Friday, 02 October 2026
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क्या स्टेबलकॉइन्स बढ़ाएंगे डॉलर का दबदबा? जानिए वैश्विक अर्थव्यवस्था पर संभावित प्रभाव

नई दिल्ली: अमेरिका में 14 मई को सीनेट बैंकिंग कमेटी द्वारा ‘डिजिटल एसेट मार्केट क्लैरिटी एक्ट’ को मंजूरी दिए जाने के बाद देश एक व्यापक क्रिप्टो कानून लागू करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बढ़ा चुका है। इस पहल ने बैंकों और क्रिप्टो कंपनियों के साथ-साथ नियामकों का भी ध्यान खींचा है, क्योंकि इसका असर वैश्विक डिजिटल वित्तीय व्यवस्था और डॉलर की भूमिका पर पड़ सकता है।

आज चलन में मौजूद सभी स्टेबलकॉइन्स में से 97% से भी ज़्यादा अमेरिकी डॉलर की कीमत से जुड़े हैं। इन डिजिटल टोकन्स की कीमत को स्थिर रखने के लिए मुख्य रूप से अमेरिकी सरकारी बॉन्ड्स (US Treasury bills) को गारंटी के तौर पर रखा जाता है। साल 2025 में पास हुए अमेरिकी ‘GENIUS एक्ट’ के तहत, स्टेबलकॉइन जारी करने वाली कंपनियों के लिए इन सरकारी सेक्योरिटीज में रिज़र्व रखना अनिवार्य कर दिया गया था। इस रिज़र्व पर मिलने वाले ब्याज से ही इन कंपनियों को अपने टोकन्स को बढ़ावा देने और बाज़ार में उनकी पहुँच बढ़ाने में मदद मिलती है।

इसका सीधा नतीजा यह है कि जब वियतनाम, नाइजीरिया या भारत में कोई व्यक्ति डॉलर-आधारित स्टेबलकॉइन खरीदता है, तो वह असल में एक ‘डिजिटल डॉलर’ ही अपने पास रख रहा होता है। स्टेबलकॉइन कंपनियों के लिए साफ़ और स्पष्ट नियम बनाकर, यह क्लैरिटी एक्ट डॉलर स्टेबलकॉइन के पूरे इकोसिस्टम को दुनिया भर के बाज़ारों में इस्तेमाल के लिए और भी आसान बना देता है।

कई यूज़र्स के लिए ये स्टेबलकॉइन्स उन देशों में अपनी बचत को सुरक्षित रखने का जरिया हैं जहाँ स्थानीय करेंसी (मुद्रा) की कीमत लगातार गिर रही है। इसके अलावा, इनसे विदेशों में पैसे भेजना और मंगाना काफी सस्ता और तेज़ हो जाता है। जिन देशों में महंगाई बहुत ज़्यादा है या बैंकिंग सिस्टम कमज़ोर है, वहाँ लोग इन्हीं खूबियों की वजह से इन्हें तेज़ी से अपना रहे हैं।

लेकिन सरकारों और केंद्रीय बैंकों (जैसे भारत में RBI) के लिए इसके मायने बिल्कुल अलग हैं। जैसे-जैसे लोग अपनी बचत और लेन-देन डॉलर वाले स्टेबलकॉइन्स में करने लगेंगे, केंद्रीय बैंकों का बाज़ार में मनी सप्लाई और महंगाई पर से नियंत्रण कम होने लगेगा। देश की आर्थिक गतिविधियों का एक बड़ा हिस्सा एक विदेशी करेंसी से जुड़ जाएगा, जो विदेशी नियमों से चलेगी और दूसरे देश के फाइनेंशियल सिस्टम पर निर्भर होगी। बड़े पैमाने पर स्थानीय करेंसी को डॉलर स्टेबलकॉइन में बदलने से देश की अपनी मुद्रा की एक्सचेंज रेट (विनिमय दर) पर भी भारी दबाव पड़ता है।

इस पूरी प्रक्रिया को—जिसमें डॉलर निजी डिजिटल माध्यमों के ज़रिए धीरे-धीरे स्थानीय करेंसी की जगह ले लेता है—’डिजिटल डॉलरॉइजेशन’ कहा जाता है। ‘बैंक फॉर इंटरनेशनल सेटलमेंट्स’ ने इसे एक बड़े खतरे के रूप में देखा है, जो स्टेबलकॉइन्स की वजह से उभरती अर्थव्यवस्थाओं के सामने आ सकता है।

यही वजह है कि दुनिया भर की सरकारों ने अब इस पर कदम उठाना शुरू कर दिया है। यूरोपीय संघ के ‘मीका’ (MiCA) नियम कानून ने अपने क्षेत्र में पेमेंट के लिए गैर-यूरो स्टेबलकॉइन्स के इस्तेमाल पर कुछ पाबंदियाँ लगाई हैं, ताकि उनकी अपनी करेंसी ‘यूरो’ का दबदबा बना रहे। फ्रांस ने यूरो से जुड़े स्टेबलकॉइन्स को बढ़ावा दिया है, तो वहीं दक्षिण कोरिया ने अपनी स्थानीय करेंसी ‘वॉन’ पर आधारित स्टेबलकॉइन को अपनी प्राथमिकता बनाते हुए अपने डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत किया है। हाँगकाँग ने भी अपने रेगुलेटेड सिस्टम के तहत पारंपरिक बैंकों को स्थानीय करेंसी से जुड़े स्टेबलकॉइन जारी करने का पहला लाइसेंस दे दिया है। भारत को भी जल्द ही अपने नियमों में ऐसे ही सवालों के जवाब ढूंढने होंगे।

यह क्लैरिटी एक्ट इन चुनौतियों को खत्म नहीं करता, बल्कि डॉलर स्टेबलकॉइन सिस्टम को कानूनी मजबूती और स्पष्टता देकर इन्हें और भी गंभीर बना देता है। यही वजह है कि दुनिया भर के कई रेगुलेटर्स अब अमेरिका के फैसले का इंतज़ार नहीं कर रहे हैं; वे डिजिटल दौर में अपनी मौद्रिक संप्रभुता को बचाने और डॉलर के विकल्प तैयार करने की रेस में पहले ही आगे बढ़ चुके हैं।

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BN

Bureau NOTD

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NOTD News के लिए नियमित रूप से समाचार लिखते हैं।

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