इराक में 28 जून 2004 को सत्ता लौटाई गई, पर क्या यह शांति थी या महज़ एक दिखावा? जानिए इस पूरी कहानी के पीछे की सच्चाई।
नई दिल्ली: क्या किसी युद्ध का अंत केवल एक दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर होने से हो जाता है? क्या किसी देश की सत्ता लौटा देने भर से वहां शांति स्थापित हो जाती है? 28 जून 2004 को दुनिया ने एक ऐसा ही ऐतिहासिक दृश्य देखा, जब अमेरिका ने घोषणा की कि इराक पर उसका कब्ज़ा समाप्त हो चुका है और देश की बागडोर अब इराकी सरकार के हाथों में है।
पहली नज़र में यह लोकतंत्र की जीत और युद्ध के अंत का प्रतीक लग रहा था, लेकिन हकीकत इससे कहीं अधिक जटिल थी। सत्ता तो सौंप दी गई, पर सड़कों पर गोलियों की आवाज़ें अब भी गूंज रही थीं, बम धमाके जारी थे और विदेशी सैनिक अभी भी इराक की धरती पर मौजूद थे।
ऐसे में दुनिया के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा हुआ। क्या वास्तव में युद्ध खत्म हो गया था, या यह संघर्ष केवल एक नए रूप में शुरू हुआ था? 28 जून 2004 की यह घटना केवल सत्ता हस्तांतरण की कहानी नहीं, बल्कि आधुनिक विश्व राजनीति, युद्ध, कूटनीति और राष्ट्र-निर्माण की सबसे जटिल और बहुचर्चित घटनाओं में से एक है।
सत्ता हस्तांतरण का ऐतिहासिक दिन
28 जून 2004 को बगदाद में एक ऐतिहासिक घटना हुई जब अमेरिका के नेतृत्व वाले गठबंधन ने इराक की अंतरिम सरकार को सत्ता सौंप दी। Coalition Provisional Authority (CPA) का औपचारिक अंत कर दिया गया और इयाद अलावी की सरकार ने देश की जिम्मेदारी संभाली।
अमेरिका ने इसे इराक की संप्रभुता की वापसी और युद्ध के अंत के रूप में पेश किया, लेकिन जमीनी हकीकत इससे अलग थी। देश में अमेरिकी और गठबंधन सैनिक अब भी मौजूद थे और सुरक्षा की स्थिति बेहद अस्थिर थी। इसी कारण दुनिया के सामने बड़ा सवाल खड़ा हुआ कि क्या यह वास्तव में युद्ध का अंत था या केवल प्रशासनिक बदलाव?
यह दिन इराक के इतिहास में एक नए अध्याय की शुरुआत था, लेकिन साथ ही यह भी स्पष्ट था कि शांति और स्थिरता अभी दूर थी।

सद्दाम हुसैन का शासन
इस घटना के तार साल 1979 से जुड़े हैं। सद्दाम हुसैन ने 1979 में इराक की सत्ता संभाली और लंबे समय तक देश पर कठोर नियंत्रण बनाए रखा। शुरुआती वर्षों में तेल से मिलने वाली आय के कारण शिक्षा, स्वास्थ्य और आधारभूत ढांचे में विकास हुआ, जिससे इराक आर्थिक रूप से मजबूत दिखने लगा।
लेकिन धीरे-धीरे सद्दाम हुसैन का शासन अत्यधिक केंद्रीकृत और दमनकारी बन गया। राजनीतिक विरोधियों पर कठोर कार्रवाई की गई और बाथ पार्टी को सत्ता का मुख्य आधार बनाया गया। कुर्द आबादी के खिलाफ सैन्य अभियानों और मानवाधिकार उल्लंघनों के आरोपों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनकी छवि को प्रभावित किया।
1980 के दशक के अंत तक इराक एक ऐसे देश के रूप में देखा जाने लगा जहां विकास और दमन दोनों साथ-साथ मौजूद थे। यही विरोधाभास आगे चलकर अमेरिका और इराक के बीच टकराव की बड़ी वजह बना।

ईरान युद्ध, कुवैत संकट और वैश्विक प्रतिबंध
1980 में इराक ने ईरान पर हमला किया, जिससे आठ साल लंबा और विनाशकारी युद्ध शुरू हुआ। इस युद्ध में दोनों देशों को भारी आर्थिक और मानव नुकसान हुआ।
युद्ध खत्म होने के बाद इराक कर्ज़ में डूब गया और आर्थिक संकट गहरा गया। इसी दबाव के बीच 1990 में सद्दाम हुसैन ने कुवैत पर हमला कर दिया। इस कदम की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कड़ी आलोचना हुई और संयुक्त राष्ट्र ने हस्तक्षेप किया।
1991 में अमेरिका के नेतृत्व में खाड़ी युद्ध हुआ, जिसमें इराक को पीछे हटना पड़ा। इसके बाद इराक पर कठोर आर्थिक प्रतिबंध लगाए गए और Weapons of Mass Destruction (WMD) की जांच शुरू हुई। लगातार प्रतिबंधों और अंतरराष्ट्रीय दबाव ने इराक की अर्थव्यवस्था और राजनीति को कमजोर कर दिया और भविष्य के बड़े संघर्ष की नींव रख दी।
9/11 के बाद अमेरिका ने बदली नीति
11 सितंबर 2001 को अमेरिका पर हुए आतंकवादी हमलों ने उसकी विदेश नीति को पूरी तरह बदल दिया। लगभग तीन हजार लोगों की मौत के बाद राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू. बुश (George W, Bush) ने आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक अभियान शुरू किया और उन देशों के खिलाफ कड़ी नीति अपनाई जिन्हें संभावित सुरक्षा खतरा माना जा रहा था।
इसी दौरान अमेरिकी प्रशासन ने दावा किया कि सद्दाम हुसैन के पास सामूहिक विनाश के हथियार मौजूद हैं और भविष्य में वे आतंकवादी संगठनों के हाथ लग सकते हैं। हालांकि संयुक्त राष्ट्र के हथियार निरीक्षकों को ऐसे हथियारों का कोई निर्णायक प्रमाण नहीं मिला था और फ्रांस, जर्मनी तथा रूस सहित कई देशों ने तत्काल सैन्य कार्रवाई का विरोध किया।
इसके बावजूद अमेरिका और ब्रिटेन ने यह तर्क दिया कि इराक को रोकना वैश्विक सुरक्षा के लिए आवश्यक है। यही सोच मार्च 2003 में इराक पर सैन्य आक्रमण का मुख्य आधार बनी। बाद में जब इराक में WMD नहीं मिले, तो युद्ध के औचित्य पर दुनिया भर में गंभीर बहस शुरू हुई और यह आज भी आधुनिक अंतरराष्ट्रीय राजनीति के सबसे विवादित मुद्दों में गिना जाता है।

2003 का इराक युद्ध और सद्दाम शासन का पतन
20 मार्च 2003 को अमेरिका, ब्रिटेन और उनके सहयोगी देशों ने ‘ऑपरेशन इराकी फ़्रीडम’ (Operation Iraqi Freedom) के तहत इराक पर व्यापक सैन्य हमला शुरू किया। आधुनिक हथियारों, हवाई हमलों और तेज़ जमीनी अभियान के कारण इराकी सेना अधिक समय तक प्रतिरोध नहीं कर सकी।
9 अप्रैल 2003 को अमेरिकी सैनिक बगदाद पहुंच गए और राजधानी पर उनका नियंत्रण स्थापित हो गया। इसी दौरान सद्दाम हुसैन की विशाल प्रतिमा को गिराए जाने की तस्वीर पूरी दुनिया में युद्ध की प्रतीक बन गई। कुछ ही समय बाद सद्दाम की सरकार पूरी तरह समाप्त हो गई और अमेरिका ने Coalition Provisional Authority के माध्यम से इराक का प्रशासन अपने हाथ में ले लिया।
हालांकि सैन्य जीत के बाद देश में कानून-व्यवस्था तेजी से बिगड़ने लगी। सरकारी संस्थाएं कमजोर हो गईं, लूटपाट बढ़ी और सुरक्षा व्यवस्था लगभग ध्वस्त हो गई। 13 दिसंबर 2003 को सद्दाम हुसैन को तिकरित के पास एक भूमिगत ठिकाने से गिरफ्तार कर लिया गया, लेकिन उनकी गिरफ्तारी के बावजूद हिंसा कम नहीं हुई। इसके विपरीत, विद्रोही संगठनों और सांप्रदायिक संघर्षों का दौर तेजी से बढ़ने लगा।
युद्ध के बाद की गलतियाँ
सद्दाम शासन के पतन के बाद अमेरिका ने Coalition Provisional Authority (CPA) के तहत इराक का प्रशासन संभाला। लेकिन कुछ बड़े निर्णयों ने स्थिति को और बिगाड़ दिया। इराकी सेना को पूरी तरह भंग कर दिया गया और बाथ पार्टी के हजारों अधिकारियों को सरकारी व्यवस्था से हटा दिया गया।
परिणामस्वरूप विद्रोही समूहों ने तेजी से ताकत हासिल की। बगदाद, फलूजा और रमादी जैसे शहर हिंसा के केंद्र बन गए। आत्मघाती हमले, अपहरण और सड़क किनारे बम विस्फोट आम हो गए।
क्या था सत्ता हस्तांतरण का वास्तविक अर्थ?
28 जून 2004 को इराक की अंतरिम सरकार को सत्ता सौंपना संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 1546 के तहत किया गया था। इस दिन CPA को समाप्त कर दिया गया और इराक को औपचारिक रूप से संप्रभुता वापस मिली।
इयाद अलावी के नेतृत्व में नई सरकार ने प्रशासन संभाला। अमेरिका ने इसे कब्ज़े के अंत के रूप में प्रस्तुत किया, लेकिन लगभग 1.5 लाख अमेरिकी सैनिक अभी भी देश में मौजूद थे। वे अब सीधे कब्ज़े वाली सेना के बजाय बहुराष्ट्रीय बल के रूप में काम कर रहे थे।
अंतरराष्ट्रीय कानून विशेषज्ञों के अनुसार यह “कानूनी अंत” था, लेकिन वास्तविक सैन्य प्रभाव अभी भी जारी था। इसलिए यह दिन पूरी तरह युद्ध समाप्त होने का प्रतीक नहीं था, बल्कि राजनीतिक और प्रशासनिक बदलाव का संकेत था।
सत्ता हस्तांतरण के बाद भी हालात अस्थिर रहे
सत्ता हस्तांतरण के बाद भी इराक में स्थिरता नहीं आई। सुन्नी और शिया समुदायों के बीच तनाव तेजी से बढ़ा और देश में सांप्रदायिक हिंसा फैल गई। विभिन्न उग्रवादी संगठनों ने आत्मघाती हमलों और बम धमाकों के जरिए सरकार और विदेशी बलों को निशाना बनाया।
2005 में चुनाव हुए और नया संविधान भी अपनाया गया, लेकिन राजनीतिक असहमति और सुरक्षा संकट जारी रहा। अबू मुसाब अल-जरकावी जैसे आतंकवादी नेताओं ने स्थिति को और खराब किया। इराक में लाखों लोग विस्थापित हुए और अर्थव्यवस्था कमजोर बनी रही।
यह स्पष्ट हो गया कि केवल सत्ता परिवर्तन से देश में शांति नहीं लाई जा सकती, बल्कि मजबूत संस्थाओं और सामाजिक एकता की आवश्यकता होती है।
इराक युद्ध की सीख
इराक का अनुभव आधुनिक इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक घटनाओं में से एक है। 28 जून 2004 को सत्ता हस्तांतरण ने कानूनी रूप से विदेशी कब्ज़े का अंत किया, लेकिन वास्तविक शांति का मार्ग लंबा और कठिन था। बाद के वर्षों में इराक ने आतंकवाद, गृह संघर्ष और राजनीतिक अस्थिरता का सामना किया।
WMD के न मिलने से युद्ध की वैधता पर भी सवाल उठे। सद्दाम हुसैन के निष्कासन और 2006 में उनकी फांसी के बावजूद देश पूरी तरह स्थिर नहीं हो सका। इस पूरे घटनाक्रम ने दुनिया को यह सिखाया कि किसी देश में लोकतंत्र केवल सैन्य हस्तक्षेप से स्थापित नहीं किया जा सकता।
स्थिरता के लिए मजबूत संस्थाएं, सामाजिक संतुलन और दीर्घकालिक राजनीतिक योजना आवश्यक होती है। यही कारण है कि 28 जून 2004 आज भी वैश्विक राजनीति में एक विवादित और महत्वपूर्ण मोड़ माना जाता है।
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