मणिपुर, नागालैंड और अरुणाचल प्रदेश में AFSPA बढ़ाए जाने के बाद जानिए ‘अशांत क्षेत्र’ क्या होता है, सेना को कौन सी विशेष शक्तियां मिलती हैं और कानून में सुरक्षा उपाय क्या हैं।
नई दिल्ली: केंद्र सरकार ने पूर्वोत्तर के तीन राज्यों मणिपुर, नागालैंड और अरुणाचल प्रदेश के कुछ हिस्सों में सशस्त्र बल (विशेष शक्तियां) अधिनियम यानी AFSPA को एक बार फिर छह महीने के लिए बढ़ा दिया है।
गृह मंत्रालय की ओर से जारी अधिसूचनाओं के मुताबिक, यह विस्तार 1 अक्टूबर 2026 से 31 मार्च 2027 तक प्रभावी रहेगा, हालांकि सरकार चाहे तो इससे पहले भी इसे वापस ले सकती है। फैसला तीनों राज्यों की कानून-व्यवस्था की स्थिति की समीक्षा के बाद लिया गया है।
AFSPA के तहत किसी इलाके को पहले ‘अशांत क्षेत्र’ यानी Disturbed Area घोषित किया जाता है। इसके बाद वहां तैनात सशस्त्र बलों के अधिकारियों को कानून में निर्धारित कुछ विशेष अधिकार मिलते हैं। हालांकि, इन शक्तियों के इस्तेमाल पर कानूनी शर्तें और सुप्रीम कोर्ट की ओर से तय सुरक्षा उपाय भी लागू होते हैं।
मणिपुर में लगभग पूरे राज्य में AFSPA जारी
मणिपुर में केंद्र ने पूरे राज्य को अशांत क्षेत्र घोषित रखने का फैसला किया है, लेकिन पांच जिलों के 13 पुलिस थाना क्षेत्रों को इससे बाहर रखा गया है। यह व्यवस्था 1 अक्टूबर से अगले छह महीने तक लागू रहेगी।
जिन 13 पुलिस थाना क्षेत्रों को AFSPA के दायरे से बाहर रखा गया है, उनमें इम्फाल पश्चिम जिले के इम्फाल, लाम्फेल, सिटी, सिंगजामेई, पटसोई और वांगोई; इम्फाल पूर्व के पोरोमपाट, हेइंगांग और इरिलबुंग; थौबल जिले का थौबल; बिष्णुपुर जिले के बिष्णुपुर और नंबोल तथा काकचिंग जिले का काकचिंग शामिल हैं।
यानी मणिपुर में AFSPA पूरी तरह से नहीं हटाया गया है। बल्कि कुछ शहरी और अपेक्षाकृत सामान्य कानून-व्यवस्था वाले इलाकों को इससे बाहर रखते हुए राज्य के बाकी हिस्से में ‘अशांत क्षेत्र’ का दर्जा जारी रखा गया है।
मणिपुर में मई 2023 से मैतेई और कुकी-जो समुदायों के बीच हिंसा के बाद सुरक्षा स्थिति लंबे समय से संवेदनशील बनी हुई है। केंद्र का ताजा फैसला इसी व्यापक सुरक्षा और कानून-व्यवस्था की समीक्षा के बाद आया है।
नागालैंड के नौ जिलों में जारी रहेगा AFSPA
नागालैंड में भी AFSPA का दायरा केवल पूरे राज्य पर एक समान तरीके से लागू नहीं है। केंद्र ने नौ जिलों को ‘अशांत क्षेत्र’ के रूप में अधिसूचित किया है। इनमें दीमापुर, निउलैंड, चुमौकेदिमा, मोन, किफिरे, नोकलाक, फेक, पेरेन और मेलुरी शामिल हैं।
इसके अलावा पांच अन्य जिलों में कुछ पुलिस थाना क्षेत्रों को भी AFSPA के दायरे में रखा गया है। इनमें कोहिमा, मोकोकचुंग, लोंगलेंग, वोखा और जुन्हेबोटो जिले शामिल हैं। उपलब्ध विवरण के अनुसार इन जिलों में कुल 21 पुलिस थाना क्षेत्रों को अधिसूचना में शामिल किया गया है।
अरुणाचल प्रदेश में किन इलाकों में लागू रहेगा कानून?
अरुणाचल प्रदेश में AFSPA को तिरप, चांगलांग और लोंगडिंग जिलों में बढ़ाया गया है। इसके अलावा असम की सीमा से लगे नामसाई जिले में नामसाई, महादेवपुर और चौखाम पुलिस थाना क्षेत्रों को भी अधिसूचना में शामिल किया गया है।
तीनों राज्यों में यह फैसला केंद्र सरकार द्वारा AFSPA की धारा 3 के तहत लिया गया है। इस धारा के तहत यदि केंद्र सरकार, राज्य के राज्यपाल या संबंधित केंद्रशासित प्रदेश के प्रशासक की राय में कोई क्षेत्र ऐसी ‘अशांत या खतरनाक स्थिति’ में है कि नागरिक प्रशासन की सहायता के लिए सशस्त्र बलों का इस्तेमाल जरूरी है, तो उसे अधिसूचना के जरिए ‘अशांत क्षेत्र’ घोषित किया जा सकता है।
क्या है AFSPA और इससे सेना को मिलने वाले अधिकार?
AFSPA का पूरा नाम Armed Forces (Special Powers) Act, 1958 है। इसे ऐसे क्षेत्रों में सशस्त्र बलों को कुछ विशेष अधिकार देने के लिए बनाया गया था, जिन्हें सरकार ‘अशांत क्षेत्र’ घोषित करती है। कानून की धारा 3 के तहत पहले किसी क्षेत्र को ‘Disturbed Area’ घोषित किया जाता है और इसके बाद धारा 4 के तहत सशस्त्र बलों के कुछ अधिकारियों को विशेष शक्तियां मिलती हैं।
यह समझना जरूरी है कि AFSPA अपने आप में कर्फ्यू लगाने वाला कानून नहीं है। यानी AFSPA लागू होने का अर्थ यह नहीं है कि इलाके के लोगों के लिए अपने घर से निकलना, बाजार जाना या यात्रा करना अपने आप प्रतिबंधित हो जाता है। ऐसे प्रतिबंध अलग कानूनी प्रावधानों या प्रशासनिक आदेशों के जरिए लगाए जा सकते हैं।
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1. कुछ परिस्थितियों में बल प्रयोग और गोली चलाने की शक्ति
AFSPA की धारा 4(a) सबसे अधिक चर्चा में रहने वाले प्रावधानों में से एक है। इसके तहत यदि किसी अधिकृत अधिकारी को लगे कि सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए कार्रवाई जरूरी है, तो उचित चेतावनी देने के बाद उस व्यक्ति के खिलाफ बल प्रयोग कर सकता है।
इसके तहत कानून या आदेश का उल्लंघन कर रहे पांच या उससे अधिक लोगों की सभा, हथियार रखने या हथियार के रूप में इस्तेमाल की जा सकने वाली चीजों, आग्नेयास्त्रों, गोला-बारूद या विस्फोटक रखने पर रोक हो।
कानून कुछ परिस्थितियों में बल प्रयोग से मौत तक होने की संभावना को भी शामिल करता है। लेकिन इसका इस्तेमाल बिना शर्त नहीं किया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने 1997 के नागा पीपुल्स मूवमेंट ऑफ ह्यूमन राइट्स बनाम यूनियन ऑफ इंडिया मामले में स्पष्ट किया था।
इसमें धारा 4(a) के तहत कार्रवाई के लिए संबंधित निषेधात्मक आदेश का अस्तित्व और अधिकारी की आवश्यक कार्रवाई की संतुष्टि जैसी शर्तें महत्वपूर्ण हैं। अदालत ने न्यूनतम आवश्यक बल के इस्तेमाल पर भी जोर दिया था।
2. बिना वारंट गिरफ्तारी
AFSPA की धारा 4(c) के तहत सशस्त्र बलों का अधिकृत अधिकारी किसी ऐसे व्यक्ति को बिना वारंट गिरफ्तार कर सकता है जिसके बारे में उचित संदेह हो कि उसने ऐसा अपराध किया है जो कानून के तहत गिरफ्तार करने योग्य है।
इसका मतलब यह नहीं है कि गिरफ्तार व्यक्ति अनिश्चितकाल तक सेना की हिरासत में रह सकता है। AFSPA की धारा 5 के अनुसार गिरफ्तारी के बाद व्यक्ति को निकटतम पुलिस थाने के प्रभारी अधिकारी को जल्द से जल्द सौंपना होता है और गिरफ्तारी की परिस्थितियों की रिपोर्ट भी देनी होती है।
सुप्रीम कोर्ट ने भी 1997 के फैसले में कहा था कि ऐसे गिरफ्तार व्यक्ति को कम से कम संभव देरी में पुलिस को सौंपा जाना चाहिए ताकि उसे कानून के मुताबिक मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया जा सके।
3. बिना वारंट तलाशी और कार्रवाई
AFSPA के तहत अधिकृत अधिकारी किसी परिसर में प्रवेश कर तलाशी ले सकता है, यदि उसे यह विश्वास हो कि वहां ऐसा व्यक्ति छिपा है जिसकी गिरफ्तारी जरूरी है या हथियार, गोला-बारूद अथवा अन्य आपत्तिजनक सामग्री मौजूद है।
कानून कुछ परिस्थितियों में बलपूर्वक प्रवेश की अनुमति भी देता है। इसके तहत हथियारों या ऐसे ठिकानों को नष्ट करने की कार्रवाई भी की जा सकती है जिन्हें सशस्त्र गिरोहों या संगठित हिंसक गतिविधियों के लिए इस्तेमाल किया जा रहा हो।
हालांकि तलाशी और गिरफ्तारी की शक्तियों का इस्तेमाल भी कानून की शर्तों और लागू सुरक्षा प्रक्रियाओं के अधीन है।
4. क्या सेना पुलिस की जगह ले लेती है?
AFSPA लागू होने का मतलब यह नहीं है कि सेना राज्य पुलिस या नागरिक न्याय व्यवस्था की जगह ले लेती है। कानून के तहत सशस्त्र बलों को अशांत या संवेदनशील क्षेत्रों में सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखने के लिए कुछ विशेष अधिकार मिलते हैं, लेकिन नागरिक प्रशासन की जिम्मेदारियां खत्म नहीं होतीं।
किसी अपराध की शिकायत दर्ज करना, FIR की जांच करना, आरोपियों के खिलाफ अभियोजन चलाना और अदालत में मामले की सुनवाई जैसी सामान्य आपराधिक न्याय प्रक्रिया नागरिक संस्थाओं के अधिकार क्षेत्र में ही रहती है। सेना को मुख्य रूप से ऐसी परिस्थितियों में नागरिक प्रशासन की सहायता के लिए तैनात किया जाता है, जहां सामान्य कानून-व्यवस्था से निपटना चुनौतीपूर्ण हो।
इसलिए AFSPA के तहत सेना को मिले विशेष अधिकारों को पुलिस की पूरी भूमिका अपने हाथ में लेने के रूप में नहीं देखा जा सकता। सुरक्षा अभियान और नागरिक प्रशासन के बीच जिम्मेदारियों का यह अंतर AFSPA की व्यवस्था को समझने में महत्वपूर्ण है।
5. जवानों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई में विशेष प्रावधान
AFSPA की धारा 6 में एक महत्वपूर्ण सुरक्षा प्रावधान है। इसके मुताबिक कानून के तहत किए गए किसी कार्य को लेकर सशस्त्र बल के किसी व्यक्ति के खिलाफ मुकदमा, वाद या अन्य कानूनी कार्रवाई शुरू करने के लिए केंद्र सरकार की पूर्व मंजूरी आवश्यक होती है।
यही प्रावधान AFSPA पर होने वाली बहस का एक प्रमुख हिस्सा रहा है। समर्थकों के अनुसार, यह संवेदनशील इलाकों में काम कर रहे सुरक्षा बलों को कानूनी सुरक्षा देता है, जबकि आलोचक लंबे समय से तर्क देते रहे हैं कि इससे कथित मानवाधिकार उल्लंघनों के मामलों में जवाबदेही की प्रक्रिया कठिन हो सकती है।
AFSPA को लेकर विवाद क्यों?
AFSPA भारत के सबसे बहस वाले सुरक्षा कानूनों में से एक रहा है। केंद्र और सुरक्षा प्रतिष्ठान का तर्क रहा है कि उग्रवाद और सशस्त्र हिंसा से प्रभावित क्षेत्रों में सामान्य पुलिस व्यवस्था पर्याप्त नहीं होने पर सुरक्षा बलों को तेजी से कार्रवाई करने के लिए विशेष कानूनी अधिकार जरूरी हैं।
दूसरी ओर, मानवाधिकार संगठनों और कई नागरिक समूहों ने लंबे समय से कानून के तहत मिली शक्तियों, खासकर बिना वारंट गिरफ्तारी, तलाशी, बल प्रयोग और अभियोजन के लिए केंद्र की पूर्व मंजूरी वाले प्रावधानों पर सवाल उठाए हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने 1997 में AFSPA की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा था, लेकिन साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि विशेष शक्तियों का इस्तेमाल मनमाने ढंग से नहीं किया जा सकता और निर्धारित दिशानिर्देशों का पालन जरूरी है।



