Sunday, 02 August 2026
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यमुना को फिर से नदी बनाने की जरूरत: दिल्ली का शोधित जल हरियाणा को, ट्यूबवेल पर प्रतिबंध अनिवार्य

हथनीकुंड बैराज से यमुना में अधिक जल छोड़ने की मांग, गिरते भूजल और प्रदूषण पर चिंता

दिल्ली में यमुना नदी आज एक गंभीर जल संकट से जूझ रही है। बरसात के महीनों को छोड़ दें तो यमुना लगभग नाले में तब्दील हो चुकी है। पहाड़ियों से निकलने वाली पवित्र यमुना का जल हथनीकुंड बैराज से हरियाणा की ओर मोड़ दिया जाता है, जिससे नदी दिल्ली तक सूख जाती है। विशेषज्ञों और पर्यावरणविदों का मानना है कि यदि यमुना को फिर से जीवंत बनाना है तो इसके लिए बहुआयामी रणनीति अपनानी होगी।

दिल्ली का शोधित जल हरियाणा के किसानों को देने का सुझाव

विशेषज्ञों के अनुसार, दिल्ली के सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) से निकलने वाले शोधित जल को हरियाणा के किसानों को सिंचाई के लिए उपलब्ध कराना चाहिए। इससे हथनीकुंड बैराज से हरियाणा को भेजे जा रहे ताजे पानी में कटौती की जा सकती है, और वह पानी यमुना में छोड़ा जा सकता है जिससे नदी का प्रवाह बना रहेगा।

इस नीति से न केवल यमुना को पानी मिलेगा, बल्कि हरियाणा के किसानों को भी फायदा होगा। सरकार इस योजना को अमल में लाकर दोनों राज्यों की जल समस्याओं का संतुलित समाधान निकाल सकती है।

ट्यूबवेल पर लगे प्रतिबंध, भूजल स्तर खतरनाक स्तर पर

यमुना के आस-पास के क्षेत्रों—दिल्ली, हरियाणा और उत्तर प्रदेश—में अनियंत्रित ट्यूबवेल उपयोग ने भूजल स्तर को बेहद नीचे पहुंचा दिया है। विशेषज्ञों ने सुझाव दिया है कि यमुना के आसपास के क्षेत्रों में ट्यूबवेल लगाने पर प्रतिबंध लगाया जाए। इससे वर्षा के दौरान प्राकृतिक पुनर्भरण को बढ़ावा मिलेगा और नदी को गर्मी व सर्दी में भी जल उपलब्ध हो सकेगा।

धान की खेती पर नियंत्रण जरूरी

हरियाणा सरकार ने पहले ही 15 जून से पहले धान की रोपाई पर प्रतिबंध लगाया है, जो एक सराहनीय कदम है। लेकिन बरसात के मौसम में भी ट्यूबवेल से धान की सिंचाई की जा रही है, जिससे भूजल और अधिक नीचे जा रहा है। सरकार को चाहिए कि बरसात के दौरान धान की सिंचाई पर भी सख्ती से रोक लगाए। इसके बदले किसानों को मक्का जैसी वैकल्पिक फसलें अपनाने के लिए प्रेरित किया जाए।

पहले पीने का पानी, फिर सिंचाई: राष्ट्रीय नीति में बदलाव की जरूरत

राष्ट्रीय जल नीति में पीने के पानी को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि इसमें संशोधन कर नदियों की सतत प्रवाहशीलता को दूसरी प्राथमिकता दी जानी चाहिए और सिंचाई को तीसरे स्थान पर रखा जाए। इससे यमुना जैसी नदियों की अस्तित्व रक्षा की जा सकेगी।

उद्योगों पर भी कसनी होगी लगाम

यमुना में प्रदूषण का एक बड़ा कारण उद्योगों द्वारा छोड़ा गया अनुपचारित अपशिष्ट जल है। कई बार यह देखा गया है कि उद्योग सरकारी मानकों की अनदेखी करते हैं और सीधे नदी में प्रदूषित जल छोड़ते हैं। लॉकडाउन के दौरान जब उद्योग बंद थे, तब यमुना का जल पहली बार स्वच्छ दिखा।

IITs के ‘गंगा रिवर बेसिन मैनेजमेंट प्लान’ में सिफारिश की गई थी कि सभी उद्योगों को Zero Liquid Discharge (ZLD) नीति के तहत काम करना चाहिए, यानी एक बूंद भी प्रदूषित पानी बाहर न छोड़ा जाए। इसे बार-बार शुद्ध कर पुनः उपयोग में लाया जाए।

देशव्यापी नीति की दरकार

यदि केवल हरियाणा, दिल्ली और उत्तर प्रदेश में यह नियम लागू किया गया तो वहां के उद्योग आर्थिक रूप से पिछड़ सकते हैं। इसलिए सरकार को चाहिए कि पूरे देश के लिए समान नियम बनाए जाएं ताकि किसी राज्य के उद्योगों को प्रतिस्पर्धात्मक नुकसान न उठाना पड़े।

यमुना को बचाने के लिए एक समन्वित और सख्त नीति की आवश्यकता है। जब तक हथनीकुंड से पर्याप्त पानी नहीं छोड़ा जाएगा, ट्यूबवेल पर रोक नहीं लगेगी, और उद्योगों को जवाबदेह नहीं बनाया जाएगा, तब तक यमुना पुनर्जीवित नहीं हो पाएगी। यह केवल एक पर्यावरणीय चिंता नहीं, बल्कि देश की संस्कृति, सभ्यता और भविष्य से जुड़ा प्रश्न है।

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Aniket

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लेखक

Aniket Sardhana is a journalism graduate with hands-on experience in field reporting, camera operations, and news production. With a strong understanding of newsroom workflows and on-ground storytelling, he has developed a practical and detail-oriented approach to reporting. Aniket writes extensively on cryptocurrency and current affairs, focusing on policy developments, market trends, and their broader socio-economic impact.

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