चंडीगढ़ में जन्मी नीरजा भनोट ने मॉडलिंग से लेकर फ्लाइट पर्सर बनने तक का सफर तय किया। लेकिन 1986 में ‘पैन एम फ्लाइट 73’ में दिखाई गई उनकी बहादुरी ने उन्हें देश की वीरांगनाओं में शामिल कर दिया।
नई दिल्ली/चंडीगढ़: वह सिर्फ 22 साल की थीं। जिंदगी सामने थी, सपने बड़े थे और जन्मदिन आने में महज दो दिन बाकी थे। लेकिन 5 सितंबर 1986 की उस रात एक विमान के भीतर ऐसा संकट आया, जहां खुद को बचाने का रास्ता चुनना सबसे स्वाभाविक फैसला होता।
नीरजा भनोट चाहतीं तो सबसे पहले विमान से बाहर निकल सकती थीं। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। उन्होंने यात्रियों को रास्ता दिखाया, आतंकियों से बचाने के लिए पासपोर्ट छिपाए, आपातकालीन दरवाजा खोला और दूसरों को सुरक्षित बाहर निकालती रहीं। अंत में जब गोलियां चलीं तो उन्होंने तीन बच्चों को बचाने के लिए खुद को ढाल बना दिया।
नीरजा उस हमले में मारी गईं, लेकिन उनकी कहानी वहीं खत्म नहीं हुई। उनकी बहादुरी ने उन्हें भारत की सबसे कम उम्र की अशोक चक्र प्राप्तकर्ताओं में शामिल किया और आने वाली पीढ़ियों के लिए साहस, कर्तव्य और मानवता की मिसाल बना दिया।
7 सितंबर 1963 को चंडीगढ़ में हुआ था जन्म
नीरजा भनोट का जन्म 7 सितंबर 1963 को चंडीगढ़ में हुआ था। उनके पिता हरिश भनोट पत्रकार थे, जबकि मां रमा भनोट गृहिणी थीं। परिवार में उनके दो भाई अखिल और अनीश थे। परिवार उन्हें प्यार से ‘लाडो’ कहकर बुलाता था। नीरजा की शुरुआती पढ़ाई चंडीगढ़ के सेक्रेड हार्ट सीनियर सेकेंडरी स्कूल में हुई। बाद में परिवार मुंबई आ गया, जहां उन्होंने बॉम्बे स्कॉटिश स्कूल से पढ़ाई पूरी की और सेंट जेवियर्स कॉलेज से स्नातक किया।

स्कूल और कॉलेज के दिनों से ही नीरजा के व्यक्तित्व में आत्मविश्वास और स्पष्टता दिखाई देती थी। उनके दोस्तों और सहपाठियों ने बाद में उन्हें ऐसी लड़की के रूप में याद किया जो अपनी बात कहने से नहीं डरती थी। वह मिलनसार थीं, लेकिन गलत बात के सामने चुप रहने वाली नहीं थीं। यही आत्मविश्वास आगे चलकर उनके पेशेवर जीवन और सबसे कठिन परीक्षा में दिखाई दिया।
मॉडलिंग से शुरू हुआ करियर
कॉलेज के दिनों में नीरजा को एक फोटोग्राफर ने देखा और मॉडलिंग का प्रस्ताव दिया। इसके बाद उन्होंने कई विज्ञापन अभियानों में काम किया। उनकी खूबसूरती, आत्मविश्वास और प्रभावशाली व्यक्तित्व के कारण वह जल्द ही विज्ञापन जगत में पहचानी जाने लगीं।
उन्होंने बिनाका, फॉरहन्स, गोडरेज, अमूल और कई अन्य ब्रांडों के विज्ञापनों में काम किया। पत्रिकाओं के कवर पर भी उनकी तस्वीरें प्रकाशित हुईं। उस समय मॉडलिंग उनके करियर का एक अहम हिस्सा बन चुकी थी। लेकिन नीरजा के सामने जिंदगी का अगला पड़ाव कुछ और था।

शादी के बाद बदली जिंदगी
1985 में नीरजा की शादी परिवार की पसंद से शारजाह, संयुक्त अरब अमीरात में रहने वाले एक व्यक्ति से हुई। शादी के बाद वह पति के साथ शारजाह चली गईं। लेकिन यह विवाह सुखद नहीं रहा। उनके पिता के लिखे विवरण और बाद की रिपोर्टों के अनुसार उन्हें दहेज को लेकर मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना का सामना करना पड़ा। आर्थिक नियंत्रण और दुर्व्यवहार के बीच उन्होंने महज दो महीने बाद इस रिश्ते से बाहर निकलने का फैसला किया और मुंबई लौट आईं।

उस दौर में एक युवा महिला के लिए असफल विवाह से बाहर निकलना आसान नहीं था। लेकिन नीरजा ने अपनी जिंदगी को उस अनुभव तक सीमित नहीं होने दिया। उन्होंने अपने करियर को फिर से आगे बढ़ाने का फैसला किया और इसी क्रम में पैन एम एयरलाइंस में फ्लाइट अटेंडेंट की नौकरी के लिए आवेदन किया।
10 हजार उम्मीदवारों में चुनी गईं नीरजा
पैन एम (Pan Am) उस समय दुनिया की प्रमुख अंतरराष्ट्रीय विमानन कंपनियों में शामिल थी। रिपोर्टों के अनुसार करीब 10 हजार आवेदनों में से लगभग 80 उम्मीदवारों का चयन हुआ और नीरजा भी उनमें शामिल थीं। प्रशिक्षण के बाद वह फ्लाइट क्रू का हिस्सा बनीं। बाद में अपने प्रदर्शन और अनुभव के आधार पर उन्हें सीनियर फ्लाइट पर्सर बनाया गया।
फ्लाइट पर्सर का काम सिर्फ यात्रियों को भोजन और सुविधाएं देना नहीं होता था। वह विमान के केबिन संचालन और यात्रियों की सुरक्षा से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी संभालती थीं। यही कारण था कि 5 सितंबर 1986 को जब पैन एम फ्लाइट 73 पर हमला हुआ, तब नीरजा विमान में मौजूद सबसे वरिष्ठ केबिन क्रू सदस्यों में थीं।
जब ‘पैन एम फ्लाइट 73’ बनी बंधक
5 सितंबर 1986 को पैन एम फ्लाइट 73 मुंबई से न्यूयॉर्क के लिए रवाना हुई थी। विमान को कराची और फ्रैंकफर्ट होते हुए न्यूयॉर्क पहुंचना था। कराची के जिन्ना अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर विमान के ठहराव के दौरान चार हथियारबंद आतंकियों ने विमान पर कब्जा कर लिया।
अमेरिकी जांच एजेंसी एफबीआई के रिकॉर्ड के अनुसार इन चार आरोपियों को अबू निदाल संगठन से जुड़ा माना गया। इस हमले में 20 यात्रियों और चालक दल के सदस्यों की हत्या हुई और 100 से अधिक लोग घायल हुए। एफबीआई रिकॉर्ड में 379 यात्रियों और चालक दल के सदस्यों की हत्या के प्रयास का भी उल्लेख है।
विमान में सैकड़ों यात्री और चालक दल के सदस्य थे। कुछ रिकॉर्डों में कुल संख्या करीब 390 बताई गई है। इतने लोगों से भरे विमान पर हथियारबंद आतंकियों का कब्जा उस समय की सबसे गंभीर विमानन त्रासदियों में से एक बन गया।
नीरजा ने दिखाई सूझबूझ
जैसे ही आतंकियों ने विमान पर कब्जा किया, नीरजा ने खतरे को पहचान लिया और कॉकपिट क्रू को सतर्क किया। पैन एम हिस्टोरिकल फाउंडेशन के अनुसार नीरजा की चेतावनी के बाद कॉकपिट में मौजूद तीनों सदस्य विमान से बाहर निकलने में सफल रहे। इससे विमान को उड़ाकर कहीं और ले जाना आतंकियों के लिए मुश्किल हो गया।
यह फैसला आगे की पूरी घटना में बेहद महत्वपूर्ण साबित हुआ। यदि पायलट आतंकियों के कब्जे में आ जाते, तो विमान को किसी अन्य स्थान पर ले जाना संभव हो सकता था। लेकिन कॉकपिट खाली होने के कारण विमान जमीन पर ही फंसा रहा।
नीरजा ने इसके बाद विमान के अंदर यात्रियों को संभालने की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली।
अमेरिकी यात्रियों को बचाने के लिए छिपाए पासपोर्ट
आतंकियों की योजना यात्रियों की राष्ट्रीयता पहचानने से जुड़ी थी। उस समय अमेरिकी नागरिकों को विशेष निशाना बनाए जाने की आशंका थी। नीरजा और अन्य क्रू सदस्यों ने कई यात्रियों के पासपोर्ट छिपा दिए ताकि आतंकियों को उनकी पहचान न मिल सके। पैन एम हिस्टोरिकल फाउंडेशन के अनुसार नीरजा ने यात्रियों के पासपोर्ट छिपाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
यह कदम बेहद जोखिम भरा था। अगर आतंकियों को पता चल जाता कि नीरजा यात्रियों की पहचान छिपा रही हैं, तो वह सीधे उनके निशाने पर आ सकती थीं। इसके बावजूद उन्होंने ऐसा किया।
करीब 17 घंटे चला पूरा संकट
पैन एम हिस्टोरिकल फाउंडेशन के अनुसार विमान पर कब्जे और उसके बाद की पूरी स्थिति करीब 17 घंटे तक चली। इस दौरान यात्रियों को बंधक बनाकर रखा गया। विमान के भीतर तनाव लगातार बढ़ता गया और यात्रियों को यह पता नहीं था कि अगला पल उनके लिए क्या लेकर आएगा।
इसी दौरान नीरजा ने यात्रियों को शांत रखने और उन्हें सुरक्षित रखने की कोशिश जारी रखी। उन्होंने अपने पद की जिम्मेदारी को सिर्फ औपचारिक भूमिका नहीं माना, बल्कि संकट की घड़ी में नेतृत्व किया।
जब यात्रियों के लिए खुला रास्ता
स्थिति बिगड़ने के बाद नीरजा ने विमान के आपातकालीन दरवाजे खोलने में मदद की। यात्रियों को बाहर निकलने का रास्ता मिला और कई लोग विमान से बाहर निकलने लगे।
यह वह क्षण था जब नीरजा के पास खुद को बचाने का अवसर था। लेकिन उन्होंने पहले यात्रियों को बाहर जाने दिया। अमेरिकी न्याय विभाग के पीड़ित सहायता कार्यालय के रिकॉर्ड के अनुसार पैन एम फ्लाइट 73 के चालक दल के सदस्यों के संयुक्त प्रयासों ने 350 से अधिक लोगों की जान बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसी अंतिम निकासी के दौरान नीरजा की जान चली गई।
तीन बच्चों को बचाते हुए चली गई जान
नीरजा की शहादत की सबसे मार्मिक घटना विमान के अंतिम चरण से जुड़ी है। जब आतंकियों ने यात्रियों और चालक दल पर गोलियां चलानी शुरू कीं, तब नीरजा ने तीन बच्चों को गोलियों से बचाने के लिए खुद को उनके सामने कर दिया।
नीरजा को गोली लगी और 5 सितंबर 1986 को उनकी मौत हो गई। उस समय वह सिर्फ 22 वर्ष की थीं और अपने 23वें जन्मदिन में मात्र दो दिन शेष थे। उनका अंतिम संस्कार 6 सितंबर को हुआ, जबकि 7 सितंबर को उनका जन्मदिन था। उनके पिता ने बाद में लिखा कि जिस दिन परिवार को उनकी वापसी की उम्मीद थी, उसी के आसपास उन्हें उनकी बेटी का ताबूत मिला।
कितने लोगों की जान बची?
नीरजा की बहादुरी से जुड़े कई विवरणों में यह कहा गया है कि उन्होंने 350 से अधिक लोगों की जान बचाने में भूमिका निभाई। भारत में कई आधिकारिक और सार्वजनिक स्मरणों में यह संख्या लगभग 360 या उससे अधिक बताई जाती है।
अमेरिकी न्याय विभाग के रिकॉर्ड में पैन एम फ्लाइट 73 के 16 फ्लाइट अटेंडेंट और पाकिस्तान में पैन एम के निदेशक विराफ दारोगा के सामूहिक प्रयासों को 350 से अधिक लोगों की जान बचाने से जोड़ा गया है। नीरजा इस सामूहिक साहस की सबसे प्रमुख प्रतीकों में से एक बनीं।
भारत का सर्वोच्च शांतिकालीन वीरता सम्मान मिला
नीरजा भनोट को मरणोपरांत अशोक चक्र से सम्मानित किया गया। यह भारत का सर्वोच्च शांतिकालीन वीरता पुरस्कार है। पैन एम हिस्टोरिकल फाउंडेशन के अनुसार 1987 में वह इस सम्मान को पाने वाली पहली महिला और उस समय सबसे कम उम्र की प्राप्तकर्ता बनीं।
उनकी वीरता को केवल भारत में ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सम्मान मिला। उन्हें पाकिस्तान की ओर से तमगा-ए-पाकिस्तान से सम्मानित किया गया। 2006 में अमेरिकी न्याय विभाग ने पैन एम फ्लाइट 73 के चालक दल को विशेष साहस पुरस्कार से सम्मानित किया। नीरजा का नाम इस सम्मान से जुड़े बहादुर क्रू सदस्यों में प्रमुखता से शामिल था।
डाक टिकट से लेकर ट्रस्ट तक, आज भी जिंदा है विरासत
नीरजा की याद में भारत सरकार ने 2004 में डाक टिकट जारी किया। उनके परिवार ने उनकी स्मृति में नीरजा भनोट पैन एम ट्रस्ट की स्थापना की। ट्रस्ट उनकी स्मृति में नीरजा पुरस्कारों के जरिए बहादुरी, सामाजिक सेवा और मानवीय मूल्यों को सम्मानित करता रहा है।

नीरजा की कहानी का प्रभाव सिर्फ पुरस्कारों तक सीमित नहीं रहा। वह भारत में महिला साहस और आत्मनिर्भरता का प्रतीक बन गईं। उनकी जिंदगी यह भी दिखाती है कि व्यक्तिगत मुश्किलों से गुजरने के बाद कोई व्यक्ति अपने जीवन की दिशा खुद तय कर सकता है।
2016 में बनी फिल्म ‘नीरजा’
नीरजा भनोट की कहानी को 2016 में बड़े पर्दे पर भी उतारा गया। निर्देशक राम माधवानी की फिल्म ‘नीरजा’ में अभिनेत्री सोनम कपूर ने नीरजा की भूमिका निभाई। फिल्म ने उनकी जिंदगी और पैन एम फ्लाइट 73 के अपहरण की घटना को सिनेमाई रूप में पेश किया।
फिल्म के लिए सोनम कपूर को राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार में विशेष पहचान मिली। इसके बाद नीरजा की कहानी नई पीढ़ी तक और व्यापक रूप से पहुंची। हालांकि वास्तविक घटना में मौजूद हर व्यक्ति और हर परिस्थिति को किसी फिल्म में पूरी तरह समेटना संभव नहीं होता, लेकिन इस फिल्म ने नीरजा भनोट के साहस को देशभर में फिर चर्चा में ला दिया।
आज उनकी 63वीं जयंती पर उन्हें याद करना सिर्फ एक वीरांगना को श्रद्धांजलि देना नहीं है। यह उस मानवीय साहस को याद करना है जो सबसे भयावह परिस्थिति में भी दूसरों के लिए खड़ा होने की ताकत देता है।
एक विमान में आतंकियों की बंदूकें थीं, सामने मौत थी और पीछे सैकड़ों डरे हुए लोग। उस समय नीरजा भनोट ने अपने पद की नहीं, इंसानियत की जिम्मेदारी निभाई। यही वजह है कि चार दशक बाद भी उनका नाम सिर्फ इतिहास में नहीं, बल्कि भारत की सामूहिक स्मृति में जिंदा है।
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