Sunday, 27 September 2026
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2022 से अब तक 111 सांसद-विधायकों ने बदली पार्टी! दल-बदल और लोकतंत्र के बीच जनता के भरोसे का सवाल

चुनाव जीतने के बाद पार्टी बदलने वाले सांसद-विधायकों की बढ़ती चर्चा के बीच सवाल मतदाताओं के जनादेश पर भी उठता है। जानिए 111 मामलों में दल-बदल, दोबारा जनादेश और प्रतिनिधित्व का क्या संबंध है।

नई दिल्ली: चुनाव के दौरान मतदाता किसी उम्मीदवार के नाम के साथ-साथ उसके राजनीतिक दल और उसकी विचारधारा को भी ध्यान में रखकर अपना वोट तय करते हैं। लेकिन अगर चुनाव जीतने के बाद वही निर्वाचित प्रतिनिधि किसी दूसरी पार्टी का दामन थाम ले, तो सवाल सिर्फ एक नेता के राजनीतिक फैसले का नहीं रह जाता। यह सवाल उठता है कि जिस राजनीतिक पहचान के साथ मतदाता ने उसे चुना था, क्या उस पहचान को बदलने के बाद भी क्या मतदाता के जनादेश का वही अर्थ रहता है?

देश में चुनाव के बाद सांसदों और विधायकों के दल बदलने की बहस एक बार फिर तेज हो गई है। दरअसल, Association for Democratic Reforms (ADR) और National Election Watch के नए विश्लेषण के मुताबिक, 2022 से 2026 के बीच चुनाव जीतने के बाद 111 मौजूदा सांसदों और विधायकों ने अपनी राजनीतिक पार्टी बदली।

इनमें 26 लोकसभा सांसद, 7 राज्यसभा सांसद और 78 विधायक शामिल हैं। यह विश्लेषण 2022 से 2026 के दौरान हुए चुनावों और उपचुनावों पर आधारित है और इसमें आंकड़े 12 जुलाई 2026 तक की स्थिति के अनुसार दिए गए हैं।

यह आंकड़ा भारतीय राजनीति में दल-बदल की समस्या पर फिर से ध्यान आकर्षित करता है।

111 में कौन-कौन शामिल?

ADR के विश्लेषण के अनुसार, 111 मामलों में 26 लोकसभा सांसद, 7 राज्यसभा सदस्य और 78 विधायक शामिल हैं। यानी इस सूची में राज्य विधानसभाओं के सदस्य सबसे बड़ा हिस्सा हैं। इन सांसदों और विधायकों ने अपने-अपने चुनाव जीतने के बाद राजनीतिक दल बदला।

ADR ने इस रिकार्ड में चार तरह के मामलों को शामिल किया है। इनमें व्यक्तिगत दल-बदल, पार्टी विलय, इस्तीफा और उसके बाद उपचुनाव में जीत, तथा अयोग्यता के बाद उपचुनाव में जीत से जुड़े मामले शामिल हैं।

किन राज्यों में सबसे अधिक मामले?

जारी डाटा के मुताबिक राज्यवार आंकड़ों में नागालैंड सबसे ऊपर है। यहां 32 निर्वाचित प्रतिनिधियों ने पार्टी बदली, जो कुल 111 मामलों का करीब 29% है। सभी 32 मामले विधायक स्तर के हैं। इसके बाद पश्चिम बंगाल में 20 मामले सामने आए, जो करीब 18% हैं। इसके बाद तेलंगाना में 9, जबकि गोवा और पंजाब में 8-8 मामले दर्ज किए गए।

नागालैंड के मामले में अधिकांश बदलाव Nationalist Democratic Progressive Party (NDPP) और Naga People’s Front (NPF) के बीच राजनीतिक पुनर्संरेखण से जुड़े बताए गए हैं।

ADR के अनुसार, 25 ऐसे प्रतिनिधि थे जो मूल रूप से NDPP से निर्वाचित हुए थे और बाद में पार्टी बदलने वालों में शामिल रहे, जबकि NPF 32 प्रतिनिधियों के शामिल होने के साथ सबसे बड़ा प्राप्तकर्ता रहा।

पश्चिम बंगाल में तस्वीर अलग है। ADR के अनुसार, यहां 20 मामले सभी लोकसभा सांसदों से जुड़े हैं। रिपोर्ट के मुताबिक ये सांसद मूल रूप से All India Trinamool Congress (AITC) के टिकट पर चुने गए थे और बाद में Nationalist Citizens Party of India (NCPI) में चले गए। इन सांसदों ने इसे पार्टी विलय से जुड़ा मामला बताया है और इस संबंध में मामला लोकसभा अध्यक्ष के समक्ष लंबित है।

अन्य राज्यों का क्या है हाल?

ADR के आंकड़ों में तेलंगाना के सभी 9 मामले BRS से निर्वाचित विधायकों से जुड़े हैं, जबकि कांग्रेस इन मामलों में प्रमुख प्राप्तकर्ता पार्टी रही। गोवा में कांग्रेस के 8 विधायक BJP में गए। पंजाब में 8 मामले दर्ज हुए, जिनमें 6 राज्यसभा सदस्य और 2 विधायक शामिल हैं। महाराष्ट्र में 6 लोकसभा सांसदों ने पार्टी बदली और ये सभी शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) से निर्वाचित हुए थे तथा बाद में एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में शामिल हुए।

मेघालय में 6, मणिपुर में 5, अरुणाचल प्रदेश और गुजरात में 4-4, हिमाचल प्रदेश और राजस्थान में 2-2 तथा कर्नाटक, मध्य प्रदेश, सिक्किम, उत्तर प्रदेश और दिल्ली में 1-1 मामला दर्ज किया गया। इस तरह ADR ने कुल 17 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में ऐसे बदलाव दर्ज किए हैं।

किस पार्टी से कितने प्रतिनिधि निकले?

पार्टीवार आंकड़े भी राजनीतिक तस्वीर को समझने में मदद करते हैं। ADR के अनुसार, मूल पार्टी के आधार पर सबसे ज्यादा बदलाव NDPP से जुड़े रहे, जिसके 25 प्रतिनिधि बाद में दूसरी राजनीतिक व्यवस्था में गए। इसके बाद AITC के 20 और कांग्रेस के 19 प्रतिनिधि रहे।

इसके अलावा BRS के 9, AAP और NCP के 7-7, शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के 6, JD(U) के 5 और NPP के 4 प्रतिनिधियों ने पार्टी बदली। रिपोर्ट के मुताबिक NDPP, AITC और कांग्रेस से जुड़े मामले मिलाकर कुल 111 में से 64 यानी 58% मामले बनते हैं।

दूसरी तरफ, नई पार्टी में शामिल होने के आंकड़ों में NPF सबसे आगे रहा, जिसमें 32 प्रतिनिधि गए। इसके बाद BJP में 29 और NCPI में 20 प्रतिनिधि शामिल हुए। कांग्रेस में 9, शिवसेना में 8, NPP में 6 और PPA में 4 प्रतिनिधियों के जाने की बात रिपोर्ट में कही गई है। ADR के मुताबिक NPF, BJP और NCPI मिलकर 111 में से 81 यानी 73% मामलों के गंतव्य दल रहे।

भारत में दल-बदल रोकने के लिए कानून

राजनीतिक दल बदलने की समस्या नई नहीं है। भारत में 1960 और 1970 के दशक में बड़े पैमाने पर दल-बदल की घटनाओं के बाद इसे रोकने के लिए संवैधानिक व्यवस्था बनाने की मांग तेज हुई। इसके परिणामस्वरूप 1985 में संविधान के 52वें संशोधन के जरिए दसवीं अनुसूची यानी Anti-Defection Law को संविधान में जोड़ा गया।

दसवीं अनुसूची के तहत किसी राजनीतिक दल से जुड़े निर्वाचित सदस्य को कुछ परिस्थितियों में अयोग्य ठहराया जा सकता है। इनमें प्रमुख रूप से किसी सदस्य द्वारा स्वेच्छा से अपनी पार्टी की सदस्यता छोड़ना या सदन में पार्टी के निर्देश के खिलाफ मतदान करना अथवा मतदान से अनुपस्थित रहना शामिल है, बशर्ते उसे पार्टी की अनुमति न मिली हो और निर्धारित अवधि में उस कार्रवाई को माफ न किया गया हो।

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पार्टी बदलने के पीछे नेताओं के कारण

किसी सांसद या विधायक द्वारा पार्टी बदलने का कोई भी एक निश्चित कारण तय करना सही नहीं होगा। अलग-अलग राजनीतिक परिस्थितियों में कारण भी अलग हो सकते हैं। कुछ मामलों में नेता अपनी राजनीतिक विचारधारा या नीतिगत मतभेदों को कारण बताते हैं। कहीं नेतृत्व से असहमति, संगठन के भीतर विवाद या क्षेत्रीय राजनीति में बदलाव भूमिका निभा सकता है।

कुछ मामलों में राजनीतिक दलों के बीच व्यापक पुनर्संरेखण या विलय होता है। ऐसे मामलों में व्यक्तिगत नेता का निर्णय किसी बड़े संगठनात्मक बदलाव का हिस्सा हो सकता है। दूसरी ओर, कुछ मामलों में चुनावी रणनीति, भविष्य की राजनीतिक संभावनाएं या किसी दूसरे दल के साथ गठबंधन की परिस्थितियां भी भूमिका निभा सकती हैं।

लोकतंत्र पर दल-बदल का असर

दल-बदल का सबसे महत्वपूर्ण सवाल प्रतिनिधित्व से जुड़ा है। चुनाव में मतदाता किसी उम्मीदवार के साथ उसके राजनीतिक दल को भी चुनते हैं। इसलिए चुनाव के तुरंत बाद पार्टी बदलने पर यह बहस स्वाभाविक है कि क्या निर्वाचित प्रतिनिधि ने मतदाताओं के राजनीतिक जनादेश को उसी रूप में कायम रखा है।

दूसरी तरफ, लोकतांत्रिक व्यवस्था में निर्वाचित प्रतिनिधियों को अपनी राजनीतिक राय रखने और बदलती परिस्थितियों के अनुसार निर्णय लेने की स्वतंत्रता भी होती है। उदाहरण के लिए, यदि कोई पार्टी औपचारिक रूप से दूसरी पार्टी में विलय करती है या कोई सदस्य इस्तीफा देकर दोबारा चुनाव लड़ता है और मतदाताओं से नया जनादेश हासिल करता है, तो स्थिति अलग होती है।

जनता के भरोसे पर उठते सवाल

लोकतंत्र में जनता का विश्वास केवल चुनाव के दिन वोट डालने से नहीं बनता। यह भरोसा इस उम्मीद पर भी टिका होता है कि चुना गया प्रतिनिधि पूरे कार्यकाल में मतदाताओं के सामने जवाबदेह रहेगा।

अगर कोई प्रतिनिधि चुनाव जीतने के तुरंत बाद उस पार्टी को छोड़ देता है जिसके चुनाव चिन्ह और राजनीतिक मंच के आधार पर उसे वोट मिला था, तो मतदाताओं के एक हिस्से को यह महसूस हो सकता है कि उनके वोट का राजनीतिक अर्थ बदल गया। हालांकि, यह अनुभव हर मतदाता का समान नहीं होता और इसे किसी सर्वे या विशिष्ट अध्ययन के बिना सार्वभौमिक तथ्य नहीं कहा जा सकता।

इसीलिए पार्टी बदलने वाले नेताओं से अक्सर यह अपेक्षा की जाती है कि वे सार्वजनिक रूप से अपने फैसले का कारण स्पष्ट करें। इससे मतदाताओं को यह समझने का अवसर मिलता है कि बदलाव विचारधारा, नीतिगत मतभेद, संगठनात्मक परिस्थितियों या किसी व्यापक राजनीतिक पुनर्संरेखण के कारण हुआ।

111 का आंकड़ा क्या संदेश देता है?

2022 से 2026 के बीच 111 सांसदों और विधायकों के पार्टी बदलने का आंकड़ा भारतीय राजनीति में दल-बदल की मौजूदगी को रेखांकित करता है। लेकिन इस आंकड़े को समझते समय यह याद रखना जरूरी है कि इसमें अलग-अलग तरह के राजनीतिक और कानूनी घटनाक्रम शामिल हैं। कुछ मामले व्यक्तिगत रूप से पार्टी बदलने के हैं, कुछ विलय से जुड़े हैं और कुछ में इस्तीफा या अयोग्यता के बाद मतदाताओं के पास दोबारा जाने की प्रक्रिया शामिल है।

इसलिए असली लोकतांत्रिक सवाल केवल यह नहीं है कि कितने नेताओं ने पार्टी बदली, बल्कि यह भी है कि उन्होंने किस परिस्थिति में बदली, क्या मतदाताओं को कारण बताया गया, क्या संवैधानिक प्रक्रिया का पालन हुआ और क्या नए राजनीतिक समीकरण के लिए जनता से दोबारा जनादेश लिया गया।

आखिरकार, राजनीतिक दल लोकतंत्र में महत्वपूर्ण संस्थाएं हैं और निर्वाचित प्रतिनिधि जनता के प्रति जवाबदेह होते हैं। पार्टी बदलना संविधान में हर परिस्थिति में प्रतिबंधित नहीं है, लेकिन जब ऐसा बदलाव चुनावी जनादेश, सदन की स्थिरता और मतदाताओं के भरोसे को प्रभावित करता है, तब उसकी प्रक्रिया और औचित्य पर सार्वजनिक बहस होना स्वाभाविक है।

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MD Faijan

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लेखक

मोहम्मद फैजान न्यूज़ ऑफ द डे में पत्रकार हैं, जहाँ वे खेल, मनोरंजन, राजनीति और अंतरराष्ट्रीय मामलों को कवर करते हैं। इससे पहले वे यूट्यूब चैनल स्पोर्ट्स यारी में सोशल मीडिया एग्जीक्यूटिव के रूप में कार्य कर चुके हैं, जहाँ उन्होंने डिजिटल कंटेंट मैनेजमेंट और ऑडियंस एंगेजमेंट का व्यावहारिक अनुभव प्राप्त किया। भारत के छत्तीसगढ़ राज्य के कोरिया जिले से संबंध रखने वाले फैजान आधुनिक मीडिया कार्यप्रणालियों की अच्छी समझ रखते हैं और कहानी कहने के विभिन्न रूपों में गहरी रुचि रखते हैं।

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