नई दिल्ली/सियोल: दुनिया भर के विशेषज्ञों और नीति-निर्माताओं ने एआई प्रणालियों में नैतिक सिद्धांतों और मानवीय निगरानी को अनिवार्य बनाने पर जोर देते हुए कहा है कि साझा मानवीय मूल्यों के अभाव में तेज़ तकनीकी विकास कई वैश्विक समस्याओं को और बढ़ा सकता है।
यह आह्वान ग्लोबल एआई फोरम फॉर ह्यूमन को-प्रॉस्पेरिटी 2026 (GAFH 2026) के दौरान किया गया, जिसका आयोजन 12 जून को दक्षिण कोरिया के सियोल स्थित कोरिया चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री में हुआ। प्रमुख मीडिया संस्थान चियोंजी इल्बो (Cheonji Ilbo) द्वारा आयोजित इस सम्मेलन में 300 से अधिक प्रतिनिधियों ने भाग लिया, जिनमें नीति-निर्माता, मानवाधिकार कार्यकर्ता, शिक्षाविद और उद्योग जगत के विशेषज्ञ शामिल थे। सम्मेलन का समापन ग्लोबल एआई डिक्लेरेशन पर हस्ताक्षर के साथ हुआ।
फोरम का उद्घाटन करते हुए चियोंजी इल्बो के सीईओ और GAFH आयोजन समिति के अध्यक्ष ली सांग-म्योन ने कहा कि एआई का भविष्य तकनीकी वर्चस्व की प्रतिस्पर्धा से नहीं, बल्कि सार्वभौमिक मानवीय मूल्यों से संचालित होना चाहिए। उन्होंने चेतावनी दी कि बिना पर्याप्त नियंत्रण के एआई का विकास स्वायत्त हथियारों, व्यापक निगरानी और गलत सूचना जैसी चुनौतियों को तेज़ी से बढ़ा सकता है।
भारत का प्रतिनिधित्व करते हुए मेरी ग्रुप ऑफ इंस्टीट्यूशंस के वाइस प्रेसिडेंट प्रोफेसर (डॉ.) ललित अग्रवाल ने डिजिटल युग में उभरते “एम्पैथी डिवाइड” (सहानुभूति की खाई) पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि डिजिटल कनेक्टिविटी बढ़ने के बावजूद एल्गोरिदम आधारित इको चैंबर्स और बढ़ते ध्रुवीकरण के कारण समाज पहले की तुलना में अधिक विभाजित होता जा रहा है।
प्रोफेसर अग्रवाल ने एआई-संचालित शांति शिक्षा (AI-powered Peace Education) को बढ़ावा देने की आवश्यकता पर जोर देते हुए डेवलपर्स से ऐसे बुद्धिमान शिक्षण प्लेटफॉर्म विकसित करने का आग्रह किया जो विवाद समाधान, अंतर-सांस्कृतिक समझ और पीस लिटरेसी को प्रोत्साहित करें। उन्होंने मेरी के टोटल असेसमेंट ऑफ रिस्क एंड पीस (TARP) फ्रेमवर्क को भी प्रस्तुत किया, जिसे यह आकलन करने के लिए तैयार किया गया है कि उच्च-प्रभाव वाली प्रणालियां संघर्ष को बढ़ावा दे रही हैं या स्थिरता को।
सम्मेलन में अन्य वक्ताओं ने भी एआई के लिए मानव-केंद्रित दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता पर बल दिया। वर्ल्ड काउंसिल फॉर पब्लिक डिप्लोमेसी एंड कम्युनिटी डायलॉग के अध्यक्ष एंडी वर्माउट ने कहा कि एआई के लिए नियामक व्यवस्था राष्ट्रीय सीमाओं से आगे बढ़नी चाहिए, क्योंकि यह तकनीक वैश्विक स्तर पर कार्य करती है। वहीं, सांस्कृतिक मानवविज्ञानी डॉ. पार्क जंग-जिन ने कहा कि नैतिक सिद्धांतों को बाद में जोड़ने के बजाय एआई प्रणालियों के मूल ढांचे में ही शामिल किया जाना चाहिए।
सियोल नेशनल यूनिवर्सिटी के विशिष्ट प्रोफेसर जू यंग-सियोप ने कहा कि एआई युग में किसी देश की प्रगति का आकलन उसकी व्यावसायिक सफलता से नहीं, बल्कि इस आधार पर किया जाना चाहिए कि वह मानव सह-अस्तित्व को बढ़ावा देने और संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) को हासिल करने के लिए एआई का कितना प्रभावी उपयोग करता है।
सम्मेलन में अपनाए गए ग्लोबल एआई डिक्लेरेशन में इस बात पर जोर दिया गया कि जैसे-जैसे एआई प्रणालियां मानव निर्णय लेने की प्रक्रिया को अधिक प्रभावित कर रही हैं, वैसे-वैसे सरकारों, प्रौद्योगिकी कंपनियों और संस्थानों की जिम्मेदारी है कि वे नवाचार के केंद्र में नैतिकता, जवाबदेही और मानवीय निगरानी को सुनिश्चित करें।
