RSS से जुड़े विद्या भारती के 1,000 स्कूल पश्चिम बंगाल में खोलने की तैयारी है। CM सुवेंदु अधिकारी ने जिलों, नगरपालिकाओं और पंचायतों तक विस्तार का लक्ष्य रखा। जानें सरकार की पूरी योजना।
कोलकाता: पश्चिम बंगाल की शिक्षा व्यवस्था को लेकर मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने बड़ा ऐलान किया है। उन्होंने राज्य में अगले एक साल के भीतर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से संबद्ध शिक्षा संगठन विद्या भारती के कम से कम 1,000 स्कूल स्थापित करने का लक्ष्य रखा है। इन स्कूलों को राज्य के जिलों, नगरपालिकाओं और पंचायत स्तर तक पहुंचाने की बात कही गई है। अधिकारी ने इस पहल का उद्देश्य बच्चों तक वह शिक्षा पहुंचाना बताया, जिसे उन्होंने ‘राष्ट्रीयतावादी शिक्षा’ कहा।
यह घोषणा ऐसे समय हुई है जब पश्चिम बंगाल में नई भाजपा सरकार शिक्षा व्यवस्था में कई बदलावों की बात कर रही है। मुख्यमंत्री ने राज्य के मौजूदा चार शिक्षा विभागों को एकीकृत करने का प्रस्ताव भी रखा है। साथ ही उन्होंने मदरसा शिक्षा के लिए अलग प्रशासनिक व्यवस्था नहीं रखने की बात कही। इन दोनों प्रस्तावों को मिलाकर देखें तो यह केवल नए स्कूल खोलने की योजना नहीं, बल्कि राज्य की शिक्षा व्यवस्था के प्रशासन और वैचारिक दिशा में बदलाव का संकेत भी है।
विद्या भारती के कार्यक्रम में हुआ ऐलान
सुवेंदु अधिकारी ने यह घोषणा कोलकाता स्थित रामकृष्ण मिशन इंस्टीट्यूट ऑफ कल्चर में आयोजित एक कार्यक्रम में की। कार्यक्रम विद्या भारती की 74वीं वर्षगांठ के मौके पर आयोजित किया गया था। मुख्यमंत्री ने संगठन से राज्य में अपनी गतिविधियों का विस्तार करने और अधिक स्कूल स्थापित करने की जिम्मेदारी लेने का आह्वान किया।
प्रस्ताव के मुताबिक, एक साल में कम से कम 1,000 नए विद्या भारती स्कूल स्थापित किए जाने हैं। इनका विस्तार केवल बड़े शहरों तक सीमित नहीं रहेगा। मुख्यमंत्री ने जिलों के साथ-साथ नगरपालिकाओं और पंचायतों तक ऐसे स्कूल पहुंचाने की बात कही है।
मौजूदा रिपोर्टों के मुताबिक, पश्चिम बंगाल में विद्या भारती से जुड़े करीब 313 स्कूल पहले से मौजूद हैं। इस लिहाज से 1,000 स्कूलों का नया लक्ष्य संगठन की राज्य में मौजूदगी को कई गुना बढ़ा सकता है।
क्या ये सरकारी स्कूल होंगे?
प्रस्तावित 1,000 स्कूल राज्य सरकार के सरकारी स्कूलों के तौर पर नहीं, बल्कि RSS से संबद्ध विद्या भारती नेटवर्क के स्कूलों के रूप में बताए गए हैं।
विद्या भारती स्वयं को एक ऐसे शैक्षिक संगठन के रूप में प्रस्तुत करती है जो भारतीय संस्कृति, परंपराओं, मूल्यों और चरित्र निर्माण पर आधारित शिक्षा पर जोर देता है। संगठन के मुताबिक उसकी शुरुआत 1952 में उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में पहले ‘सरस्वती शिशु मंदिर’ से हुई थी। बाद में अलग-अलग राज्यों में ऐसे स्कूलों का विस्तार हुआ और 1977 में राष्ट्रीय स्तर पर विद्या भारती अखिल भारतीय शिक्षा संस्थान का गठन हुआ।
क्या है विद्या भारती का शिक्षा मॉडल?
विद्या भारती के अनुसार उसका उद्देश्य केवल पाठ्यक्रम आधारित शिक्षा देना नहीं है। संगठन शिक्षा को भारतीय संस्कृति, नैतिक मूल्यों, अनुशासन और चरित्र निर्माण से जोड़ता है। उसकी आधिकारिक सामग्री के अनुसार, पहला सरस्वती शिशु मंदिर 1952 में गोरखपुर में शुरू हुआ था और बाद में यह मॉडल कई राज्यों तक फैला।
संगठन अपनी शिक्षा व्यवस्था में योग, संस्कृत, सांस्कृतिक गतिविधियों, मूल्य शिक्षा और भारतीय दर्शन को भी महत्व देता है। विद्या भारती की ओर से प्रकाशित सामग्री में आधुनिक तकनीक, डिजिटल शिक्षा, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और रोबोटिक्स जैसी चीजों को भी शिक्षा में शामिल करने की बात कही गई है।
देशभर में संगठन के स्कूलों की संख्या के बारे में अलग-अलग आधिकारिक प्रस्तुतियों में अलग-अलग आंकड़े मिलते हैं। विद्या भारती की वेबसाइट के एक पुराने विवरण में 12,828 औपचारिक स्कूल और 11,353 अनौपचारिक स्कूलों का उल्लेख है, जबकि संगठन की नई सामग्री व्यापक शिक्षा केंद्रों समेत 30,000 से अधिक संस्थानों का दावा करती है। इसलिए संख्या बताते समय यह स्पष्ट करना जरूरी है कि अलग-अलग आंकड़े अलग-अलग श्रेणियों को शामिल करते हैं।
‘राष्ट्रीयतावादी शिक्षा’ पर क्यों जोर दे रहे सुवेंदु?
मुख्यमंत्री ने अपने संबोधन में शिक्षा को राष्ट्रीय चेतना और देशभक्ति से जोड़ने पर जोर दिया। उन्होंने आरोप लगाया कि पिछली सरकारों के दौरान राज्य की शिक्षा व्यवस्था कमजोर हुई और संस्थानों में राजनीतिक प्रभाव बढ़ा।
रिपोर्टों के अनुसार, अधिकारी ने विद्या भारती से ऐसी शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करने में भूमिका निभाने का आग्रह किया जिसे वे ‘राष्ट्रीयतावादी’ मानते हैं। उन्होंने विशेष रूप से कुछ जिलों में विद्या भारती की मौजूदगी बढ़ाने की बात कही।
उन्होंने मुर्शिदाबाद और दक्षिण 24 परगना में अधिक स्कूल खोलने की जरूरत बताई और इन इलाकों में ‘राष्ट्रविरोधी गतिविधियों’ के अधिक होने का दावा किया। यह दावा मुख्यमंत्री के राजनीतिक और वैचारिक रुख के संदर्भ में देखा जा रहा है।
विभागों को एक करने का प्रस्ताव
सुवेंदु अधिकारी ने केवल विद्या भारती के स्कूलों की संख्या बढ़ाने की बात नहीं कही। उन्होंने पश्चिम बंगाल की मौजूदा शिक्षा प्रशासन व्यवस्था में भी बदलाव का प्रस्ताव रखा।
मुख्यमंत्री ने राज्य के चार शिक्षा विभागों को एक व्यवस्था के तहत लाने की बात कही। इसके साथ उन्होंने कहा कि मदरसा शिक्षा के लिए अलग प्रशासनिक व्यवस्था नहीं होनी चाहिए।
मौजूदा पश्चिम बंगाल सरकार की आधिकारिक वेबसाइट पर स्कूली शिक्षा, उच्च शिक्षा, तकनीकी शिक्षा, प्रशिक्षण एवं कौशल विकास और अल्पसंख्यक मामले एवं मदरसा शिक्षा अलग-अलग विभागों के रूप में सूचीबद्ध हैं।
स्कूल शिक्षा विभाग प्राथमिक, माध्यमिक और उच्च माध्यमिक शिक्षा से संबंधित काम देखता है। इसके तहत पाठ्यक्रम, परीक्षा, निरीक्षण, शिक्षक भर्ती, स्कूल मान्यता और विभिन्न योजनाओं से जुड़ी संस्थागत व्यवस्थाएं काम करती हैं।
दूसरी ओर, अल्पसंख्यक मामलों और मदरसा शिक्षा का अलग विभाग लंबे समय से राज्य की प्रशासनिक संरचना का हिस्सा है। पश्चिम बंगाल सरकार के अनुसार यह विभाग 1996 में बनाया गया था और बाद में इसका नाम बदलकर अल्पसंख्यक मामले एवं मदरसा शिक्षा विभाग किया गया।
इसलिए मुख्यमंत्री का प्रस्ताव लागू होने पर प्रशासनिक ढांचे में बदलाव के लिए औपचारिक सरकारी आदेश और विभागीय पुनर्गठन की जरूरत होगी।
मदरसा प्रशासन खत्म करने की बात
मदरसा शिक्षा के लिए अलग प्रशासनिक व्यवस्था खत्म करने का प्रस्ताव राजनीतिक और सामाजिक रूप से संवेदनशील मुद्दा है।
पश्चिम बंगाल में मदरसा शिक्षा के लिए अलग बोर्ड और प्रशासनिक संस्थाएं मौजूद हैं। ऐसे में इसे सामान्य शिक्षा प्रशासन के साथ जोड़ने की योजना से प्रशासनिक ढांचे में बदलाव आ सकता है।
हालांकि, मुख्यमंत्री के बयान के आधार पर यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगा कि राज्य के मदरसे बंद किए जाएंगे। मौजूदा रिपोर्टों में बात अलग प्रशासनिक व्यवस्था खत्म करने की है, न कि मदरसा शिक्षा समाप्त करने की।
वंदे मातरम को लेकर भी सरकार का सख्त रुख
विद्या भारती स्कूलों के विस्तार की घोषणा से एक दिन पहले ही सुवेंदु अधिकारी ने स्कूलों में वंदे मातरम के पूर्ण संस्करण के गायन को लेकर सख्त रुख अपनाया था।
उन्होंने चेतावनी दी कि यदि स्कूलों में इसका अनिवार्य रूप से पालन नहीं किया गया तो सरकारी वित्तीय सहायता और अन्य सरकारी समर्थन रोका जा सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि छात्रों की भागीदारी केवल औपचारिक नहीं होनी चाहिए।
यह बयान उस व्यापक नीति दिशा से जुड़ा दिखाई देता है जिसमें सरकार शिक्षा संस्थानों में राष्ट्रीय प्रतीकों, देशभक्ति और भारतीय संस्कृति पर अधिक जोर देने की बात कर रही है।
सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्या होगी?
1,000 स्कूलों का लक्ष्य सुनने में बड़ा है, लेकिन इसे जमीन पर उतारना उससे भी बड़ी चुनौती होगी। स्कूल खोलने के लिए जमीन, भवन, शिक्षक, प्रशासनिक ढांचा, मान्यता, पाठ्यक्रम और वित्तीय संसाधनों की जरूरत होगी।
इसके अलावा यह भी स्पष्ट करना होगा कि प्रस्तावित संस्थानों में पढ़ाई किस बोर्ड के तहत होगी। यदि ये स्कूल राज्य या केंद्रीय बोर्ड से संबद्ध होते हैं तो उन्हें संबंधित शैक्षणिक और नियामकीय मानकों का पालन करना होगा।
ग्रामीण क्षेत्रों और पंचायत स्तर पर स्कूल खोलने की स्थिति में शिक्षक उपलब्धता और बुनियादी सुविधाएं भी महत्वपूर्ण होंगी। केवल संस्थानों की संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा; छात्रों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देना भी उतना ही महत्वपूर्ण होगा।
आलोचना और पारदर्शिता का सवाल
विद्या भारती का शिक्षा मॉडल भारतीय संस्कृति और मूल्यों पर जोर देता है, लेकिन शिक्षा में किसी वैचारिक संगठन की बढ़ती भूमिका पर सवाल उठना भी स्वाभाविक है।
आलोचना का एक प्रमुख आधार यह हो सकता है कि स्कूलों में शिक्षा और वैचारिक प्रशिक्षण के बीच सीमा कैसे तय होगी। खासकर सरकारी व्यवस्था के साथ यदि किसी संगठन का विस्तार जोड़ा जाता है तो पाठ्यक्रम, शिक्षक प्रशिक्षण और शैक्षणिक स्वतंत्रता से जुड़े सवाल महत्वपूर्ण होंगे।
दूसरी ओर, विद्या भारती अपने मॉडल को मूल्य आधारित और भारतीय सांस्कृतिक परंपराओं से जुड़ी शिक्षा के रूप में प्रस्तुत करती है। संगठन का कहना है कि उसका उद्देश्य विद्यार्थियों में ज्ञान के साथ चरित्र, जिम्मेदारी और सामाजिक सेवा की भावना विकसित करना है।
इसलिए आने वाले समय में बहस केवल ‘RSS के स्कूल’ खोलने तक सीमित नहीं रहेगी। असली सवाल यह होगा कि इन स्कूलों की शैक्षणिक गुणवत्ता, पाठ्यक्रम, मान्यता और प्रशासनिक जवाबदेही किस तरह सुनिश्चित की जाती है।
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