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The Battle of the Somme, 1916: जब सोम्मे की धरती पर शुरू हुआ प्रथम विश्व युद्ध का सबसे खूनी अध्याय

1 जुलाई 1916 को शुरू हुई “सोम्मे की लड़ाई” प्रथम विश्व युद्ध की सबसे खूनी लड़ाइयों में गिनी जाती है। जानिए कैसे कुछ किलोमीटर जमीन के लिए लाखों सैनिकों की जान चली गई।

सोम्मे, फ्रांस: 1 जुलाई 1916 की सुबह, उत्तरी फ्रांस की सोम्मे नदी के आसपास का इलाका तोपों की गड़गड़ाहट से कांप रहा था। ब्रिटिश सेना को विश्वास था कि एक सप्ताह तक चली भारी बमबारी के बाद जर्मन रक्षा पंक्तियां लगभग तबाह हो चुकी होंगी। हजारों सैनिक अपनी खाइयों से बाहर निकले और खुले मैदान की ओर बढ़ने लगे। लेकिन कुछ ही मिनटों में उन्हें एहसास हो गया कि वास्तविकता उनकी उम्मीदों से बिल्कुल अलग थी।

जर्मन मशीनगनों ने ऐसी आग बरसाई कि ब्रिटिश सेना के इतिहास का सबसे रक्तरंजित दिन दर्ज हो गया। केवल पहले ही दिन ब्रिटेन के लगभग 57,000 सैनिक हताहत हुए, जिनमें करीब 19,000 मारे गए। यह संख्या आज भी ब्रिटिश सैन्य इतिहास के सबसे बड़े एकदिवसीय नुकसान के रूप में दर्ज है।

आज, 1 जुलाई 2026 को, प्रथम विश्व युद्ध की सबसे चर्चित और विनाशकारी लड़ाइयों में से एक The Battle of the Somme की शुरुआत के 110 वर्ष पूरे हो रहे हैं। यह युद्ध केवल एक सैन्य अभियान नहीं था, बल्कि आधुनिक औद्योगिक युद्ध की भयावहता का ऐसा प्रतीक बन गया जिसने लाखों परिवारों की जिंदगी बदल दी।

क्यों लड़ी गई थी Battle of the Somme?

1914 में शुरू हुए प्रथम विश्व युद्ध के दो वर्षों बाद पश्चिमी मोर्चे (Western Front) पर स्थिति लगभग गतिरोध में पहुंच चुकी थी। जर्मनी, फ्रांस और ब्रिटेन की सेनाएं सैकड़ों किलोमीटर लंबी खाइयों में जमी हुई थीं।

1915 के अंत में मित्र राष्ट्रों (Allies) ने निर्णय लिया कि 1916 में जर्मन सेना के खिलाफ एक बड़ा संयुक्त हमला किया जाएगा। इसके लिए फ्रांस की सोम्मे नदी के आसपास का क्षेत्र चुना गया।

मूल योजना के अनुसार इस अभियान का नेतृत्व फ्रांसीसी सेना को करना था, जबकि ब्रिटिश सेना सहयोगी भूमिका में रहती। लेकिन फरवरी 1916 में जर्मनी ने वर्दुन (Verdun) पर विशाल हमला कर दिया। वर्दुन की लड़ाई में फ्रांस की सेना बुरी तरह उलझ गई और उसे भारी नुकसान उठाना पड़ा।

ऐसी स्थिति में सोम्मे अभियान की जिम्मेदारी काफी हद तक ब्रिटिश सेना के कंधों पर आ गई। ब्रिटिश एक्सपेडिशनरी फोर्स के कमांडर फील्ड मार्शल डगलस हेग (Douglas Haig) और फ्रांसीसी जनरल फर्डिनेंड फोश (Ferdinand Foch) इस अभियान के प्रमुख रणनीतिक नेताओं में शामिल थे।

युद्ध से पहले की तैयारियां

मित्र राष्ट्रों को विश्वास था कि जर्मन रक्षा पंक्तियों को तोपखाने की भारी बमबारी से नष्ट किया जा सकता है।

24 जून 1916 से जर्मन मोर्चों पर लगातार सात दिन तक गोलाबारी की गई। लगभग 15 लाख गोले दागे गए। ब्रिटिश नेतृत्व को उम्मीद थी कि जर्मन खाइयां और कंटीले तार पूरी तरह नष्ट हो जाएंगे।

लेकिन एक बड़ी समस्या यह थी कि कई गोले खराब गुणवत्ता के थे और फटे ही नहीं। दूसरी ओर जर्मनों ने गहरे भूमिगत बंकर बना रखे थे, जहां वे बमबारी के दौरान सुरक्षित रहे। यही गलती बाद में मित्र राष्ट्रों को बेहद महंगी पड़ी।

1 जुलाई की सुबह और ब्रिटेन की सबसे बड़ी गलती

सुबह लगभग 7:30 बजे ब्रिटिश सैनिक अपनी खाइयों से बाहर निकले और जर्मन मोर्चों की ओर बढ़ने लगे। कई सैनिकों को यह बताया गया था कि सामने लगभग कोई प्रतिरोध नहीं मिलेगा। वे भारी सामान लेकर व्यवस्थित पंक्तियों में आगे बढ़ रहे थे।

लेकिन जर्मन मशीनगन पोस्ट लगभग सुरक्षित थीं। कुछ ही मिनटों में खुला मैदान मौत के मैदान में बदल गया। ब्रिटिश सैनिकों की पूरी-पूरी टुकड़ियां मशीनगनों की चपेट में आ गईं। कई स्थानों पर सैनिक जर्मन खाइयों तक पहुंचने से पहले ही मारे गए।

पहले दिन के अंत तक लगभग 57,000 ब्रिटिश सैनिक हताहत हुए। इनमें लगभग 19,240 सैनिकों की मौत हुई। इतिहासकारों के अनुसार किसी भी एक दिन में ब्रिटिश सेना को इतना बड़ा नुकसान पहले कभी नहीं हुआ था।

सोम्मे की धरती पर महीनों तक चला नरसंहार

युद्ध केवल पहले दिन तक सीमित नहीं रहा। Battle of the Somme जुलाई से नवंबर 1916 तक लगभग साढ़े चार महीने चला। इस दौरान दोनों पक्षों ने लगातार हमले और जवाबी हमले किए।

लड़ाई के प्रमुख क्षेत्रों में पॉजियर्स (Pozières), डेलविल वुड (Delville Wood), थियपवाल (Thiepval), गिलेमोंट (Guillemont) और ब्यूमोंट-हैमेल (Beaumont-Hamel) जैसे स्थान शामिल थे। हर कुछ किलोमीटर भूमि के लिए हजारों सैनिकों की जान जा रही थी।

बरसात, कीचड़, टूटे हुए पेड़, बमों से बने विशाल गड्ढे और लगातार गोलाबारी ने पूरे इलाके को लगभग चंद्रमा जैसी वीरान भूमि में बदल दिया था।

पहली बार युद्ध में उतरे टैंक

The Battle of the Somme का एक ऐतिहासिक पहलू यह भी था कि यहीं पहली बार टैंकों का बड़े पैमाने पर सैन्य उपयोग किया गया। 15 सितंबर 1916 को फ्लेर्स-कॉर्सेलेट (Flers-Courcelette) क्षेत्र में ब्रिटेन ने मार्क-I टैंकों को मैदान में उतारा।

हालांकि शुरुआती टैंक तकनीकी रूप से कमजोर थे। कई रास्ते में खराब हो गए और उनकी गति भी बहुत कम थी। फिर भी इन मशीनों ने दुनिया को भविष्य के युद्धों की एक झलक दिखाई।

आने वाले दशकों में टैंक आधुनिक युद्ध की सबसे महत्वपूर्ण सैन्य तकनीकों में शामिल हो गए।

हवा में भी छिड़ी थी जंग

सोम्मे केवल जमीन पर लड़ी जाने वाली लड़ाई नहीं थी। रॉयल फ्लाइंग कॉर्प्स और जर्मन वायुसेना के बीच भी तीव्र संघर्ष हुआ।

हवाई टोही मिशनों ने तोपखाने को लक्ष्य तय करने में मदद की। पायलट दुश्मन की गतिविधियों पर नज़र रखते थे और कई बार हवा में डॉगफाइट भी होती थीं।

1st World War के दौरान सैन्य विमानन का महत्व तेजी से बढ़ रहा था और सोम्मे इसका बड़ा उदाहरण बना।

सैनिकों के लिए बड़ी चुनौती

सोम्मे के मोर्चे पर लड़ने वाले सैनिकों की परिस्थितियां बेहद कठिन थीं। वे संकरी और गंदी खाइयों में रहते थे। बारिश के कारण खाइयां पानी से भर जाती थीं। भोजन सीमित था और लगातार गोलाबारी का खतरा बना रहता था।

कई सैनिकों को “शेल शॉक” जैसी मानसिक समस्याओं का सामना करना पड़ा, जिसे आज पोस्ट-ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर (PTSD) के शुरुआती रूप के तौर पर देखा जाता है।

हजारों सैनिकों ने अपनी डायरी और पत्रों में उस भयावह माहौल का वर्णन किया है, जहां हर दिन मौत उनके सामने खड़ी दिखाई देती थी।

और किन देशों ने भाग लिया?

The Battle of the Somme मुख्य रूप से ब्रिटिश और फ्रांसीसी सेनाओं द्वारा जर्मन साम्राज्य के खिलाफ लड़ी गई थी।

ब्रिटिश साम्राज्य के अंतर्गत आने वाले कई देशों के सैनिक भी इसमें शामिल थे।

इसमें मुख्य रूप से –

  • ब्रिटेन
  • फ्रांस
  • कनाडा
  • ऑस्ट्रेलिया
  • न्यूज़ीलैंड
  • दक्षिण अफ्रीका
  • न्यूफ़ाउंडलैंड (उस समय अलग डोमिनियन) शामिल रहे।

विशेष रूप से न्यूफ़ाउंडलैंड रेजिमेंट को पहले दिन भारी नुकसान उठाना पड़ा। उनकी यूनिट लगभग पूरी तरह नष्ट हो गई थी।

क्या मित्र राष्ट्र जीत पाए?

तकनीकी रूप से देखें तो मित्र राष्ट्रों ने कुछ क्षेत्रीय बढ़त हासिल की। नवंबर 1916 तक वे लगभग 10 किलोमीटर तक आगे बढ़ चुके थे। लेकिन इस सफलता की कीमत बहुत भारी थी।

अनुमानों के अनुसार लड़ाई के दौरान:

  • मित्र राष्ट्रों के लगभग 6 लाख से अधिक सैनिक हताहत हुए।
  • जर्मन सेना के लगभग 4.5 से 5 लाख सैनिक हताहत हुए।

कुल मिलाकर 10 लाख से अधिक लोग मारे गए, घायल हुए या लापता हुए।

इतने बड़े नुकसान की तुलना में हासिल की गई भूमि बहुत कम थी।

इसी कारण कई इतिहासकार इस लड़ाई को “युद्ध की निरर्थकता” (The Futility of War) का प्रतीक मानते हैं।

डगलस हेग पर उठे सवाल

ब्रिटिश कमांडर डगलस हेग आज भी इस घटना के विवादास्पद व्यक्तित्व बने हुए हैं। उनके समर्थकों का कहना है कि उन्होंने जर्मन सेना को कमजोर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और अंततः मित्र राष्ट्रों की जीत की नींव रखी।

वहीं आलोचकों का तर्क है कि उन्होंने सैनिकों की जान की कीमत पर पुराने सैन्य तरीकों का इस्तेमाल किया। कई ब्रिटिश इतिहासकारों ने उन्हें “Butcher of the Somme” तक कहा, हालांकि यह उपाधि आज भी बहस का विषय है।

जर्मनी पर इसका क्या असर पड़ा?

हालांकि जर्मनी ने सोम्मे में मित्र राष्ट्रों को भारी नुकसान पहुंचाया, लेकिन उसे भी गंभीर क्षति हुई। जर्मन सेना के अनुभवी सैनिक बड़ी संख्या में मारे गए या घायल हुए।

जर्मन जनरल फ्रिट्ज वॉन बेलो (Fritz von Below) और अन्य अधिकारियों ने बाद में स्वीकार किया कि सोम्मे ने उनकी सेना की ताकत को गहराई से प्रभावित किया।

कई सैन्य इतिहासकार मानते हैं कि 1916 में वर्दुन और सोम्मे की लड़ाइयों ने जर्मनी की दीर्घकालिक सैन्य क्षमता को कमजोर कर दिया था।

इतिहास में क्यों महत्वपूर्ण है Battle of the Somme?

सोम्मे की लड़ाई कई कारणों से ऐतिहासिक महत्व रखती है। यह आधुनिक औद्योगिक युद्ध की भयावहता का प्रतीक बनी। इसने दिखाया कि मशीनगन, भारी तोपखाने और खाई युद्ध के युग में पारंपरिक सैन्य रणनीतियां कितनी महंगी साबित हो सकती हैं।

यहीं पहली बार टैंकों का उपयोग हुआ। इस युद्ध में हवाई शक्ति के बढ़ते महत्व को भी दुनिया ने देखा। और सबसे बढ़कर, यह युद्ध लाखों लोगों के लिए उस पीढ़ी की त्रासदी का प्रतीक बन गया जिसे अक्सर “Lost Generation” कहा जाता है।

110 साल बाद भी क्यों याद की जाती है यह लड़ाई?

आज फ्रांस के सोम्मे क्षेत्र में अनेक युद्ध स्मारक मौजूद हैं। थियपवाल मेमोरियल (Thiepval Memorial) पर उन हजारों ब्रिटिश और राष्ट्रमंडल सैनिकों के नाम अंकित हैं जिनके शव कभी नहीं मिल सके। हर वर्ष ब्रिटेन, फ्रांस, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और अन्य देशों से लोग यहां श्रद्धांजलि देने पहुंचते हैं।

110 वर्ष बाद भी Battle of the Somme केवल एक सैन्य संघर्ष नहीं मानी जाती। यह उस साख और सीख की याद दिलाती है, जिसमें यूरोप की महाशक्तियों ने महज कुछ किलोमीटर जमीन के लिए लाखों जिंदगियां दांव पर लगा दी थीं।

1 जुलाई 1916 को शुरू हुई यह लड़ाई आखिरकार नवंबर 1916 में समाप्त हुई, लेकिन इसकी गूंज इतिहास में आज भी सुनाई देती है। सोम्मे हमें याद दिलाती है कि युद्ध के मैदान पर जीत और हार से कहीं अधिक स्थायी चीज मानव जीवन की कीमत होती है।

ये भी पढ़ें ;- 999 Emergency Number: कैसे शुरू हुई दुनिया की पहली इमरजेंसी हेल्पलाइन, जिसने बदल दी आपातकालीन सेवाओं की तस्वीर

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MD Faijan

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लेखक

मोहम्मद फैजान न्यूज़ ऑफ द डे में पत्रकार हैं, जहाँ वे खेल, मनोरंजन, राजनीति और अंतरराष्ट्रीय मामलों को कवर करते हैं। इससे पहले वे यूट्यूब चैनल स्पोर्ट्स यारी में सोशल मीडिया एग्जीक्यूटिव के रूप में कार्य कर चुके हैं, जहाँ उन्होंने डिजिटल कंटेंट मैनेजमेंट और ऑडियंस एंगेजमेंट का व्यावहारिक अनुभव प्राप्त किया। भारत के छत्तीसगढ़ राज्य के कोरिया जिले से संबंध रखने वाले फैजान आधुनिक मीडिया कार्यप्रणालियों की अच्छी समझ रखते हैं और कहानी कहने के विभिन्न रूपों में गहरी रुचि रखते हैं।

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