Friday, 02 October 2026
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मालवीय नगर का वो ‘बंद मकान’ और कातिल मां की खामोशी, 2 बेटियों के कत्ल की आरोपी का अभी जेल ही ठिकाना

अदालत ने खारिज की जमानत याचिका: जज बोले- घर के अंदर जो कत्लेआम हुआ, उसकी एक-एक बात बतानी होगी, जांच के अहम मोड़ पर राहत नहीं

नई दिल्ली, न्यूज ऑफ द डे

राजधानी दिल्ली के मालवीय नगर की गलियों में आज भी उस दोहरे हत्याकांड की दहशत कम नहीं हुई है। अपनी ही दो जवान बेटियों, राधिका (34) और गुणिशा (28), की जान लेने की आरोपी 53 वर्षीय सुनीता अरोड़ा की जमानत अर्जी कोर्ट ने ठुकरा दी है। साकेत कोर्ट के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश हरगुरवरिंदर सिंह जग्गी ने मामले को ‘अति गंभीर’ श्रेणी का मानते हुए कहा कि जब तक फोरेंसिक रिपोर्ट और गवाहों के बयान दर्ज नहीं हो जाते, आरोपी का बाहर आना न्याय के हित में नहीं है।

मर्डर मिस्ट्री: किचन के सामानों से बनाया ‘मौत का हथियार’

अभियोजन पक्ष (Prosecution) ने कोर्ट में वो सच बयां किया जिसे सुनकर कोर्ट रूम में सन्नाटा पसर गया। पुलिस को उस बंद घर के अंदर से जो सामान मिला, वो किसी सोची-समझी साजिश की गवाही दे रहा था-
खून से लथपथ घर: सिंक के पास खून के ताजे निशान और फर्श पर बिखरा पीला तरल पदार्थ।
किचन बना ‘टॉर्चर रूम’: ओखली-मूसल में पिसा हुआ सफेद जहरीला पाउडर, मिक्सर-ग्राइंडर का नुकीला ब्लेड और कांच की टूटी हुई बोतलें। आरोप है कि इन्हीं से बेटियों पर हमला किया गया।
दरवाजा अंदर से बंद: पुलिस जब घर पहुंची तो दरवाजा अंदर से लॉक था। अंदर बेटियां मृत पड़ी थीं और मां बेहोश होने का नाटक कर रही थी।

‘वो मां नहीं, सालों की प्रताड़ना का शिकार थी’

हैरानी की बात यह है कि आरोपी सुनीता के वकील ने इसे ‘कोल्ड ब्लडेड मर्डर’ मानने से इनकार कर दिया। उन्होंने कोर्ट में एक ऐसी कहानी रखी जो समाज के स्याह पक्ष को दिखाती है:
पति पर गंभीर आरोप: वकील ने दावा किया कि सुनीता का पति सुधीर अरोड़ा एक ‘हैवान’ की तरह व्यवहार करता था। वह अपनी पत्नी और बेटियों को न सिर्फ पीटता था, बल्कि उन्हें भूखा भी रखता था।
आत्महत्या का प्रयास: बचाव पक्ष का तर्क है कि यह मर्डर नहीं, बल्कि ‘सुसाइड पैक्ट’ था। मां और बेटियां उस नर्क भरी जिंदगी से तंग आ चुकी थीं।
पुलिस की लापरवाही: वकील ने सवाल उठाया कि 5 मार्च की घटना की FIR दर्ज करने में पुलिस ने 52 घंटे क्यों लगाए? और मां को बिना बताए बेटियों का अंतिम संस्कार क्यों कर दिया गया?

‘बेटियों की मौत का हिसाब तो देना होगा’: कोर्ट

अदालत ने बचाव पक्ष की ‘मानसिक प्रताड़ना’ वाली बात सुनी तो सही, लेकिन उसे जमानत का आधार नहीं माना। अदालत ने कहा, “कानून में ‘लास्ट सीन टुगेदर’ का सिद्धांत बहुत अहम है। जब घर के अंदर सिर्फ तीन लोग थे और दो की मौत हो गई, तो जीवित बचे तीसरे इंसान (मां) की जिम्मेदारी है कि वह सच बताए। जांच अभी नाजुक दौर में है, ऐसे में जमानत देना जांच को पटरी से उतारना होगा।”

सुलगते सवाल

सवाल 1: अगर यह सामूहिक आत्महत्या की कोशिश थी, तो बेटियां ही क्यों मरीं और मां सुरक्षित कैसे बच गई?
सवाल 2: घर में मिले मूसल और ग्राइंडर ब्लेड का इस्तेमाल क्या बेटियों को तड़पाने के लिए किया गया था?
सवाल 3: क्या पति सुधीर अरोड़ा की भूमिका की भी निष्पक्ष जांच हुई है, या पुलिस ने सिर्फ मां को ही विलेन मान लिया?

अभी जमानत याचिका खारिज होने से सुनीता को जेल की सलाखों के पीछे ही रहना होगा, जबकि पुलिस अब विसरा रिपोर्ट और घटनास्थल से मिले रसायनों की फोरेंसिक जांच का इंतजार कर रही है।

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IK

Imran Khan

लेखक

NOTD News के लिए नियमित रूप से समाचार लिखते हैं।

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