Friday, 14 August 2026
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पाकिस्तान 14 अगस्त को ही क्यों मनाता है स्वतंत्रता दिवस? आजादी के दिन कराची में क्या हुआ और बंटवारे में भारत से क्या-क्या मिला?

14 अगस्त को पाकिस्तान क्यों मनाता है आजादी? जानिए माउंटबेटन के कराची दौरे, जिन्ना के शपथ ग्रहण और भारत से पाकिस्तान को मिले धन-संपत्ति की कहानी।

नई दिल्ली: 14 अगस्त आते ही पाकिस्तान में हर तरफ हरे-सफेद झंडे नजर आने लगते हैं। सरकारी इमारतों से लेकर घरों और बाजारों तक ‘यौम-ए-आजादी’ की तैयारियां होती हैं। लेकिन भारत में 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस मनाया जाता है, जबकि पाकिस्तान उससे ठीक एक दिन पहले अपनी आजादी का जश्न मनाता है।

सवाल सिर्फ तारीख का नहीं है। 1947 में जिस बंटवारे ने दो नए डोमिनियन को जन्म दिया, उसके साथ एक विशाल प्रशासनिक और आर्थिक तंत्र को भी दो हिस्सों में बांटना पड़ा था।

पाकिस्तान को सिर्फ एक भूभाग नहीं मिला था। उसे नकद राशि, रेलवे और डाक-तार व्यवस्था से जुड़े संसाधन, प्रशासनिक इमारतें, सैन्य उपकरणों का हिस्सा, सरकारी चल संपत्तियां, कर्मचारी और वित्तीय दायित्वों में हिस्सेदारी भी मिली।

कई संस्थानों को सीधे बांटना संभव नहीं था, इसलिए उनके लिए अलग वित्तीय व्यवस्था की गई। यहां तक कि आजादी के शुरुआती महीनों में पाकिस्तान की मुद्रा और केंद्रीय बैंकिंग व्यवस्था भी पूरी तरह स्वतंत्र नहीं थी।

तो 14 अगस्त 1947 को कराची में वास्तव में क्या हुआ था? पाकिस्तान को भारत से अलग होने के बाद कौन-कौन से संसाधन मिले और कौन-सी व्यवस्थाएं उसे शुरू में भारत के साथ साझा करनी पड़ीं? आइए पूरी कहानी समझते हैं।

14 अगस्त 1947 को कराची में क्या हुआ?

पाकिस्तान के इतिहास में 14 अगस्त 1947 सत्ता हस्तांतरण और नए देश के औपचारिक अस्तित्व में आने की प्रक्रिया का महत्वपूर्ण दिन था। उस समय कराची पाकिस्तान की राजधानी थी और यहीं उसकी पहली संविधान सभा का गठन हुआ था।

पाकिस्तान की पहली संविधान सभा का पहला सत्र 10 अगस्त 1947 को कराची के सिंध असेंबली भवन में शुरू हुआ। 11 अगस्त को मोहम्मद अली जिन्ना को सर्वसम्मति से संविधान सभा का अध्यक्ष चुना गया और इसी दौरान पाकिस्तान का राष्ट्रीय ध्वज भी औपचारिक रूप से मंजूर किया गया। 12 अगस्त को जिन्ना को ‘कायदे-आजम’ के रूप में संबोधित करने का प्रस्ताव स्वीकार किया गया।

इसके बाद 14 अगस्त को सत्ता हस्तांतरण का औपचारिक समारोह हुआ। तत्कालीन वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन कराची पहुंचे और संविधान सभा को संबोधित किया। उन्होंने ब्रिटिश सम्राट जॉर्ज षष्ठम का संदेश भी सभा तक पहुंचाया। जिन्ना ने अपने जवाब में ब्रिटेन और माउंटबेटन के प्रति सद्भाव व्यक्त किया।

माउंटबेटन के आधिकारिक विवरण के अनुसार, इसके बाद जिन्ना और वह एक औपचारिक जुलूस में कराची की सड़कों से गुजरे, जहां बड़ी संख्या में लोग मौजूद थे। उसी दिन माउंटबेटन दिल्ली लौट गए, क्योंकि 15 अगस्त को भारत के सत्ता हस्तांतरण समारोह में उन्हें शामिल होना था।

हालांकि, यहां एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक तथ्य है। जिन्ना ने पाकिस्तान के पहले गवर्नर-जनरल के रूप में 15 अगस्त 1947 को शपथ ली थी। पाकिस्तान की संविधान सभा के आधिकारिक रिकॉर्ड में भी उनके शपथ ग्रहण की तारीख 15 अगस्त दर्ज है।

फिर पाकिस्तान 14 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस क्यों मनाता है?

कानूनी रूप से Indian Independence Act 1947 ने 15 अगस्त 1947 से भारत और पाकिस्तान नाम के दो स्वतंत्र डोमिनियन स्थापित करने की बात कही थी। यानी दोनों देशों का संवैधानिक जन्म 15 अगस्त से जुड़ा था। पाकिस्तान के शुरुआती आधिकारिक दस्तावेजों और 1948 में जारी शुरुआती स्मारक डाक टिकटों पर भी 15 अगस्त 1947 का उल्लेख मिलता है।

लेकिन 14 अगस्त को कराची में सत्ता हस्तांतरण का समारोह आयोजित किया गया था। इसका एक प्रमुख व्यावहारिक कारण माउंटबेटन का दोनों नए डोमिनियन के समारोहों में शामिल होना था।

कराची और दिल्ली में एक ही दिन व्यक्तिगत रूप से मौजूद रहना संभव नहीं था। इसलिए पाकिस्तान में सत्ता हस्तांतरण का औपचारिक कार्यक्रम 14 अगस्त को रखा गया, जबकि माउंटबेटन अगले दिन दिल्ली में होने वाले भारतीय समारोह में शामिल हुए।

बाद में पाकिस्तान ने 14 अगस्त को अपना स्वतंत्रता दिवस मानना शुरू कर दिया। उपलब्ध पाकिस्तानी रिकॉर्ड के अनुसार 29 जून 1948 को कराची में प्रधानमंत्री लियाकत अली खान की अध्यक्षता में हुई बैठक में स्वतंत्रता दिवस 15 अगस्त के बजाय 14 अगस्त को मनाने का निर्णय लिया गया।

आजादी के बाद पाकिस्तान का पहला प्रशासन

1947 में पाकिस्तान के सामने सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ सीमा तय करना नहीं थी। एक नया देश अचानक अस्तित्व में आया था और उसे अपना प्रशासन चलाने के लिए सरकारी ढांचा चाहिए था।

नई सरकार को मंत्रालय, सचिवालय, कर्मचारी, वित्तीय संस्थान, पुलिस, सेना, डाक व्यवस्था, रेलवे और दूसरे प्रशासनिक तंत्र तैयार करने थे।

विभाजन से पहले केंद्र सरकार की संस्थाएं पूरे ब्रिटिश भारत के लिए काम करती थीं। इसलिए विभाजन परिषद (Partition Council) और उसकी समितियों को प्रशासनिक विभागों, कर्मचारियों, रिकॉर्ड और संपत्तियों को अलग करने का काम करना पड़ा। जवाहरलाल नेहरू के साथ हुई चर्चाओं के दस्तावेजों में भी केंद्रीय सिविल विभाग के कर्मचारियों, संगठनों और अभिलेखों के विभाजन का उल्लेख मिलता है।

यानी पाकिस्तान को एक तैयार देश का पूरा सरकारी ढांचा एक झटके में अलग से नहीं मिला। कई संस्थाओं को क्षेत्र, उपयोग और संपत्ति के हिसाब से विभाजित करना पड़ा, जबकि कुछ साझा व्यवस्थाएं कुछ समय तक चलती रहीं।

नकद रकम में पाकिस्तान को कितने रुपये मिले?

बंटवारे के समय सबसे चर्चित मुद्दों में से एक था नकद शेष राशि। अविभाजित भारत सरकार के कुल नकद शेष में से पाकिस्तान का हिस्सा 75 करोड़ रुपये तय किया गया था। इसमें से शुरुआती 20 करोड़ रुपये पाकिस्तान को कामकाज शुरू करने के लिए दे दिए गए थे। बाकी 55 करोड़ रुपये का भुगतान बाद में भारत-पाकिस्तान के बीच बढ़ते तनाव के बीच विवाद का विषय बना।

यह समझना जरूरी है कि 75 करोड़ रुपये कोई ‘अलग से दान’ नहीं थे। यह अविभाजित सरकार की नकद शेष राशि में पाकिस्तान के हिस्से का वित्तीय निपटारा था।

बाद के समझौते में दोनों देशों के बीच सार्वजनिक ऋण, स्टर्लिंग बैलेंस, सैन्य स्टोर, पेंशन और दूसरी वित्तीय देनदारियों का भी हिसाब किया गया।

पाकिस्तान को कितनी फीसदी संपत्ति मिली थी?

यहां अक्सर एक बात को बहुत सरल करके बताया जाता है कि पाकिस्तान को ब्रिटिश भारत की ‘17.5 फीसदी संपत्ति’ मिली। वास्तविक व्यवस्था इससे ज्यादा जटिल थी।

दरअसल, 17.5 फीसदी का अनुपात मुख्य रूप से कुछ वित्तीय दायित्वों और परिसंपत्तियों के निपटारे में इस्तेमाल हुआ, जबकि भौतिक या चल संपत्ति के विभाजन के लिए कई मामलों में अलग नियम थे। सामान्य चल सरकारी संपत्तियों के लिए लगभग 80:20 का अनुपात अपनाया गया। भारत के हिस्से 80 फीसदी और पाकिस्तान के हिस्से 20 फीसदी संपत्ति आई।

इसमें सरकारी कार्यालयों का फर्नीचर, टाइपराइटर, अलमारियां, स्टेशनरी, उपकरण और दूसरी चल वस्तुएं तक शामिल थीं।

यानी बंटवारा सिर्फ बड़े सरकारी भवनों या हथियारों का नहीं था। छोटे से छोटे सरकारी सामान की सूची तक तैयार की गई थी।

रेलवे का कितना हिस्सा पाकिस्तान को मिला?

बात करें अगर रेलवे लाइनों के बंटवारे की, तो इसे मुख्य रूप से भौगोलिक स्थिति के आधार पर बांटा गया था। ऐतिहासिक विवरण के अनुसार लगभग 6,950 मील यानी करीब 19 फीसदी रेलवे ट्रैक पाकिस्तान के हिस्से में गया, जबकि लगभग 34,083 मील भारत में रहा।

रेलवे के चल स्टॉक जैसे इंजन, डिब्बे और वैगन का बंटवारा अलग आधार पर किया गया, जबकि वर्कशॉप मुख्य रूप से उनके स्थान के आधार पर विभाजित हुईं।

इससे पाकिस्तान को एक महत्वपूर्ण रेलवे नेटवर्क मिला, जिसमें तत्कालीन North Western Railway का बड़ा हिस्सा शामिल था।

यानी पाकिस्तान को सिर्फ रेल की पटरियां नहीं मिलीं, बल्कि उसके क्षेत्र में मौजूद रेलवे संस्थान, इंफ्रास्ट्रक्चर और संबंधित चल संपत्तियों का हिस्सा भी मिला।

डाक और टेलीग्राफ व्यवस्था भी पाकिस्तान के हिस्से आई

आजादी के समय डाक और टेलीग्राफ पूरे उपमहाद्वीप की संचार व्यवस्था की रीढ़ थे।

विभाजन के बाद पाकिस्तान के क्षेत्र में मौजूद डाक एवं टेलीग्राफ व्यवस्था को पाकिस्तान की नई सरकार के प्रशासन के तहत लाया गया। भारत के 1948-49 के बजट भाषण में भी पाकिस्तान के क्षेत्र में मौजूद रेलवे तथा पोस्ट और टेलीग्राफ व्यवस्था को पाकिस्तान को हस्तांतरित परिसंपत्तियों में शामिल बताया गया है।

लेकिन नई व्यवस्था तुरंत पूरी तरह अलग नहीं हुई। कुछ सेवाओं में संक्रमणकालीन समझौते किए गए। उदाहरण के लिए डाक टिकटों के मामले में दोनों डोमिनियन के बीच कुछ समय तक साझा व्यवस्था रही। अगस्त 1947 के बाद भी दोनों देशों के बीच आर्थिक और संचार संबंधों को अचानक खत्म करने के बजाय कई व्यवस्थाओं को संक्रमण काल में चलाया गया।

बैंकिंग और मुद्रा में भारत की भूमिका

आजादी के समय पाकिस्तान के पास अपनी पूरी केंद्रीय बैंकिंग व्यवस्था तैयार नहीं थी। इसीलिए Reserve Bank of India ने जून 1948 तक पाकिस्तान के केंद्रीय बैंक के रूप में काम किया।

RBI के आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार, विभाजन के बाद उसने पाकिस्तान के लिए केंद्रीय बैंक की भूमिका निभाई और जून 1948 में State Bank of Pakistan के संचालन शुरू होने तक यह व्यवस्था जारी रही।

यानी पाकिस्तान की राजनीतिक स्वतंत्रता के बावजूद उसकी मौद्रिक व्यवस्था तुरंत पूरी तरह अलग नहीं हुई थी।

शुरुआती दौर में पाकिस्तान में भारतीय नोट भी चलन में रहे, जिन पर पाकिस्तान सरकार की मुहर या ओवरप्रिंट का इस्तेमाल किया गया। बाद में पाकिस्तान ने अपनी स्वतंत्र मुद्रा व्यवस्था विकसित की।

यह उस समय की वास्तविकता को दिखाता है जहां राजनीतिक सीमाएं तेजी से खींच दी गईं, लेकिन आर्थिक और प्रशासनिक संस्थाओं को अलग करने में समय लगा।

सेना और सैन्य उपकरणों का बंटवारा

विभाजन के सबसे जटिल हिस्सों में से एक ब्रिटिश इंडियन आर्मी का बंटवारा था।

सैन्य बलों को दो नए डोमिनियन के बीच बांटा गया। पाकिस्तान को सैन्य स्टोर और उपकरणों में लगभग एक-तिहाई हिस्सा देने का निर्णय हुआ था।

लेकिन कागज पर तय हिस्से को जमीन पर पहुंचाना आसान नहीं था। बड़ी मात्रा में हथियार, गोला-बारूद और सैन्य सामान भारत में स्थित डिपो में था। कई सैन्य संस्थान और ऑर्डनेंस फैक्ट्रियां भी भारतीय क्षेत्र में थीं।

इसलिए पाकिस्तान के हिस्से के सैन्य सामान के हस्तांतरण को लेकर दोनों देशों के बीच गंभीर विवाद पैदा हुआ। यह प्रक्रिया 15 अगस्त 1947 को पूरी नहीं हुई और बाद के महीनों तक चलती रही।

महत्वपूर्ण बात यह है कि सभी ऑर्डनेंस फैक्ट्रियां पाकिस्तान को नहीं दी गईं। चूंकि अधिकांश ऐसी फैक्ट्रियां भारतीय क्षेत्र में थीं और उन्हें तोड़कर दोनों देशों में बांटना व्यावहारिक नहीं माना गया, इसलिए पाकिस्तान को अपनी समान संस्थाएं स्थापित करने के लिए अलग वित्तीय सहायता देने की व्यवस्था की गई।

भारत के 1948-49 के बजट दस्तावेजों में पाकिस्तान को ऑर्डनेंस फैक्ट्रियों और ऐसी विशिष्ट संस्थाओं की स्थापना के लिए लगभग 6 करोड़ रुपये उपलब्ध कराने की व्यवस्था का उल्लेख है।

सरकारी इमारतें और दफ्तर किसे मिले?

सरकारी इमारतों का बंटवारा भी सीधा 80:20 में नहीं था। जो प्रशासनिक भवन और सरकारी प्रतिष्ठान पाकिस्तान के हिस्से में आए क्षेत्रों में स्थित थे और नई सरकार ने उन्हें अपने नियंत्रण में लिया, वे पाकिस्तान की प्रशासनिक संपत्ति का हिस्सा बने। भारत के आधिकारिक बजट दस्तावेज में पाकिस्तान के क्षेत्र में स्थित प्रशासनिक भवन और स्थापनाएँ तथा वहां काम कर रही रेलवे और पोस्ट-टेलीग्राफ व्यवस्था का उल्लेख किया गया है।

इसका मतलब था कि पाकिस्तान को नई राजधानी कराची में सचिवालय और प्रशासन चलाने के लिए उपलब्ध सरकारी ढांचे का इस्तेमाल करना पड़ा, जबकि भारत ने दिल्ली और अपने हिस्से के क्षेत्रों में मौजूद केंद्रीय संस्थानों को अपने नियंत्रण में रखा।

सरकारी कर्मचारी भी बंटवारे का हिस्सा बने

बंटवारा सिर्फ मशीन, पैसा और इमारतों का नहीं था। सरकारी कर्मचारी भी दो प्रशासनिक व्यवस्थाओं में बांटे गए।

केंद्रीय और प्रांतीय सेवाओं में काम करने वाले कर्मचारियों को भारत या पाकिस्तान में सेवा जारी रखने के विकल्प दिए गए। धार्मिक पहचान, सेवा स्थान, व्यक्तिगत पसंद और प्रशासनिक जरूरतों के आधार पर कर्मचारियों का स्थानांतरण हुआ।

इस प्रक्रिया ने दोनों देशों के प्रशासन को गहराई से प्रभावित किया। पाकिस्तान को अचानक एक नए राष्ट्र की नौकरशाही खड़ी करनी थी, जबकि उसके पास अनुभवी अधिकारियों और कर्मचारियों की संख्या सीमित थी। विभाजन के कारण बड़े पैमाने पर कर्मचारियों का पलायन भी हुआ।

 ‘संपत्ति के बंटने’ से बड़ी बंटवारे की कहानी

1947 का विभाजन कागज पर संपत्तियों की सूची बनाने से कहीं ज्यादा जटिल था। एक तरफ Partition Council और उसकी समितियां फर्नीचर, रेलवे स्टॉक, सैन्य सामान और सरकारी रिकॉर्ड तक का हिसाब कर रही थीं, तो दूसरी तरफ पंजाब और बंगाल में हिंसा, विस्थापन और बड़े पैमाने पर पलायन चल रहा था।

ऐसे माहौल में कर्मचारियों को स्थानांतरित करना, सामान की सूची बनाना, उसे सुरक्षित पहुंचाना और दो नए प्रशासन खड़े करना बेहद कठिन काम था। शोध में भी यह सामने आया है कि विभाजन के दौरान दोनों पक्षों ने संपत्तियों और संस्थानों के बंटवारे को व्यवस्थित करने की कोशिश की, लेकिन यह प्रक्रिया लगातार विवादों और व्यावहारिक समस्याओं से घिरी रही।

14 अगस्त पाकिस्तान के लिए सिर्फ एक तारीख नहीं है। यह उस ऐतिहासिक मोड़ की याद है जब ब्रिटिश भारत से अलग होकर एक नया डोमिनियन सामने आया और उसे लगभग शून्य से अपना शासन, अर्थव्यवस्था और संस्थाएं खड़ी करनी पड़ीं। वहीं भारत के लिए 15 अगस्त वह तारीख बनी जिस दिन सत्ता का हस्तांतरण और स्वतंत्रता का राष्ट्रीय समारोह हुआ।

दोनों तारीखों के बीच सिर्फ 24 घंटे का अंतर दिखाई देता है, लेकिन उन 24 घंटों के पीछे 1947 के सबसे बड़े राजनीतिक, प्रशासनिक और मानवीय बदलावों की पूरी कहानी छिपी है।

ये भी पढ़ें :- 3 जून 1947: जब रेडियो पर सुनाई गई भारत के बंटवारे की खबर, कैसे लॉर्ड माउंटबेटन के एक फैसले ने बदल दिया दक्षिण एशिया का इतिहास

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MD Faijan

लेखक

मोहम्मद फैजान न्यूज़ ऑफ द डे में पत्रकार हैं, जहाँ वे खेल, मनोरंजन, राजनीति और अंतरराष्ट्रीय मामलों को कवर करते हैं। इससे पहले वे यूट्यूब चैनल स्पोर्ट्स यारी में सोशल मीडिया एग्जीक्यूटिव के रूप में कार्य कर चुके हैं, जहाँ उन्होंने डिजिटल कंटेंट मैनेजमेंट और ऑडियंस एंगेजमेंट का व्यावहारिक अनुभव प्राप्त किया। भारत के छत्तीसगढ़ राज्य के कोरिया जिले से संबंध रखने वाले फैजान आधुनिक मीडिया कार्यप्रणालियों की अच्छी समझ रखते हैं और कहानी कहने के विभिन्न रूपों में गहरी रुचि रखते हैं।

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