Saturday, 05 September 2026
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Pan India Movie Scam: RRR, KGF और Pushpa की कामयाबी के बाद क्यों फेल हुआ यह अनोखा फॉर्मूला? ‘टॉक्सिक’ की विफलता के बाद उठते सवाल


₹2 करोड़ से कम बजट वाली ‘हनुमान अंश’ ने धीरे-धीरे शो और दर्शक बढ़ाए, जबकि ‘टॉक्सिक’ जैसी बड़ी फिल्म संघर्ष करती दिखी। जानिए बॉक्स ऑफिस पर इस उलटफेर के पीछे क्या वजह हो सकती है।

नई दिल्ली: कुछ साल पहले तक भारतीय सिनेमा में ‘Pan India’ शब्द ही किसी फिल्म की बड़ी महत्वाकांक्षा और संभावित सफलता का संकेत माना जाने लगा था। एक क्षेत्रीय भाषा में बनी फिल्म को हिंदी, तमिल, तेलुगु, मलयालम और दूसरी भाषाओं में बड़े पैमाने पर रिलीज करना, अलग-अलग इंडस्ट्री के सितारों को एक साथ लाना और देशभर में भारी प्रचार करना जैसे फिल्मी कारोबार का नया फॉर्मूला बन गए थे।

इस बदलाव को सबसे ज्यादा ताकत ‘Baahubali’, ‘Pushpa: The Rise’, ‘RRR’ और ‘KGF: Chapter 2’ जैसी फिल्मों की सफलता से मिली। खासकर महामारी के बाद इन फिल्मों ने हिंदी बेल्ट में भी मजबूत प्रदर्शन किया और यह धारणा बनी कि अगर फिल्म को सही पैकेजिंग के साथ पूरे देश में उतारा जाए तो क्षेत्रीय सिनेमा भी राष्ट्रीय स्तर पर हजारों करोड़ का कारोबार कर सकता है।

लेकिन इसी सफलता के बाद एक दूसरा सवाल भी लगातार बढ़ता जा रहा है। क्या हर फिल्म को Pan India बनाकर बेचने से वह Pan India हिट बन सकती है?

‘Liger’, ‘Radhe Shyam’ और ‘Adipurush’ जैसे उदाहरणों ने इस सोच पर सवाल खड़े किए। अब 2026 में Yash की ‘Toxic’ की बॉक्स ऑफिस यात्रा और बेहद कम बजट में बनी ‘Hanuman Ansh’ की अप्रत्याशित सफलता ने इस बहस को फिर तेज कर दिया है।

पैन इंडिया सिनेमा का असली मतलब क्या है?

सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि Pan India फिल्म का अर्थ सिर्फ ऐसी फिल्म नहीं है, जो चार-पांच भाषाओं में रिलीज हो।

इस शब्द का इस्तेमाल आम तौर पर ऐसी फिल्मों के लिए किया जाता है, जिनका लक्ष्य अपने मूल भाषा क्षेत्र से बाहर देशभर के दर्शकों तक पहुंचना और वहां व्यावसायिक सफलता हासिल करना होता है।

यही अंतर पिछले कुछ वर्षों में साफ दिखाई दिया है। किसी फिल्म के पास बड़ा बजट हो सकता है, कई भाषाओं में डबिंग हो सकती है, बड़े सितारे हो सकते हैं और हजारों स्क्रीन मिल सकती हैं। लेकिन अगर कहानी और किरदार दर्शकों से जुड़ नहीं पाते, तो केवल ‘Pan India’ टैग टिकट खिड़की पर लंबे समय तक फिल्म को नहीं बचा सकता।

RRR, KGF और Pushpa ने आखिर क्या अलग किया?

‘RRR’, ‘KGF 2’ और ‘Pushpa: The Rise’ की सफलता ने पूरे फिल्म कारोबार को प्रभावित किया।

इन फिल्मों ने हिंदी बाजार में सिर्फ इसलिए जगह नहीं बनाई क्योंकि उन्हें दूसरी भाषाओं में डब किया गया था। इनके पास मजबूत स्टार इमेज, बड़े पर्दे पर देखने लायक दृष्टि, पात्रों के बीच स्पष्ट संघर्ष, याद रहने वाले किरदार और ऐसी कहानी थी जिसे भाषा की बाधा के बावजूद समझना आसान था।

‘Pushpa’ की हिंदी सफलता खास तौर पर महत्वपूर्ण थी। अल्लू अर्जुन उस समय हिंदी बेल्ट में उतने बड़े स्टार नहीं थे, जितने दक्षिण भारत में। इसके बावजूद फिल्म ने धीरे-धीरे ‘वर्ड-ऑफ-माउथ’ के सहारे अपना दर्शक वर्ग बढ़ाया।

‘KGF: Chapter 2’ ने हिंदी बाजार में और बड़ा प्रभाव डाला। इसकी हिंदी डबिंग ने शुरुआती वर्षों में जिस तरह का कारोबार किया, उसने यह साबित किया कि दर्शक सिर्फ बॉलीवुड सितारों के भरोसे नहीं हैं। यश की स्क्रीन प्रेजेंस और फिल्म की larger-than-life प्रस्तुति ने हिंदी दर्शकों को आकर्षित किया।

वहीं ‘RRR’ के मामले में SS Rajamouli का ब्रांड, Ram Charan और Jr NTR की जोड़ी और फिल्म का विशाल सिनेमैटिक क्षेत्रफल बड़ी ताकत बने।

फिर Liger और Radhe Shyam क्यों नहीं चल पाईं?

2022 में ‘Liger’ और ‘Radhe Shyam’ ने इस फॉर्मूले की सीमाएं दिखा दी थीं।

‘लाइगर’ में विजय देवरकोंडा को हिंदी दर्शकों के बीच पहले से मिली पहचान का फायदा उठाने की कोशिश की गई। फिल्म को Pan India इवेंट की तरह पेश किया गया, बड़े स्तर पर प्रचार हुआ और कई भाषाओं में रिलीज किया गया। इसके बावजूद फिल्म दर्शकों की उम्मीदों पर खरी नहीं उतरी।

इसी तरह ‘Radhe Shyam’ में प्रभास जैसे बड़े स्टार थे और फिल्म को लगभग 10,000 स्क्रीन पर रिलीज किया गया था। फिर भी इसका प्रदर्शन उम्मीद के मुताबिक नहीं रहा।

विश्लेषण में एक अहम बात सामने आई थी। इन फिल्मों ने जिस चीज को दोहराने की कोशिश की, वह असल में Pan India marketing formula था, न कि उन सफल फिल्मों की रचनात्मक ताकत।

यानी निर्माताओं ने देखा कि KGF, RRR और Pushpa सफल हुईं और फिर यह मान लिया कि वैसा ही स्टार कास्ट, वैसी ही रिलीज रणनीति और वैसा ही प्रचार दूसरी फिल्म को भी सफल बना देगा। लेकिन दर्शकों ने इसे स्वीकार नहीं किया।

‘आदिपुरुष’ ने भी यही चेतावनी दी

पैन इंडिया की विफलता का एक सबसे बड़ा उदाहरण फिल्म आदिपुरुष को समझा जा सकता है।

प्रभास जैसे स्टार, रामायण जैसी व्यापक रूप से पहचानी जाने वाली कहानी, बड़ा बजट, बड़े पैमाने का VFX और देशभर में रिलीज फिल्म के पास लगभग हर वह तत्व था जिसे Pan India blockbuster के लिए जरूरी माना जाता है।

लेकिन रिलीज के बाद कहानी, संवाद और VFX को लेकर व्यापक आलोचना हुई। फिल्म की शुरुआती कमाई मजबूत रही, लेकिन नकारात्मक word-of-mouth ने उसके प्रदर्शन को प्रभावित किया। विरोध और विवाद भी सामने आए और निर्माताओं को रिलीज के बाद कुछ संवादों में बदलाव करना पड़ा।

स्टार की लोकप्रियता दर्शकों को पहले दिन थिएटर तक ला सकती है। लेकिन उन्हें दूसरी बार टिकट खरीदने के लिए मजबूर करने का काम कहानी, अनुभव और word-of-mouth करता है।

टॉक्सिक की कहानी क्या बताती है?

हाल ही में सिनेमाघरों में रिलीज हुई यश की मच अवेटेड फिल्म ‘टॉक्सिक’ ने एक बार फिर इस बहस को सामने ला दिया।

फिल्म की शुरुआत मजबूत रही और इसके पहले दिन भारत में लगभग ₹101 करोड़ की नेट कमाई दर्ज हुई। शुरुआती दिनों में इसका worldwide gross भी तेजी से बढ़ा। लेकिन extended opening weekend के पांच दिनों में फिल्म ₹300 करोड़ worldwide का आंकड़ा पार नहीं कर सकी, जबकि उससे काफी बड़ी उम्मीदें थीं।

इसके बाद फिल्म की स्क्रीन संख्या में भी तेज गिरावट देखने को मिली। शुरुआती दिन लगभग 24,000 शो से घटकर दसवें दिन यह संख्या करीब 2,253 शो रह गई।

यहां केवल ‘फिल्म फ्लॉप हो गई’ कहना पर्याप्त नहीं होगा। ‘Toxic’ की यात्रा यह सवाल उठाती है कि क्या बड़ा स्टार, पैन इंडिया कास्ट और विशाल ओपनिंग अपने आप लंबे समय तक दर्शक बनाए रख सकते हैं?

फिल्म को कई भाषाओं में रिलीज किया गया और इसमें यश के साथ कियारा आडवाणी, नयनतारा, हुमा कुरैशी और रुक्मिणी वसंत और दूसरे कलाकार थे। यानी राष्ट्रीय बाजार के लिए पैकेजिंग में कोई कमी नहीं थी।

फिर भी आलोचना और mixed audience response ने इसकी गति को प्रभावित किया।

क्या स्क्रीन का गलत वितरण भी जिम्मेदार?

पैन इंडिया फिल्म की सफलता में सिर्फ कुल स्क्रीन की संख्या महत्वपूर्ण नहीं होती। किस शहर में कितनी स्क्रीन मिलीं, किस भाषा के शो कितने हैं और पहले सप्ताह के बाद कितनी स्क्रीन बचती हैं, ये ज्यादा महत्वपूर्ण सवाल हैं।

कई बार बड़े बजट की फिल्म शुरुआत में भारी संख्या में स्क्रीन हासिल कर लेती है। लेकिन अगर दर्शक अपेक्षित संख्या में नहीं आते तो प्रदर्शक तेजी से शो कम कर देते हैं।

इसके उलट छोटी फिल्म को शुरुआत में कम स्क्रीन मिल सकती हैं। अगर word-of-mouth अच्छा रहा तो उसके शो बढ़ सकते हैं।

‘हनुमान अंश’ ने बदल दिया खेल

7 अगस्त 2026 को रिलीज हुई फिल्म ‘हनुमान अंश’ इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। फिल्म ‘नीम करोली बाबा’ के जीवन से प्रेरित भक्ति नाटक है और इसे ₹2 करोड़ से कम बजट में बनाया गया था।

शुरुआत में फिल्म को सिर्फ 355 शो मिले थे। लेकिन दर्शकों की प्रतिक्रिया और word-of-mouth के बाद इसके शो लगातार बढ़ते गए। 29वें दिन तक यह करीब 5,055 शो तक पहुंच गई और India gross लगभग ₹97.99 करोड़ हो गया।

यानी जिस फिल्म को शुरुआत में बड़े इवेंट के रूप में पेश नहीं किया गया, उसने धीरे-धीरे अपना बाजार बनाया।

यहां एक बड़ा सबक छिपा है। दर्शक को पहले से यह बताना जरूरी नहीं कि फिल्म बहुत बड़ी है; अगर फिल्म अच्छी है तो दर्शक खुद उसे बड़ा बना सकते हैं।

फिल्म का सही प्रमोशन बेहद जरूरी

आज के प्रतिस्पर्धी बाजार में प्रमोशन फिल्म के अस्तित्व के लिए बेहद जरूरी है। लेकिन प्रमोशन का उद्देश्य दर्शकों को फिल्म के बारे में बताना होना चाहिए, न कि ऐसी उम्मीद बनाना जिसे फिल्म पूरा न कर सके।

‘Pan India’ शब्द को अगर मार्केटिंग स्लोगन की तरह इस्तेमाल किया जाए, लेकिन फिल्म की कहानी स्थानीय या सीमित दर्शक वर्ग से आगे न निकल पाए, तो प्रचार उल्टा असर डाल सकता है।

एक बड़ा सवाल यह भी है कि क्या हर भाषा के दर्शक के लिए प्रचार की रणनीति अलग बनाई जाती है?

हिंदी दर्शक के लिए बनाई गई मार्केटिंग रणनीति तमिल, तेलुगु, कन्नड़ या मलयालम बाजार में उसी तरह काम करे, यह जरूरी नहीं।

क्या हर फिल्म को Pan India बनाना जरूरी है?

यही शायद इस पूरी बहस का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष है। अगर कहानी किसी खास क्षेत्र, संस्कृति या भाषा से गहराई से जुड़ी है और उसका कोर दर्शक मजबूत है, तो उसे पहले अपने बाजार में मजबूत प्रदर्शन करने देना ज्यादा समझदारी हो सकती है।

इसके बाद word-of-mouth, reviews और दर्शकों की मांग के आधार पर दूसरे बाजारों में स्क्रीन बढ़ाई जा सकती हैं।

‘Vikram’ और ‘Vikrant Rona’ जैसे उदाहरण भी दिखाते हैं कि किसी फिल्म की सफलता और Pan India सफलता अलग-अलग चीजें हैं। ‘Vikram’ ने दक्षिण भारत में शानदार प्रदर्शन किया, लेकिन हिंदी बाजार में उसका कारोबार उसी अनुपात में नहीं था।

इसलिए एक फिल्म का अपने क्षेत्र में ब्लॉक्बस्टर होना उसे Pan India blockbuster नहीं बनाता।

क्या Pan India Theory खुद एक Scam है?

पैन इंडिया सिनेमा कोई फर्जी अवधारणा नहीं है। ‘Baahubali’, ‘RRR’, ‘KGF’, ‘Pushpa’ और बाद में कई दूसरी फिल्मों ने साबित किया है कि भारतीय दर्शक भाषा की सीमाओं से बाहर जाकर फिल्मों को स्वीकार कर सकते हैं।

समस्या Pan India को फिल्म की गुणवत्ता के बजाय मार्केटिंग लेबल मान लेने में है।

अगर निर्माता पहले यह तय कर लें कि फिल्म Pan India होगी और उसके बाद कहानी को उस लेबल के मुताबिक ढालने की कोशिश करें, तो जोखिम बढ़ जाता है।

इसके उलट अगर फिल्म की कहानी, किरदार और सिनेमैटिक अनुभव मजबूत हो और निर्माता उसके बाद अलग-अलग बाजारों के लिए रणनीति तैयार करें, तो Pan India सफलता की संभावना ज्यादा हो सकती है।

ये भी पढें :- Mirzapur The Movie Review: बड़े पर्दे पर जमा ‘मिर्जापुर’ का भौकाल! कहानी, एक्शन और एक्टिंग ने जीता दिल

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MD Faijan

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लेखक

मोहम्मद फैजान न्यूज़ ऑफ द डे में पत्रकार हैं, जहाँ वे खेल, मनोरंजन, राजनीति और अंतरराष्ट्रीय मामलों को कवर करते हैं। इससे पहले वे यूट्यूब चैनल स्पोर्ट्स यारी में सोशल मीडिया एग्जीक्यूटिव के रूप में कार्य कर चुके हैं, जहाँ उन्होंने डिजिटल कंटेंट मैनेजमेंट और ऑडियंस एंगेजमेंट का व्यावहारिक अनुभव प्राप्त किया। भारत के छत्तीसगढ़ राज्य के कोरिया जिले से संबंध रखने वाले फैजान आधुनिक मीडिया कार्यप्रणालियों की अच्छी समझ रखते हैं और कहानी कहने के विभिन्न रूपों में गहरी रुचि रखते हैं।

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