पंजाब में 2027 चुनाव से पहले SAD-BJP गठबंधन की अटकलों ने सियासत गरमा दी है। भगवंत मान के तीखे हमले और BJP के अलग रुख से बढ़ी हलचल।
चंडीगढ़: पंजाब में 2027 के विधानसभा चुनाव से कई महीने पहले ही राजनीतिक समीकरण तेजी से बदलते नजर आ रहे हैं। शिरोमणि अकाली दल (SAD) और भारतीय जनता पार्टी (BJP) के बीच पुराने गठबंधन को दोबारा बहाल करने की अटकलों ने राज्य की सियासत को गरमा दिया है। इसी मुद्दे पर मुख्यमंत्री भगवंत मान ने अकाली दल पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने आरोप लगाया कि सत्ता में वापसी के लिए अकाली नेतृत्व बीजेपी के साथ गठबंधन करने के लिए “घुटनों पर” आ गया है और “भीख मांग रहा है।”
दूसरी ओर, अकाली दल के वरिष्ठ नेता बिक्रम सिंह मजीठिया ने सार्वजनिक रूप से कहा है कि पंजाब के लोग SAD और BJP को दोबारा साथ देखना चाहते हैं। वहीं बीजेपी की ओर से हाल में कहा गया है कि पार्टी 2027 में पंजाब की सभी 117 विधानसभा सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है।
यानी एक तरफ गठबंधन की अटकलें तेज हैं, तो दूसरी तरफ बीजेपी ने फिलहाल इसे लेकर स्पष्ट दूरी बनाई हुई है। ऐसे में 2027 का पंजाब चुनाव अभी से बहुकोणीय और बेहद दिलचस्प होता दिखाई दे रहा है।
मान का अकाली दल पर हमला
मुख्यमंत्री भगवंत मान ने बुधवार को छविंडा देवी में आयोजित ‘लोक मिलनी’ कार्यक्रम को संबोधित करते हुए अकाली दल और बीजेपी के संभावित गठबंधन को निशाने पर लिया। यह इलाका अकाली नेता बिक्रम सिंह मजीठिया के राजनीतिक प्रभाव वाले क्षेत्र में आता है।
मान ने अकाली नेतृत्व पर आरोप लगाया कि वह बीजेपी के साथ दोबारा हाथ मिलाने के लिए बेहद उत्सुक है। उन्होंने इसे सत्ता में वापसी की कोशिश बताते हुए अकाली दल पर पंजाब के हितों की अनदेखी करने का आरोप लगाया।
मुख्यमंत्री ने अपने भाषण में अकाली दल को पंजाब में नशे की समस्या, बेअदबी और राज्य के भविष्य से जुड़े मुद्दों को लेकर भी घेरा। उन्होंने आरोप लगाया कि पूर्व SAD-BJP शासन ने पंजाब को गंभीर समस्याओं की ओर धकेला और अब दोनों दल दोबारा सत्ता हासिल करने के लिए साथ आने की कोशिश कर रहे हैं।
मान का यह हमला ऐसे समय हुआ है जब पंजाब में अगले विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक दलों ने अपनी रणनीति तैयार करना शुरू कर दिया है। ऐसे में SAD-BJP संबंधों को लेकर कोई भी बयान सीधे चुनावी समीकरणों पर असर डाल सकता है।
क्या SAD-BJP के बीच गठबंधन होने जा रहा है?
अकाली दल के नेताओं की ओर से गठबंधन की संभावना के संकेत जरूर मिले हैं। 21 अगस्त को वरिष्ठ SAD नेता बिक्रम सिंह मजीठिया ने कहा था कि पंजाब के लोग दोनों दलों को दोबारा साथ देखना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि दोनों पार्टियों के अलग होने के पीछे कृषि कानूनों का मुद्दा था, लेकिन अब वे कानून वापस लिए जा चुके हैं और पंजाब की परिस्थितियां बदल गई हैं।
मजीठिया ने यह भी स्पष्ट किया था कि अंतिम फैसला दोनों दलों का शीर्ष नेतृत्व करेगा। यानी उनके बयान को गठबंधन की आधिकारिक घोषणा नहीं माना जा सकता।
इससे पहले SAD सांसद हरसिमरत कौर बादल ने भी दोनों दलों के बीच संभावित समझौते की ओर संकेत किया था। उनके बयान के बाद पंजाब की राजनीति में SAD-BJP गठबंधन को लेकर चर्चा और तेज हो गई।
बीजेपी का बयान
गठबंधन की अटकलों के बीच बीजेपी का रुख फिलहाल अकाली दल से अलग दिखाई देता है।
बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव संगठन बीएल संतोष ने हाल ही में कहा कि पार्टी पंजाब की सभी 117 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है। उनके बयान को SAD-BJP गठबंधन की संभावनाओं को खारिज करने के रूप में देखा गया।
इससे पहले पंजाब बीजेपी अध्यक्ष की ओर से भी सभी सीटों पर संगठन मजबूत करने और अकेले चुनाव लड़ने की तैयारी के संकेत दिए गए थे।
यही वजह है कि मौजूदा स्थिति में यह कहना जल्दबाजी होगी कि SAD और BJP के बीच गठबंधन तय हो गया है। अकाली नेताओं के संकेत और बीजेपी के सार्वजनिक बयानों के बीच साफ अंतर देखा जा सकता है।
BJP और SAD का इतिहास
SAD और BJP का रिश्ता पंजाब की राजनीति में नया नहीं है। दोनों दल कई दशकों तक गठबंधन में रहे और विधानसभा तथा लोकसभा चुनाव मिलकर लड़ते रहे।
इस गठबंधन में अकाली दल पंजाब में बड़ा राजनीतिक घटक था, जबकि बीजेपी मुख्य रूप से शहरी इलाकों में अपना प्रभाव रखती थी। दोनों दलों का सामाजिक और भौगोलिक आधार एक-दूसरे के लिए पूरक माना जाता था।
लेकिन 2020 में केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा लाए गए तीन कृषि कानूनों को लेकर दोनों दलों के रिश्ते में बड़ा संकट पैदा हुआ। किसान आंदोलन के दौरान SAD ने बीजेपी से दूरी बना ली और NDA से बाहर निकल गया। हरसिमरत कौर बादल ने केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद दोनों दलों ने अलग-अलग चुनावी रास्ता अपनाया।
अकाली दल के लिए गठबंधन के मायने
SAD के सामने 2027 चुनाव में बड़ी चुनौती है। पंजाब की राजनीति में कभी प्रमुख ताकत रहा अकाली दल 2022 के विधानसभा चुनाव में सत्ता से बाहर हो गया था। इसके बाद पार्टी को अपने राजनीतिक आधार को दोबारा मजबूत करने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ी।
बीजेपी के साथ पुराने गठबंधन की वापसी अकाली दल को संगठनात्मक और चुनावी स्तर पर कुछ फायदे दे सकती है। दूसरी ओर बीजेपी के लिए SAD के साथ गठबंधन ग्रामीण और सिख मतदाताओं के बीच अपनी पहुंच मजबूत करने का रास्ता बन सकता है।
लेकिन दोनों दलों के बीच सीट बंटवारा और नेतृत्व की भूमिका सबसे बड़ा सवाल होगी। यही वजह है कि बीजेपी की ओर से ‘बड़े भाई’ की भूमिका की इच्छा की खबरें सामने आने के बाद गठबंधन की बातचीत और जटिल हो गई है।
बीजेपी के लिए भी आसान नहीं पंजाब की राह
भारतीय जनता पार्टी ने पिछले कुछ वर्षों में पंजाब में अपने संगठन को स्वतंत्र रूप से मजबूत करने पर जोर दिया है। पुराने गठबंधन में पार्टी सीमित संख्या में सीटों पर चुनाव लड़ती थी, जबकि अकाली दल अधिक सीटों पर उम्मीदवार उतारता था।
अब बीजेपी का एक वर्ग मानता है कि पार्टी को पंजाब में अपना स्वतंत्र आधार तैयार करना चाहिए।
इसी रणनीति के तहत सभी 117 सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी का बयान महत्वपूर्ण है। अगर बीजेपी वास्तव में अकेले चुनाव लड़ती है तो पंजाब का चुनावी मुकाबला और अधिक बहुकोणीय हो सकता है।
हालांकि, चुनाव नजदीक आने पर राजनीतिक समीकरण बदलना भारतीय राजनीति में असामान्य नहीं है। इसलिए मौजूदा बयानों के आधार पर अंतिम चुनावी गठबंधन की तस्वीर तय मानना जल्दबाजी होगी।
SAD-BJP गठबंधन से बढ़ेगी AAP की दिक्कतें?
भगवंत मान के लिए संभावित SAD-BJP गठबंधन राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण मुद्दा है। आम आदमी पार्टी ने 2022 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और SAD-BJP दोनों को पीछे छोड़ते हुए पंजाब में सरकार बनाई थी।
ऐसे में 2027 में AAP की कोशिश सत्ता विरोधी माहौल को नियंत्रित करने और विपक्षी दलों को एक-दूसरे के साथ जोड़कर पेश करने की हो सकती है।
मान के ताजा बयान में भी यही रणनीति दिखाई देती है। उन्होंने SAD पर बीजेपी के साथ सत्ता में वापसी के लिए समझौता करने का आरोप लगाया और दोनों दलों के पिछले शासन को निशाने पर लिया।
AAP के लिए चुनौती यह होगी कि वह 2022 की अपनी बड़ी जीत को दोहरा सके। इसके लिए सरकार के कामकाज, कानून-व्यवस्था, रोजगार, नशे की समस्या और राज्य की आर्थिक स्थिति जैसे मुद्दे चुनावी बहस के केंद्र में रह सकते हैं।
कांग्रेस की भी गठबंधन पर पैनी नजर
पंजाब की राजनीति में केवल AAP, SAD और BJP ही खिलाड़ी नहीं हैं। कांग्रेस भी 2027 के लिए अपनी जमीन मजबूत करने की कोशिश कर रही है।
SAD-BJP गठबंधन की संभावना ने कांग्रेस को भी प्रतिक्रिया देने का मौका दिया है। पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग ने बीजेपी से सार्वजनिक रूप से यह स्पष्ट करने को कहा है कि वह SAD के साथ गठबंधन नहीं करेगी।
कांग्रेस के लिए यह मुद्दा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अगर SAD और BJP एक साथ आते हैं तो राज्य में विपक्षी वोटों के बंटवारे का गणित बदल सकता है।
दूसरी तरफ अगर दोनों दल अलग-अलग चुनाव लड़ते हैं तो कांग्रेस, AAP, SAD और BJP के बीच मुकाबला और अधिक त्रिकोणीय या बहुकोणीय हो सकता है।
2027 में 117 सीटों पर होगा मुकाबला
पंजाब विधानसभा में कुल 117 सीटें हैं और अगला विधानसभा चुनाव 2027 में होना है। सरकार बनाने के लिए किसी दल या गठबंधन को 59 सीटों का बहुमत चाहिए।
2022 में AAP ने बड़ी जीत दर्ज की थी और भगवंत मान मुख्यमंत्री बने। अब 2027 का चुनाव उनके लिए सरकार के प्रदर्शन पर जनता के फैसले का चुनाव भी होगा।
वहीं SAD के सामने अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता मजबूत करने और बीजेपी के सामने राज्य में स्वतंत्र राजनीतिक आधार विस्तार करने की चुनौती है।
क्या पुराने गठबंधन की वापसी होगी आसान?
SAD और BJP के लिए सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ साथ आने की घोषणा नहीं, बल्कि उस गठबंधन को जमीन पर स्वीकार्य बनाना होगी। 2020 के बाद पंजाब की राजनीति में कई बदलाव हुए हैं। किसान आंदोलन ने बीजेपी की छवि को राज्य के ग्रामीण क्षेत्रों में प्रभावित किया था। दूसरी ओर SAD को भी अपने पारंपरिक समर्थन आधार में चुनौतियों का सामना करना पड़ा।
अगर दोनों दल साथ आते हैं तो उन्हें यह स्पष्ट करना होगा कि 2020 में जिस मुद्दे पर गठबंधन टूटा था, उसके बाद राजनीतिक परिस्थितियां कैसे बदली हैं। इसके अलावा सीट का बंटवारा भी महत्वपूर्ण होगा। पुराने गठबंधन की व्यवस्था को जस का तस दोहराना संभव होगा या नहीं, यह भी एक बड़ा सवाल है।
2027 का पंजाब चुनाव अभी दूर है, लेकिन राजनीतिक लड़ाई शुरू हो चुकी है। और SAD-BJP गठबंधन पर जारी यह घमासान इस बात का शुरुआती संकेत है कि अगले विधानसभा चुनाव में सिर्फ सरकार के कामकाज पर नहीं, बल्कि गठबंधनों और राजनीतिक ध्रुवीकरण पर भी बड़ा दांव लगेगा।
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