Wimbledon 2010 में John Isner और Nicolas Mahut ने 11 घंटे 5 मिनट तक खेलकर ऐसा रिकॉर्ड बनाया, जिसे नए नियमों के बाद तोड़ना लगभग असंभव है। जानिए इस मैच से जुड़ी रोचक घटनाएं।
नई दिल्ली: 24 जून 2010 की शाम जब विंबलडन के कोर्ट नंबर 18 पर मौजूद हजारों दर्शक अपनी सीटों से खड़े होकर तालियां बजा रहे थे, तब वे सिर्फ एक खिलाड़ी की जीत का जश्न नहीं मना रहे थे। वे खेल इतिहास के एक ऐसे अध्याय के गवाह बने थे, जिसे दशकों तक याद किया जाएगा।
अमेरिका के जॉन इस्नर (John Isner) और फ्रांस के निकोलस माहुत (Nicolas Mahut) के बीच खेला गया यह मुकाबला सिर्फ एक टेनिस मैच नहीं था। यह धैर्य, मानसिक मजबूती, शारीरिक सहनशक्ति और खेल भावना की ऐसी परीक्षा थी, जिसने टेनिस के इतिहास को हमेशा के लिए बदल दिया।
आज उस ऐतिहासिक मुकाबले को 16 साल पूरे हो चुके हैं। लेकिन 11 घंटे 5 मिनट तक चली वह लड़ाई अब भी टेनिस की सबसे अविश्वसनीय कहानी मानी जाती है।
विंबलडन का एक साधारण मैच जो इतिहास बन गया
22 जून 2010 को Wimbledon Championship का पहला दौर चल रहा था।
दुनिया की निगाहें उस समय रोजर फेडरर, राफेल नडाल, नोवाक जोकोविच और एंडी मरे जैसे बड़े सितारों पर थीं। कोर्ट नंबर 18 पर खेले जा रहे जॉन इस्नर और निकोलस माहुत के मुकाबले को लेकर किसी विशेष उत्साह की उम्मीद नहीं थी।
जॉन इस्नर उस समय दुनिया के 23वें नंबर के खिलाड़ी थे। छह फुट दस इंच लंबे इस अमेरिकी खिलाड़ी की पहचान उनकी खतरनाक सर्विस थी।
दूसरी तरफ फ्रांस के Nicolas Mahut घास वाले कोर्ट के विशेषज्ञ माने जाते थे और Wimbledon Qualifiers जीतकर मुख्य ड्रॉ में पहुंचे थे।
पहले दिन मैच सामान्य तरीके से आगे बढ़ा। इस्नर ने पहला सेट 6-4 से जीता। माहुत ने दूसरा सेट 6-3 से अपने नाम किया।
तीसरा सेट टाईब्रेक में इस्नर ने 6-7(7) से जीता और चौथा सेट माहुत ने 7-6(3) से जीतकर मुकाबले को पांचवें और निर्णायक सेट में पहुंचा दिया।
लेकिन तभी अंधेरा बढ़ने लगा और मैच रोकना पड़ा। दर्शकों को लगा कि अगले दिन कुछ ही मिनटों में विजेता तय हो जाएगा। उन्हें नहीं पता था कि असली कहानी तो अब शुरू होने वाली थी।
शुरू हुआ दूसरे दिन का खेल
23 जून की दोपहर दोनों खिलाड़ी कोर्ट पर वापस लौटे।
उस समय Wimbledon के नियम अलग थे। तब निर्णायक पांचवें सेट में टाईब्रेक नहीं होता था। सेट जीतने के लिए खिलाड़ी को दो गेम की बढ़त हासिल करना अनिवार्य होता था।
शुरुआत में सब कुछ सामान्य लग रहा था। लेकिन जल्द ही यह स्पष्ट हो गया कि दोनों खिलाड़ियों की सर्विस तोड़ना लगभग असंभव है।
इस्नर अपनी विशाल सर्विस के दम पर लगातार अंक जीत रहे थे। माहुत भी किसी तरह पीछे नहीं हट रहे थे।
स्कोर 10-10 पहुंचा। फिर 15-15। फिर 20-20। दर्शकों ने सोचा, अब शायद कोई गलती करेगा। लेकिन कोई गलती नहीं हुई। जैसे-जैसे स्कोर आगे बढ़ता गया, तनाव भी बढ़ता गया।
देखते ही देखते स्कोर 25-25। 30-30। 35-35 तक चला गया।
अब कोर्ट नंबर 18 के आसपास भीड़ जमा होने लगी थी। दूसरे कोर्टों पर खेल खत्म हो रहे थे, लेकिन इस मुकाबले का कोई अंत दिखाई नहीं दे रहा था।
दर्शकों के चेहरों पर हैरानी साफ दिखाई दे रही थी। कमेंटेटर बार-बार यही सवाल पूछ रहे थे—”यह मैच आखिर खत्म कब होगा?” लेकिन इसका जवाब किसी के पास नहीं था।
स्कोरबोर्ड भी हो गया था परेशान
इतिहास में पहली बार Wimbledon के इलेक्ट्रॉनिक स्कोरबोर्ड को ऐसी समस्या का सामना करना पड़ा। जब स्कोर 47-47 तक पहुंचा, तो स्कोरबोर्ड सही आंकड़े दिखाने में संघर्ष करने लगा। सिस्टम को इतने बड़े स्कोर की कल्पना करके डिजाइन ही नहीं किया गया था।
दर्शक हंस रहे थे। खिलाड़ी खेल रहे थे। और तकनीक हार मान रही थी। यह दृश्य अपने आप में अविश्वसनीय था।
दुनिया भर में सुर्खियां बना यह मुकाबला
दूसरे दिन जैसे-जैसे मुकाबला लंबा होता गया, पूरी दुनिया की नजरें कोर्ट नंबर 18 पर टिक गईं। टीवी चैनलों ने अपने कार्यक्रम बदल दिए। न्यूज वेबसाइटें हर कुछ मिनट में अपडेट देने लगीं। सोशल मीडिया पर लोग स्कोर शेयर कर रहे थे।
कई दर्शक सिर्फ यह देखने के लिए टीवी के सामने बैठे रहे कि आखिर कौन पहले टूटेगा। लेकिन दोनों खिलाड़ी मानो हार मानने को तैयार ही नहीं थे। घंटों बीतते जा रहे थे। खिलाड़ियों की चाल धीमी पड़ रही थी। घुटनों पर दबाव बढ़ रहा था। पसीना लगातार बह रहा था। लेकिन आश्चर्य की बात यह थी कि दोनों खिलाड़ी अभी भी सर्विस गेम जीतते जा रहे थे।
हर गेम के बाद दोनों बेंच पर बैठते, पानी पीते और फिर अगले राउंड के लिए तैयार हो जाते। यह सिर्फ टेनिस नहीं रह गया था। यह मानसिक युद्ध बन चुका था।
59-59 पर अंधेरे के कारण रुका मैच
दूसरे दिन का खेल समाप्त होते तक भी मैच का कोई स्पष्ट नतीजा सामने नहीं आया। स्कोर 59-59 पर टाई रहा। यह अपने आप में एक अविश्वसनीय उपलब्धि थी। अकेला पांचवां सेट ही टेनिस इतिहास का सबसे लंबा सेट बन चुका था।
लेकिन फिर अंधेरा बढ़ गया। विंबलडन अधिकारियों ने खेल रोकने का फैसला लिया। जब खिलाड़ी कोर्ट से बाहर गए, तब किसी को नहीं पता था कि अगला दिन क्या लेकर आएगा।
तीसरे दिन का खेल
24 जून 2010 को जब दोनों खिलाड़ी फिर कोर्ट पर पहुंचे, तब यह मुकाबला पूरी दुनिया की सुर्खियों में था। हजारों दर्शक सुबह से ही कोर्ट नंबर 18 के आसपास जमा थे। मीडिया प्रतिनिधियों की संख्या अचानक कई गुना बढ़ चुकी थी। हर कोई इतिहास का अंत देखना चाहता था। लेकिन इतिहास अभी भी खत्म होने को तैयार नहीं था।
आखिरकार टूटा माहुत का सर्विस गेम
स्कोर 60-60 पहुंचा। फिर 65-65। फिर 68-68। हर गेम के साथ तनाव बढ़ता जा रहा था। दोनों खिलाड़ियों के चेहरों पर थकान साफ दिखाई दे रही थी। लेकिन मानसिक दृढ़ता अभी भी बरकरार थी।
फिर वह क्षण आया जिसका पूरी दुनिया इंतजार कर रही थी। 138वें गेम में जॉन इस्नर ने माहुत की सर्विस तोड़ दी।
स्कोर 69-68 हो गया। अब मैच जीतने के लिए इस्नर को सिर्फ अपनी सर्विस बचानी थी। उन्होंने ऐसा ही किया। आखिरी अंक जीतते ही इस्नर जमीन पर बैठ गए। माहुत नेट की ओर बढ़े। दोनों खिलाड़ियों ने हाथ मिलाया और पूरा स्टेडियम खड़ा होकर तालियां बजाने लगा।
आंकड़े जो आज भी अविश्वसनीय लगते हैं
यह मुकाबला कुल 11 घंटे 5 मिनट चला।
तीन दिनों तक चले इस मुकाबले का अंतिम स्कोर था:
जॉन इस्नर 6-4, 3-6, 7-6, 6-7, 70-68 निकोलस माहुत
इस मुकाबले में कुल 183 गेम खेले गए। जिसमें से 138 गेम तो केवल पांचवें सेट में हुए।
जॉन इस्नर ने 113 ऐस लगाए जबकि निकोलस माहुत ने 103 ऐस लगाए।
दोनों खिलाड़ियों ने मिलकर 216 ऐस लगाए। इनमें से कई रिकॉर्ड आज भी कायम हैं।
निकोलस माहुत भी बने हीरो
खेलों में अक्सर विजेता को याद रखा जाता है। लेकिन Wimbledon के इस मुकाबले ने यह धारणा बजल दी।
Nicolas Mahut बले ही मैच हार गए थे, लेकिन दुनिया भर के प्रशंसकों ने उन्हें भी उतना ही सम्मान दिया जितना Isner को।
कई लोगों का मानना है कि यदि माहुत मानसिक रूप से कमजोर पड़ जाते, तो यह मुकाबला कभी इतिहास नहीं बनता।
अगले दौर में क्या हुआ?
इतना लंबा मैच खेलने की कीमत भी चुकानी पड़ी। इस्नर अगले दौर में उतरे जरूर, लेकिन उनका शरीर पूरी तरह थक चुका था। उन्होंने अपना अगला मुकाबला सीधे सेटों में गंवा दिया।
यह कोई आश्चर्य की बात नहीं थी। 11 घंटे से ज्यादा कोर्ट पर बिताने के बाद किसी खिलाड़ी से सामान्य प्रदर्शन की उम्मीद करना मुश्किल था।
विंबलडन ने बदले नियम
इस मुकाबले का असर केवल रिकॉर्ड बुक तक सीमित नहीं रहा। टेनिस प्रशासकों ने महसूस किया कि ऐसे मुकाबले खिलाड़ियों के स्वास्थ्य और टूर्नामेंट शेड्यूल दोनों के लिए समस्या बन सकते हैं।
इसके बाद वर्षों तक चर्चा चलती रही। आखिरकार Wimbledon ने निर्णायक सेट में टाईब्रेक नियम लागू कर दिया। बाद में सभी ग्रैंड स्लैम टूर्नामेंटों ने भी लंबे निर्णायक सेटों को सीमित करने के लिए नए नियम अपनाए।
कई मायनों में कहा जा सकता है कि इस्नर और माहुत के मैच ने टेनिस के नियम बदल दिए।
कोर्ट नंबर 18 बना ऐतिहासिक स्थल
इस मुकाबले की याद में Wimbledon ने कोर्ट नंबर 18 पर एक विशेष स्मारक पट्टिका भी लगाई। आज भी वहां आने वाले दर्शक उस स्थान को देखने पहुंचते हैं, जहां खेल इतिहास का सबसे लंबा मैच खेला गया था। यह सिर्फ एक कोर्ट नहीं, बल्कि टेनिस इतिहास का स्मारक बन चुका है।
मैच के बाद दोनों खिलाड़ियों का रिश्ता
इतनी लंबी लड़ाई के बाद दोनों खिलाड़ियों के बीच गहरी मित्रता बन गई। दोनों ने कई बार स्वीकार किया कि यह मुकाबला उनके जीवन का सबसे यादगार अनुभव था।
माहुत ने बाद में कहा था कि वह हार गए, लेकिन उन्हें गर्व है कि वे खेल इतिहास के सबसे महान मैचों में से एक का हिस्सा बने। इस्नर ने भी कई बार कहा कि लोग उन्हें उनके करियर के किसी खिताब से ज्यादा इस मैच के लिए याद रखते हैं।
16 साल बाद भी क्यों जिंदा है यह कहानी?
आज टेनिस बदल चुका है और नई पीढ़ी के खिलाड़ी सामने आ चुके हैं।
कार्लोस अल्काराज़, यानिक सिनर और अन्य सितारे नए रिकॉर्ड बना रहे हैं। लेकिन इस्नर और माहुत के मैच का रिकॉर्ड अब भी कायम है।
और आने वाले कई दशकों या शाताब्दियों तक भी कायम रहेगा क्योंकि नए नियमों के बाद किसी मैच का 70-68 तक पहुंचना लगभग असंभव है।
खेल इतिहास की सबसे बड़ी सहनशक्ति की परीक्षा
जब भी खेलों में महान मुकाबलों की बात होती है, तो अक्सर World Cup Final, Olympics Final या Grand Slam Final का जिक्र होता है। लेकिन John Isner और Nicolas Mahut का मुकाबला अलग श्रेणी में आता है।
यह ट्रॉफी जीतने का मैच नहीं था। यह फाइनल भी नहीं था। यह सिर्फ पहले दौर का मुकाबला था। फिर भी यह खेल इतिहास के सबसे यादगार आयोजनों में शामिल हो गया।
इसीलिए John Isner और Nicolas Mahut का मुकाबला सिर्फ टेनिस का सबसे लंबा मैच नहीं, बल्कि खेल इतिहास की सबसे अविश्वसनीय मानवीय सहनशक्ति की कहानियों में से एक माना जाता है। 16 साल बाद भी जब इसकी चर्चा होती है, तो खेल प्रेमियों को यकीन नहीं होता कि एक टेनिस मैच वास्तव में तीन दिन तक चला था।
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