथ वह Denver के प्रति भावनात्मक रूप से जुड़ जाती है और अंततः अपराधियों की टीम में शामिल हो जाती है।

इस बदलाव को दर्शक Stockholm Syndrome से जोड़ते हैं, जहां पीड़ित अपने कैदकर्ता के प्रति सहानुभूति और प्रेम विकसित कर लेता है।

हालांकि विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि मनोरंजन जगत में इस अवधारणा को कई बार अतिरंजित या गलत तरीके से प्रस्तुत किया जाता है।

आज भी क्यों चर्चा में है यह शब्द?

Stockholm Syndrome का नाम भले ही 1973 की एक बैंक डकैती से जुड़ा हो, लेकिन यह अवधारणा आज भी मानव व्यवहार को समझने की कोशिश में उपयोग की जाती है।

यह हमें याद दिलाती है कि अत्यधिक तनाव, भय और नियंत्रण की परिस्थितियों में इंसानी दिमाग हमेशा वैसा व्यवहार नहीं करता जैसा सामान्य परिस्थितियों में अपेक्षित होता है।

इसी वजह से 50 वर्ष से अधिक समय बाद भी Stockholm Syndrome अपराध विज्ञान, मनोविज्ञान और सामाजिक अध्ययन की दुनिया में बहस और शोध का विषय बना हुआ है।

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MD Faijan

लेखक

मोहम्मद फैजान न्यूज़ ऑफ द डे में पत्रकार हैं, जहाँ वे खेल, मनोरंजन, राजनीति और अंतरराष्ट्रीय मामलों को कवर करते हैं। इससे पहले वे यूट्यूब चैनल स्पोर्ट्स यारी में सोशल मीडिया एग्जीक्यूटिव के रूप में कार्य कर चुके हैं, जहाँ उन्होंने डिजिटल कंटेंट मैनेजमेंट और ऑडियंस एंगेजमेंट का व्यावहारिक अनुभव प्राप्त किया। भारत के छत्तीसगढ़ राज्य के कोरिया जिले से संबंध रखने वाले फैजान आधुनिक मीडिया कार्यप्रणालियों की अच्छी समझ रखते हैं और कहानी कहने के विभिन्न रूपों में गहरी रुचि रखते हैं।

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