Thursday, 16 July 2026
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बिहार: जिसने दुनिया को ज्ञान दिया, वही आज पलायन और पिछड़ेपन का प्रतीक क्यों बन गया?

कभी नालंदा, विक्रमशिला, चाणक्य और आर्यभट्ट की धरती रहा बिहार आज गरीबी, पलायन और पिछड़ेपन से क्यों जोड़ा जाता है? जानिए बिहार के गौरवशाली इतिहास, पतन, राजनीति, अर्थव्यवस्था और विकास की पूरी कहानी

नई दिल्ली: किसी बड़े शहर के रेल्वे स्टेशन या बस स्टेशन पर उतने वाला एक व्यक्ति, जिसके कंधे पर  एक  बेग  और  एक हाथ में  एक बेग और आखों में उम्मीदें लेकर जब वहाँ से बाहर निकलता है और रास्ते में चलते चलते किसी अनजान से टकरा जाता और उससे यह  मजाक में कोई यह बोल देता है कि अरे बिहारी हो क्या ? यह  एक सवाल नहीं है यह उस छवि की झलक है जो पूरे देश में बिहार के साथ जुड़ चुकी है गरीबी, पलायन, मजदूरी और पिछड़ापन क्या आज बिहार की यही पहचान बनके रह गई है

क्या बिहार हमेशा से ऐसा था ?

अगर कोई व्यक्ति 1500 साल पहले समय की यात्रा करके बिहार पहुंचता, तो शायद उसे दुनिया का सबसे विकसित और ज्ञानवान क्षेत्र दिखाई देता।

यही वह भूमि थी जहां से साम्राज्य उठे, जहां से विज्ञान निकला, जहां से राजनीति की सबसे बड़ी किताबें लिखी गईं और जहां दुनिया का सबसे बड़ा विश्वविद्यालय खड़ा हुआ।

तो आखिर ऐसा क्या हुआ कि कभी दुनिया को दिशा देने वाला बिहार आज विकास की दौड़ में पीछे दिखाई देता है? क्यों बिहार का नाम सुनते ही लोग उसे एक अलग नजरिए से देखने लगते हैं?

 जब बिहार दुनिया का ज्ञान केंद्र था

आज जब हम दुनिया की महान यूनिवर्सिटीज़ की बात करते हैं, तो हार्वर्ड, ऑक्सफोर्ड और कैम्ब्रिज का नाम लेते हैं।

लेकिन इन सभी संस्थानों के अस्तित्व में आने से सदियों पहले बिहार में नालंदा विश्वविद्यालय मौजूद था। 7वीं शताब्दी में चीन से आए प्रसिद्ध यात्री और विद्वान ह्वेनसांग (Xuanzang) ने नालंदा के बारे में लिखा था कि यहां हजारों विद्यार्थी और शिक्षक अध्ययन करते थे।

वहीं इतिहासकारों के अनुसार नालंदा में लगभग 10,000 छात्र और 2,000 शिक्षक थे। यहां भारत ही नहीं, बल्कि चीन, कोरिया, जापान, तिब्बत और दक्षिण-पूर्व एशिया से भी छात्र पढ़ने आते थे। नालंदा के अलावा विक्रमशिला विश्वविद्यालय भी बिहार में ही था, जिसे उस समय दुनिया के प्रमुख शिक्षा केंद्रों में गिना जाता था।

यही वह बिहार है जहां से गणितज्ञ आर्यभट्ट ने खगोल विज्ञान और गणित को एक नई दिशा दी। यही वह क्षेत्र था जहां से चाणक्य ने राजनीति और शासन की ऐसी नीतियां लिखीं, जिन्हें आज भी पढ़ाया जाता है।

साम्राज्यों की धरती

बिहार सिर्फ शिक्षा का केंद्र नहीं था। यही प्राचीन मगध था। यहीं से चंद्रगुप्त मौर्य का साम्राज्य खड़ा हुआ। यहीं से सम्राट अशोक ने शासन किया और बौद्ध धर्म को पूरे एशिया तक फैलाया।

जब यूरोप का बड़ा हिस्सा छोटे-छोटे राज्यों में बंटा हुआ था, तब बिहार और मगध क्षेत्र विश्व के सबसे शक्तिशाली राजनीतिक केंद्रों में शामिल थे।

कैसे शुरू हुआ पतन?

इतिहास में कोई भी सभ्यता एक दिन में नहीं गिरती। बिहार का पतन भी धीरे-धीरे हुआ। 12वीं शताब्दी में विदेशी आक्रमणों के दौरान नालंदा और विक्रमशिला जैसे शिक्षा केंद्रों को नष्ट कर दिया गया और उनके पुस्तकालयों को जला दिया गया।

कहा जाता है कि नालंदा के पुस्तकालय में इतनी पुस्तकें थीं कि उसकी आग कई दिनों तक जलती रही।

हालांकि इस विषय पर इतिहासकारों के अलग-अलग मत हैं, लेकिन इतना तय  है कि इन संस्थानों का विनाश भारतीय ज्ञान परंपरा के लिए एक बड़ा झटका था।

अंग्रेज आए और तस्वीर बदल गई

Bihar के आर्थिक पिछड़ेपन की कहानी को समझने के लिए ब्रिटिश शासन को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। औपनिवेशिक शासन का उद्देश्य विकास नहीं, बल्कि संसाधनों का दोहन था।

बिहार की उपजाऊ भूमि से राजस्व लिया गया, लेकिन उद्योगों और आधुनिक बुनियादी ढांचे में पर्याप्त निवेश नहीं हुआ। जमींदारी व्यवस्था ने किसानों की स्थिति और कमजोर कर दी। जहां भारत के कुछ हिस्सों में औद्योगिक विकास शुरू हो रहा था, वहीं बिहार खेती के मामले मे पीछे रह गया

आजादी के बाद भी क्यों नहीं बदला बिहार?

जब 1947 में भारत आजाद हो गया, लेकिन Bihar की चुनौतियां खत्म नहीं हुईं। आजादी के बाद देश के कई राज्यों ने उद्योग, निर्माण और शहरीकरण पर ध्यान दिया। महाराष्ट्र में ऑटोमोबाइल उद्योग बढ़ा।

गुजरात में व्यापार और बंदरगाहों का विकास हुआ। कर्नाटक तकनीक का केंद्र बना। लेकिन Bihar औद्योगिक क्रांति से लगभग बाहर रह गया। साल 2000 में झारखंड अलग राज्य बन गया।

इसके साथ ही बिहार के अधिकांश खनिज संसाधन और कई बड़े औद्योगिक क्षेत्र भी अलग हो गए। यह बिहार की अर्थव्यवस्था के लिए बड़ा झटका साबित हुआ।

राजनीति बनाम विकास

Bihar की राजनीति ने सामाजिक बदलाव जरूर किए। वंचित वर्गों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व मिला और सामाजिक न्याय की बहस मजबूत हुई। लेकिन कई विशेषज्ञ मानते हैं कि दशकों तक राजनीति का केंद्र जातीय समीकरण बने रहे, जबकि उद्योग, शिक्षा, रोजगार और निवेश जैसे मुद्दों पर गति नहीं मिल सकी। परिणाम यह हुआ कि बड़ी आबादी होने के बावजूद रोजगार के अवसर पर्याप्त नहीं बन पाए।

पलायन: बिहार की सबसे बड़ी पहचान

आज बिहार का शायद ही कोई ऐसा परिवार होगा जिसका कोई सदस्य राज्य से बाहर काम न करता हो।

दिल्ली की निर्माण साइटों से लेकर पंजाब के खेतों तक, मुंबई की फैक्ट्रियों से लेकर बेंगलुरु के कार्यालयों तक, बिहारी हर जगह दिखाई देते हैं। विडंबना यह है कि जिस मेहनतकश समुदाय ने दूसरे राज्यों के विकास में योगदान दिया, वही अपने राज्य में पर्याप्त मौके न मिलने के कारण पलायन करने को मजबूर हुआ। धीरे-धीरे बिहारी शब्द एक क्षेत्रीय पहचान से ज्यादा मजदूर की छवि से जोड़ा जाने लगा।

प्राकृतिक आपदाओं की मार

बिहार की भौगोलिक स्थिति भी चुनौतियां पैदा करती है। कोसी, गंडक और अन्य नदियों के कारण उत्तर बिहार में हर साल बाढ़ आती है जिससे लाखों लोग प्रभावित होते हैं और फसलें बर्बाद हो जाती हैं जिससे सड़कें और बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचता है।

लेकिन क्या बिहार सिर्फ पिछड़ेपन की कहानी है?

आज भी Bihar भारत को सबसे अधिक युवा आबादी देने वाले राज्यों में से एक है।आईएएस, आईपीएस, इंजीनियरिंग, मेडिकल और प्रतियोगी परीक्षाओं में बिहार के छात्र लगातार सफलता हासिल करते हैं। यही नहीं

देश के कई बड़े पत्रकार, वैज्ञानिक, शिक्षक, लेखक और प्रशासनिक अधिकारी बिहार से आते हैं। समस्या प्रतिभा की नहीं है। समस्या अवसरों की है।

सबसे बड़ा सवाल

जब कोई Bihar का नाम सुनते ही गरीबी, मजदूरी और भ्रष्टाचार के बारे में सोचता है, तो वह सिर्फ वर्तमान देख रहा होता है। लेकिन बिहार की कहानी वर्तमान से कहीं बड़ी है। यह उस भूमि की कहानी है जिसने दुनिया को विश्वविद्यालय दिए, साम्राज्य दिए, गणितज्ञ दिए, दार्शनिक दिए और शासन की अवधारणाएं दीं।

शायद असली सवाल यह नहीं है कि Bihar पिछड़ा क्यों है। असली सवाल यह है कि जिस राज्य ने कभी दुनिया को ज्ञान दिया, वह अपनी खोई हुई पहचान को दोबारा कब हासिल करेगा?

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BN

Bureau NOTD

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