जानिए 7 जुलाई 1896 को भारत में हुई पहली फिल्म स्क्रीनिंग की पूरी कहानी। Watson’s Hotel, Lumière Brothers और भारतीय सिनेमा की शुरुआत का इतिहास।
मुंबई: कल्पना कीजिए कि आपके सामने एक सफेद पर्दा लगा हो। अचानक उस पर एक चलती हुई ट्रेन दिखाई दे। लोग अपनी सीटों से घबरा जाएं, कुछ डरकर पीछे हट जाएं और कुछ हैरानी से एक-दूसरे का चेहरा देखने लगें। आज यह दृश्य सामान्य लगता है, लेकिन 19वीं सदी के अंत में यह किसी जादू से कम नहीं था।
7 जुलाई 1896 का दिन भारतीय सांस्कृतिक इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण तारीखों में गिना जाता है। इसी दिन तत्कालीन बॉम्बे (आज का मुंबई) स्थित Watson’s Hotel में पहली बार भारत के लोगों ने चलती हुई तस्वीरों (Moving Pictures) को बड़े पर्दे पर देखा। यह प्रदर्शन फ्रांस के प्रसिद्ध ल्यूमियर बंधुओं (Lumière Brothers) द्वारा विकसित Cinematograph मशीन के माध्यम से किया गया था।
उस समय शायद ही किसी ने सोचा होगा कि यह छोटा-सा फिल्म प्रदर्शन आने वाले वर्षों में दुनिया के सबसे बड़े फिल्म उद्योगों में से एक भारतीय सिनेमा की नींव बन जाएगा।
फ्रांस के दो भाइयों ने बदल दी मनोरंजन की दुनिया
भारतीय सिनेमा की शुरुआत समझने के लिए सबसे पहले उन दो भाइयों को जानना जरूरी है, जिनकी वजह से यह संभव हो सका।
ऑगस्टे लुमिएर (Auguste Lumière) और लुई लुमिएर (Louis Lumière) का जन्म फ्रांस में हुआ था। उनके पिता Antoine Lumière फोटोग्राफी के व्यवसाय से जुड़े थे।
बचपन से ही दोनों भाइयों की रुचि कैमरे, प्रकाश और तस्वीरों में थी। उस समय दुनिया में फोटोग्राफी लोकप्रिय हो रही थी, लेकिन तस्वीरों को चलाने का कोई आसान तरीका मौजूद नहीं था।
अमेरिकी वैज्ञानिक Thomas Edison ने Kinetoscope नामक उपकरण बनाया था, लेकिन उसमें एक समय में केवल एक व्यक्ति ही फिल्म देख सकता था। लुमिएर बंधुओं ने इसे बदलने का निर्णय लिया।

Cinematograph ने बदला पूरा खेल
1895 में दोनों भाइयों ने Cinematograph विकसित किया। यह उस समय की सबसे आधुनिक मशीनों में से एक थी क्योंकि यह तीनों काम कर सकती थी—
- कैमरे की तरह फिल्म रिकॉर्ड करना
- फिल्म को विकसित करना
- बड़े पर्दे पर प्रोजेक्टर की तरह दिखाना
सबसे बड़ी बात यह थी कि पहली बार दर्जनों लोग एक साथ बैठकर फिल्म देख सकते थे। यही तकनीक आगे चलकर आधुनिक फिल्म उद्योग की आधारशिला बनी।
दुनिया का पहला सार्वजनिक फिल्म प्रदर्शन
28 दिसंबर 1895 को फ्रांस की राजधानी पेरिस के Salon Indien du Grand Café में Lumière Brothers ने दुनिया का पहला व्यावसायिक सार्वजनिक फिल्म प्रदर्शन किया।
दर्शकों ने पहली बार चलती हुई तस्वीरें देखीं। उनकी छोटी-छोटी फिल्मों में रोजमर्रा की जिंदगी दिखाई गई थी।
इन फिल्मों की सफलता इतनी बड़ी थी कि कुछ ही महीनों में लुमिएर कंपनी ने अपने प्रतिनिधियों को दुनिया के अलग-अलग देशों में भेजना शुरू कर दिया।
भारत तक कैसे पहुंचा सिनेमा?
1896 में यूरोप और एशिया के कई शहरों में फिल्म प्रदर्शन शुरू हो चुके थे। इसी क्रम में Lumière Brothers के प्रतिनिधि भारत भी पहुंचे। उन्होंने उस समय के व्यापारिक और सांस्कृतिक केंद्र मुंबई को चुना।
उस दौर में बॉम्बे ब्रिटिश भारत का सबसे आधुनिक शहर माना जाता था। यहां स्थित Watson’s Hotel अपने समय के सबसे प्रतिष्ठित होटलों में गिना जाता था।
लोहे की संरचना वाला यह होटल ब्रिटिश अधिकारियों, व्यापारियों और विदेशी मेहमानों का प्रमुख ठिकाना था। यही होटल भारतीय सिनेमा के इतिहास का पहला थिएटर भी बना।
भारत ने पहली बार फिल्म देखी
7 जुलाई 1896 की शाम Watson’s Hotel में एक विशेष आयोजन किया गया। यह कोई सामान्य कार्यक्रम नहीं था। यहां पहली बार भारत के लोगों को चलती हुई तस्वीरें दिखाई जाने वाली थीं।
इस प्रदर्शन के लिए टिकट रखे गए थे। मुख्य रूप से इसमें ब्रिटिश अधिकारी, यूरोपीय व्यापारी, शिक्षित भारतीय, पत्रकार और बॉम्बे के प्रतिष्ठित नागरिक मौजूद थे। उस समय किसी को अंदाजा नहीं था कि वे इतिहास का हिस्सा बनने जा रहे हैं।

कौन-कौन सी फिल्में दिखाई गईं?
Lumière Brothers ने उस दिन अपनी कई प्रसिद्ध छोटी फिल्मों का प्रदर्शन किया।
इनमें –
- Arrival of a Train at La Ciotat Station
- Workers Leaving the Lumière Factory
- The Sprinkler Sprinkled (L’Arroseur Arrosé)
- Baby’s Breakfast
- Fishing for Goldfish
- Demolition of a Wall को मुख्य रूप से शआमिल किया गया था।
ये सभी फिल्में केवल कुछ सेकंड या लगभग एक मिनट लंबी थीं। इनमें कोई संवाद नहीं था। कोई संगीत रिकॉर्ड नहीं था। लेकिन दर्शकों के लिए यह किसी चमत्कार से कम नहीं था।
ट्रेन वाली फिल्म ने सबको चौंका दिया
इस प्रदर्शनी के दौरान सबसे ज्यादा चर्चा फिल्म Arrival of a Train की हुई। जब पर्दे पर तेज गति से आती ट्रेन दिखाई दी, तो कई दर्शकों को लगा कि ट्रेन सचमुच उनकी ओर आ रही है।
हालांकि बाद में इस घटना को लेकर कई किस्से बढ़ा-चढ़ाकर बताए गए, लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं कि उस समय चलती हुई तस्वीरें लोगों के लिए बिल्कुल नया अनुभव थीं।
भारतीय दर्शकों ने पहली बार महसूस किया कि कैमरा केवल तस्वीरें नहीं बल्कि समय को भी कैद कर सकता है।

जब बॉम्बे में मची नई तकनीक की चर्चा
Watson’s Hotel की पहली स्क्रीनिंग इतनी सफल रही कि अगले कुछ दिनों तक लगातार अतिरिक्त शो आयोजित किए गए। इसके बाद बॉम्बे के Novelty Theatre सहित अन्य स्थानों पर भी फिल्म प्रदर्शन शुरू हुआ।
अखबारों में इस नई तकनीक की खूब चर्चा हुई। लोग इसे “जीवित तस्वीरें”, “चलती तस्वीरें” और “दुनिया का नया चमत्कार” कहने लगे।
इन्हीं दर्शकों में एक ऐसा भारतीय भी मौजूद था, जिसने यह तय कर लिया कि अब केवल विदेशी फिल्में देखना काफी नहीं है। बल्कि भारत को अपनी फिल्में भी बनानी चाहिए।
उस व्यक्ति का नाम था हरीशचंद्र सखाराम भटवडेकर, जिन्हें पूरी दुनिया सावे दादा के नाम से जानती है।
जब सावे दादा ने भारत का पहला कैमरा मंगवाया
Watson’s Hotel में हुई उस ऐतिहासिक स्क्रीनिंग ने केवल दर्शकों का मनोरंजन नहीं किया, बल्कि कुछ लोगों के भीतर एक नया सपना भी जगा दिया। इन्हीं में से एक थे हरीशचंद्र सखाराम भटवडेकर, जिन्हें इतिहास सावे दादा (Save Dada) के नाम से याद करता है।
सावे दादा पेशे से फोटोग्राफर थे और बॉम्बे में उनका फोटो स्टूडियो था। लुमिएर ब्रदर्स की फिल्मों ने उन्हें इतना प्रभावित किया कि उन्होंने तय कर लिया कि भारत को अपनी घटनाओं और अपने लोगों को भी कैमरे में कैद करना चाहिए।
उन्होंने लंदन से Cinematograph कैमरा मंगवाया। माना जाता है कि वे फिल्म कैमरा खरीदने वाले पहले भारतीयों में शामिल थे। इसके बाद उन्होंने भारत में फिल्म निर्माण की शुरुआत की और यहीं से भारतीय फिल्म निर्माण (Film Making) का पहला अध्याय लिखा गया।

भारत की पहली फिल्में कैसे बनीं?
1899 में सावे दादा ने अपनी पहली फिल्म बनाई, जिसका नाम था The Wrestlers (पहलवान)। इस फिल्म में मुंबई के हैंगिंग गार्डन में आयोजित एक कुश्ती मुकाबले को रिकॉर्ड किया गया था। इसे भारत की पहली डॉक्यूमेंट्री अथवा “Actuality Film” माना जाता है।
इसके बाद उन्होंने कई अन्य वास्तविक घटनाओं को कैमरे में रिकॉर्ड किया। इनमें सार्वजनिक समारोह, सामाजिक कार्यक्रम और प्रसिद्ध व्यक्तियों के स्वागत जैसे दृश्य शामिल थे।
उनकी फिल्मों में किसी प्रकार की काल्पनिक कहानी नहीं होती थी, बल्कि वे वास्तविक जीवन को कैमरे में उतारने का प्रयास करते थे। यही वजह है कि सावे दादा को भारतीय वृत्तचित्र (Documentary) सिनेमा का भी अग्रदूत माना जाता है।

बंगाल में भी शुरू हुआ फिल्म निर्माण
इसी दौरान कोलकाता (तत्कालीन कलकत्ता) में हीरालाल सेन (Hiralal Sen) भी चलचित्रों के क्षेत्र में प्रयोग कर रहे थे।
उन्होंने थिएटर प्रस्तुतियों की रिकॉर्डिंग शुरू की और बाद में विज्ञापन फिल्मों के निर्माण का भी प्रयास किया। हालांकि उनकी अधिकांश फिल्में बाद में आग में नष्ट हो गईं, लेकिन भारतीय सिनेमा के शुरुआती इतिहास में उनका योगदान बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।
इस तरह मुंबई और कलकत्ता दोनों शहर भारतीय फिल्म निर्माण के शुरुआती केंद्र बन गए।
दादासाहेब फाल्के ने दिया भारतीय सिनेमा को नया रूप
अगर सावे दादा ने भारतीय फिल्म निर्माण की शुरुआत की, तो दादासाहेब फाल्के (Dadasaheb Phalke) ने उसे एक उद्योग का रूप दिया। कहा जाता है कि 1910 के आसपास उन्होंने विदेशी फिल्म The Life of Christ देखी।
फिल्म देखकर उनके मन में विचार आया कि यदि विदेशी अपने धार्मिक और सांस्कृतिक विषयों पर फिल्म बना सकते हैं, तो भारत की अपनी कहानियां भी पर्दे पर आनी चाहिए।
इसके बाद उन्होंने महीनों तक फिल्म निर्माण की तकनीक सीखी, विदेश से उपकरण मंगवाए और अपने परिवार की मदद से फिल्म बनाने का काम शुरू किया।
1913 में बनी भारत की पहली फीचर फिल्म
3 मई 1913 को मुंबई के Coronation Cinema में दादासाहेब फाल्के की फिल्म राजा हरिश्चंद्र (Raja Harishchandra) प्रदर्शित हुई। यह भारत की पहली पूर्ण लंबाई (Full-Length) की फीचर फिल्म मानी जाती है।
फिल्म पूरी तरह मूक (Silent) थी। उस समय महिलाओं का फिल्मों में अभिनय करना सामाजिक रूप से स्वीकार्य नहीं था, इसलिए रानी तारामती का किरदार भी पुरुष कलाकार अन्ना सालुंके (Anna Salunke) ने निभाया।
राजा हरिश्चंद्र की सफलता ने साबित कर दिया कि भारत अपने दर्शकों के लिए अपनी कहानियों पर आधारित फिल्में बना सकता है। इसके बाद देशभर में फिल्म निर्माण की रफ्तार तेजी से बढ़ने लगी।

मूक फिल्मों से बोलती फिल्मों तक का सफर
1913 से 1930 के बीच भारत में सैकड़ों मूक फिल्में बनीं। पौराणिक कथाएं, ऐतिहासिक घटनाएं और सामाजिक विषय इन फिल्मों का प्रमुख आधार बने।
मुंबई, पुणे, कोलकाता, चेन्नई और लाहौर जैसे शहर धीरे-धीरे फिल्म निर्माण के बड़े केंद्र बनने लगे।
तकनीक भी लगातार विकसित हो रही थी। कैमरे बेहतर हुए, संपादन की नई विधियां आईं और फिल्मों की अवधि बढ़ने लगी। फिर आया वह क्षण जिसने भारतीय सिनेमा को हमेशा के लिए बदल दिया।
जब पहली बार पर्दे पर सुनाई दी आवाज
14 मार्च 1931 को मुंबई के Majestic Cinema में भारत की पहली बोलती फिल्म आलम आरा (Alam Ara) रिलीज हुई। निर्देशक अर्देशिर ईरानी (Ardeshir Irani) द्वारा बनाई गई इस फिल्म में पहली बार संवाद और गीत दोनों सुनाई दिए।
फिल्म का पहला गीत “दे दे खुदा के नाम पर” भारतीय सिनेमा के इतिहास का पहला फिल्मी गीत माना जाता है। आलम आरा की सफलता के बाद मूक फिल्मों का दौर लगभग समाप्त हो गया और भारतीय सिनेमा पूरी तरह साउंड फिल्मों के युग में प्रवेश कर गया।
130 साल पहले हुई एक स्क्रीनिंग ने कैसे बदल दिया भारत?
7 जुलाई 1896 को Watson’s Hotel में हुई स्क्रीनिंग केवल कुछ मिनटों का कार्यक्रम था, लेकिन उसका प्रभाव आने वाली कई पीढ़ियों तक दिखाई दिया।
उसी स्क्रीनिंग से प्रेरित होकर सावे दादा ने कैमरा खरीदा। सावे दादा के प्रयोगों ने दादासाहेब फाल्के जैसे फिल्मकारों को रास्ता दिखाया। फाल्के की फिल्मों ने भारतीय फिल्म उद्योग की मजबूत नींव रखी।
इसके बाद भारतीय सिनेमा ने मूक फिल्मों से बोलती फिल्मों, श्वेत-श्याम से रंगीन फिल्मों, एनालॉग से डिजिटल और अब OTT तथा वैश्विक रिलीज़ तक का लंबा सफर तय किया।
आज भारत हर साल सबसे अधिक फिल्मों का निर्माण करने वाले देशों में शामिल है। हिंदी के अलावा तमिल, तेलुगु, मलयालम, कन्नड़, मराठी, बंगाली, पंजाबी, गुजराती और अन्य कई भाषाओं में फिल्में बनती हैं, जिन्हें दुनिया के अनेक देशों में देखा जाता है।
भारतीय फिल्मों ने न केवल मनोरंजन के क्षेत्र में पहचान बनाई है, बल्कि देश की संस्कृति, संगीत, साहित्य और सामाजिक विचारों को भी वैश्विक मंच तक पहुंचाया है।
आज 130 वर्ष बाद, भारतीय सिनेमा केवल फिल्मों का उद्योग नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की भावनाओं, संस्कृति और पहचान का हिस्सा बन चुका है। इसकी शुरुआत जिस छोटे-से फिल्म प्रदर्शन से हुई थी, वही आज दुनिया के सबसे बड़े और सबसे प्रभावशाली फिल्म उद्योगों में से एक की मजबूत नींव मानी जाती है।
ये भी पढ़ें :- 15 महीने तक एक कमरे में कैद, खाने के लिए इनाम पर निर्भर जिंदगी, जापान के सबसे विवादित रियलिटी शो की कहानी
