आसिम वकार के कांग्रेस में जाने से UP की सियासत में नई हलचल। AIMIM के पूर्व राष्ट्रीय प्रवक्ता ने ओवैसी की पार्टी पर BJP के खिलाफ लड़ाई को कमजोर करने का आरोप लगाया। 2027 चुनाव में इसका क्या असर होगा?
नई दिल्ली/लखनऊ: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 से ठीक पहले राज्य की सियासत में एक अहम राजनीतिक घटनाक्रम सामने आया है। ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के राष्ट्रीय प्रवक्ता और पार्टी का प्रमुख चेहरा रहे सैयद आसिम वकार ने बुधवार, 2 सितंबर को कांग्रेस का दामन थाम लिया। वे लंबे समय से असदुद्दीन ओवैसी की अगुवाई वाली AIMIM से जुड़े थे और टीवी डिबेट्स तथा राजनीतिक कार्यक्रमों में पार्टी का पक्ष रखने वाले प्रमुख चेहरों में शामिल रहे हैं।
वकार के कांग्रेस में शामिल होने को उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले AIMIM के लिए राजनीतिक झटके के तौर पर देखा जा रहा है। खास तौर पर इसलिए क्योंकि AIMIM अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी पिछले कुछ महीनों से उत्तर प्रदेश में पार्टी का संगठन मजबूत करने और आगामी विधानसभा चुनाव में ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी में जुटे हैं। ऐसे समय में पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता का कांग्रेस में जाना ओवैसी की रणनीति के सामने नई चुनौती खड़ी करता नजर रहा है।
कांग्रेस में शामिल होते ही AIMIM पर निशाना
कांग्रेस में शामिल होने के बाद आसिम वकार ने अपने पुराने राजनीतिक दल पर खुलकर हमला बोला। उन्होंने कहा कि उनकी राजनीतिक लड़ाई भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ होनी चाहिए और इसी उद्देश्य से उन्होंने कांग्रेस का रुख किया है।
वकार का आरोप है कि AIMIM नेतृत्व सार्वजनिक तौर पर BJP का विरोध करने की बात करता है, लेकिन जमीनी राजनीति में उसका मुकाबला अक्सर उन दलों और नेताओं से होता है जो BJP के खिलाफ चुनाव लड़ रहे हैं। उनके मुताबिक, अगर विपक्षी दल एक-दूसरे को कमजोर करते हैं तो उसका सीधा राजनीतिक लाभ सत्तारूढ़ दल को मिल सकता है।
वकार ने यह भी कहा कि अगर लक्ष्य BJP को सत्ता से हटाना है तो विपक्षी दलों के बीच वोटों का बिखराव रोकना जरूरी है। उन्होंने कांग्रेस को BJP के खिलाफ प्रमुख राजनीतिक लड़ाई लड़ने वाला दल बताया और राहुल गांधी के नेतृत्व का समर्थन किया।
AIMIM को कहा BJP की ‘बी–टीम‘
आसिम वकार ने AIMIM की राजनीति पर सवाल उठाते हुए उसे BJP की ‘B-Team’ कहा। AIMIM और असदुद्दीन ओवैसी लगातार इस तरह के आरोपों को खारिज करते रहे हैं और खुद को एक स्वतंत्र राजनीतिक विकल्प के तौर पर पेश करते हैं।
वकार ने कांग्रेस में शामिल होने के दौरान कहा कि उन्होंने AIMIM में यह सोचकर प्रवेश किया था कि पार्टी BJP के खिलाफ राजनीतिक संघर्ष कर रही है, लेकिन समय के साथ उन्हें लगा कि जमीनी स्तर पर पार्टी का ज्यादा जोर कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और दूसरे विपक्षी दलों से मुकाबले पर है। इसी राजनीतिक असहमति को उन्होंने पार्टी छोड़ने की वजहों में शामिल किया।
यह बयान इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि उत्तर प्रदेश में मुस्लिम मतदाताओं को लेकर कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और AIMIM के बीच राजनीतिक प्रतिस्पर्धा लंबे समय से चर्चा का विषय रही है। 2027 का चुनाव इस प्रतिस्पर्धा को और तेज कर सकता है।
इमरान प्रतापगढ़ी की अहम भूमिका
आसिम वकार के कांग्रेस में शामिल होने का कार्यक्रम नई दिल्ली स्थित कांग्रेस मुख्यालय में आयोजित किया गया। कांग्रेस में शामिल होने के दौरान उत्तर प्रदेश कांग्रेस प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और पार्टी के अल्पसंख्यक विभाग के अध्यक्ष एवं राज्यसभा सांसद इमरान प्रतापगढ़ी मौजूद रहे।
वकार को कांग्रेस में लाने में इमरान प्रतापगढ़ी की भूमिका भी महत्वपूर्ण बताई जा रही है। हालांकि, यह स्पष्ट नहीं है कि वकार के साथ AIMIM के कितने स्थानीय कार्यकर्ता या समर्थक कांग्रेस में आएंगे। फिलहाल राजनीतिक महत्व मुख्य रूप से उनके व्यक्तिगत प्रभाव और AIMIM के राष्ट्रीय प्रवक्ता के तौर पर उनकी पहचान से जुड़ा है।
AIMIM से पहले समाजवादी पार्टी में रहे वकार
आसिम वकार की राजनीतिक यात्रा केवल AIMIM तक सीमित नहीं रही है। AIMIM में आने से पहले वह करीब दो दशक तक समाजवादी पार्टी से जुड़े रहे थे। इसके बाद उन्होंने असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी का रुख किया और करीब एक दशक तक AIMIM के साथ सक्रिय रहे। पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता के तौर पर उन्होंने उत्तर प्रदेश की राजनीति में खास पहचान बनाई।
यही वजह है कि कांग्रेस में उनका जाना सिर्फ एक पार्टी बदलने की घटना नहीं है। उनका राजनीतिक सफर SP से AIMIM और अब कांग्रेस तक पहुंचा है। खास बात यह है कि कांग्रेस और समाजवादी पार्टी दोनों ही उत्तर प्रदेश में BJP के खिलाफ विपक्षी राजनीति का हिस्सा हैं। ऐसे में वकार का कांग्रेस में जाना राज्य में विपक्षी खेमे के भीतर चल रही राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के लिहाज से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
AIMIM और SP के बीच बढ़ती राजनीतिक दूरी
एक तरफ AIMIM जहां BJP को चुनौती देने के लिए विपक्षी एकता की बात करती रही है, वहीं दूसरी तरफ ओवैसी ने पिछले कुछ महीनों में समाजवादी पार्टी और अखिलेश यादव पर भी तीखे हमले किए हैं।
जून में ओवैसी ने उत्तर प्रदेश में मुस्लिम और दलित मतदाताओं के लिए AIMIM को वैकल्पिक राजनीतिक मंच के रूप में पेश किया था। उन्होंने समाजवादी पार्टी के PDA (पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक) मॉडल और उसके मुस्लिम-दलित प्रतिनिधित्व को लेकर सवाल उठाए थे। दूसरी तरफ जुलाई में उन्होंने समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन की संभावना भी जताई। राजनीतिक विश्लेषकों के लिए AIMIM का विपक्षी दलों पर हमला और साथ ही गठबंधन के दरवाजे खुले रखना, 2027 की चुनावी रणनीति का अहम हिस्सा है।
आसिम वकार की आलोचना इसी राजनीतिक संदर्भ में महत्वपूर्ण हो जाती है। उन्होंने जिस बात को AIMIM की कमजोरी बताया है, वही रणनीति ओवैसी के लिए चुनावी विस्तार का जरिया हो सकती है। अंतिम तस्वीर चुनावी गठबंधन और सीट बंटवारे के बाद ही स्पष्ट होगी।
2022 में AIMIM का प्रदर्शन कैसा रहा था?
उत्तर प्रदेश में AIMIM के पिछले विधानसभा चुनाव प्रदर्शन को देखें तो पार्टी के सामने बड़ी चुनौती साफ दिखाई देती है। 2022 के विधानसभा चुनाव में AIMIM ने 95 सीटों पर चुनाव लड़ा था, लेकिन एक भी सीट नहीं जीत सकी। पार्टी को राज्य के कुल वोटों का करीब 0.4 प्रतिशत मिला था।
कांग्रेस का प्रदर्शन भी 2022 में कमजोर रहा था। पार्टी ने 399 सीटों पर चुनाव लड़ा और केवल दो सीटें जीत सकी। इसलिए 2027 में कांग्रेस के सामने भी उत्तर प्रदेश में अपने संगठन और जनाधार को मजबूत करने की बड़ी चुनौती है।
यही वजह है कि आसिम वकार जैसे नेता का कांग्रेस में जाना पार्टी के लिए राजनीतिक रूप से उपयोगी हो सकता है, खासकर अल्पसंख्यक मतदाताओं के बीच।
मुस्लिम वोट पर होगी पैनी नजर
उत्तर प्रदेश की राजनीति में मुस्लिम मतदाता लंबे समय से महत्वपूर्ण चुनावी कारक रहे हैं। कांग्रेस और समाजवादी पार्टी दोनों ही इस समुदाय के बीच अपना समर्थन बनाए रखने या बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। AIMIM भी इसी राजनीतिक क्षेत्र में अपना विस्तार करना चाहती है।
2027 का चुनाव इसलिए भी महत्वपूर्ण होगा क्योंकि राज्य में BJP के सामने विपक्षी दलों के बीच वोटों का बंटवारा बड़ा मुद्दा रहेगा। अगर AIMIM बड़ी संख्या में सीटों पर उम्मीदवार उतारती है तो मुस्लिम बहुल या मुस्लिम प्रभाव वाली सीटों पर त्रिकोणीय मुकाबले की संभावना बढ़ सकती है। दूसरी ओर, अगर विपक्षी दलों के बीच सीट समझौता होता है तो चुनावी तस्वीर अलग हो सकती है।
इसी संदर्भ में वकार का कांग्रेस में जाना कांग्रेस के लिए प्रतीकात्मक और संगठनात्मक दोनों स्तरों पर महत्वपूर्ण है। वह AIMIM के राष्ट्रीय प्रवक्ता रह चुके हैं और उत्तर प्रदेश की राजनीतिक बहसों में पार्टी का चेहरा रहे हैं। कांग्रेस उन्हें AIMIM की राजनीति और उसके भीतर की असहमति को सामने रखने वाले नेता के रूप में भी इस्तेमाल कर सकती है।
ओवैसी के लिए कितना बड़ा झटका?
आसिम वकार का जाना AIMIM के लिए निश्चित रूप से एक राजनीतिक नुकसान है, लेकिन इसका वास्तविक चुनावी असर कितना होगा, यह अभी कहना मुश्किल है। पार्टी का संगठन किसी एक प्रवक्ता पर निर्भर नहीं है और ओवैसी खुद उत्तर प्रदेश में सक्रिय अभियान चला रहे हैं। AIMIM ने राज्य में संगठनात्मक विस्तार के लिए चार जोन बनाए हैं और चुनावी तैयारी को तेज किया है।
फिर भी, वकार का जाना उस समय हुआ है जब AIMIM अपने ‘वोट-कटर’ या ‘वोट बांटने वाली पार्टी’ की छवि से बाहर निकलकर खुद को एक गंभीर राजनीतिक विकल्प के तौर पर स्थापित करने की कोशिश कर रही है। ऐसे में पार्टी के भीतर से ही किसी प्रमुख नेता का यह आरोप लगाना कि AIMIM की रणनीति विपक्ष को नुकसान पहुंचा सकती है, ओवैसी के लिए राजनीतिक चुनौती जरूर है।
वहीं कांग्रेस के लिए भी यह सिर्फ एक नेता के शामिल होने का मामला नहीं है। पार्टी उत्तर प्रदेश में अपनी खोई हुई जमीन वापस पाने की कोशिश कर रही है और समाजवादी पार्टी के साथ उसके संबंध भी 2027 के चुनावी समीकरण में अहम होंगे। वकार का कांग्रेस में आना इस बात का संकेत है कि चुनाव से पहले विपक्षी खेमे के भीतर राजनीतिक पुनर्संयोजन अभी जारी रहेगा।
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