Operation Entebbe की 50वीं वर्षगांठ पर जानिए कैसे इज़रायल ने युगांडा में साहसिक सैन्य अभियान चलाकर बंधकों को बचाया और दुनिया को अपनी रणनीतिक क्षमता का परिचय दिया।
एंटेबे, युगांडा: कभी-कभी इतिहास में कुछ सैन्य अभियान केवल युद्ध का हिस्सा नहीं रहते, बल्कि वे साहस, रणनीति और असंभव को संभव कर दिखाने की मिसाल बन जाते हैं। 3 और 4 जुलाई 1976 की रात अफ्रीकी देश युगांडा के Entebbe International Airport पर इज़रायल द्वारा चलाया गया Operation Entebbe (जिसे शुरुआत में Operation Thunderbolt और बाद में Operation Yonatan कहा गया) ऐसा ही एक मिशन था।
लगभग 4,000 किलोमीटर दूर दुश्मन की धरती पर जाकर बंधकों को सुरक्षित वापस लाना उस दौर में लगभग असंभव माना जाता था, लेकिन इजरायली कमांडो ने इसे हकीकत में बदल दिया। आज भी इसे दुनिया के सबसे सफल और साहसी Hostage Rescue Operations में गिना जाता है।
Air France Flight 139 का अपहरण
इस पूरी घटना की शुरुआत 27 जून 1976 को होती है। Air France Flight 139 ने इज़रायल के तेल अवीव से फ्रांस की राजधानी पेरिस के लिए उड़ान भरी थी।
उड़ान का निर्धारित ठहराव Athens (Greece) में था। यहीं से चार हथियारबंद आतंकवादी विमान में सवार हुए। बाद में पता चला कि इनमें दो सदस्य फिलिस्तीनी संगठन Popular Front for the Liberation of Palestine–External Operations (PFLP-EO) से जुड़े थे, जबकि दो जर्मन उग्रवादी संगठन Revolutionary Cells के सदस्य थे।
एथेंस से उड़ान भरने के कुछ ही समय बाद आतंकवादियों ने हथियारों के बल पर विमान का नियंत्रण अपने हाथ में ले लिया। उन्होंने पायलट Michel Bacos को पहले Benghazi (Libya) जाने का आदेश दिया।
वहां विमान कई घंटों तक रुका, ईंधन भरा गया और एक महिला यात्री को चिकित्सकीय कारणों से छोड़ दिया गया। इसके बाद विमान को युगांडा के Entebbe International Airport ले जाया गया।

युगांडा को क्यों चुना गया?
उस समय युगांडा के राष्ट्रपति ईदी अमीन थे, जिनके फिलिस्तीनी संगठनों से घनिष्ठ संबंध माने जाते थे। एंटेबे एयरपोर्ट पहुंचने पर आतंकवादियों को युगांडा की सेना का सहयोग मिला। विमान को पुराने टर्मिनल के पास खड़ा किया गया और यात्रियों को उसी भवन में बंधक बनाकर रखा गया।
शुरुआत में विमान में 248 यात्री और 12 चालक दल के सदस्य थे। कुछ दिनों बाद आतंकवादियों ने गैर-इज़रायली और अधिकांश गैर-यहूदी यात्रियों को रिहा कर दिया। हालांकि Air France के कप्तान Michel Bacos और उनके चालक दल ने अपने यात्रियों को छोड़ने से इनकार कर दिया और स्वयं भी बंधकों के साथ रहने का फैसला किया। यह निर्णय बाद में उनकी बहादुरी के लिए दुनिया भर में सराहा गया।
अंततः लगभग 106 बंधक आतंकवादियों के कब्जे में रह गए। इनमें अधिकांश इज़रायली नागरिक और यहूदी मूल के विदेशी नागरिक थे।

आतंकवादियों की मांग क्या थी?
आतंकवादियों ने इजरायल, फ्रांस, पश्चिम जर्मनी, स्विट्जरलैंड और केन्या सहित विभिन्न देशों की जेलों में बंद 53 फिलिस्तीनी और सहयोगी कैदियों की रिहाई की मांग रखी। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि तय समय सीमा तक उनकी मांगें पूरी नहीं हुईं तो बंधकों को एक-एक करके मार दिया जाएगा।
इस धमकी ने पूरी दुनिया का ध्यान युगांडा की ओर खींच लिया। कई देशों ने बातचीत के जरिए समाधान निकालने की कोशिश शुरू की, जबकि इज़रायल के सामने सबसे कठिन फैसला था। क्या आतंकवादियों के सामने झुका जाए या सैन्य कार्रवाई की जाए?
इजरायल की दुविधा और रणनीति
प्रधानमंत्री यित्ज़ाक राबिन (Yitzhak Rabin) के नेतृत्व वाली इज़रायली सरकार ने शुरुआत में बातचीत का रास्ता खुला रखा, ताकि बंधकों की जान बचाई जा सके। लेकिन साथ ही रक्षा मंत्री शिमोन पेरेज़ (Shimon Peres) और सेना के शीर्ष अधिकारियों ने एक गुप्त सैन्य अभियान की तैयारी भी शुरू कर दी।

इज़रायल की खुफिया एजेंसी मोसाद (Mossad) और सैन्य खुफिया विभाग ने एंटेबे एयरपोर्ट की हर संभव जानकारी जुटानी शुरू की। इसमें सबसे बड़ी मदद उस तथ्य से मिली कि एयरपोर्ट के पुराने टर्मिनल का निर्माण वर्षों पहले एक इज़रायली कंपनी ने किया था। इससे भवन का नक्शा और संरचना पहले से उपलब्ध थी।

इसके अलावा रिहा किए गए यात्रियों से आतंकवादियों की संख्या, हथियारों की स्थिति, बंधकों की लोकेशन और युगांडा के सैनिकों की गतिविधियों की विस्तृत जानकारी ली गई। इन सूचनाओं ने आगे बनने वाली सैन्य योजना की नींव रखी।
दुनिया के सबसे साहसी मिशन योजना
इजरायल की विशेष कमांडो यूनिट सायेरेट मटकल (Sayeret Matkal) को ऑपरेशन की जिम्मेदारी सौंपी गई। मिशन का नेतृत्व लेफ्टिनेंट कर्नल Yonatan Netanyahu को दिया गया, जो बाद में इस अभियान के सबसे बड़े नायक माने गए।
सबसे बड़ी चुनौती दूरी थी। इज़रायल से युगांडा की दूरी लगभग 4,000 किलोमीटर थी। रास्ते में कई ऐसे देश थे जो इजरायली सैन्य विमानों को अपने हवाई क्षेत्र का उपयोग करने की अनुमति नहीं देते। इसके बावजूद इजरायल ने C-130 Hercules परिवहन विमानों के जरिए कमांडो भेजने का फैसला किया।
पूरे अभियान को अत्यंत गोपनीय रखा गया। विमानों को रडार से बचाने के लिए समुद्र और अफ्रीका के ऊपर बेहद कम ऊंचाई पर उड़ाया गया।
ऑपरेशन को और अधिक सफल बनाने के लिए कमांडो अपने साथ एक काली Mercedes-Benz और Land Rover वाहन भी लेकर गए। योजना यह थी कि एयरपोर्ट पर तैनात युगांडाई सैनिक कुछ समय के लिए भ्रमित हो जाएं, क्योंकि राष्ट्रपति ईदी अमीन अक्सर ऐसे ही वाहन काफिले में चलते थे। इस रणनीति से कमांडो बिना ज्यादा संदेह पैदा किए पुराने टर्मिनल तक पहुंचना चाहते थे।

ऑपरेशन की शुरुआत और एंटेबे एयरपोर्ट पर हमला
3 जुलाई 1976 की रात इज़रायल से उड़ान भरने वाले चार C-130 Hercules विमान कई घंटों की उड़ान के बाद युगांडा के Entebbe International Airport पहुंचे। मिशन में करीब 100 इज़रायली कमांडो, मेडिकल स्टाफ और एयरक्रू शामिल थे।
पूरी योजना इस तरह बनाई गई थी कि एयरपोर्ट पर मौजूद आतंकवादियों को प्रतिक्रिया देने का मौका ही न मिले।
रात के अंधेरे में विमान उतरते ही कमांडो अपनी Mercedes-Benz और Land Rover गाड़ियों के साथ पुराने टर्मिनल की ओर बढ़े।
जब युगांडाई सैनिकों को हुआ शक
शुरुआत में इज़रायली कमांडो काली Mercedes-Benz और Land Rover में एयरपोर्ट पहुंचे ताकि युगांडाई सैनिक उन्हें राष्ट्रपति ईदी अमीन का काफिला समझकर रास्ता दे दें।
लेकिन यह योजना सफल नहीं हो सकी, क्योंकि अमीन हाल ही में काली मर्सिडीज की जगह सफेद मर्सिडीज का इस्तेमाल करने लगे थे। इस बदलाव की जानकारी इजरायली खुफिया एजेंसियों के पास नहीं थी। संदेह होने पर युगांडाई सैनिकों ने गाड़ियों को रोकने की कोशिश की, जिसके बाद कमांडो ने तुरंत कार्रवाई करते हुए गोलीबारी शुरू कर दी।
कुछ ही मिनटों में बदल गया पूरा घटनाक्रम
गोलीबारी से बचते हुए कमांडो तेजी से पुराने टर्मिनल भवन में दाखिल हुए। उन्होंने हिब्रू और अंग्रेजी में बंधकों को जमीन पर लेटने का निर्देश दिया ताकि उन्हें आतंकवादियों से अलग पहचाना जा सके। इसके तुरंत बाद आतंकवादियों के साथ भीषण मुठभेड़ शुरू हो गई।
कुछ ही मिनटों में सभी सात आतंकवादी मार गिराए गए। हालांकि इस दौरान दुर्भाग्यवश तीन बंधकों की भी गोली लगने से मौत हो गई। वहीं एक बुजुर्ग महिला बंधक डोरा ब्लोच (Dora Bloch), जिन्हें पहले स्वास्थ्य कारणों से Mulago Hospital (Kampala) भेजा गया था, ऑपरेशन के समय एयरपोर्ट पर मौजूद नहीं थीं।
बाद में युगांडा की सुरक्षा एजेंसियों ने उनकी हत्या कर दी, जिसकी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कड़ी आलोचना हुई।
युगांडा की सेना से भी हुई मुठभेड़
आतंकवादियों को खत्म करने के बाद इज़रायली कमांडो का सामना युगांडा की सेना से हुआ। एयरपोर्ट परिसर में दोनों पक्षों के बीच गोलीबारी हुई, जिसमें लगभग 45 युगांडाई सैनिक मारे गए।
ऑपरेशन के दौरान इज़रायली कमांडो ने युगांडा वायुसेना के MiG-17 और MiG-21 लड़ाकू विमानों को भी नष्ट कर दिया, ताकि उनका पीछा न किया जा सके। विभिन्न स्रोतों के अनुसार, लगभग 11 लड़ाकू विमान नष्ट किए गए थे।
Yonatan Netanyahu की शहादत
इस सफल अभियान की सबसे बड़ी कीमत इजरायल को अपने कमांडर लेफ्टिनेंट कर्नल Yonatan Netanyahu के रूप में चुकानी पड़ी। एयरपोर्ट पर हुई गोलीबारी के दौरान उन्हें गोली लगी और उनकी मृत्यु हो गई। वह इस ऑपरेशन में शहीद होने वाले इकलौते इजरायली सैनिक थे।
Yonatan Netanyahu, इज़रायल के मौजूदा प्रधानमंत्री (बेंजामिन नेतन्याहू) Benjamin Netanyahu के बड़े भाई थे। उनकी बहादुरी और नेतृत्व के सम्मान में बाद में इस अभियान का नाम Operation Yonatan रखा गया। आज भी इज़रायल में उन्हें राष्ट्रीय नायक के रूप में याद किया जाता है।

केन्या की गुप्त लेकिन अहम भूमिका
Operation Entebbe की सफलता के पीछे केन्या की भूमिका भी बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है। लंबी दूरी के कारण इजरायली विमानों को वापसी के दौरान ईंधन की जरूरत थी। आधिकारिक तौर पर कई अफ्रीकी देशों ने मदद करने से इनकार कर दिया था, लेकिन केन्या ने गोपनीय रूप से सहयोग दिया।
नैरोबी के जोमो केन्याटा अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पर इजरायली विमानों को ईंधन भरने की अनुमति दी गई। वहीं कुछ घायल बंधकों और सैनिकों को प्राथमिक चिकित्सा भी उपलब्ध कराई गई।
बाद में इस सहयोग की वजह से युगांडा के राष्ट्रपति ईदी अमीन ने केन्या की कड़ी आलोचना की और दोनों देशों के संबंधों में तनाव बढ़ गया।

दुनिया की प्रतिक्रिया
ऑपरेशन के बाद अधिकांश पश्चिमी देशों ने इज़रायल की कार्रवाई की सराहना की। कई देशों ने इसे आतंकवाद के खिलाफ निर्णायक संदेश बताया। हालांकि कुछ देशों ने युगांडा की संप्रभुता के उल्लंघन का मुद्दा भी उठाया और संयुक्त राष्ट्र में इस पर चर्चा हुई।
युगांडा ने इज़रायल की कार्रवाई की निंदा की, जबकि इजरायल ने इसे अपने नागरिकों की सुरक्षा के लिए आवश्यक कदम बताया। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में इस मुद्दे पर बहस हुई, लेकिन इज़रायल के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो सकी।

दुनिया के सैन्य इतिहास में Operation Entebbe का महत्तव
इस घटना के 50 साल बाद भी Operation Entebbe को आज आधुनिक सैन्य इतिहास के सबसे सफल Special Forces Missions में गिना जाता है। इसकी कई वजहें हैं।
पहली, इज़रायली सेना ने लगभग 4,000 किलोमीटर दूर जाकर अभियान चलाया। दूसरी, पूरी कार्रवाई कुछ ही मिनटों में पूरी कर ली गई। तीसरी, बंधकों की बड़ी संख्या को सुरक्षित निकालना और आतंकवादियों को निष्क्रिय करना अपने आप में असाधारण उपलब्धि थी।
इस ऑपरेशन के बाद दुनिया के कई देशों ने अपने Counter-Terrorism Doctrine और Hostage Rescue Operations की रणनीतियों में बदलाव किए। ब्रिटेन की SAS, अमेरिका की Delta Force और अन्य विशेष बलों के प्रशिक्षण में भी इस अभियान का अध्ययन किया जाने लगा।
ये भी पढ़ें :- Simla Agreement: 1971 की जंग के बाद हुआ वह ऐतिहासिक समझौता, जिसने भारत-पाकिस्तान संबंधों की नई रूपरेखा तय की

