भारत में 2021 से जून 2026 के बीच सीवर और सेप्टिक टैंक की खतरनाक सफाई के दौरान 332 सैनिटेशन वर्करों की मौत हुई। महाराष्ट्र में सबसे ज्यादा 58 मौतें दर्ज हुईं। पूरी तस्वीर समझिए।
मुंबई/नई दिल्ली: भारत अंतरिक्ष में नई ऊंचाइयां छू रहा है, लेकिन देश के कई हिस्सों में इंसान आज भी दूसरे इंसानों के मल-मूत्र और सीवर की गंदगी के बीच अपनी जान जोखिम में डालकर सफाई करने को मजबूर हैं। इसी विरोधाभास पर बॉम्बे हाई कोर्ट ने हाल ही में बेहद सख्त टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि एक तरफ देश चंद्रमा के दूसरे हिस्से तक पहुंचने पर गर्व कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ जाति व्यवस्था और सामाजिक भेदभाव के कारण कुछ नागरिकों से ऐसा काम कराया जा रहा है, जो मानवीय गरिमा के खिलाफ है।
न्यायमूर्ति भारती डांगरे और न्यायमूर्ति मंजुषा देशपांडे की पीठ ने 13 अगस्त 2026 के फैसले में मैनुअल स्कैवेंजिंग के जारी रहने पर चिंता जताई और कहा कि संविधान में समानता और कानून के समान संरक्षण की गारंटी के बावजूद देश आज भी इस सामाजिक बुराई से पूरी तरह मुक्त नहीं हुआ है।
अदालत ने महाराष्ट्र सरकार के दो सरकारी प्रस्तावों को रद्द करते हुए स्पष्ट किया कि निजी ठेकेदारों या निजी क्षेत्र के लिए काम करते हुए खतरनाक सफाई के दौरान मारे गए सैनिटेशन वर्करों के आश्रित भी 30 लाख रुपये के मुआवजे के हकदार हैं।
राज्य सरकार को मुआवजा देना होगा और बाद में संबंधित नियोक्ता से राशि वसूलने का अधिकार राज्य के पास रहेगा। अदालत ने पांच मृत सैनिटेशन वर्करों के आश्रितों को भी 30-30 लाख रुपये देने का निर्देश दिया।
बॉम्बे हाई कोर्ट ने क्या कहा?
इस पीरे मामले में अदालत ने यह कहा कि मैनुअल स्कैवेंजिंग ऐसी अमानवीय प्रथा है, जिसे रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट के फैसलों और कानूनों में स्पष्ट प्रावधान होने के बावजूद पूरी तरह समाप्त नहीं किया जा सका है। पीठ की टिप्पणी उस याचिका पर आई जिसमें राज्य और स्थानीय निकायों द्वारा मैनुअल स्कैवेंजर्स के रूप में रोजगार पर रोक और उनके पुनर्वास से जुड़े 2013 के कानून को लागू करने में कथित विफलता को चुनौती दी गई थी।
याचिका श्रमिक संगठन श्रमिक जनता संघ, 2022 में मुंब्रा की एक हाउसिंग सोसायटी में सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान जान गंवाने वाले सूरज के पिता राजू माधवे और लेखक श्रेयस पांडे ने दायर की थी। याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता गायत्री सिंह ने अदालत के सामने तर्क दिया कि राज्य सरकार के आदेश निजी ठेकेदारों और नियोक्ताओं पर मुआवजे की जिम्मेदारी डाल रहे थे, जबकि सुप्रीम कोर्ट पहले ही सीवर मौतों के मामले में राज्य की जिम्मेदारी स्पष्ट कर चुका है।
महाराष्ट्र सरकार के दावे और अदालत की आपत्ति
मामले की सुनवाई के दौरान राज्य की ओर से बताया गया था कि महाराष्ट्र के 36 जिलों को मैनुअल स्कैवेंजिंग से मुक्त घोषित किया गया है और अगस्त 2023 में जिलाधिकारियों द्वारा प्रमाणपत्र भी दिए गए थे। लेकिन अगस्त 2024 की सुनवाई में राज्य के वकील ने स्पष्ट किया कि ये प्रमाणपत्र उस समय की स्थिति के आधार पर थे, जिससे उनकी वर्तमान स्थिति पर सवाल खड़े हुए।
याचिकाकर्ताओं ने इसके विपरीत ऐसे मामलों का उल्लेख किया जहां सीवर और सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान मौतें जारी थीं। उन्होंने बताया कि राज्य ने 81 मामलों में 10-10 लाख रुपये का मुआवजा भी दिया था। हाई कोर्ट ने इन परिस्थितियों को देखते हुए कहा कि इससे यह संकेत मिलता है कि राज्य इस सामाजिक बुराई को पूरी तरह खत्म करने में सफल नहीं हुआ है। अदालत ने कहा कि सरकारी तंत्र की ओर से कुछ कदम उठाए गए हैं, लेकिन प्रयास आधे-अधूरे हैं।
जनवरी 2021 से जून 2026 तक 332 मौतें
मैनुअल स्कैवेंजिंग और खतरनाक सफाई को लेकर सबसे हालिया सरकारी आंकड़े स्थिति की गंभीरता बताते हैं। सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय ने 21 जुलाई 2026 को लोकसभा में बताया कि 1 जनवरी 2021 से 30 जून 2026 तक 18 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में सीवर और सेप्टिक टैंक की खतरनाक सफाई के दौरान 332 सैनिटेशन वर्करों की मौत हुई।
इन आंकड़ों में महाराष्ट्र सबसे ऊपर है। उपलब्ध सरकारी आंकड़ों के अनुसार महाराष्ट्र में 58 मौतें, हरियाणा में 47, तमिलनाडु में 38 और उत्तर प्रदेश में 37 मौतें दर्ज की गईं।
सरकार ने यह भी बताया कि पिछले पांच वर्षों में खतरनाक मैनुअल सफाई के लिए जिम्मेदार एजेंसियों और अधिकारियों के खिलाफ 193 प्राथमिकी दर्ज की गई हैं।
सीवर के अंदर जाना इतना खतरनाक क्यों है?
सेप्टिक टैंक केवल गंदे पानी या मानव मल से भरी जगह नहीं होते। ये अक्सर बंद और सीमित स्थान होते हैं, जहां ऑक्सीजन की कमी और जहरीली गैसों की मौजूदगी जानलेवा स्थिति पैदा कर सकती है।
सड़ने वाले जैविक पदार्थों से हाइड्रोजन सल्फाइड, मीथेन, अमोनिया और कार्बन मोनोऑक्साइड जैसी गैसें पैदा हो सकती हैं। इनमें हाइड्रोजन सल्फाइड विशेष रूप से खतरनाक है। पर्याप्त मात्रा में इसके संपर्क से सांस लेने में परेशानी, चक्कर, बेहोशी और गंभीर स्थिति में मौत तक हो सकती है। ऑक्सीजन की कमी स्वयं भी कुछ ही समय में जानलेवा हो सकती है।
सीवर के अंदर मौजूद खतरा केवल गैसों तक सीमित नहीं है। वहां फिसलने, गिरने, डूबने, अचानक जहरीली गैसों की मात्रा बढ़ने, संरचना के टूटने और बचाव के दौरान दूसरे व्यक्ति के भी फंसने का जोखिम रहता है।
सबसे खतरनाक स्थितियों में से एक यह है कि किसी कर्मचारी के बेहोश होने पर दूसरा व्यक्ति उसे बचाने के लिए बिना सुरक्षा उपकरण के अंदर चला जाता है। इससे एक दुर्घटना कई लोगों की मौत में बदल सकती है।
क्या कहते हैं कानून?
भारत में मैनुअल स्कैवेंजिंग को रोकने के लिए मैनुअल स्कैवेंजर्स के रूप में रोजगार का निषेध और उनका पुनर्वास अधिनियम, 2013 लागू है। यह कानून मैनुअल स्कैवेंजिंग पर रोक लगाने के साथ ऐसे लोगों के पुनर्वास और वैकल्पिक आजीविका पर भी जोर देता है।
कानून के तहत खतरनाक तरीके से सीवर या सेप्टिक टैंक की सफाई पर भी रोक है। केंद्र सरकार के अनुसार 6 दिसंबर 2014 से खतरनाक सीवर और सेप्टिक टैंक सफाई को प्रतिबंधित किया गया है।
2013 के नियमों में यह भी बताया गया है कि यदि किसी विशेष परिस्थिति में सीवर में व्यक्ति का प्रवेश बिल्कुल आवश्यक हो, तो कई सुरक्षा शर्तें पूरी करनी होंगी। इनमें गैसों की जांच, ऑक्सीजन स्तर की निगरानी, सुरक्षा उपकरण, प्रशिक्षित कर्मचारी, बचाव उपकरण और चिकित्सकीय सहायता जैसी व्यवस्थाएं शामिल हैं।
नियमों के अनुसार सीवर में काम करने वाले कर्मचारियों के लिए गैस मॉनिटर, श्वसन उपकरण, सुरक्षा हार्नेस, हेलमेट, दस्ताने, गमबूट, सुरक्षा बेल्ट, ऑक्सीजन और आपातकालीन उपकरण जैसी व्यवस्थाओं का प्रावधान है। काम से पहले ऑक्सीजन और जहरीली तथा ज्वलनशील गैसों की जांच भी जरूरी है।
सरकार ने क्या कदम उठाए हैं?
सरकार ने मैनुअल स्कैवेंजिंग को समाप्त करने और सैनिटेशन वर्करों को सुरक्षित रोजगार देने के लिए नमस्ते योजना जैसी पहल शुरू की है। इसका उद्देश्य सैनिटेशन वर्करों की पहचान, कौशल विकास, सुरक्षा, स्वास्थ्य और मशीनीकृत सफाई की दिशा में बदलाव को बढ़ावा देना है।
तकनीकी स्तर पर कई शहरों में सक्शन-कम-जेटिंग मशीन, सीवर निरीक्षण उपकरण और रोबोटिक मशीनों का इस्तेमाल बढ़ाने की कोशिश की जा रही है। कुछ तकनीकों में ऐसे रोबोट भी शामिल हैं जो इंसान को सीवर के अंदर उतारे बिना सफाई या निरीक्षण में मदद कर सकते हैं।
लेकिन संसद में जुलाई 2026 में सरकार ने यह भी बताया कि राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में मशीनीकृत सीवर सफाई के कार्यान्वयन का कोई अलग मूल्यांकन नहीं किया गया है।
यही स्थिति बताती है कि कानून और योजनाओं के साथ-साथ उनके वास्तविक क्रियान्वयन की निगरानी भी उतनी ही जरूरी है।
दूसरे देशों में सीवर की सफाई कैसे होती है?
दुनिया के कई देशों ने सीवर और सेप्टिक टैंक की सफाई को धीरे-धीरे मानव श्रम से हटाकर मशीनों और स्वचालित प्रणालियों की ओर बढ़ाया है।
अमेरिका और यूरोप के कई हिस्सों में सीवर नेटवर्क की डिजाइनिंग, निरीक्षण और सफाई के लिए औद्योगिक सुरक्षा मानकों का इस्तेमाल किया जाता है। मशीनरी, विशेष उपकरण, गैस निगरानी और सुरक्षित सुरंगों के जरिए मानव के सीधे संपर्क को कम करने पर जोर दिया जाता है।

हालांकि, यह कहना सही नहीं होगा कि हर पश्चिमी देश में सीवर की सफाई पूरी तरह मानव रहित है। कुछ विशेष परिस्थितियों में प्रशिक्षित कर्मचारी सीमित स्थानों में प्रवेश कर सकते हैं, लेकिन ऐसे काम के लिए कठोर सुरक्षा प्रोटोकॉल, उपकरण, प्रशिक्षण और बचाव व्यवस्था महत्वपूर्ण हिस्सा होते हैं।
मलेशिया ने कैसे बदली व्यवस्था?
मलेशिया का उदाहरण भारत के लिए खास तौर पर महत्वपूर्ण माना जाता है। वहां सीवर प्रबंधन 1950 के दशक के बाद धीरे-धीरे पारंपरिक व्यवस्था से अधिक मशीनीकृत और स्वचालित व्यवस्था की ओर बढ़ा। तकनीकी विकास के साथ सीवर उद्योग में नए उपकरण शामिल किए गए और पर्यावरणीय मानकों को मजबूत किया गया।

वहां सरकार ने सीवर प्लांट के निर्माण और रखरखाव को सब्सिडी दी और लोगों को सेप्टिक टैंक की सफाई की जरूरत तथा मानकों के बारे में जागरूक किया। इसका उद्देश्य यह था कि लोग बेहतर व्यवस्था को अपनाने के लिए तैयार हों।
मलेशिया के उदाहरण का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि वहां सेप्टिक टैंक की सफाई करने वाले कर्मचारियों को टैंक के अंदर जाने से बचाने पर जोर दिया गया। यदि कोई टैंक मशीन से साफ नहीं हो सकता, तो समाधान के तौर पर उसके डिजाइन या व्यवस्था में बदलाव किया जाता है।
यानी तकनीक का इस्तेमाल केवल कर्मचारी को बचाने के लिए नहीं, बल्कि पूरे सैनिटेशन सिस्टम को इस तरह डिजाइन करने के लिए किया गया ताकि कर्मचारी को खतरनाक जगह में जाने की जरूरत ही न पड़े।
जापान और सिंगापुर से क्या सीख सकता है भारत?
जापान, सिंगापुर और मलेशिया जैसे एशियाई देशों ने भी बेहतर सीवर प्रबंधन और तकनीक पर जोर दिया है। इन देशों का अनुभव यह दिखाता है कि सैनिटेशन को केवल सफाई कर्मचारी का काम मानने के बजाय इसे शहरी बुनियादी ढांचे, इंजीनियरिंग, स्वास्थ्य और सार्वजनिक सुरक्षा से जोड़ना जरूरी है।
भारत में समस्या का एक हिस्सा यह भी है कि कई पुराने सीवर और सेप्टिक टैंक ऐसे तरीके से डिजाइन किए गए हैं कि उनकी सफाई के लिए मानव प्रवेश की जरूरत पड़ती है। यदि नए ढांचे में मशीन से सफाई, निरीक्षण और रखरखाव को शुरुआत से ही शामिल किया जाए, तो खतरनाक मानव प्रवेश की जरूरत काफी कम की जा सकती है।
केवल मशीन खरीदने से खत्म नहीं होगी समस्या
सीवर सफाई को मशीनीकृत करने का मतलब केवल नगर निकायों को मशीनें उपलब्ध करा देना नहीं है। मशीनों के संचालन के लिए प्रशिक्षित कर्मचारी, नियमित रखरखाव, स्पेयर पार्ट्स, गैस निगरानी उपकरण, आपातकालीन बचाव दल और जवाबदेही की स्पष्ट व्यवस्था भी जरूरी है।
विधि सेंटर की समीक्षा में भी यह बात सामने आती है कि कई मामलों में मशीनों की उपलब्धता के बावजूद खतरनाक सफाई के दौरान मानव श्रमिकों का इस्तेमाल जारी रहा।
इसलिए समाधान तीन स्तरों पर होना चाहिए। पहला, मानव प्रवेश को न्यूनतम करना; दूसरा, जहां प्रवेश बिल्कुल जरूरी हो वहां अंतरराष्ट्रीय स्तर के सुरक्षा प्रोटोकॉल लागू करना; और तीसरा, नियम तोड़ने वाले ठेकेदारों और अधिकारियों की जवाबदेही तय करना।
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