Tuesday, 30 June 2026
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Harshavardhan GB: 4 साल की उम्र में सीखा शतरंज, अब बने भारत के 97वें ग्रैंडमास्टर

4 साल की उम्र में शतरंज सीखने वाले Harshavardhan GB ने ग्रैंडमास्टर बनकर इतिहास रच दिया। जानिए भारत के 97वें ग्रैंडमास्टर की प्रेरक यात्रा।

चेन्नई: भारत का शतरंज जगत पिछले कुछ वर्षों में लगातार नई ऊंचाइयां छू रहा है। विश्वनाथन आनंद के बाद जिस गति से देश में युवा प्रतिभाएं उभरी हैं, उसने भारत को वैश्विक शतरंज महाशक्ति बनाने की दिशा में आगे बढ़ाया है। इसी कड़ी में अब एक और नाम जुड़ गया है।

तमिलनाडु के 22 वर्षीय युवा खिलाड़ी Harshavardhan GB ने ग्रैंडमास्टर का दर्जा हासिल कर भारत के 97वें शतरंज ग्रैंडमास्टर बनने का गौरव प्राप्त किया है।

यह उपलब्धि केवल एक खिलाड़ी की व्यक्तिगत सफलता नहीं है, बल्कि भारतीय शतरंज के उस मजबूत ढांचे की भी कहानी है जिसने पिछले एक दशक में विश्व स्तर के खिलाड़ी तैयार किए हैं।

हर्षवर्धन की सफलता यह भी दिखाती है कि भारत अब केवल कुछ महान खिलाड़ियों का देश नहीं रहा, बल्कि यहां लगातार नई पीढ़ी के ग्रैंडमास्टर्स तैयार हो रहे हैं।

चेन्नई से शुरू हुई यात्रा

Harshavardhan GB का संबंध तमिलनाडु से है, जिसे भारतीय शतरंज का सबसे बड़ा केंद्र माना जाता है। चेन्नई को लंबे समय से भारत की “चेस कैपिटल” कहा जाता है। यही वह शहर है जिसने विश्वनाथन आनंद, डी. गुकेश, आर. प्रज्ञानानंदा, अरविंद चितंबरम और कई अन्य अंतरराष्ट्रीय सितारे दिए हैं।

हर्षवर्धन ने बहुत छोटी उम्र में शतरंज खेलना शुरू कर दिया था। प्राप्त जानकारियों के अनुसार उन्होंने लगभग चार वर्ष की उम्र में पहली बार शतरंज की बिसात पर कदम रखा। उस समय शायद किसी ने नहीं सोचा होगा कि यह बच्चा एक दिन भारत का ग्रैंडमास्टर बनेगा।

परिवार ने शुरू से ही उनकी प्रतिभा को पहचाना और उन्हें आगे बढ़ने के लिए आवश्यक समर्थन दिया। शतरंज के प्रति उनका समर्पण बचपन से ही साफ झलकता था। स्कूल की पढ़ाई के साथ-साथ वे लगातार टूर्नामेंट खेलते रहे और धीरे-धीरे राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाने लगे।

जूनियर स्तर पर दिखाई प्रतिभा

किसी भी ग्रैंडमास्टर की यात्रा आसान नहीं होती। यह वर्षों की मेहनत, हजारों घंटों के अभ्यास और लगातार प्रतियोगिताओं में भाग लेने का परिणाम होती है।

हर्षवर्धन ने भी यही रास्ता अपनाया। उन्होंने आयु वर्ग की राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में लगातार अच्छा प्रदर्शन किया। उनके खेल की सबसे बड़ी विशेषता उनकी तैयारी, धैर्य और जटिल स्थितियों में सही निर्णय लेने की क्षमता रही।

जूनियर स्तर पर उनके प्रदर्शन ने उन्हें भारत के उभरते हुए खिलाड़ियों की सूची में शामिल कर दिया। कई प्रशिक्षकों और विशेषज्ञों ने उनके अंदर भविष्य के ग्रैंडमास्टर की झलक देखनी शुरू कर दी थी।

एशियन जूनियर चैंपियन बनने का गौरव

Harshavardhan GB के करियर का एक महत्वपूर्ण पड़ाव एशियन जूनियर चैंपियनशिप रही। इस प्रतियोगिता में शानदार प्रदर्शन ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई।

एशियाई स्तर पर सफलता हासिल करना किसी भी युवा खिलाड़ी के लिए बड़ी उपलब्धि मानी जाती है क्योंकि यहां भारत, चीन, उज्बेकिस्तान, कजाखस्तान, ईरान और अन्य मजबूत शतरंज देशों के खिलाड़ी हिस्सा लेते हैं।

इस उपलब्धि ने हर्षवर्धन का आत्मविश्वास बढ़ाया और उन्हें ग्रैंडमास्टर बनने के लक्ष्य के और करीब पहुंचा दिया।

ग्रैंडमास्टर बनने का कठिन रास्ता

शतरंज में ग्रैंडमास्टर का खिताब हासिल करना दुनिया की सबसे कठिन उपलब्धियों में से एक माना जाता है।

किसी खिलाड़ी को ग्रैंडमास्टर बनने के लिए तीन जीएम नॉर्म हासिल करने होते हैं और साथ ही अंतरराष्ट्रीय शतरंज महासंघ (FIDE) द्वारा निर्धारित 2500 रेटिंग का स्तर भी पार करना होता है।

दुनिया भर में हजारों अंतरराष्ट्रीय मास्टर और फिडे मास्टर हैं, लेकिन ग्रैंडमास्टर बनने वाले खिलाड़ियों की संख्या अपेक्षाकृत बहुत कम होती है। हर्षवर्धन भी कई वर्षों से इस लक्ष्य की ओर बढ़ रहे थे। उन्होंने क्रमशः अपने जीएम नॉर्म हासिल किए और लगातार रेटिंग में सुधार करते रहे।

चोला चेस टूर्नामेंट में इतिहास

20 से 28 जून के बीच चेन्नई में आयोजित चोला इंटरनेशनल चेस टूर्नामेंट Harshavardhan GB के करियर का सबसे महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ।

इस प्रतियोगिता में उन्हें अपने तीसरे और अंतिम ग्रैंडमास्टर नॉर्म की जरूरत थी। दबाव काफी था क्योंकि पूरा भारतीय शतरंज समुदाय उनकी प्रगति पर नज़र रखे हुए था। लेकिन हर्षवर्धन ने दबाव को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया।

प्रतियोगिता के दौरान उन्होंने स्थिर और परिपक्व खेल दिखाया। आखिरकार आवश्यक प्रदर्शन पूरा करते हुए उन्होंने अपना तीसरा जीएम नॉर्म हासिल कर लिया।

इसके साथ ही वह आधिकारिक रूप से भारत के 97वें ग्रैंडमास्टर बन गए। दिलचस्प बात यह रही कि टूर्नामेंट का खिताब पोलैंड के अनुभवी ग्रैंडमास्टर मिखाल क्रासेनकोव ने जीता, लेकिन भारतीय प्रशंसकों के लिए सबसे बड़ी खबर हर्षवर्धन का ग्रैंडमास्टर बनना था।

परिवार की खुशी

किसी भी खिलाड़ी की सफलता के पीछे परिवार का बड़ा योगदान होता है। हर्षवर्धन के माता-पिता ने भी उनकी यात्रा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वर्षों तक प्रतियोगिताओं में भाग लेना, प्रशिक्षण की व्यवस्था करना और लगातार मानसिक समर्थन देना आसान काम नहीं होता।

ग्रैंडमास्टर बनने के बाद परिवार की खुशी स्वाभाविक थी। यह केवल एक खिलाड़ी का सपना पूरा होना नहीं था, बल्कि पूरे परिवार की वर्षों की मेहनत का परिणाम था।

उनके करीबी लोगों ने बताया कि हर्षवर्धन हमेशा से अनुशासित और मेहनती खिलाड़ी रहे हैं। यही गुण उन्हें इस मुकाम तक लेकर आए।

भारत में बढ़ता शतरंज साम्राज्य

हर्षवर्धन का ग्रैंडमास्टर बनना भारतीय शतरंज के लिए एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि है। एक समय था जब भारत में विश्वनाथन आनंद के रूप में केवल एक ही ग्रैंडमास्टर था।

1988 में आनंद भारत के पहले ग्रैंडमास्टर बने थे। उस समय शायद ही किसी ने कल्पना की होगी कि एक दिन देश में ग्रैंडमास्टर्स की संख्या 100 के करीब पहुंच जाएगी।

आज स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है। भारत दुनिया के सबसे तेजी से उभरते शतरंज देशों में शामिल है।

डी. गुकेश, आर. प्रज्ञानानंदा, अर्जुन एरिगैसी, विदित गुजराती, निहाल सरीन और कई अन्य युवा खिलाड़ी विश्व स्तर पर भारत का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। हर्षवर्धन इसी नई पीढ़ी का हिस्सा हैं।

तमिलनाडु क्यों बन रहा है शतरंज का गढ़?

भारतीय शतरंज की सफलता की चर्चा तमिलनाडु का उल्लेख किए बिना पूरी नहीं हो सकती। देश के अधिकांश ग्रैंडमास्टर्स किसी न किसी रूप में तमिलनाडु की शतरंज संस्कृति से जुड़े रहे हैं।

यहां मजबूत कोचिंग सिस्टम, नियमित टूर्नामेंट, अनुभवी प्रशिक्षक और प्रतिस्पर्धी माहौल मौजूद है। विश्वनाथन आनंद की सफलता ने भी राज्य में शतरंज के प्रति रुचि बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभाई। अब हर्षवर्धन की उपलब्धि इस परंपरा को और मजबूत बना रही है।

दोस्तों के बीच “लेजेंड” के नाम से मशहूर

कुछ रिपोर्टों में उल्लेख किया गया कि हर्षवर्धन अपने दोस्तों के बीच लंबे समय से “लेजेंड” के नाम से जाने जाते थे। यह उपनाम केवल मजाक नहीं था, बल्कि उनके खेल के प्रति सम्मान का प्रतीक था।

अब जब वे ग्रैंडमास्टर बन चुके हैं, तो यह उपनाम एक तरह से वास्तविकता में बदल गया है। उनके मित्रों और साथी खिलाड़ियों के लिए यह उपलब्धि किसी आश्चर्य से कम नहीं, लेकिन पूरी तरह अप्रत्याशित भी नहीं थी। वे लंबे समय से जानते थे कि हर्षवर्धन में असाधारण क्षमता है।

आगे की राह

ग्रैंडमास्टर बनना किसी खिलाड़ी की यात्रा का अंत नहीं बल्कि नई शुरुआत होती है।

अब Harshavardhan GB के सामने और भी बड़ी चुनौतियां हैं। उन्हें सुपर ग्रैंडमास्टर्स के खिलाफ लगातार प्रतिस्पर्धा करनी होगी और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान मजबूत करनी होगी।

भारत के कई युवा खिलाड़ी आज विश्व चैंपियनशिप की दौड़ में शामिल हैं। ऐसे में उम्मीद की जा रही है कि हर्षवर्धन भी आने वाले वर्षों में विश्व रैंकिंग में ऊंचा स्थान हासिल करने की दिशा में आगे बढ़ेंगे।

भारत 100वें ग्रैंडमास्टर की ओर अग्रसर

Harshavardhan GB के ग्रैंडमास्टर बनने के साथ भारत अब 100 ग्रैंडमास्टर्स के ऐतिहासिक आंकड़े के और करीब पहुंच गया है। यह केवल एक संख्या नहीं होगी, बल्कि भारतीय शतरंज की दशकों लंबी यात्रा का प्रतीक होगी।

विश्वनाथन आनंद से शुरू हुई यह कहानी अब नई पीढ़ी के हाथों में है और हर्षवर्धन जी.बी. उसका नवीनतम अध्याय हैं।

एक उपलब्धि, जो सिर्फ व्यक्तिगत नहीं

भारत के 97वें ग्रैंडमास्टर बनने के साथ Harshavardhan GB ने अपने नाम को भारतीय शतरंज इतिहास में दर्ज करा लिया है। चार साल की उम्र में शुरू हुआ सफर, वर्षों की मेहनत, अनगिनत मुकाबले, अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताएं और लगातार सुधार की चाह ने उन्हें इस मुकाम तक पहुंचाया।

जब आने वाले वर्षों में भारतीय शतरंज के स्वर्णिम दौर की चर्चा होगी, तो हर्षवर्धन जी.बी. का नाम उन खिलाड़ियों में शामिल होगा जिन्होंने भारत को विश्व शतरंज की अग्रिम पंक्ति में बनाए रखने में योगदान दिया।

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MD Faijan

लेखक

मोहम्मद फैजान न्यूज़ ऑफ द डे में पत्रकार हैं, जहाँ वे खेल, मनोरंजन, राजनीति और अंतरराष्ट्रीय मामलों को कवर करते हैं। इससे पहले वे यूट्यूब चैनल स्पोर्ट्स यारी में सोशल मीडिया एग्जीक्यूटिव के रूप में कार्य कर चुके हैं, जहाँ उन्होंने डिजिटल कंटेंट मैनेजमेंट और ऑडियंस एंगेजमेंट का व्यावहारिक अनुभव प्राप्त किया। भारत के छत्तीसगढ़ राज्य के कोरिया जिले से संबंध रखने वाले फैजान आधुनिक मीडिया कार्यप्रणालियों की अच्छी समझ रखते हैं और कहानी कहने के विभिन्न रूपों में गहरी रुचि रखते हैं।

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