1934 की एक रात में दर्जनों लोगों की हत्या, गिरफ्तारियां और सत्ता का खेल। जानिए ‘Night of the Long Knives’ ने कैसे हिटलर को निर्विवाद शासक बना दिया।
नई दिल्ली: सत्ता की राजनीति में विश्वासघात कोई नई बात नहीं है। लेकिन इतिहास में कुछ घटनाएं ऐसी होती हैं, जहां सत्ता बचाने के लिए उठाया गया कदम पूरी दुनिया की दिशा बदल देता है। 30 जून 1934 की रात जर्मनी में कुछ ऐसा ही हुआ था।
यह वह रात थी जब एडोल्फ हिटलर ने अपने राजनीतिक विरोधियों पर नहीं, बल्कि अपने ही साथियों पर हमला बोल दिया। जिन लोगों ने नाजी आंदोलन को सड़कों से उठाकर सत्ता के गलियारों तक पहुंचाने में मदद की थी, वही अचानक “राज्य के दुश्मन” घोषित कर दिए गए।
कुछ घंटों के भीतर गिरफ्तारियां शुरू हुईं, गोलियां चलीं, घरों पर छापे पड़े और दर्जनों लोग बिना किसी मुकदमे के मार दिए गए। इतिहास इस घटना को “Night of the Long Knives” (लंबी छुरियों की रात) के नाम से जानता है।
30 जून से 2 जुलाई 1934 तक चले इस खूनी अभियान ने न केवल नाजी पार्टी का आंतरिक शक्ति संतुलन बदल दिया, बल्कि हिटलर को जर्मनी का निर्विवाद शासक भी बना दिया। कई इतिहासकार इसे वह क्षण मानते हैं जब लोकतांत्रिक संस्थाओं के अवशेष भी खत्म होने लगे और जर्मनी तेजी से पूर्ण तानाशाही की ओर बढ़ गया।
सत्ता के बाद भी असुरक्षित हिटलर
जनवरी 1933 में Adolf Hitler जर्मनी का चांसलर बन चुका था। नाजी पार्टी सत्ता में थी और उसका प्रभाव तेजी से बढ़ रहा था। लेकिन इसके बावजूद हिटलर की स्थिति उतनी मजबूत नहीं थी जितनी बाद के वर्षों में दिखाई देती है।
उस समय जर्मनी की सेना में बड़े उद्योगपति, नौकरशाही और राष्ट्रपति पॉल वॉन हिंडनबर्ग (Paul von Hindenburg) जैसी संस्थाएं और व्यक्ति बेहद प्रभावशाली थे। नाजी पार्टी के भीतर भी कई शक्ति केंद्र मौजूद थे। इनमें सबसे बड़ा था SA (Sturmabteilung), जिसे आमतौर पर “ब्राउनशर्ट्स” कहा जाता था।
SA वही संगठन था जिसने नाजी आंदोलन के शुरुआती दिनों में सड़क स्तर पर लड़ाइयां लड़ी थीं। कम्युनिस्टों और अन्य राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ हिंसक अभियानों में इसकी बड़ी भूमिका रही थी। 1934 तक इसकी सदस्य संख्या लगभग 30 लाख तक पहुंच चुकी थी, जबकि जर्मन सेना की संख्या केवल एक लाख के आसपास थी।
SA के प्रमुख एर्न्स्ट रोहम (Ernst Röhm) थे, जो नाजी आंदोलन के पुराने स्तंभों में से एक थे। लेकिन यहीं से समस्या शुरू हुई। रोहम का मानना था कि नाजी क्रांति अभी अधूरी है। वे चाहते थे कि जर्मनी में व्यापक सामाजिक और आर्थिक बदलाव किए जाएं।
सबसे विवादास्पद बात यह थी कि वे जर्मन सेना को SA में विलय कर देश की मुख्य सैन्य शक्ति बनाना चाहते थे। यह विचार सेना को बिल्कुल स्वीकार नहीं था।
सेना, उद्योगपति और रूढ़िवादी वर्ग की चिंता
जर्मन सेना स्वयं को देश की सबसे पेशेवर और अनुशासित संस्था मानती थी। उसके वरिष्ठ अधिकारियों को लगता था कि SA एक राजनीतिक भीड़ है, जिसे सैन्य शक्ति नहीं सौंपी जा सकती।
उधर उद्योगपति और रूढ़िवादी राजनेता भी रोहम के विचारों से असहज थे। उन्हें डर था कि SA का बढ़ता प्रभाव देश में अस्थिरता पैदा कर सकता है। 1934 के शुरुआती महीनों में सेना और राजनीतिक वर्ग की ओर से हिटलर पर दबाव बढ़ने लगा कि वह SA को नियंत्रित करे।
इस बीच राष्ट्रपति पॉल वॉन हिंडनबर्ग की तबीयत भी लगातार खराब हो रही थी। हिटलर जानता था कि उनकी मृत्यु के बाद उसे सत्ता का और बड़ा अवसर मिल सकता है। लेकिन इसके लिए सेना का समर्थन आवश्यक था।
यानी हिटलर के सामने एक कठिन विकल्प था। पुराने सहयोगी रोहम या जर्मन सेना। इस द्वंद्व के बीच Adolf Hitler ने सेना को चुना।

हिटलर के कान भरने वाले लोग
इस पूरे घटनाक्रम में हाइनरिख हिमलर, हरमन गोरिंग और राइनहार्ड हेड्रिख जैसे नेताओं की भूमिका भी महत्वपूर्ण थी। ये सभी नाजी नेतृत्व के प्रभावशाली सदस्य थे और SA के बढ़ते प्रभाव से खुश नहीं थे।

विशेष रूप से हिमलर की SS (Schutzstaffel) संगठन उस समय SA की तुलना में छोटी थी, लेकिन तेजी से शक्ति हासिल करना चाहती थी। हिमलर और हेड्रिख ने हिटलर को यह विश्वास दिलाया कि रोहम और उनके समर्थक कथित रूप से सरकार के खिलाफ साजिश रच रहे हैं।
इतिहासकारों में इस बात पर मतभेद है कि वास्तव में कोई तख्तापलट की योजना थी या नहीं, लेकिन यह स्पष्ट है कि हिटलर ने इस आरोप को कार्रवाई का आधार बना लिया।
30 जून 1934: जब ऑपरेशन शुरू हुआ
30 जून की सुबह Adolf Hitler स्वयं बैड वीसे पहुंचा। वहां रोहम और SA के कई वरिष्ठ नेता एक बैठक के लिए मौजूद थे।
हिटलर ने अचानक होटल में प्रवेश किया और नेताओं को गिरफ्तार करने का आदेश दिया। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार उसने रोहम को देशद्रोह का आरोपी बताते हुए हिरासत में लेने का निर्देश दिया। इसी के साथ पूरे जर्मनी में कार्रवाई शुरू हो गई।
SS, गेस्टापो और अन्य सुरक्षा एजेंसियों ने संदिग्ध लोगों को पकड़ना शुरू कर दिया। कई लोगों को उनके घरों से उठा लिया गया। कुछ को जेल भेजा गया, जबकि कई लोगों को बिना किसी मुकदमे के गोली मार दी गई।
कई पुराने विरोधी भी बने निशाना
Night of the Long Knives केवल SA के खिलाफ अभियान नहीं था। हिटलर ने इसका इस्तेमाल अपने अन्य राजनीतिक विरोधियों को खत्म करने के लिए भी किया।
पूर्व नाजी नेता ग्रेगर स्ट्रासर (Gregor Strasser) को मार दिया गया। स्ट्रासर कभी पार्टी के प्रमुख नेताओं में शामिल थे, लेकिन बाद में उनका हिटलर से मतभेद हो गया था।
पूर्व जर्मन चांसलर कर्ट वॉन श्लाइचर (Kurt von Schleicher) और उनकी पत्नी की भी हत्या कर दी गई। श्लाइशर पहले जर्मन राजनीति में प्रभावशाली व्यक्ति रह चुके थे और हिटलर उन्हें संभावित खतरे के रूप में देखता था।
कैथोलिक कार्यकर्ता एरिख क्लाउज़ेनर (Erich Klausener) भी इस अभियान का शिकार बने। इसके अलावा कई पत्रकार, प्रशासनिक अधिकारी और राजनीतिक कार्यकर्ता भी मारे गए।
इतिहासकारों का मानना है कि कुछ लोगों की हत्या राजनीतिक कारणों से हुई, जबकि कुछ मामले व्यक्तिगत दुश्मनी और सत्ता संघर्ष से भी जुड़े थे।
एर्न्स्ट रोहम का अंत
गिरफ्तारी के बाद रोहम को म्यूनिख की स्टैडेलहाइम जेल (Stadelheim Prison) में रखा गया। 1 जुलाई 1934 को उन्हें एक पिस्तौल दी गई और आत्महत्या करने का अवसर दिया गया। लेकिन उन्होंने ऐसा करने से इनकार कर दिया।
इसके बाद SS अधिकारियों ने उनकी कोठरी में प्रवेश किया और उन्हें गोली मार दी। रोहम की मौत केवल एक व्यक्ति का अंत नहीं थी। यह उस शक्ति केंद्र के पतन का प्रतीक थी जिसने कभी नाजी आंदोलन को सड़कों से उठाकर राष्ट्रीय राजनीति तक पहुंचाया था।

कितने लोग मारे गए?
नाजी सरकार ने आधिकारिक रूप से लगभग 77 मौतों को स्वीकार किया था। लेकिन बाद के ऐतिहासिक अध्ययनों में यह संख्या कहीं अधिक बताई गई।
अधिकांश शोधकर्ता मानते हैं कि मृतकों की वास्तविक संख्या 85 से 200 के बीच हो सकती है। कुछ इतिहासकार इससे भी अधिक संख्या का अनुमान लगाते हैं।
कई हत्याएं कभी आधिकारिक रिकॉर्ड में दर्ज नहीं की गईं, इसलिए सटीक आंकड़ा आज भी विवाद का विषय बना हुआ है।

हिटलर ने इस कार्रवाई को वैध ठहराया
13 जुलाई 1934 को जर्मन संसद में दिए गए भाषण में Adolf Hitler ने कहा कि उसने राष्ट्र को बचाने के लिए यह कदम उठाया। उसने स्वयं को “जर्मन जनता का सर्वोच्च न्यायाधीश” बताया और दावा किया कि यदि वह कार्रवाई नहीं करता तो देश गृहयुद्ध की ओर बढ़ सकता था।
नाजी प्रचार मशीन ने भी यही संदेश फैलाया। अखबारों और सरकारी प्रचार माध्यमों में इसे देशद्रोहियों के खिलाफ आवश्यक कदम के रूप में प्रस्तुत किया गया।
इसके बाद जर्मन सरकार ने एक कानून पारित कर इन हत्याओं को कानूनी मान्यता भी दे दी। यानी जिन लोगों को बिना मुकदमे और बिना न्यायिक प्रक्रिया के मार दिया गया था, उनकी हत्या को बाद में वैध घोषित कर दिया गया।
इस घटना से हिटलर को क्या मिला?
नाइट ऑफ द लॉन्ग नाइव्स (Night of the Long Knives) का सबसे बड़ा लाभ हिटलर को मिला। सबसे पहले, उसने नाजी पार्टी के भीतर संभावित विरोधियों को समाप्त कर दिया। दूसरा, उसने जर्मन सेना का विश्वास जीत लिया। सेना अब उसे स्थिरता और व्यवस्था का प्रतीक मानने लगी।
फिर 2 अगस्त 1934 को राष्ट्रपति पॉल वॉन हिंडनबर्ग की मृत्यु हो गई। हिटलर ने तुरंत राष्ट्रपति और चांसलर के पदों को मिलाकर स्वयं को फ्यूहरर (Führer) घोषित कर दिया। अब जर्मनी में उसके ऊपर कोई प्रभावी संवैधानिक नियंत्रण नहीं बचा था।
कई इतिहासकार मानते हैं कि यदि नाइट ऑफ द लॉन्ग नाइव्स नहीं होती, तो हिटलर के लिए इतनी आसानी से पूर्ण सत्ता हासिल करना संभव नहीं होता।
SS का उदय
इस अभियान के बाद सबसे बड़ा लाभ SS को मिला। हिमलर के नेतृत्व में SS तेजी से जर्मनी की सबसे शक्तिशाली सुरक्षा संस्था बन गई। आने वाले वर्षों में यही संगठन कंसन्ट्रेशन कैंपों के संचालन, राजनीतिक दमन और होलोकॉस्ट जैसे अपराधों में केंद्रीय भूमिका निभाने वाला था।
दूसरी ओर SA का प्रभाव तेजी से कम हो गया और वह कभी भी पहले जैसी शक्ति हासिल नहीं कर सकी।
इतिहास में क्यों महत्वपूर्ण है यह घटना?
Night of the Long Knives को केवल एक राजनीतिक सफाया कहना पर्याप्त नहीं होगा। यह वह क्षण था जब हिटलर ने यह स्पष्ट कर दिया कि उसकी सत्ता के सामने कानून, संस्थाएं और व्यक्तिगत संबंध कोई मायने नहीं रखते।
उसने अपने सबसे पुराने सहयोगियों तक को हटाने में संकोच नहीं किया। इस घटना ने जर्मनी की सेना को अपने पक्ष में कर लिया, नाजी पार्टी के भीतर विरोध खत्म कर दिया और तानाशाही की राह लगभग पूरी तरह साफ कर दी।
कुछ ही वर्षों बाद दुनिया ने द्वितीय विश्व युद्ध देखा। लाखों नहीं, करोड़ों लोग मारे गए। होलोकॉस्ट जैसी भयावह त्रासदी हुई और यूरोप का नक्शा बदल गया।
इसलिए इतिहासकारों के लिए 30 जून 1934 केवल राजनीतिक हत्याओं की तारीख नहीं है। यह वह दिन है जब जर्मनी में तानाशाही ने अपने सबसे खतरनाक रूप की ओर निर्णायक कदम बढ़ाया था। Night of the Long Knives आज भी इस बात की याद दिलाती है कि जब सत्ता पर संस्थागत नियंत्रण कमजोर पड़ जाता है, तो लोकतंत्र से तानाशाही तक का सफर बहुत तेजी से तय हो सकता है।
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