द्वितीय विश्व युद्ध के बाद दुनिया एक स्थायी अंतरराष्ट्रीय आपराधिक अदालत की तलाश में थी। 1 जुलाई 2002 को ICC के गठन के साथ यह सपना साकार हुआ। जानिए इसकी स्थापना, शक्तियां, बड़े मामले और विवाद।
नई दिल्ली: कल्पना कीजिए कि किसी देश में युद्ध के दौरान हजारों निर्दोष लोगों की हत्या कर दी जाए, महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार हो, पूरे समुदाय को खत्म करने की कोशिश की जाए और अपराध करने वाले नेता अपने ही देश की सत्ता या सेना के संरक्षण में बच निकलें।
20वीं सदी के अधिकांश हिस्से में ऐसा कई बार हुआ। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद नूर्नबर्ग और टोक्यो ट्रायल जैसे विशेष न्यायाधिकरण बने, लेकिन दुनिया के पास ऐसा कोई स्थायी अंतरराष्ट्रीय न्यायालय नहीं था जो मानवता के खिलाफ अपराध करने वालों को लगातार जवाबदेह ठहरा सके।
इसी कमी को दूर करने के लिए 1 जुलाई 2002 को एक ऐतिहासिक संस्था अस्तित्व में आई, International Criminal Court (ICC)। नीदरलैंड्स के हेग शहर में स्थित यह अदालत दुनिया का पहला स्थायी अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय बनी, जिसका उद्देश्य नरसंहार, युद्ध अपराध, मानवता के खिलाफ अपराध और बाद में आक्रामक युद्ध (Crime of Aggression) जैसे गंभीर अपराधों के लिए जिम्मेदार व्यक्तियों पर मुकदमा चलाना था।
आज, अपनी स्थापना के 24 वर्ष पूरे होने पर ICC अंतरराष्ट्रीय न्याय व्यवस्था की सबसे चर्चित और विवादास्पद संस्थाओं में गिनी जाती है।
ICC की जरूरत आखिर क्यों पड़ी?
International Criminal Court की कहानी 2002 से नहीं, बल्कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद शुरू होती है। दरअसल, 1945 में युद्ध समाप्त होने के बाद मित्र देशों ने नाजी नेताओं के खिलाफ मुकदमे चलाने के लिए Nuremberg Trials आयोजित किए। इसी तरह जापानी नेताओं के खिलाफ टोक्यो ट्रायल हुए।
इन मुकदमों ने यह सिद्धांत स्थापित किया कि युद्ध अपराध केवल देशों द्वारा नहीं, बल्कि व्यक्तियों द्वारा भी किए जाते हैं और उन्हें व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। हालांकि ये न्यायाधिकरण अस्थायी थे।
अगले दशकों में दुनिया ने कई भीषण अत्याचार देखे जिसमें मुख्य रूप से –
- Cambodian Genocide
- Bosnian War
- Rwandan Genocide शामिल रहे।
विशेष रूप से 1994 में रवांडा में लगभग 8 लाख लोगों की हत्या और पूर्व यूगोस्लाविया में हुए जातीय संघर्षों ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय को झकझोर दिया।
संयुक्त राष्ट्र ने इन मामलों के लिए अलग-अलग ट्रिब्यूनल बनाए, लेकिन धीरे-धीरे यह विचार मजबूत हुआ कि दुनिया को एक स्थायी अदालत की जरूरत है।

रोम में लिखी गई नई न्यायिक व्यवस्था
17 जुलाई 1998 को इटली की राजधानी Rome में आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में 120 देशों ने ICC की स्थापना के पक्ष में मतदान किया। यहीं Rome Statute को अपनाया गया, जो ICC का संस्थापक दस्तावेज माना जाता है।
रोम संविधि के अनुसार अदालत तभी अस्तित्व में आ सकती थी जब कम से कम 60 देश इसे मंजूरी दें। 11 अप्रैल 2002 को आवश्यक संख्या पूरी हुई और 1 जुलाई 2002 को Rome Statute आधिकारिक रूप से लागू हो गया। इसी दिन ICC की औपचारिक स्थापना हुई।

ICC क्या है और कैसे काम करती है?
ICC कोई विश्व सरकार नहीं है और न ही यह संयुक्त राष्ट्र की अदालत है। यह एक स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय संस्था है, हालांकि संयुक्त राष्ट्र के साथ इसका सहयोग संबंध है। इसका मुख्यालय The Hague में स्थित है।
अदालत का अधिकार क्षेत्र चार प्रमुख अपराधों तक सीमित है:
नरसंहार (Genocide) : जब किसी जातीय, धार्मिक या राष्ट्रीय समूह को पूरी तरह या आंशिक रूप से नष्ट करने की कोशिश की जाए।
मानवता के खिलाफ अपराध (Crimes Against Humanity) : व्यापक और संगठित स्तर पर नागरिक आबादी के खिलाफ किए गए अपराध, जैसे हत्या, यातना, दासता, बलात्कार या जबरन विस्थापन।
युद्ध अपराध (War Crimes) : युद्ध के दौरान अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानूनों का उल्लंघन।
आक्रामकता का अपराध (Crime of Aggression) : जब कोई राज्य अवैध रूप से दूसरे राज्य के खिलाफ सैन्य आक्रमण करे।
किन लोगों पर चल सकता है मुकदमा?
आपको बता दें कि, International Criminal Court देशों पर नहीं, व्यक्तियों पर मुकदमा चलाती है। अर्थात राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, सैन्य कमांडर, विद्रोही नेता या अन्य प्रभावशाली व्यक्ति इसके दायरे में आ सकते हैं। ICC का यह सिद्धांत उसे अन्य कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से अलग बनाता है।
कब हस्तक्षेप कर सकती है ICC?
ICC केवल उन्हीं मामलों में हस्तक्षेप करती है, जब संबंधित देश की न्यायिक व्यवस्था गंभीर अपराधों की निष्पक्ष जांच और मुकदमा चलाने में असमर्थ या अनिच्छुक हो। इसे अंतरराष्ट्रीय कानून में “Complementarity Principle” कहा जाता है।
इसका अर्थ है कि ICC किसी देश की अदालतों का स्थान नहीं लेती, बल्कि अंतिम विकल्प (Court of Last Resort) के रूप में काम करती है। यदि किसी देश की सरकार या न्यायपालिका युद्ध अपराध, नरसंहार, मानवता के खिलाफ अपराध या आक्रामकता जैसे मामलों में कार्रवाई नहीं करती, या जानबूझकर आरोपियों को बचाने की कोशिश करती है, तब ICC जांच शुरू कर सकती है और आरोपियों के खिलाफ मुकदमा चला सकती है।
शुरुआती वर्षों की चुनौतियां
2002 में स्थापना के बाद ICC के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपनी वैधता, निष्पक्षता और वैश्विक स्वीकार्यता स्थापित करना था।
कई देशों ने इसे अंतरराष्ट्रीय न्याय की दिशा में ऐतिहासिक कदम माना, लेकिन कुछ प्रमुख शक्तियां इससे दूरी बनाए रहीं। विशेष रूप से अमेरिका, चीन, रूस और भारत ने रोम संविधि (Rome Statute) की पुष्टि नहीं की।
अमेरिका की चिंता थी कि उसके सैनिकों और अधिकारियों के खिलाफ राजनीतिक कारणों से मुकदमे चलाए जा सकते हैं। चीन और रूस ने भी अपनी संप्रभुता तथा राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों का हवाला दिया।
भारत ने भी कुछ कानूनी और नीतिगत आपत्तियों के कारण सदस्यता नहीं ली। इन बड़े देशों की अनुपस्थिति ने शुरुआती वर्षों में ICC की प्रभावशीलता और सार्वभौमिकता पर कई सवाल खड़े किए।
ICC का पहला बड़ा मामला
International Criminal Court का पहला बड़ा और ऐतिहासिक मामला थॉमस लुबांगा डायलो (Thomas Lubanga Dyilo) के खिलाफ था, जो कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य (Democratic Republic of the Congo) के एक मिलिशिया नेता थे।
उन पर 15 वर्ष से कम आयु के बच्चों की भर्ती कर उन्हें सशस्त्र संघर्ष में शामिल करने और युद्ध में इस्तेमाल करने का आरोप लगाया गया था। लंबी सुनवाई के बाद मार्च 2012 में ICC ने उन्हें दोषी ठहराया और बाद में 14 वर्ष की सजा सुनाई। यह ICC के इतिहास का पहला दोषसिद्धि निर्णय था।
इस फैसले ने बाल सैनिकों के उपयोग के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय कानून को मजबूती दी और ICC की विश्वसनीयता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

जोसेफ कोनी और LRA मामला
युगांडा के विद्रोही संगठन Lord’s Resistance Army (LRA) के नेता जोसेफ कोनी के खिलाफ ICC ने 2005 में गिरफ्तारी वारंट जारी किया था। उन पर अपहरण, बाल सैनिकों की भर्ती, हत्या, यौन हिंसा और मानवता के खिलाफ अपराधों सहित कई गंभीर आरोप लगाए गए। कोनी और उसके संगठन पर हजारों लोगों की मौत और लाखों लोगों के विस्थापन का आरोप है।
हालांकि, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लंबे प्रयासों के बावजूद वह आज तक गिरफ्तारी से बचा हुआ है। यह मामला ICC की उस चुनौती को भी दर्शाता है कि अदालत के पास अपनी पुलिस नहीं होती और उसे देशों के सहयोग पर निर्भर रहना पड़ता है।

सूडान और उमर अल-बशीर
ICC के सबसे चर्चित मामलों में से एक सूडान के पूर्व राष्ट्रपति ओमर अल-बशीर का रहा है। 2009 और 2010 में ICC ने उनके खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी किए थे। उन पर दारफुर क्षेत्र में नरसंहार, युद्ध अपराध और मानवता के खिलाफ अपराधों के आरोप लगाए गए।
यह पहली बार था जब ICC ने किसी मौजूदा राष्ट्राध्यक्ष के खिलाफ ऐसी कार्रवाई की। इस कदम ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति और न्याय व्यवस्था में व्यापक बहस छेड़ दी। हालांकि अल-बशीर लंबे समय तक गिरफ्तारी से बचते रहे, लेकिन यह मामला International Criminal Court के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मिसाल माना जाता है।

लीबिया और मुअम्मर गद्दाफी
2011 में अरब स्प्रिंग के दौरान लीबिया में सरकार विरोधी आंदोलन और हिंसा बढ़ने पर ICC ने तत्कालीन नेता मुअम्मर गद्दाफी के खिलाफ जांच शुरू की। उन पर प्रदर्शनकारियों के दमन, हत्या और मानवता के खिलाफ अपराधों के आरोप लगाए गए थे।
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद द्वारा मामला ICC को भेजे जाने के बाद अदालत ने गद्दाफी, उनके बेटे सैफ अल-इस्लाम गद्दाफी और खुफिया प्रमुख अब्दुल्ला अल-सेनुसी के खिलाफ कार्रवाई शुरू की।
हालांकि अक्टूबर 2011 में गद्दाफी की मौत हो गई, जिससे उनके खिलाफ चल रही कानूनी प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकी। फिर भी यह मामला ICC की सबसे चर्चित जांचों में शामिल है।

यूक्रेन और रूस युद्ध
हाल के वर्षों में ICC का सबसे चर्चित मामला रूस-यूक्रेन युद्ध से जुड़ा रहा है। मार्च 2023 में अदालत ने रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी किया।
ICC का आरोप था कि यूक्रेन के कब्जे वाले क्षेत्रों से बच्चों के कथित अवैध स्थानांतरण और निर्वासन से जुड़े युद्ध अपराधों की जांच के आधार पर यह कदम उठाया गया। यह मामला वैश्विक राजनीति में व्यापक चर्चा का विषय बना और ICC के इतिहास के सबसे हाई-प्रोफाइल मामलों में शामिल हो गया।

इजराइल-फिलिस्तीन जांच
International Criminal Court ने इजराइल और फिलिस्तीनी क्षेत्रों में कथित युद्ध अपराधों और मानवता के खिलाफ अपराधों के आरोपों की जांच भी शुरू की है। यह मामला अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सबसे संवेदनशील और विवादास्पद मामलों में गिना जाता है। जांच में विभिन्न पक्षों की सैन्य कार्रवाइयों और नागरिकों पर पड़े प्रभावों का अध्ययन किया जा रहा है।
समर्थकों का मानना है कि न्याय सुनिश्चित करने के लिए सभी पक्षों की निष्पक्ष जांच आवश्यक है, जबकि आलोचकों का तर्क है कि यह मामला अत्यधिक राजनीतिक और कूटनीतिक जटिलताओं से जुड़ा हुआ है। इस जांच ने वैश्विक राजनीति और अंतरराष्ट्रीय न्याय व्यवस्था पर नई बहस छेड़ दी है।

क्यों होती है ICC की आलोचना?
ICC को लेकर शुरुआत से ही कई विवाद और आलोचनाएं होती रही हैं। सबसे बड़ी आलोचना यह रही कि इसके शुरुआती वर्षों के अधिकांश मामले अफ्रीकी देशों से जुड़े थे। कई अफ्रीकी नेताओं और सरकारों ने आरोप लगाया कि अदालत अपेक्षाकृत कमजोर देशों पर अधिक ध्यान देती है, जबकि शक्तिशाली देशों और उनके सहयोगियों के मामलों में उसकी भूमिका सीमित दिखाई देती है।
इसके अलावा ICC की न्यायिक प्रक्रिया अक्सर काफी लंबी और जटिल मानी जाती है, जिसके कारण कई मामलों में फैसला आने में वर्षों लग जाते हैं। एक अन्य बड़ी चुनौती यह है कि अदालत के पास अपनी पुलिस या सैन्य बल नहीं है। इसलिए गिरफ्तारी वारंट लागू कराने के लिए उसे सदस्य देशों के सहयोग पर निर्भर रहना पड़ता है। यदि कोई देश सहयोग नहीं करता, तो आरोपी लंबे समय तक गिरफ्तारी से बच सकता है, जिससे अदालत की प्रभावशीलता पर सवाल उठते हैं।
24 साल बाद ICC की विरासत
1 जुलाई 2002 को जब International Criminal Court अस्तित्व में आई थी, तब उसके सामने एक कठिन लक्ष्य था। ऐसी दुनिया में न्याय स्थापित करना जहां राजनीति, शक्ति और राष्ट्रीय हित अक्सर कानून से टकराते हैं।
पिछले 24 वर्षों में ICC ने युद्ध अपराधों, नरसंहार और मानवता के खिलाफ अपराधों से जुड़े अनेक मामलों की जांच की है। उसने कई ऐतिहासिक फैसले दिए, शक्तिशाली नेताओं के खिलाफ वारंट जारी किए और अंतरराष्ट्रीय न्याय की अवधारणा को नई दिशा दी।
शायद यही कारण है कि 1 जुलाई 2002 को स्थापित यह अदालत आज भी दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण न्यायिक प्रयोगों में से एक मानी जाती है। एक ऐसा प्रयास, जो सीमाओं से परे जाकर न्याय की तलाश करता है।
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