झारखंड आंदोलन के स्तंभ शिबू सोरेन को राकेश कुमार सिंह ने दी श्रद्धांजलि, हेमंत सोरेन के प्रति संवेदना व्यक्त की

झारखंड आंदोलन के स्तंभ शिबू सोरेन को राकेश कुमार सिंह ने दी श्रद्धांजलि, हेमंत सोरेन के प्रति संवेदना व्यक्त की

“शिबू सोरेन का जाना झारखंड की आत्मा को गहरा आघात है” — राकेश कुमार सिंह

नई दिल्ली, 4 अगस्त 2025

झारखंड आंदोलन के स्तंभ, झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) के संस्थापक और तीन बार राज्य के मुख्यमंत्री रहे आदरणीय शिबू सोरेन जी के निधन पर वरिष्ठ पत्रकार एवं वर्ष 2006 से 2011 तक बिहार-झारखंड कांग्रेस के प्रवक्ता रहे राकेश कुमार सिंह ने गहरा शोक व्यक्त किया है।

दिल्ली के सर गंगा राम अस्पताल में सोमवार सुबह 81 वर्षीय शिबू सोरेन जी ने अंतिम सांस ली। उनके निधन की सूचना के साथ ही पूरे झारखंड में शोक की लहर फैल गई है।

इस शोकपूर्ण अवसर पर राकेश कुमार सिंह ने अपने शोक संदेश में कहा, “गुरुजी का संपूर्ण जीवन संघर्ष, तपस्या और सामाजिक न्याय के लिए समर्पित रहा। उन्होंने झारखंड के जनमानस की पीड़ा को देश के सर्वोच्च मंचों तक पहुंचाया और उसे एक नई पहचान दी। उनका जीवन एक प्रेरक अध्याय था, जो आने वाली पीढ़ियों को मार्गदर्शन देता रहेगा।”

उन्होंने झारखंड के मुख्यमंत्री और शिबू सोरेन के सुपुत्र हेमंत सोरेन के प्रति गहरी संवेदना प्रकट करते हुए कहा, ” पिता का साया सर से उठना केवल पारिवारिक क्षति नहीं, बल्कि झारखंड के राजनीतिक और सामाजिक जीवन में एक शून्य के समान है। यह केवल एक नेता का निधन नहीं, बल्कि झारखंड की आत्मा को गहरा आघात है।”

राकेश कुमार सिंह के पिता और गुप्तचर ब्यौरा के सेवानिवृत्त अधिकारी श्री जे.बी. सिंह—जिन्हें झारखंड अलग राज्य आंदोलन में उनकी विशिष्ट भूमिका के लिए राष्ट्रपति पुलिस पदक से सम्मानित किया गया था—ने भी अपने प्रिय मित्र को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की। वर्ष 1984 से 2000 तक दक्षिण बिहार (वर्तमान झारखंड) के प्रभारी रहते हुए उन्होंने अलग राज्य की मांग को लेकर चल रहे आंदोलन में मुख्य वार्ताकार की भूमिका निभाई थी। गुरुजी शिबू सोरेन उन्हें न सिर्फ अपना प्रिय मित्र मानते थे, बल्कि भाई जैसा स्नेह भी देते थे।

राकेश कुमार सिंह ने गुरुजी के संघर्षमय जीवन, सादगी, जनसरोकारों के प्रति प्रतिबद्धता और आदिवासी चेतना को संगठित करने की उनकी अद्वितीय क्षमता को नमन करते हुए कहा, “शिबू सोरेन जी झारखंड की आत्मा थे। उन्होंने केवल एक राज्य का निर्माण नहीं किया, बल्कि उस राज्य की पहचान और गरिमा को गढ़ा। उनका जाना देश की समावेशी राजनीति के लिए भी एक बड़ी क्षति है।”

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