नई दिल्ली: कल्पना कीजिए कि किसी देश में हर साल कीमतें तेजी से बढ़ रही हों और स्थानीय मुद्रा की कीमत लगातार गिर रही हो। अगर आज 100 रुपये में उतना सामान नहीं खरीदा जा सकता, जितना कल खरीदा जा सकता था, तो परिवारों को या तो कम सामान खरीदना होगा या उसी सामान के लिए ज्यादा पैसे खर्च करने होंगे। ऐसे में घर का बजट बनाना मुश्किल हो जाएगा और लोग अपनी बचत को ऐसी जगह रखना चाहेंगे, जहां उसकी कीमत ज्यादा स्थिर रहे।
यह स्थिति केवल किसी एक देश तक सीमित नहीं है। उभरती और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में आर्थिक अस्थिरता के कारण महंगाई बढ़ने पर लोग अक्सर अपनी बचत अमेरिकी डॉलर में रखना पसंद करते हैं। अर्थशास्त्र में इसे डॉलराइजेशन कहा जाता है। यानी स्थानीय मुद्रा के बजाय अमेरिकी डॉलर में बचत रखना।
पहले इसके लिए विदेशी मुद्रा में बैंक खाता खोलना या बैंक में डॉलर जमा करना पड़ता था। लेकिन तकनीक ने यह प्रक्रिया बदल दी है। अब लोग स्मार्टफोन के जरिए डॉलर से जुड़ी स्टेबलकॉइन खरीद सकते हैं और उन्हें डिजिटल वॉलेट में रख सकते हैं।
बैंक फॉर इंटरनेशनल सेटलमेंट्स ने हाल ही में प्रकाशित एक अध्ययन में इस बदलाव का उभरती और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं पर संभावित असर देखा है। अध्ययन के मुताबिक, अमेरिकी डॉलर में बचत करने की वजहें बहुत ज्यादा नहीं बदली हैं। बढ़ती महंगाई, स्थानीय मुद्रा की कीमत में तेज गिरावट और आर्थिक अनिश्चितता अब भी लोगों को ज्यादा स्थिर विकल्प तलाशने के लिए मजबूर करती हैं। हालांकि, स्टेबलकॉइन ने डॉलर में बचत करना पहले की तुलना में आसान बना दिया है।
पहले डॉलर रखने के लिए लोगों को मुख्य रूप से बैंकों पर निर्भर रहना पड़ता था। अब स्टेबलकॉइन के जरिए वे घरेलू बैंकिंग व्यवस्था पर निर्भर हुए बिना डिजिटल डॉलर रख सकते हैं। इससे उन लोगों को अपनी बचत सुरक्षित रखने का एक और विकल्प मिलता है, जिनका स्थानीय बैंकों पर भरोसा कम हो रहा हो। शोधकर्ताओं के मुताबिक, एक बार जब लोग डॉलर में बचत शुरू कर देते हैं, तो वे जल्दी स्थानीय मुद्रा में वापस नहीं आते। पुराने आंकड़े बताते हैं कि महंगाई कम होने और आर्थिक स्थिति सुधरने के बाद भी लोग अपनी बचत का एक हिस्सा डॉलर में रखते हैं।
अध्ययन का एक अहम निष्कर्ष यह भी है कि स्टेबलकॉइन पारंपरिक डॉलर बैंक जमा की जगह पूरी तरह नहीं ले रहे हैं। यानी अमेरिकी डॉलर में बैंक के जरिए बचत और डॉलर से जुड़ी स्टेबलकॉइन के जरिए बचत, दोनों साथ-साथ बढ़ सकती हैं। स्टेबलकॉइन खास तौर पर ऐसे लोगों को आकर्षित कर रहे हैं, जो तकनीक का ज्यादा इस्तेमाल करते हैं। सरकारों और केंद्रीय बैंकों के लिए इसका मतलब यह है कि डॉलराइजेशन अब ऐसे वित्तीय माध्यम के जरिए भी बढ़ सकता है, जिस पर उनका सीधा नियंत्रण कम है।
परंपरागत रूप से सरकारें बैंकों और दूसरी रेगुलेटेड फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशंस के जरिए दूसरे देशों से आने-जाने वाले पैसे को नियंत्रित करती रही हैं। विदेशी मुद्रा खातों या कैपिटल फ्लो पर रोक जैसे नियम इसलिए काम करते हैं क्योंकि बैंक देश के नियमों के तहत काम करते हैं। लेकिन स्टेबलकॉइन इससे-अलग हैं। इन्हें पब्लिक ब्लॉकचेन नेटवर्क पर भेजा जा सकता है और प्राइवेट डिजिटल वॉलेट में रखा जा सकता है। इसलिए पुराने नियमों के जरिए इन पर नजर रखना ज्यादा मुश्किल हो सकता है।
छोटी अर्थव्यवस्थाओं के लिए इसका असर बड़ा हो सकता है। अगर ज्यादा लोग डॉलर से जुड़ी स्टेबलकॉइन में अपनी बचत रखते हैं, तो सरकारों के लिए अपने वित्तीय तंत्र में पैसे के प्रवाह को प्रभावित करना मुश्किल हो सकता है। मनी सप्लाई को संभालना, स्थानीय मुद्रा को स्थिर रखना और फाइनेंशियल शॉक्स से निपटना भी चुनौतीपूर्ण हो सकता है, खासकर तब जब लोगों की बचत का बढ़ता हिस्सा पारंपरिक बैंकिंग व्यवस्था से बाहर रखा जा रहा हो।
हालांकि, बैंक फॉर इंटरनेशनल सेटलमेंट्स का अध्ययन इस मामले में जल्दबाजी में कोई निष्कर्ष निकालने से बचता है। दशकों के अनुभव को देखते हुए शोधकर्ताओं को इस बात के बेहद कम प्रमाण मिले हैं, जिसमें केवल अमेरिकी डॉलर में बचत करने से सरकारों और केंद्रीय बैंकों के लिए महंगाई को नियंत्रित करना या अर्थव्यवस्था को संभालना काफी मुश्किल हो जाता है। इसका असर हर देश में एक जैसा नहीं होता। यह इस बात पर निर्भर करता है कि वहां डॉलर का इस्तेमाल कितना होता है और देश की मौजूदा आर्थिक स्थिति कैसी है।
लेखक स्टेबलकॉइन को अर्थव्यवस्थाओं के लिए नुकसानदेह नहीं बताते। उनका कहना है कि यह भी जरूरी नहीं कि स्टेबलकॉइन का इस्तेमाल उतना बढ़े, जितना कुछ लोग उम्मीद कर रहे हैं। पारंपरिक डॉलर बैंक जमा का अनुभव यह पूरी तरह नहीं बता सकता कि स्टेबलकॉइन आगे कैसे इस्तेमाल किए जाएंगे। इसलिए जैसे-जैसे देश डिजिटल एसेट्स को लेकर प्रयोग कर रहे हैं, यह समझने के लिए और शोध की जरूरत होगी कि डिजिटल डॉलर के ये नए रूप आने वाले वर्षों में फाइनेंशियल स्टेबिलिटी और आर्थिक नीतियों को किस तरह प्रभावित कर सकते हैं।
भारतीय नीति-निर्माताओं को भी डॉलर से जुड़ी स्टेबलकॉइन के बढ़ते इस्तेमाल पर नजर रखनी चाहिए। इससे यह समझने में मदद मिलेगी कि इनका घरेलू बचत, क्रॉस-बॉर्डर कैपिटल फ्लो और पूरी वित्तीय व्यवस्था पर क्या असर पड़ रहा है। भारत के वीडीए फ्रेमवर्क को विकसित करते समय यह जानकारी महत्वपूर्ण होगी, ताकि उभरते जोखिमों से निपटा जा सके और उपयोगी डिजिटल एसेट इनोवेशन पर जरूरत से ज्यादा रोक लगाए बिना रेगुलेटरी सिस्टम को मजबूत किया जा सके।



