Friday, 23 October 2026
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टीवी पर अब हर घंटे सिर्फ 12 मिनट ही दिखेंगे विज्ञापन, दिल्ली हाईकोर्ट ने बरकरार रखा ट्राई का नियम, कहा- मुनाफे के लिए जनता का समय बर्बाद नहीं कर सकते

मनोरंजन और न्यूज चैनलों की याचिकाएं खारिज, कोर्ट ने कहा- स्पेक्ट्रम सरकारी संपत्ति है, मनमानी व्यावसायिक वसूली पर लगेगी लगाम

नई दिल्ली, न्यूज ऑफ द डे

टीवी प्रेमियों के लिए दिल्ली हाईकोर्ट से एक बहुत बड़ी और राहत भरी खबर आई है। अदालत ने भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (TRAI) के उस नियम को हरी झंडी दे दी है, जिसमें टीवी चैनलों पर हर एक घंटे के प्रसारण के दौरान विज्ञापनों (Ads) की समयसीमा अधिकतम 12 मिनट तय की गई है। हाईकोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि देश का संविधान किसी भी कंपनी या प्रसारक (Broadcaster) को सार्वजनिक संसाधनों के जरिए असीमित मुनाफा कमाने या अंधाधुंध कमर्शियलाइजेशन की गारंटी नहीं देता।

जस्टिस अनिल क्षेत्रपाल और जस्टिस अमित महाजन की बेंच ने 9एक्स मीडिया प्राइवेट लिमिटेड और न्यूज ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन सहित कई बड़े मनोरंजन और क्षेत्रीय चैनलों द्वारा दायर उन याचिकाओं को सिरे से खारिज कर दिया, जिनमें ट्राई के ‘क्वालिटी ऑफ सर्विस रेगुलेशन 2012’ के नियम 3 को चुनौती दी गई थी।

क्या है ट्राई का ’10+2 नियम’?

ट्राई ने साल 2012 में एक नियम बनाया था जिसे टीवी इंडस्ट्री में ’10+2 मिनट का फॉर्मूला’ कहा जाता है। इस नियम के मुताबिक, टीवी पर दिखाए जाने वाले किसी भी 1 घंटे के प्रोग्राम में चैनल अधिकतम 10 मिनट के कमर्शियल विज्ञापन और 2 मिनट के अपने खुद के चैनल के प्रोमो ही दिखा सकते हैं। यानी दर्शकों को 1 घंटे में कम से कम 48 मिनट का मूल कंटेंट (सीरियल, फिल्म या न्यूज) मिलना अनिवार्य है।

हाईकोर्ट के फैसले की 3 बड़ी बातें

पब्लिक प्रॉपर्टी है एयरवेव्स: कोर्ट ने कहा कि टीवी सिग्नल के लिए इस्तेमाल होने वाले स्पेक्ट्रम और एयरवेव्स सीमित प्राकृतिक संसाधन हैं। सरकार इन्हें जनता की ओर से संभालती है (पब्लिक ट्रस्टी है)। इसलिए इसका इस्तेमाल जनहित में होना चाहिए।
संविधान का हवाला: ट्राई का यह नियम संविधान के अनुच्छेद 39(बी) और 39(सी) के बिल्कुल अनुकूल है, क्योंकि यह किसी एक संसाधन के अत्यधिक व्यावसायिक दोहन को रोकता है और इसका समान वितरण सुनिश्चित करता है।
कंटेंट की आजादी पर रोक नहीं: अदालत ने साफ किया कि 12 मिनट की यह पाबंदी केवल दर्शकों के टीवी देखने के अनुभव (Viewer Experience) को बेहतर बनाने के लिए है। इससे चैनलों की कंटेंट बनाने या अपने बिजनेस मॉडल को तय करने की आजादी पर कोई असर नहीं पड़ता।

चैनलों की दलील-‘ट्राई के पास हक नहीं, हमारा भारी नुकसान होगा’

सुनवाई के दौरान न्यूज और एंटरटेनमेंट चैनलों की तरफ से पैरवी कर रहे वकीलों ने दलील दी थी कि ट्राई के पास विज्ञापनों के समय को नियंत्रित करने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है। चैनलों का कहना था कि इस पाबंदी से उनके विज्ञापन राजस्व (Ad Revenue) को भारी नुकसान पहुंचेगा और टीवी बिजनेस चलाना मुश्किल हो जाएगा।

हाईकोर्ट का करारा जवाब

हाईकोर्ट ने चैनलों के इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि ट्राई ने पूरी पारदर्शिता, सभी पक्षों से लंबी चर्चा (Consultation Process) और अंतरराष्ट्रीय नियमों को देखने के बाद ही यह फैसला लिया है। इसलिए इसे किसी भी तरह से मनमाना या गलत नहीं ठहराया जा सकता। ट्राई ने पूरी तरह अपनी कानूनी सीमा के भीतर रहकर दर्शकों के हक में यह काम किया है।

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IK

Imran Khan

लेखक

NOTD News के लिए नियमित रूप से समाचार लिखते हैं।

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