किसी ने साइकिल को स्कूल बनाया तो किसी ने ब्लैकबोर्ड पर Microsoft Word सिखाया। शिक्षक दिवस 2026 पर पढ़िए उन शिक्षकों की कहानियां जिन्होंने संसाधनों की कमी को बच्चों की राह में बाधा नहीं बनने दिया।
नई दिल्ली: हर साल 5 सितंबर को शिक्षक दिवस मनाया जाता है। यह दिन सिर्फ शिक्षकों को सम्मान देने का अवसर नहीं, बल्कि यह याद करने का भी मौका है कि एक शिक्षक की भूमिका सिर्फ कक्षा में पाठ पढ़ाने तक सीमित नहीं होती। कई शिक्षक ऐसे भी हैं, जिन्होंने सीमित संसाधनों, सामाजिक चुनौतियों और कठिन परिस्थितियों के बावजूद शिक्षा को उन बच्चों तक पहुंचाया, जिनके लिए या तो स्कूल जाना आसान नहीं थ, या फिर उन छात्रों के पास पर्याप्त संसाधन नहीं थे।
किसी ने साइकिल को ही अपना चलता-फिरता स्कूल बना लिया, तो किसी ने बेहद कम उम्र में गरीब बच्चों के लिए पढ़ाई की व्यवस्था शुरू कर दी। कुछ शिक्षकों ने तकनीक को ग्रामीण शिक्षा से जोड़ा, जबकि कुछ ने शरणार्थी शिविरों और दूरदराज के इलाकों में बच्चों के लिए शिक्षा के दरवाजे खोले।
इन शिक्षकों को हमेशा बड़ी सुर्खियां या मंच नहीं मिले, लेकिन इनके प्रयासों ने कई बच्चों के भविष्य की दिशा बदलने में भूमिका निभाई। आज शिक्षक दिवस 2026 के मौके पर नजर डालते हैं भारत और दुनिया के ऐसे ही शिक्षकों की कहानियों पर, जिन्होंने अपने काम से साबित किया कि शिक्षा सिर्फ किताबों और कक्षाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह बदलाव का सबसे मजबूत माध्यम बन सकती है।
1. आदित्य कुमार
उत्तर प्रदेश के आदित्य कुमार को अक्सर ‘साइकिल गुरु’ के नाम से जाना जाता है। उनकी कहानी इस मायने में अलग है कि उन्होंने शिक्षा के लिए किसी बड़े स्कूल भवन का इंतजार नहीं किया। उन्होंने अपनी साइकिल को ही चलते-फिरते स्कूल में बदल दिया।
लखनऊ में गरीब और झुग्गी-बस्तियों में रहने वाले बच्चों तक शिक्षा पहुंचाने के लिए आदित्य कुमार लंबे समय तक साइकिल से रोजाना कई किलोमीटर की यात्रा करते रहे। उनके साथ किताबें और पढ़ाने की सामग्री रहती थी। एक रिपोर्ट के मुताबिक, वे विज्ञान से स्नातक हैं और लगभग 40 मील यानी करीब 64 किलोमीटर तक साइकिल चलाकर वंचित बच्चों को पढ़ाने जाते थे।

उनका मॉडल पारंपरिक स्कूल जैसा नहीं था। जहां बच्चे रहते थे, वहीं उन्हें पढ़ाने की कोशिश की जाती थी। यही वजह है कि उन्हें ‘Mobile School Man’ भी कहा गया। कुछ रिपोर्टों में उनके हजारों नहीं बल्कि लाखों गरीब बच्चों तक पहुंचने के दावे किए गए हैं।
2. बाबर अली
पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद के बाबर अली की कहानी भारत में ग्रासरूट शिक्षक की सबसे चर्चित कहानियों में से एक है।
जब बाबर खुद पांचवीं कक्षा में पढ़ते थे, तब उन्होंने देखा कि उनके आसपास के कई बच्चे गरीबी के कारण स्कूल जाने के बजाय खेतों में काम करते थे या दूसरे छोटे-मोटे काम करते थे। उन्होंने तय किया कि जो कुछ वे अपने स्कूल में सीखते हैं, उसे उन बच्चों के साथ साझा करेंगे।
2002 के आसपास उन्होंने अपने घर के पीछे महज आठ बच्चों के साथ पढ़ाना शुरू किया। उनकी छोटी बहन भी शुरुआती विद्यार्थियों में शामिल थीं। वे खुद स्कूल जाते थे और लौटकर दूसरे बच्चों को पढ़ाते थे।
शुरुआत में यह व्यवस्था एक खेल जैसी लगती थी, लेकिन धीरे-धीरे यह एक वास्तविक शिक्षा पहल बन गई। बाद में इसी पहल ने आनंद शिक्षा निकेतन का रूप लिया।

2009 में BBC ने 16 साल की उम्र में उन्हें ‘Youngest Headmaster in the World’ के रूप में चर्चित किया। BBC के अपने Archival Material में भी बाबर अली को इसी संदर्भ में दर्ज किया गया है।
एक रिपोर्ट में बताया गया था कि उनका स्कूल गरीब बच्चों को मुफ्त शिक्षा दे रहा था और उस समय वहां सैकड़ों बच्चे पढ़ रहे थे।
2024 की एक रिपोर्ट में बाबर ने बताया कि उनकी यात्रा के 22 साल पूरे हो चुके हैं और करीब 8,000 विद्यार्थियों को मुफ्त शिक्षा मिल चुकी है।
3. रंजीतसिंह दिसाले
महाराष्ट्र के सोलापुर जिले के रंजीतसिंह दिसाले उन शिक्षकों में हैं जिन्होंने दिखाया कि तकनीक और ग्रामीण शिक्षा एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं।
वे परितेवाडी के एक जिला परिषद स्कूल में शिक्षक रहे और वहां खासकर लड़कियों की शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए काम किया। उनकी सबसे चर्चित पहल पाठ्यपुस्तकों में QR codes का इस्तेमाल थी।
इन QR codes को स्कैन करने पर बच्चों को पाठ से जुड़ी अतिरिक्त डिजिटल सामग्री, जैसे वीडियो और अन्य शिक्षा सामग्री तक पहुंच मिलती थी। इससे किताब और डिजिटल शिक्षा के बीच एक कड़ी बनी। Global Teacher Prize ने उनके इसी काम और लड़कियों की शिक्षा के लिए किए गए प्रयासों को मान्यता दी और उन्हें 2020 का Global Teacher Prize दिया।
उनका काम खास तौर पर गरीब और आदिवासी समुदायों की लड़कियों की शिक्षा से जुड़ा था।

दिसाले की उपलब्धि का एक और उल्लेखनीय पहलू था उनका पुरस्कार मिलने के बाद लिया गया फैसला। उन्होंने $1 million के Global Teacher Prize की आधी राशि अपने fellow finalists के साथ साझा करने की घोषणा की, ताकि वे भी अपने शिक्षा संबंधी काम को आगे बढ़ा सकें। Harvard Graduate School of Education ने भी उनके इस फैसले का उल्लेख किया है।
उनका काम केवल प्रौद्योगिकी तक सीमित नहीं था। उन्होंने बाल विवाह के खिलाफ जागरूकता और लड़कियों को शिक्षा से जोड़े रखने की दिशा में भी काम किया।
4. जियाउद्दीन यूसुफजई
पाकिस्तान के जियाउद्दीन यूसुफजई को दुनिया उनकी बेटी मलाला यूसुफजई के पिता के रूप में जानती है, लेकिन शिक्षक दिवस के लेख में उनकी अपनी शिक्षा-यात्रा को अलग से देखना जरूरी है।

जियाउद्दीन खुद शिक्षक और शिक्षा कार्यकर्ता रहे हैं। उन्होंने स्वात क्षेत्र में खुशाल पब्लिक स्कूल की स्थापना और संचालन में भूमिका निभाई। यह कम लागत वाले निजी स्कूलों की श्रृंखला थी।

उनकी सबसे महत्वपूर्ण भूमिका लड़कियों की शिक्षा को लेकर थी। जिस समाज में लड़कियों की शिक्षा को लेकर कई तरह की सामाजिक और धार्मिक बंदिशें थीं, वहां उन्होंने अपनी बेटी मलाला को शिक्षा हासिल करने और अपनी बात रखने के लिए प्रोत्साहित किया।
2019 में TIME के लिए लिखे अपने लेख में जियाउद्दीन ने बताया कि उनके बचपन में उनके परिवार में लड़कों और लड़कियों के साथ शिक्षा को लेकर समान व्यवहार नहीं होता था। इसी अनुभव ने उन्हें अपनी बेटी को अलग तरीके से पालने के लिए प्रेरित किया।
मलाला के शिक्षा अधिकारों की वकालत करने के कारण उन पर हमला हुआ, लेकिन इसके बाद भी जियाउद्दीन शिक्षा की लड़ाई से पीछे नहीं हटे। आज वे मलाला फंड के को-फाउंडर और बोर्ड मेंबर के रूप में लड़कियों की शिक्षा के अभियान से जुड़े रहे हैं।
5. अकीला आसिफी
अकीला आसिफी की कहानी शिक्षक दिवस के लेख में सबसे मजबूत वैश्विक उदाहरण में से एक हो सकती है।
अफगानिस्तान से विस्थापित होकर पाकिस्तान पहुंचने के बाद उन्होंने वहां रह रही अफगान शरणार्थी लड़कियों की शिक्षा को अपना मिशन बना लिया। UNHCR के अनुसार, उन्होंने 20 से अधिक वर्षों के निर्वासन के दौरान शरणार्थी लड़कियों की शिक्षा के लिए काम किया।
उन्होंने पाकिस्तान के कोट चंदना शरणार्थी शिविर में लड़कियों के लिए एक स्कूल शुरू किया। शुरुआत आसान नहीं थी। आर्थिक संसाधन सीमित थे और कुछ परिवार लड़कियों की शिक्षा को लेकर सहज नहीं थे। इसके बावजूद आसिफी ने समुदाय के भीतर लगातार काम किया।

UNHCR के अनुसार, 2015 तक उनके प्रयासों से 1,000 से अधिक शरणार्थी लड़कियों ने प्राथमिक शिक्षा पूरी की थी। इसी काम के लिए उन्हें 2015 Nansen Refugee Award दिया गया।
Global Teacher Prize के प्रोफाइल में बताया गया है कि उन्होंने शुरुआत में एक टेन्ट स्कूल से काम शुरू किया था और बाद में कोट चंदना कैंप में नौ स्कूलों तक व्यवस्था विकसित हुई, जहां 1,500 से अधिक विद्यार्थी थे, जिनमें लगभग 900 लड़कियां थीं।
उनकी कहानी सिर्फ शिक्षा देने की नहीं, बल्कि यह समझने की भी है कि विस्थापन के बीच शिक्षा बच्चों को दोबारा सामान्य जीवन की ओर लौटने का रास्ता दे सकती है।
6. रिचर्ड अप्पिया अकोटो
घाना के शिक्षक रिचर्ड अप्पिया अकोटो की कहानी इस बात की मिसाल है कि संसाधनों की कमी किसी शिक्षक की कोशिशों को रोक नहीं सकती। ग्रामीण घाना के Betenase Municipal Assembly Junior High School में ICT पढ़ाने वाले अकोटो के सामने बड़ी चुनौती थी।
उनके स्कूल में 2011 के बाद से काम करने वाला कंप्यूटर नहीं था, जबकि छात्रों को राष्ट्रीय परीक्षा के लिए कंप्यूटर और ICT की जानकारी हासिल करनी थी। ऐसे में उन्होंने हार मानने के बजाय रंगीन चॉक से ब्लैकबोर्ड पर Microsoft Word की पूरी स्क्रीन बना दी। उन्होंने मेन्यू, टूलबार और दूसरे विकल्पों को इस तरह समझाया कि जिन छात्रों ने कंप्यूटर नहीं देखा था, वे कम से कम उसकी कार्यप्रणाली की कल्पना कर सकें।

अकोटो की तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हुईं और उनकी मेहनत दुनिया तक पहुंची। इसके बाद माइक्रोसॉफ्ट ने उन्हें सिंगापुर में Microsoft Educators Exchange में आमंत्रित किया, जबकि भारत की NIIT घाना ने स्कूल को पांच डेस्कटॉप कंप्यूटर, पाठ्यपुस्तकें और अकोटो को एक लैपटॉप दान किया।

उनकी कहानी बताती है कि अच्छा शिक्षक साधनों का इंतजार नहीं करता, उपलब्ध साधनों को ही सीखने का माध्यम बना देता है।
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