DU छात्रा आकृति चौधरी की NSA हिरासत इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रद्द कर दी। जानिए कौन हैं आकृति चौधरी, उन पर NSA क्यों लगाया गया और कोर्ट ने प्रशासन की कार्रवाई पर क्या कहा।
नई दिल्ली/प्रयागराज: नोएडा में अप्रैल 2026 में हुए मजदूरों के वेतन-विरोध प्रदर्शन से जुड़े एक मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश प्रशासन को कड़ी फटकार लगाई है। दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा और सामाजिक कार्यकर्ता आकृति चौधरी के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून यानी NSA (National Security Act) के तहत की गई निरोधात्मक हिरासत को अदालत ने रद्द कर दिया। अदालत ने कार्रवाई को संविधान के तहत मिले व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार के खिलाफ माना और अधिकारियों के रवैये पर बेहद तीखी टिप्पणी की।
दो जजों की पीठ ने कहा कि अगर अधिकारियों का ऐसा ‘दमनकारी’ रवैया जारी रहा तो उत्तर प्रदेश एक “Orwellian Dystopia” यानी ऐसी व्यवस्था में बदल सकता है जहां सरकारी तंत्र नागरिकों की स्वतंत्रता और असहमति को दबाने लगे।
अदालत ने आकृति चौधरी को 5 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश भी दिया। खास बात यह है कि इस रकम की वसूली गौतम बुद्ध नगर की जिलाधिकारी मेधा रूपम और मामले में जिम्मेदार पाए गए अन्य अधिकारियों के वेतन से करने का निर्देश दिया गया है।
आखिर क्या है पूरा मामला?
इस मामले की शुरुआत अप्रैल 2026 में नोएडा के औद्योगिक इलाकों में हुए मजदूरों के विरोध प्रदर्शन से हुई। बड़ी संख्या में फैक्ट्री कर्मचारियों ने वेतन बढ़ाने और कामकाजी परिस्थितियों में सुधार की मांग को लेकर प्रदर्शन किया था।

विरोध की पृष्ठभूमि में बढ़ती महंगाई और वेतन को लेकर असंतोष था। हरियाणा में न्यूनतम मजदूरी में बढ़ोतरी की घोषणा के बाद नोएडा के कई मजदूरों में भी समान वृद्धि की मांग तेज हुई। 8 अप्रैल से शुरू हुआ आंदोलन 13 अप्रैल तक कई औद्योगिक क्षेत्रों में फैल गया और उस दिन प्रदर्शन के दौरान पथराव, तोड़फोड़ और वाहनों में आगजनी जैसी घटनाएं सामने आईं।
स्थिति बिगड़ने के बाद पुलिस ने कार्रवाई की। कई एफआईआर दर्ज हुईं और बड़ी संख्या में लोगों को गिरफ्तार किया गया। पुलिस के मुताबिक, हिंसा और कथित तौर पर आंदोलन भड़काने में शामिल लोगों की पहचान की जा रही थी। इसी कार्रवाई की जद में आकृति चौधरी भी आईं।
आकृति चौधरी कौन हैं?
आकृति चौधरी दिल्ली विश्वविद्यालय से पढ़ाई कर चुकी छात्रा और सामाजिक कार्यकर्ता हैं। वह मजदूरों से जुड़े मुद्दों पर सक्रिय रही हैं। अप्रैल के नोएडा प्रदर्शन के बाद पुलिस ने उन्हें हिरासत में लिया था।

रिपोर्ट के अनुसार, उन्हें 11 अप्रैल को हिरासत में लिया गया और बाद में उत्तर प्रदेश सरकार ने 13 मई को NSA लागू किया। वह गौतम बुद्ध नगर की कसना जेल में हिरासत में थीं। रिपोर्ट के मुताबिक उनके खिलाफ आंदोलन से संबंधित कई एफआईआर दर्ज थीं।
आकृति की ओर से दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका यानी हैबियस कॉर्पस पिटीशन में उनकी हिरासत को चुनौती दी गई। अदालत को यह तय करना था कि प्रशासन के पास उन्हें NSA जैसे कड़े कानून के तहत हिरासत में रखने के लिए पर्याप्त और ठोस आधार था या नहीं।
हाईकोर्ट ने NSA की कार्रवाई क्यों रद्द की?
इलाहाबाद हाईकोर्ट की पीठ ने मामले में उपलब्ध सामग्री और घटनाक्रम को देखने के बाद कहा कि आकृति के खिलाफ NSA लगाने के लिए जिस सामग्री पर प्रशासन ने भरोसा किया, वह पर्याप्त नहीं थी।
अदालत के अनुसार, हिरासत का आदेश “Without Application of Mind” यानी उचित तरीके से तथ्यों और परिस्थितियों पर विचार किए बिना पारित किया गया। अदालत ने इसे आकृति के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन माना।
अदालत ने प्रशासन की कार्रवाई को बेहद गंभीरता से लेते हुए यह भी कहा कि शांतिपूर्ण तरीके से सार्वजनिक स्थान पर एकत्र होना या अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाना अपने आप में ऐसी गतिविधि नहीं है जिसके आधार पर हर बार कड़े निरोधात्मक कानून का इस्तेमाल किया जाए।
हाईकोर्ट ने किया ‘ऑरवेलियन डिस्टोपिया’ का जिक्र
इस फैसले की सबसे ज्यादा चर्चा अदालत की इसी टिप्पणी को लेकर हो रही है।
पीठ ने चेतावनी दी कि अगर अधिकारियों का ‘Despotic’ यानी निरंकुश रवैया जारी रहा तो उत्तर प्रदेश ‘ऑरवेलियन डिस्टोपिया’ में बदल सकता है।
‘Orwellian’ शब्द ब्रिटिश लेखक जॉर्ज ऑरवेल के उपन्यास Nineteen Eighty-Four से जुड़ा है। इसका इस्तेमाल ऐसी व्यवस्था के लिए किया जाता है जहां सत्ता नागरिकों की निगरानी, नियंत्रण और स्वतंत्रता पर अत्यधिक हस्तक्षेप करने लगे।

अदालत की टिप्पणी का मूल संदेश यह था कि प्रशासनिक अधिकारियों को कानून द्वारा मिली शक्तियों का इस्तेमाल नागरिकों की संवैधानिक स्वतंत्रता को दबाने के लिए नहीं करना चाहिए।
अदालत ने DM मेधा रूपम पर क्या कहा?
इस मामले में गौतम बुद्ध नगर की जिलाधिकारी मेधा रूपम की भूमिका भी अदालत के निशाने पर रही।
अदालत ने NSA के तहत आकृति की हिरासत को मंजूरी देने के फैसले की आलोचना की और अधिकारियों के खिलाफ अपनी नाराजगी को उनके सर्विस रिकॉर्ड में दर्ज करने का निर्देश दिया। कोर्ट ने DM के फैसले को बेहद गंभीर प्रशासनिक चूक के तौर पर देखा।
इसके अलावा अदालत ने आकृति चौधरी को दिए जाने वाले 5 लाख रुपये के मुआवजे की राशि DM और अन्य जिम्मेदार अधिकारियों के वेतन से वसूलने का निर्देश दिया है। इसमें उस पुलिस अधिकारी तक की जिम्मेदारी तय करने की बात कही गई है जिसने NSA हिरासत के समर्थन में शुरुआती रिपोर्ट तैयार की थी।
यह निर्देश इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि आमतौर पर किसी प्रशासनिक कार्रवाई के गलत पाए जाने पर मुआवजे का भुगतान सरकारी खजाने से होता है। इस मामले में अदालत ने जिम्मेदार अधिकारियों की व्यक्तिगत जवाबदेही पर जोर दिया।
मेधा रूपम कौन हैं?
मेधा रूपम 2014 बैच की IAS अधिकारी हैं और गौतम बुद्ध नगर की पहली महिला जिलाधिकारी हैं। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय के सेंट स्टीफंस कॉलेज से अर्थशास्त्र की पढ़ाई की और सिविल सेवा परीक्षा में ऑल इंडिया रैंक 10 हासिल की थी। वह राष्ट्रीय स्तर की राइफल शूटर भी रही हैं।
वह कई जिलों में प्रशासनिक जिम्मेदारियां संभाल चुकी हैं और ग्रेटर नोएडा अथॉरिटी में अतिरिक्त मुख्य कार्यकारी अधिकारी के पद पर भी काम कर चुकी हैं। जुलाई 2025 में उन्होंने गौतम बुद्ध नगर के DM के रूप में कार्यभार संभाला था।
मेधा रूपम मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की बेटी भी हैं। यह तथ्य पहले से सार्वजनिक है, लेकिन मौजूदा मामले में अदालत की टिप्पणी का आधार उनका पारिवारिक संबंध नहीं, बल्कि DM के रूप में उनके द्वारा पारित किया गया NSA हिरासत आदेश है।

मजदूरों का प्रदर्शन की असल वजह
आकृति चौधरी की गिरफ्तारी और NSA कार्रवाई की पृष्ठभूमि समझने के लिए अप्रैल के मजदूर आंदोलन को समझना जरूरी है।
नोएडा देश के प्रमुख औद्योगिक केंद्रों में शामिल है और यहां बड़ी संख्या में फैक्ट्रियां तथा विनिर्माण इकाइयां हैं। मजदूरों के एक वर्ग की शिकायत थी कि उनकी आय बढ़ती जीवन-यापन लागत के अनुरूप नहीं है।
हरियाणा में न्यूनतम मजदूरी बढ़ाए जाने के बाद नोएडा के मजदूरों ने भी वेतन बढ़ाने की मांग तेज कर दी। आंदोलन के दौरान कई प्रदर्शनकारियों ने करीब 20 हजार रुपये मासिक वेतन की मांग की थी।
13 अप्रैल को प्रदर्शन हिंसा में तब्दील हो गई। कई औद्योगिक इलाकों में पथराव, आगजनी और तोड़फोड़ की घटनाएं सामने आईं। पुलिस ने भीड़ को नियंत्रित करने के लिए आंसू गैस और अन्य उपायों का इस्तेमाल किया।
इसके बाद सरकार ने मजदूरों की मांग पर कार्रवाई करते हुए न्यूनतम मजदूरी में लगभग 20-21 प्रतिशत की अंतरिम बढ़ोतरी की। गौतम बुद्ध नगर और गाजियाबाद में अकुशल श्रमिकों के लिए संशोधित अंतरिम मासिक मजदूरी 13,690 रुपये, अर्ध-कुशल के लिए 15,059 रुपये और कुशल श्रमिकों के लिए 16,868 रुपये तय की गई थी। ये दरें 1 अप्रैल 2026 से प्रभावी की गईं।
NSA क्या है?
राष्ट्रीय सुरक्षा कानून, 1980 (NSA) एक निरोधात्मक कानून है। इसका उद्देश्य कुछ विशेष परिस्थितियों में ऐसे व्यक्ति को हिरासत में रखना है जिससे सरकार को राष्ट्रीय सुरक्षा, राज्य की सुरक्षा या सार्वजनिक व्यवस्था के लिए खतरा होने की आशंका हो।
निरोधात्मक हिरासत सामान्य आपराधिक मुकदमे से अलग होती है। इसमें किसी व्यक्ति को अपराध साबित होने के बाद सजा देने के बजाय भविष्य में संभावित खतरे को रोकने के उद्देश्य से हिरासत में रखा जा सकता है।
इसी वजह से NSA का इस्तेमाल संवैधानिक स्वतंत्रता के संदर्भ में हमेशा संवेदनशील विषय रहा है। अदालतें यह देखती हैं कि प्रशासन ने कानून में निर्धारित शर्तों का पालन किया या नहीं और हिरासत का आधार वास्तविक, प्रासंगिक तथा पर्याप्त सामग्री पर आधारित था या नहीं।
आकृति चौधरी के मामले में हाईकोर्ट ने पाया कि NSA लगाने के लिए इस्तेमाल की गई सामग्री इस कठोर कार्रवाई को उचित ठहराने के लिए पर्याप्त नहीं थी।
5 लाख रुपये मुआवजे का भी आदेश
अदालत ने आकृति चौधरी के मौलिक अधिकारों के उल्लंघन को देखते हुए 5 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया।
लेकिन इस आदेश का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा इसकी वसूली का तरीका है। अदालत ने राशि को जिम्मेदार अधिकारियों के वेतन से वसूलने की बात कही है। इससे प्रशासनिक अधिकारियों की व्यक्तिगत जवाबदेही का सवाल सामने आता है।
अदालत ने अधिकारियों के सर्विस रिकॉर्ड में अपनी ‘नाराजगी’ दर्ज करने का भी निर्देश दिया। इससे यह संदेश जाता है कि संवैधानिक शक्तियों का इस्तेमाल करने वाले अधिकारियों को अपने फैसलों के लिए जवाबदेह रहना होगा।
क्या आकृति चौधरी अब पूरी तरह आजाद हैं?
आपको बता दें कि, हाईकोर्ट ने NSA के तहत उनकी निरोधात्मक हिरासत रद्द की है, लेकिन इससे उनके खिलाफ दर्ज अन्य आपराधिक मामलों का स्वतः अंत नहीं हुआ। रिपोर्टों के मुताबिक, आंदोलन से जुड़े अन्य मामलों में उन्हें अभी जमानत नहीं मिली है। इसलिए NSA आदेश रद्द होने के बावजूद वह अन्य मामलों के कारण न्यायिक हिरासत में रह सकती हैं।
यानी अदालत का फैसला NSA कार्रवाई पर है, न कि उनके खिलाफ दर्ज सभी मामलों पर।
फैसले का व्यापक संदेश क्या है?
आकृति चौधरी मामले का फैसला केवल एक छात्रा की NSA हिरासत तक सीमित नहीं है। यह उस बड़े सवाल से जुड़ता है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में राज्य की शक्ति और नागरिक की स्वतंत्रता के बीच संतुलन कैसे कायम किया जाए।
नोएडा में मजदूरों का प्रदर्शन हिंसक हुआ था और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने जैसी घटनाओं पर कानून के मुताबिक कार्रवाई का अधिकार प्रशासन के पास है। लेकिन हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि किसी कठोर कानून का इस्तेमाल करते समय व्यक्ति की वास्तविक भूमिका और ठोस सबूतों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
साथ ही अदालत की ‘ऑरवेलियन डिस्टोपिया’ वाली टिप्पणी इसी व्यापक चिंता को सामने लाती है। अगर प्रशासनिक शक्तियां बिना पर्याप्त आधार के नागरिकों की स्वतंत्रता सीमित करने के लिए इस्तेमाल होने लगें तो लोकतांत्रिक संस्थाओं पर भरोसा प्रभावित हो सकता है।
इस मामले में हाईकोर्ट ने एक तरफ आकृति चौधरी की NSA हिरासत को रद्द किया, वहीं दूसरी तरफ जिम्मेदार अधिकारियों पर व्यक्तिगत जवाबदेही तय करने का रास्ता भी अपनाया। 5 लाख रुपये मुआवजा, वेतन से वसूली और सर्विस रिकॉर्ड में अदालत की नाराजगी दर्ज करने के निर्देश इस फैसले को खास बनाते हैं।
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