धर्मशाला में होने वाले तीन दिवसीय समारोह पर टिकी दुनिया की नजरें, केंद्रीय तिब्बती प्रशासन के नेताओं ने दिए संकेत; जानिए दलाई लामा के चयन की पारंपरिक प्रक्रिया
तिब्बती बौद्ध धर्मगुरु 14वें दलाई लामा के उत्तराधिकारी को लेकर लंबे समय से चल रही अटकलों के बीच अब यह उम्मीद जताई जा रही है कि उनके 90वें जन्मदिन पर इस संबंध में कोई बड़ा ऐलान हो सकता है। उनका जन्मदिन 6 जुलाई को है और इस अवसर पर हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला स्थित मैकलोडगंज में तीन दिवसीय भव्य कार्यक्रम आयोजित किया जा रहा है। इस आयोजन पर चीन की भी पैनी नजर बनी हुई है।
CTA नेताओं ने बढ़ाई संभावनाएं
केंद्रीय तिब्बती प्रशासन (CTA) के कई वरिष्ठ नेताओं ने यह संकेत दिया है कि इस बार दलाई लामा अपने उत्तराधिकारी को लेकर कोई महत्वपूर्ण घोषणा कर सकते हैं। हालांकि अभी तक इस पर आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
कैसे होता है दलाई लामा का चयन?
तिब्बती बौद्ध परंपरा के अनुसार, दलाई लामा का चुनाव उनके पुनर्जन्म के आधार पर होता है। मान्यता है कि दलाई लामा की मृत्यु के बाद उनका पुनर्जन्म किसी बालक के रूप में होता है, जिसकी खोज लगभग 9 महीनों के भीतर शुरू कर दी जाती है।
इस प्रक्रिया में कुछ खास परंपराएं निभाई जाती हैं:
- वस्तुओं की पहचान: चयन प्रक्रिया के दौरान संभावित बालकों को पूर्व दलाई लामा की वस्तुएं दिखाई जाती हैं। जो बालक सही वस्तुओं की पहचान करता है, उसे ही पुनर्जन्म माना जाता है।
- सोने के कलश की परंपरा: प्राचीन परंपरा के अनुसार, नामों को एक सोने के कलश में रखा जाता था, और उसी से ‘ईश्वरीय संकेत’ के आधार पर उत्तराधिकारी का चयन होता था। अब यह कलश चीन के पास है।
- प्राकृतिक संकेत: ऐतिहासिक रूप से दलाई लामा की पहचान कुछ विशेष प्राकृतिक घटनाओं के माध्यम से भी हुई है। जैसे 1758 में 8वें दलाई लामा की पहचान एक इंद्रधनुष के माध्यम से की गई थी।
1959 में छोड़ा था तिब्बत
14वें दलाई लामा ने 1959 में चीन के दमन के कारण तिब्बत छोड़ दिया था। वे अरुणाचल प्रदेश के तवांग के रास्ते भारत आए और तब से धर्मशाला में ही रह रहे हैं। उनके भाई ग्यालो थोंडुप की आत्मकथा ‘द नूडल मेकर ऑफ कलिम्पोंग’ में इस पलायन का विस्तृत विवरण मिलता है।
पुस्तक में दिया था पुनर्जन्म का संकेत
दलाई लामा ने अपनी पुस्तक ‘वॉयस फॉर द वॉइसलेस’ में भी यह संकेत दिया था कि उनका अगला जन्म किसी ऐसे स्थान पर हो सकता है जहां वे स्वतंत्र रूप से बौद्ध धर्म और तिब्बती संस्कृति की रक्षा कर सकें।
अब जबकि दलाई लामा 90 वर्ष के हो रहे हैं, दुनिया की निगाहें इस ओर टिकी हैं कि क्या वे अपने उत्तराधिकारी के चयन को लेकर कोई औपचारिक घोषणा करेंगे। यह फैसला धार्मिक के साथ-साथ राजनीतिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
ये भी पढ़ें :- गुरुद्वारा साहिब में CPR प्रशिक्षण शिविर: 40 से अधिक परिवारों को मिला जीवन रक्षा का संबल