अमृता प्रीतम की जयंती पर जानिए उनकी जिंदगी के वे अध्याय, जिनमें प्रेम, साहिर लुधियानवी, इमरोज, विवाह और अपनी शर्तों पर जीने का साहस शामिल रहा।
नई दिल्ली: कुछ प्रेम कहानियां पूरी नहीं होतीं हैं, पर शायद वे कभी खत्म भी नहीं होतीं हैं। कुछ कविताएं लिखे जाने के बाद किताब के पन्नों में बंद नहीं रहतीं, बल्कि कई पीढ़ियों की आवाज बन जाती हैं। और कुछ लेखक अपने समय को सिर्फ लिखते नहीं, बल्कि उसे इस तरह जीते हैं कि उनकी जिंदगी ही उनकी सबसे बड़ी कहानी बन जाती है। अमृता प्रीतम ऐसी ही लेखिका थीं।

31 अगस्त 1919 को तत्कालीन अविभाजित पंजाब के गुजरांवाला में जन्मी अमृता प्रीतम ने करीब छह दशक तक पंजाबी और हिंदी साहित्य को अपनी रचनाओं से समृद्ध किया। आज उनकी 107वीं जयंती पर उन्हें याद करना सिर्फ एक मशहूर कवयित्री या उपन्यासकार को याद करना नहीं है। यह उस महिला को याद करना है जिसने प्रेम को अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया, सामाजिक बंदिशों को अपनी पहचान तय नहीं करने दी और विभाजन की त्रासदी को लाखों लोगों की आवाज बना दिया।
उनका जन्म नाम अमृत कौर था। बाद में साहित्य की दुनिया ने उन्हें अमृता प्रीतम के नाम से जाना। उनके पिता करतार सिंह हितकारी कवि, विद्वान और संपादक थे। घर में साहित्य और आध्यात्मिकता का माहौल था। शायद इसी वजह से कविता अमृता के लिए बाहर से आई कोई चीज नहीं थी; वह बचपन से ही उनके जीवन का हिस्सा बन गई थी।
11 साल की उम्र में मां को खोया
अमृता का बचपन आसान नहीं था। जब वह केवल 11 साल की थीं, उनकी मां राज बीबी का निधन हो गया। एक छोटी बच्ची के लिए यह गहरा आघात था। अकेलेपन और भावनात्मक खालीपन के बीच कविता और कल्पना उनकी साथी बन गईं। पिता ने उन्हें कविता की बारीकियां सिखाईं और बहुत कम उम्र में उन्होंने लिखना शुरू कर दिया।
सिर्फ 13 साल की उम्र में उनकी पहली कविता-पुस्तक ‘अमृत लहरां’ प्रकाशित हुई। 16 वर्ष की उम्र में ‘ठंडियां किरणां’ के प्रकाशन के बाद उन्हें व्यापक साहित्यिक पहचान मिली। यही वह दौर था जब अमृता प्रीतम आधुनिक पंजाबी कविता की एक महत्वपूर्ण आवाज के रूप में उभरने लगीं।
लेकिन साहित्य में पहचान बनने के साथ उनकी जिंदगी ने एक दूसरा मोड़ भी लिया। किशोरावस्था में ही उनका विवाह प्रीतम सिंह से कर दिया गया। यह विवाह आगे चलकर उनके जीवन का ऐसा अध्याय बना जिसे अमृता ने न तो छिपाया और न ही उसे अपनी पूरी पहचान बनने दिया।
प्रेम कविताओं से आगे बढ़ी अमृता की लेखनी
अमृता प्रीतम की शुरुआती कविताओं में प्रेम और रोमानी भाव प्रमुख थे। लेकिन समय के साथ उनकी रचनाओं का संसार बदलता गया। सामाजिक असमानता, महिलाओं की स्थिति, युद्ध, विस्थापन और राजनीतिक उथल-पुथल उनकी रचनाओं का हिस्सा बनने लगे।
वे प्रगतिशील लेखक आंदोलन से भी जुड़ीं। उनकी कविता निजी अनुभवों से निकलकर सामाजिक सवालों तक पहुंची। यही वजह है कि अमृता को केवल प्रेम की कवयित्री कहना उनके साहित्य को सीमित करना होगा। उनकी रचनाओं में प्रेम था, लेकिन उसके साथ आजादी, न्याय, स्त्री-अस्तित्व और मानवीय गरिमा की चिंता भी थी।
उनकी लेखनी में स्त्री केवल किसी पुरुष की प्रेमिका, पत्नी या मां नहीं थी। वह अपनी इच्छाओं, दुखों, फैसलों और पहचान के साथ एक स्वतंत्र मनुष्य थी। यही बात उन्हें अपने समय की कई दूसरी लेखिकाओं से अलग बनाती है।
वह कविता जिसने अमृता को अमर कर दिया
अमृता प्रीतम की जिंदगी और साहित्य पर सबसे गहरी छाप भारत के विभाजन की रही।
1947 में पंजाब ने जिस हिंसा को देखा, उसने अमृता के भीतर के कवि को हमेशा के लिए बदल दिया। लाखों घर उजड़े, परिवार बिछड़े और हजारों महिलाओं ने हिंसा का सामना किया। अमृता खुद भी लाहौर से विस्थापित होकर भारत आईं।
इसी त्रासदी से निकली ‘अज्ज आखां वारिस शाह नूं’ उनकी सबसे प्रसिद्ध कविता साबित हुई।
यह कविता उन्होंने 1948 में दिल्ली से देहरादून की रेल यात्रा के दौरान लिखी थी। इसमें उन्होंने 18वीं सदी के महान पंजाबी कवि वारिस शाह को पुकारा। वारिस शाह ने ‘हीर’ के जरिए पंजाब के प्रेम और दर्द को आवाज दी थी। अमृता ने उनसे कहा कि आज पंजाब की एक बेटी नहीं, लाखों बेटियां रो रही हैं।

यह कविता केवल विभाजन की कविता नहीं थी। इसमें उन महिलाओं का दर्द था जो दंगों और हिंसा का शिकार हुईं। इसमें उस पंजाब का शोक था जिसे धर्म के नाम पर बांट दिया गया था।
कविता की ताकत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसे पाकिस्तान में भी गहरी लोकप्रियता मिली। साहित्यकार खुशवंत सिंह ने इसका अंग्रेजी अनुवाद किया और इसे अमृता की अमर रचनाओं में माना। पाकिस्तानी लेखक और कवि भी उन्हें उसी साहित्यिक विरासत का हिस्सा मानते रहे।
विभाजन में महिलाओं का दर्द बयान करती ‘पिंजर’
विभाजन की त्रासदी अमृता प्रीतम के उपन्यास ‘पिंजर’ में भी दिखाई देती है।
1950 में प्रकाशित इस उपन्यास की नायिका पूरो है। कहानी एक ऐसी महिला के जरिए विभाजन के दौरान महिलाओं पर हुए अत्याचार, अपहरण, विस्थापन और पहचान के संकट को सामने लाती है।
‘पिंजर’ में अमृता ने सिर्फ हिंदू-मुस्लिम संघर्ष का वर्णन नहीं किया। उन्होंने यह दिखाया कि साम्प्रदायिक हिंसा में सबसे ज्यादा असुरक्षित शरीर अक्सर महिलाओं के होते हैं और उनके लिए घर, परिवार, धर्म और पहचान सब कुछ एक साथ छिन सकता है।

बाद में इसी उपन्यास पर आधारित फिल्म ‘पिंजर’ 2003 में रिलीज हुई। फिल्म ने अमृता की कहानी को नई पीढ़ी तक पहुंचाया।
साहिर, अमृता और इमरोज: प्रेम की एक अनोखी त्रयी
अमृता प्रीतम की जिंदगी में साहिर लुधियानवी और इमरोज दो ऐसे नाम रहे, जिन्होंने उनके प्रेम और रचनात्मक जीवन को अलग-अलग रंग दिए। साहिर के साथ उनका रिश्ता गहरे लेकिन अधूरे प्रेम का प्रतीक रहा। 1940 के दशक में दोनों करीब आए।

मुलाकातों के दौरान साहिर का चुपचाप सिगरेट पीना अमृता की स्मृतियों में इस कदर बस गया कि बाद में वह उनकी बुझी हुई सिगरेट के टुकड़ों को संभालकर रखने लगीं।
साहिर से उनका प्रेम कभी पूरी तरह मुकाम तक नहीं पहुंच सका। 1960 के आसपास उन्होंने अपने पति से अलग होकर अपनी स्वतंत्र जिंदगी जीने का फैसला किया। लेकिन उस रिश्ते की छाप अमृता के साहित्य और आत्मकथा ‘रसीदी टिकट’ में लंबे समय तक दिखाई देती रही।
इसके बाद अमृता के जीवन में इमरोज आए। 1958 में दोनों की मुलाकात हुई और धीरे-धीरे उनका रिश्ता प्रेम, दोस्ती और रचनात्मक साझेदारी में बदल गया। करीब चार दशक तक दोनों साथ रहे। उन्होंने औपचारिक विवाह नहीं किया, लेकिन एक-दूसरे के जीवन और काम का गहरा हिस्सा बने रहे। इमरोज ने अमृता के साथ घरेलू और रचनात्मक जीवन साझा किया और उनके अंतिम वर्षों तक साथ निभाया।

दिल्ली बनी अमृता की कर्मभूमि
1947 के बाद दिल्ली अमृता प्रीतम की स्थायी कर्मभूमि बन गई। उन्होंने यहां ऑल इंडिया रेडियो की पंजाबी सेवा में काम किया और लंबे समय तक राजधानी में रहीं। 1948 से उनका आकाशवाणी से जुड़ाव रहा और 1961 तक उन्होंने वहां काम किया।
लेकिन दिल्ली उनके लिए केवल नौकरी और घर की जगह नहीं थी। यह शहर उनकी रचनाओं में भी आया।
कहा जाता है कि अमृता की ‘दो दिल्ली’ थीं। एक वो जिसमें वह रहती थीं और दूसरी वो जिसे वह अपनी रचनाओं में देखती थीं। हौज खास का उनका घर उनके साहित्यिक जीवन का महत्वपूर्ण केंद्र बना।
उन्होंने दिल्ली को सिर्फ आधुनिक राजधानी की तरह नहीं देखा। उनकी कविताओं और कहानियों में शहर अकेलेपन, सामाजिक दूरी और बदलते मानवीय रिश्तों का प्रतीक भी बनता है।
उनकी रचना ‘दिल्ली की गलियां’ में भी शहर और उसमें मौजूद लैंगिक असमानताओं की तस्वीर दिखाई देती है।
अपनी जिंदगी को खुद लिखने का साहस
अमृता की आत्मकथा ‘रसीदी टिकट’ उनकी सबसे चर्चित कृतियों में से एक है।
आत्मकथा में उन्होंने अपनी जिंदगी के उन हिस्सों पर भी लिखा जिन पर समाज अक्सर चुप्पी चाहता है—प्रेम, विवाह, अकेलापन और रिश्ते।
‘रसीदी टिकट’ का महत्व इसलिए भी है क्योंकि यह सिर्फ एक साहित्यकार की जीवनी नहीं है। यह उस दौर की एक महिला की आत्मस्वीकृति है जिसने अपने जीवन को दूसरों की नजर से लिखने के बजाय खुद अपनी आवाज में दर्ज किया।

उनकी लेखनी में निजी और सार्वजनिक के बीच की दीवार बार-बार टूटती है। जो दर्द उन्होंने व्यक्तिगत रूप से महसूस किया, वही आगे चलकर उनकी कविता और गद्य में सामाजिक अनुभव बन गया।
पुरस्कारों ने बढ़ाया साहित्य का कद
अमृता प्रीतम का साहित्य सिर्फ लोकप्रिय नहीं हुआ, उसे संस्थागत सम्मान भी मिला।
1956 में उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। वे इस सम्मान को पाने वाली पहली महिला साहित्यकार थीं। उन्हें यह पुरस्कार उनकी चर्चित कविता-कृति ‘सुनहरे’/‘संदेश’ (Sunehade) के लिए मिला।
1969 में उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया।
1982 में उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला। यह सम्मान उन्हें ‘कागज ते कैनवास’ के लिए दिया गया और वह पंजाबी साहित्य के लिए ज्ञानपीठ पाने वाली पहली लेखिका बनीं।
1986 में उन्हें राज्यसभा के लिए नामित किया गया और उन्होंने 1992 तक संसद के उच्च सदन में सदस्य के रूप में काम किया।
2004 में उन्हें पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया।
100 से ज्यादा किताबें और कई भाषाओं में पहुंची आवाज
अमृता प्रीतम ने कविता, उपन्यास, कहानी, निबंध, जीवनी और आत्मकथा सहित अलग-अलग विधाओं में लिखा। उनके नाम 100 से अधिक पुस्तकों का उल्लेख मिलता है। उनकी रचनाओं का भारतीय और विदेशी भाषाओं में अनुवाद हुआ।
उनकी प्रमुख रचनाओं में ‘पिंजर’, ‘कागज ते कैनवास’, ‘सुनहरे’, ‘अज्ज आखां वारिस शाह नूं’ और ‘रसीदी टिकट’ शामिल हैं।
उनकी लेखनी की खासियत यह थी कि वह पंजाबी में लिखते हुए भी भाषा की सीमाओं में बंद नहीं हुई। उनके प्रेम, विस्थापन और स्त्री-अनुभव की भाषा पाठकों के लिए सार्वभौमिक बन गई।
2005 में निधन
अमृता प्रीतम का निधन 31 अक्टूबर 2005 को नई दिल्ली में 86 वर्ष की उम्र में हुआ। लेकिन उनकी मृत्यु के साथ उनकी कहानी खत्म नहीं हुई।
उनकी कविताएं आज भी पढ़ी जाती हैं। ‘पिंजर’ आज भी विभाजन और स्त्री हिंसा को समझने के लिए पढ़ा जाता है। ‘रसीदी टिकट’ आज भी निजी स्वतंत्रता और आत्मकथात्मक लेखन के संदर्भ में चर्चा में रहती है। और ‘मैं तैनूं फिर मिलांगी’ आज भी प्रेम की उन कहानियों में शामिल है जिनका अंत मृत्यु के साथ नहीं होता।

उनकी विरासत का एक और महत्वपूर्ण हिस्सा यह है कि उन्होंने आने वाली पीढ़ियों के लेखकों को जगह दी। ‘नागमणि’ के जरिए उन्होंने कई नए पंजाबी लेखकों को मंच दिया और साहित्यिक पीढ़ियों के बीच पुल का काम किया।
आज उनकी 107वीं जयंती पर अमृता प्रीतम को याद करने का सबसे सही तरीका शायद यही है कि उन्हें सिर्फ ‘प्रेम की कवयित्री’ कहकर सीमित न किया जाए।
वह विभाजन की गवाह थीं। वह पंजाब के दर्द की आवाज थीं। वह महिलाओं के अधिकार और अपनी शर्तों पर जीने की हिमायती थीं। वह प्रेम में डूबी लेखिका थीं, लेकिन प्रेम से आगे समाज को देखने वाली रचनाकार भी थीं। और शायद इसीलिए उनकी कविता आज भी समय से बाहर खड़ी दिखाई देती है।
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