132 साल पहले पेरिस में लिया गया एक फैसला आज ओलंपिक आंदोलन बन चुका है, जो खेलों के जरिए करोड़ों लोगों को प्रेरित करता है। जानिए अंतर्राष्ट्रीय ओलंपिक डे का इतिहास और भारत के स्वर्णिम पल
नई दिल्ली: 23 जून कीतारीख दुनिया के खेल इतिहास में केवल एक दिन नहीं, बल्कि एक ऐसे आंदोलन की शुरुआत का प्रतीक है जिसने दुनियाभर के तमाम देशों, भाषाओं, संस्कृतियों और राजनीतिक सीमाओं से ऊपर उठकर पूरी मानवता को एक मंच पर लाने का प्रयास किया।
हर साल 23 जून को मनाया जाने वाला International Olympic Day आधुनिक ओलंपिक आंदोलन के जन्म का उत्सव है। इसी दिन वर्ष 1894 में पेरिस के सोरबोन विश्वविद्यालय में एक ऐतिहासिक बैठक के दौरान अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति (IOC) की स्थापना हुई थी, जिसने आधुनिक ओलंपिक खेलों की नींव रखी।
साल 2026 में यह दिन और भी विशेष है क्योंकि आधुनिक ओलंपिक आंदोलन की स्थापना के 132 वर्ष पूरे हो रहे हैं। दुनिया भर में लाखों लोग दौड़, खेल प्रतियोगिताओं, शैक्षणिक कार्यक्रमों और सामुदायिक आयोजनों के जरिए इस दिन को मनाते हैं।
लेकिन इस दिन की कहानी केवल खेलों की नहीं, बल्कि एक ऐसे विचार की है जिसने खेल को विश्व शांति, शिक्षा और मानव एकता का माध्यम बनाने की कोशिश की।
प्राचीन ग्रीस से आधुनिक ओलंपिक तक का सफर
ओलंपिक खेलों की जड़ें प्राचीन ग्रीस में मिलती हैं। माना जाता है कि पहली प्राचीन ओलंपिक प्रतियोगिता 776 ईसा पूर्व में ग्रीस के ओलंपिया नगर में आयोजित हुई थी।
सदियों तक ये खेल ग्रीक संस्कृति और धार्मिक परंपराओं का हिस्सा रहे। हालांकि चौथी शताब्दी के अंत में रोमन सम्राट थियोडोसियस प्रथम ने इन्हें बंद कर दिया।
लगभग 1500 वर्षों तक ओलंपिक इतिहास के पन्नों में दबे रहे। फिर 19वीं सदी के अंत में एक फ्रांसीसी शिक्षाविद और खेल सुधारक ने इन्हें पुनर्जीवित करने का सपना देखा। उनका नाम था पियरे डी कुबर्तां (Pierre de Coubertin)
वह व्यक्ति जिसने दुनिया को नया ओलंपिक दिया
पियरे डी कुबर्तां को आधुनिक ओलंपिक आंदोलन का जनक माना जाता है। उनका मानना था कि खेल केवल प्रतियोगिता नहीं, बल्कि युवाओं में अनुशासन, नेतृत्व, सम्मान और अंतरराष्ट्रीय भाईचारा विकसित करने का माध्यम हैं।
1890 के दशक में उन्होंने दुनिया के विभिन्न देशों के खेल प्रशासकों और शिक्षाविदों को एक मंच पर लाने का प्रयास शुरू किया।
16 से 23 जून 1894 के बीच पेरिस के सोरबोन विश्वविद्यालय में अंतरराष्ट्रीय खेल कांग्रेस आयोजित हुई। इसी कांग्रेस के अंतिम दिन 23 जून को अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति (IOC) के गठन का फैसला लिया गया।
साथ ही यह भी तय हुआ कि आधुनिक ओलंपिक खेलों का पहला संस्करण 1896 में ग्रीस की राजधानी एथेंस में आयोजित होगा।

IOC की स्थापना और पहले अध्यक्ष
हालांकि आधुनिक ओलंपिक आंदोलन के प्रमुख प्रेरक पियरे डी कुबर्तां थे, लेकिन IOC के पहले अध्यक्ष ग्रीस के व्यवसायी और लेखक डेमेट्रियोस विकेलस (Demetrios Vikelas) बने। ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि पहला आधुनिक ओलंपिक एथेंस में आयोजित होना था। बाद में कुबर्तां ने IOC अध्यक्ष का पद संभाला और आंदोलन को वैश्विक स्तर तक पहुंचाया।

एथेंस में सच हुआ आधुनिक ओलंपिक का सपना
IOC की स्थापना के दो वर्ष बाद 1896 में एथेंस में पहले आधुनिक ओलंपिक खेल आयोजित हुए। इसमें 14 देशों के लगभग 240 खिलाड़ियों ने हिस्सा लिया। उस समय केवल पुरुष खिलाड़ियों को प्रतियोगिता में भाग लेने की अनुमति थी।
इन 14 देशों में ऑस्ट्रेलिया, ऑस्ट्रिया, बुल्गारिया, चिली, डेनमार्क, फ्रांस, जर्मनी, ग्रेट ब्रिटेन (और आयरलैंड), ग्रीस, हंगरी, इटली, स्वीडन, स्विट्जरलैंड, संयुक्त राज्य अमेरिका (यूएसए) जैसे देश शामिल थे।
1896 का Athens Olympics बेहद सफल रहा। सीमित वैश्विक प्रतिनिधित्व और तकनीकी बाधाओं के बावजूद, इसने इतिहास में सबसे बड़ी अंतरराष्ट्रीय भागीदारी दर्ज की।
80,000 से अधिक उत्साहित दर्शकों की उपस्थिति ने इस पहले आधुनिक आयोजन को यादगार बना दिया। इस शानदार कामयाबी ने वैश्विक ओलंपिक आंदोलन को एक नया जीवन दिया।
इन खेलों ने साबित कर दिया कि अंतरराष्ट्रीय खेल आयोजन दुनिया के देशों को एक साथ ला सकते हैं। यहीं से आधुनिक ओलंपिक आंदोलन का विस्तार शुरू हुआ।

लेकिन ओलंपिक डे की शुरुआत कब हुई?
दिलचस्प बात यह है कि IOC की स्थापना 1894 में हुई, लेकिन Olympic Day मनाने की शुरुआत इसके काफी बाद से शुरु हुई।
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद IOC ने महसूस किया कि ओलंपिक मूल्यों को आम लोगों तक पहुंचाने के लिए एक विशेष दिवस होना चाहिए।
इसके बाद 1948 में आधिकारिक तौर पर Olympic Dayशुरू किया गया। इसका उद्देश्य केवल ओलंपिक खेलों का उत्सव मनाना नहीं था, बल्कि दुनिया भर के लोगों को खेलों में भागीदारी के लिए प्रेरित करना भी था।
पहला ओलंपिक डे नौ देशों में मनाया गया था, जिसमें ऑस्ट्रिया, बेल्जियम, कनाडा, ग्रेट ब्रिटेन, ग्रीस, पुर्तगाल, स्विट्जरलैंड, उरुग्वे और वेनेजुएला शामिल थे।
क्यों मनाया जाता है ओलंपिक डे?
Olympic Day का मुख्य उद्देश्य लोगों को सक्रिय जीवनशैली अपनाने, खेलों से जुड़ने और ओलंपिक मूल्यों को समझने के लिए प्रेरित करना है। यह दिन बताता है कि खेल केवल पदक जीतने का माध्यम नहीं हैं, बल्कि समाज को जोड़ने की ताकत भी रखते हैं।
ओलंपिक आंदोलन तीन प्रमुख मूल्यों पर आधारित है –
- उत्कृष्टता (Excellence)
- मित्रता (Friendship)
- सम्मान (Respect)
इन्हीं मूल्यों को दुनिया भर में बढ़ावा देने के लिए ओलंपिक डे मनाया जाता है।
‘Move, Learn and Discover’ की अवधारणा
समय के साथ ओलंपिक डे केवल खेल प्रतियोगिताओं तक सीमित नहीं रहा। IOC और राष्ट्रीय ओलंपिक समितियों ने इसे तीन स्तंभों पर आधारित कार्यक्रम में बदल दिया –
Move (चलो और सक्रिय रहो)
Learn (ओलंपिक मूल्यों को समझो)
Discover (नई संस्कृतियों और खेलों को जानो)
आज दुनिया के कई देशों में स्कूल, विश्वविद्यालय और खेल संगठन इन तीनों विचारों के आधार पर कार्यक्रम आयोजित करते हैं।
1987 में शुरू हुई Olympic Day Run
Olympic Day के इतिहास में 1987 एक महत्वपूर्ण वर्ष माना जाता है। इसी वर्ष पहली बार Olympic Day Run आयोजित की गई।
शुरुआत में 45 राष्ट्रीय ओलंपिक समितियां इससे जुड़ी थीं, लेकिन धीरे-धीरे यह दुनिया के सबसे बड़े जनभागीदारी खेल अभियानों में बदल गई। आज 150 से अधिक देशों में ओलंपिक डे रन आयोजित की जाती है।
खेल से बढ़कर एक सामाजिक आंदोलन
आज Olympic Day केवल खिलाड़ियों का दिन नहीं है। यह उन सभी लोगों का उत्सव है जो खेलों को बेहतर समाज बनाने का माध्यम मानते हैं। दुनिया भर में इस दिन फिटनेस अभियान, साइक्लिंग कार्यक्रम, सामुदायिक दौड़, स्कूल गतिविधियां, सांस्कृतिक कार्यक्रम और ऑनलाइन अभियान आयोजित किए जाते हैं। लोग इन कार्यक्रमों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं और इस ऐतिहासिक पल के गवाह बनते हैं।
हाल के वर्षों में IOC ने “Let’s Move” अभियान के जरिए लोगों को अधिक सक्रिय जीवनशैली अपनाने के लिए प्रेरित किया है। इसका उद्देश्य शारीरिक निष्क्रियता और सामाजिक अलगाव जैसी समस्याओं से निपटना भी है।
भारत के ओलंपिक में स्वर्णिम पल
1) हॉकी में 8 गोल्ड
ओलंपिक हॉकी में भारत का दबदबा ऐतिहासिक और अद्वितीय रहा है। भारतीय पुरुष हॉकी टीम ने कुल आठ स्वर्ण पदक जीतकर इतिहास रचा है, जिसमें 1928 से 1956 तक लगातार छह गोल्ड मेडल शामिल हैं।
इस स्वर्णिम सफर की शुरुआत ‘ध्यानचंद युग’ से हुई, जिसके दौरान भारत ने लगातार तीन ओलंपिक खिताब जीते।
विशेष रूप से, 1936 के बर्लिन ओलंपिक फाइनल में भारत ने नंगे पैर खेलते हुए शक्तिशाली जर्मनी को 8-1 से हराकर अपनी बेजोड़ कला और अद्वितीय वर्चस्व को दुनिया के सामने साबित किया था।
2) कर्णम मल्लेश्वरी (2000)
साल 2000 के Sydney Olympics में भारत की कर्णम मल्लेश्वरी ने भारोत्तोलन (Weightlifting) में कांस्य पदक जीतकर इतिहास रच दिया था। वह ओलंपिक पदक जीतने वाली भारत की पहली महिला एथलीट बनीं।
उनकी इस ऐतिहासिक और अभूतपूर्व सफलता ने देश की करोड़ों बेटियों को खेलों में आगे बढ़ने और वैश्विक मंच पर भारत का नाम रोशन करने के लिए प्रेरित किया।
3) अभिनव बिंद्रा (2008)
साल 2008 के Beijing Olympics में अभिनव बिंद्रा ने इतिहास रचा था। उन्होंने पुरुषों की 10 मीटर एयर राइफल स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीता। इस ऐतिहासिक जीत के साथ वह ओलंपिक में व्यक्तिगत स्वर्ण पदक जीतने वाले पहले भारतीय एथलीट बने।
उनकी इस अद्वितीय सफलता ने भारतीय खेलों में एक नए युग की शुरुआत की और देश के युवाओं को वैश्विक मंच पर चमकने की प्रेरणा दी।
4) पी.वी. सिंधु (2016,2020)
पी.वी. सिंधु ने ओलंपिक में लगातार दो व्यक्तिगत पदक जीतकर इतिहास रचा। उन्होंने 2016 के रियो ओलंपिक में रजत पदक जीता और फिर 2020 के टोक्यो ओलंपिक में कांस्य पदक अपने नाम किया।
वह यह अनोखा मुकाम हासिल करने वाली भारत की एकमात्र महिला खिलाड़ी हैं। उनकी इस निरंतरता ने उन्हें देश की सबसे सफल एथलीटों में शामिल कर दिया।
5) नीरज चोपड़ा (2020)
2020 टोक्यो ओलंपिक में नीरज चोपड़ा ने इतिहास के पन्नों में अपना नाम दर्ज कराया। उन्होंने पुरुषों की भाला फेंक (Javelin Throw) स्पर्धा में 87.58 मीटर की विशाल थ्रो के साथ स्वर्ण पदक जीता।
यह एथलेटिक्स/ट्रैक-एंड-फील्ड में भारत का अब तक का पहला ओलंपिक गोल्ड मेडल था। उनकी इस ऐतिहासिक और अभूतपूर्व कामयाबी ने पूरे देश को गौरवान्वित किया और भारतीय खेलों को एक नई ऊंचाई दी।
2026 में ओलंपिक डे का महत्व
साल 2026 में Olympic Day ऐसे समय पर मनाया जा रहा है जब दुनिया अगले बड़े ओलंपिक आयोजनों की तैयारी कर रही है। खेल जगत में समावेशन, लैंगिक समानता, मानसिक स्वास्थ्य और युवाओं की भागीदारी जैसे मुद्दे पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गए हैं।
ऐसे में ओलंपिक डे केवल अतीत को याद करने का अवसर नहीं, बल्कि भविष्य की दिशा तय करने का भी दिन है।
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