अमेरिकी और अन्य अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों ने ईरान की बैंकिंग, निवेश, परिवहन और बीमा गतिविधियों को लंबे समय से प्रभावित किया है। युद्ध के बीच इन पाबंदियों ने आर्थिक संकट को और गंभीर बना दिया है।
तेहरान: मध्य-पूर्व में जारी युद्ध का असर ईरान की अर्थव्यवस्था पर लगातार गहराता जा रहा है। ईरान की राष्ट्रीय मुद्रा रियाल मंगलवार, 29 सितंबर को अमेरिकी डॉलर के मुकाबले एक नए रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गई। तेहरान के बाजार में एक डॉलर के लिए 25 लाख से ज्यादा रियाल का कारोबार हुआ।
इससे पहले 2 सितंबर को रियाल करीब 22 लाख प्रति डॉलर के स्तर तक गिर गया था। यानी महज 27 दिनों में मुद्रा ने एक और बड़ा निचला स्तर छू लिया।
रियाल की यह गिरावट ऐसे समय में हुई है जब ईरान युद्ध, अमेरिकी प्रतिबंधों, तेल निर्यात में भारी कमी और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में व्यापारिक गतिविधियों में रुकावट जैसी कई आर्थिक चुनौतियों से एक साथ जूझ रहा है।
दूसरी ओर, ईरान और अमेरिका के बीच मध्यस्थों के जरिए बातचीत की कोशिशें भी चल रही हैं। ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची के अनुसार, बातचीत में स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को फिर से खोलना प्रमुख मुद्दों में शामिल है।
रियाल की कीमत में आई गिरावट का कारण
ईरान की मुद्रा लंबे समय से दबाव में रही है, लेकिन मौजूदा युद्ध ने इस संकट को और तेज कर दिया है। ईरानी अर्थव्यवस्था की विदेशी मुद्रा आय का एक महत्वपूर्ण स्रोत तेल निर्यात है। युद्ध और अमेरिकी दबाव के कारण ईरान के लिए तेल को अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंचाना और उससे भुगतान हासिल करना मुश्किल हुआ है। इससे देश में डॉलर की उपलब्धता पर दबाव पड़ा और रियाल कमजोर होता गया।
अल जजीरा की रिपोर्ट के अनुसार, युद्ध के शुरुआती महीनों में ईरान के कच्चे तेल और कंडेनसेट की लोडिंग लगभग 20 लाख बैरल प्रतिदिन से घटकर जुलाई में करीब 7.4 लाख बैरल प्रतिदिन और अगस्त में लगभग 2.2 से 2.55 लाख बैरल प्रतिदिन रह गई थी।
तेल निर्यात में कमी का सीधा असर ईरान की विदेशी मुद्रा कमाई पर पड़ता है। जब देश को डॉलर कम मिलते हैं, तो आयात, विदेशी भुगतान और जरूरी सामान की खरीद के लिए डॉलर की मांग बढ़ जाती है। ऐसे माहौल में घरेलू मुद्रा पर दबाव बढ़ना स्वाभाविक है।
इसके अलावा ईरान वर्षों से अमेरिकी और अन्य अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों का सामना कर रहा है। इन प्रतिबंधों ने बैंकिंग, निवेश, व्यापार, परिवहन और बीमा जैसे क्षेत्रों में देश की अंतरराष्ट्रीय आर्थिक गतिविधियों को सीमित किया है। मौजूदा युद्ध और नए प्रतिबंधों ने इस समस्या को और गंभीर बना दिया है।
GDP में 10.1 फीसदी की गिरावट
रियाल की गिरावट को ईरान की अर्थव्यवस्था में हो रहे व्यापक संकुचन के संदर्भ में देखा जाना चाहिए। ईरान के सरकारी Statistical Center के आंकड़ों के मुताबिक, 21 मार्च से 20 जून 2026 के बीच पहली फारसी कैलेंडर तिमाही में देश की GDP सालाना आधार पर 10.1% घट गई। यह अवधि 28 फरवरी से शुरू हुए युद्ध के शुरुआती महीनों को कवर करती है।
GDP में गिरावट का सबसे बड़ा कारण ऊर्जा क्षेत्र रहा। इसी अवधि में कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस से जुड़ी आर्थिक गतिविधियों में 26.4% की कमी दर्ज की गई।
अगर तेल क्षेत्र को GDP से अलग कर दिया जाए, तब भी अर्थव्यवस्था में 4.6% की गिरावट रही। इसका मतलब है कि संकट सिर्फ तेल उद्योग तक सीमित नहीं रहा, बल्कि अर्थव्यवस्था के दूसरे हिस्सों तक भी पहुंच गया है।
उद्योग और खनन क्षेत्र में 14.7% की गिरावट दर्ज की गई, जबकि सेवा क्षेत्र 4.8% और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर 2.5% तक सिकुड़ चुका है।
कृषि क्षेत्र हालांकि इस दौरान 2.3% बढ़ा, जिससे पता चलता है कि आर्थिक संकट का प्रभाव अलग-अलग क्षेत्रों पर समान नहीं रहा।
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष यानी IMF के अप्रैल 2026 के अनुमान में भी ईरान की वास्तविक GDP वृद्धि के बजाय 2026 के लिए 6.1% संकुचन का अनुमान लगाया गया था। IMF ने इसी साल औसत उपभोक्ता महंगाई दर करीब 68.9 फीसदी रहने का अनुमान लगाया था।
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महंगाई ने बढ़ाई आम लोगों की परेशानी
ईरान की आर्थिक समस्या सिर्फ GDP और मुद्रा विनिमय दर तक सीमित नहीं है। कमजोर रियाल का सीधा असर आम लोगों की खरीद क्षमता पर पड़ रहा है। जब घरेलू मुद्रा का मूल्य गिरता है, तो आयातित सामान, कच्चा माल, मशीनरी, दवाइयां और कई दूसरी जरूरी वस्तुओं की लागत बढ़ सकती है।
सितंबर में ईरान की 12 महीने की औसत महंगाई दर 69.9% तक पहुंच गई थी। खाद्य पदार्थों, पेय और तंबाकू की कीमतों में बढ़ोतरी इससे भी ज्यादा रही। इसी दौरान आधिकारिक बेरोजगारी दर 9.1% दर्ज की गई।
तेल पर निर्भरता बनी बड़ी कमजोरी
ईरान के पास दुनिया के सबसे बड़े तेल और प्राकृतिक गैस भंडारों में से एक है। विश्व बैंक के अनुसार, ईरान प्राकृतिक गैस के भंडार के मामले में दुनिया में दूसरे और प्रमाणित कच्चे तेल भंडार के मामले में चौथे स्थान पर है। देश की अर्थव्यवस्था में हाइड्रोकार्बन, कृषि और सेवा क्षेत्र के साथ मैन्युफैक्चरिंग और वित्तीय सेवाओं की भी भूमिका है।
फिर भी सरकारी आय और विदेशी मुद्रा कमाई में तेल का महत्व काफी ज्यादा है। यही निर्भरता संकट के समय कमजोरी बन जाती है। तेल निर्यात में रुकावट आते ही सरकार की आय, विदेशी मुद्रा उपलब्धता और व्यापार क्षमता पर एक साथ दबाव बढ़ता है।
मौजूदा युद्ध में स्ट्रेट ऑफ होर्मुज भी बेहद महत्वपूर्ण हो गया है। यह समुद्री मार्ग वैश्विक तेल व्यापार के लिए रणनीतिक रूप से अहम है। यहां आवाजाही में व्यवधान से न केवल ईरान बल्कि क्षेत्रीय और वैश्विक ऊर्जा बाजारों पर भी असर पड़ता है। विश्व बैंक ने भी कहा है कि संघर्ष, तेल निर्यात में रुकावट, व्यापार मार्गों में बाधा और आयात की समस्या ईरानी अर्थव्यवस्था पर गंभीर दबाव डाल रही है।
प्रतिबंधों और युद्ध का दोहरा दबाव
ईरान पहले से ही लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों और आर्थिक संरचनात्मक समस्याओं से जूझ रहा था। ऐसे में युद्ध ने उन कमजोरियों को और तूल देने का काम किया।
विश्व बैंक के मुताबिक, 20 मार्च 2026 को समाप्त हुए ईरानी वर्ष में अर्थव्यवस्था के 2.7% सिकुड़ने का अनुमान था। बैंक ने संघर्ष, विरोध प्रदर्शनों, व्यापार में व्यवधान और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से जुड़े तनाव को इसके पीछे के कारणों में शामिल किया।
अब मौजूदा युद्ध के कारण बुनियादी ढांचे को नुकसान, ऊर्जा की कमी, पानी की समस्या, निवेश में गिरावट और अंतरराष्ट्रीय व्यापार में रुकावट जैसी चुनौतियां और बढ़ी हैं। विश्व बैंक के अनुसार, ऊंची महंगाई और घटती वास्तविक आय घरेलू मांग को कमजोर कर सकती है, जबकि वित्तीय प्रतिबंधों और अंतरराष्ट्रीय परिवहन तथा बीमा सेवाओं तक सीमित पहुंच के कारण व्यापार पर दबाव बना रह सकता है।
ईरान अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए क्या कर सकता है?
ईरान के लिए आर्थिक सुधार का रास्ता केवल एक कदम से नहीं निकलेगा। युद्ध समाप्त करने और व्यापारिक रास्तों को स्थिर करने से तत्काल राहत मिल सकती है, लेकिन लंबे समय के लिए कई स्तरों पर सुधार जरूरी होंगे।
1. तेल निर्यात और व्यापार मार्ग सामान्य करना
ईरान की अर्थव्यवस्था को तत्काल राहत देने के लिए तेल और गैस निर्यात को सामान्य करना अहम होगा। इसके लिए समुद्री व्यापार की बहाली और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में स्थिरता जरूरी है।
तेल निर्यात बढ़ने से ईरान को अधिक विदेशी मुद्रा हासिल हो सकती है, जिससे डॉलर की उपलब्धता में सुधार होगा। इससे आयात और अंतरराष्ट्रीय भुगतान का दबाव कम करने में मदद मिल सकती है। विदेशी मुद्रा प्रवाह बढ़ने पर रियाल पर बना दबाव भी कुछ हद तक कम हो सकता है।
2. अंतरराष्ट्रीय व्यापार की बहाली
ईरान की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग, परिवहन, बीमा और व्यापार व्यवस्था से बेहतर जुड़ाव जरूरी होगा। लंबे समय से जारी प्रतिबंधों ने विदेशी व्यापार और निवेश को प्रभावित किया है।
ऐसे में कूटनीतिक प्रयासों के जरिए यदि प्रतिबंधों में राहत मिलती है, तो ईरान के लिए तेल निर्यात और अंतरराष्ट्रीय भुगतान आसान हो सकते हैं। इससे विदेशी निवेश आकर्षित करने, व्यापार बढ़ाने और आर्थिक गतिविधियों को गति देने में भी मदद मिल सकती है।
3. महंगाई पर नियंत्रण
ईरान के लिए महंगाई पर काबू पाना आर्थिक स्थिरता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम होगा। सरकार और केंद्रीय बैंक को मुद्रा बाजार में स्थिरता लाने के साथ राजकोषीय और मौद्रिक नीतियों के बीच बेहतर तालमेल बनाना होगा। लगातार रियाल के कमजोर होने से आयात महंगा होता है और कीमतों पर दबाव बढ़ता है। इसलिए मुद्रा अवमूल्यन को नियंत्रित करने, कीमतों में स्थिरता लाने और लोगों का स्थानीय मुद्रा पर भरोसा मजबूत करने पर ध्यान देना जरूरी होगा।
4. तेल पर निर्भरता कम करना
लंबी अवधि में ईरान को अपनी अर्थव्यवस्था की तेल पर निर्भरता कम करने की जरूरत होगी। इसके लिए कृषि, मैन्युफैक्चरिंग, आईटी, पर्यटन, पेट्रोकेमिकल्स और अन्य गैर-तेल क्षेत्रों में निवेश बढ़ाया जा सकता है। इन क्षेत्रों के विकास से रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे और सरकार को अतिरिक्त राजस्व मिलेगा।
साथ ही, गैर-तेल वस्तुओं और सेवाओं के निर्यात को बढ़ावा देकर विदेशी मुद्रा आय के वैकल्पिक स्रोत तैयार किए जा सकते हैं।
5. ऊर्जा और बुनियादी ढांचे में निवेश
पुराने बिजली नेटवर्क, ऊर्जा आपूर्ति और पानी की कमी उत्पादन क्षमता को प्रभावित कर रहे हैं। विश्व बैंक ने भी पानी और ऊर्जा की कमी को आर्थिक गतिविधियों के लिए महत्वपूर्ण जोखिम बताया है। इसलिए बिजली उत्पादन, ग्रिड, जल प्रबंधन और औद्योगिक बुनियादी ढांचे में निवेश आर्थिक सुधार का महत्वपूर्ण हिस्सा हो सकता है।
6. निजी निवेश को बढ़ावा देना
लंबे समय तक आर्थिक विकास के लिए केवल सरकारी खर्च पर्याप्त नहीं होगा। निजी कंपनियों को निवेश के लिए स्थिर नियम, बेहतर वित्तीय व्यवस्था और अधिक भरोसेमंद कारोबारी माहौल की जरूरत होगी। इससे रोजगार और गैर-तेल उत्पादन दोनों को बढ़ाया जा सकता है।


