राजपाल यादव का चेक बाउंस विवाद करीब 16 साल पुराना है और इसकी शुरुआत ‘अता पता लापता’ के निर्माण के लिए मिली वित्तीय सहायता से हुई थी। जानें ₹5 करोड़ से शुरू हुआ विवाद कैसे कई समझौतों और मामलों तक पहुंचा।
नई दिल्ली: अभिनेता राजपाल यादव एक बार फिर अपने पुराने चेक बाउंस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट में पेश हुए। बुधवार, 7 अक्टूबर को सुनवाई के दौरान अदालत ने उन्हें 13 अक्टूबर तक शिकायतकर्ता को 2 करोड़ रुपये जमा करने का निर्देश दिया। कोर्ट ने साफ किया कि इस भुगतान के बाद ही वह दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली उनकी याचिका पर आगे विचार करेगा।
सुनवाई के दौरान राजपाल यादव ने अपनी फिल्म ‘अता पता लापता’ से हुए नुकसान और पिछले कई वर्षों में अपनी आर्थिक तथा पेशेवर परेशानियों का जिक्र किया। इसी दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और अभिनेता राजपाल यादव के बीच हल्की-फुल्की और दिलचस्प बातचीत भी देखने को मिली।
राजपाल ने किया ‘अता पता लापता’ का जिक्र
सुनवाई के दौरान राजपाल यादव खुद अदालत में मौजूद थे। उन्होंने शुरुआत में पीठ को प्रणाम किया और फिर अपने फिल्मी करियर तथा आर्थिक नुकसान के बारे में बताया। राजपाल ने कहा कि उन्होंने करीब 200 से 250 फिल्मों में काम किया है। उन्होंने दावा किया कि पिछले 13 वर्षों में उन्हें 200 से 250 करोड़ रुपये तक का व्यक्तिगत नुकसान हुआ है।
उन्होंने विशेष रूप से फिल्म ‘अता पता लापता’ से हुए नुकसान का जिक्र किया और कहा कि इस फिल्म से उन्हें करीब 17 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। उनके मुताबिक फिल्म में कुल करीब 22 करोड़ रुपये लगे थे, लेकिन उन्हें इससे कोई कमाई नहीं हुई।
राजपाल यादव ने अदालत में यह भी कहा कि फिल्म को बड़े स्तर पर रिलीज करने की योजना थी, लेकिन वह सिनेमाघरों तक नहीं पहुंच सकी। उन्होंने दावा किया कि फिल्म करीब 1,200 थिएटर में रिलीज होने वाली थी, लेकिन विवाद के चलते ऐसा नहीं हो पाया।
CJI और राजपाल यादव की बातचीत
इसी बातचीत के दौरान CJI सूर्यकांत ने उनसे पूछा कि क्या उनकी कोई नई फिल्म आ रही है। इसके बाद उन्होंने राजपाल यादव को एक अच्छी फिल्म बनाकर लोगों को फिर से एंटरटेन करने की सलाह दी और कहा कि इससे उनकी छवि दोबारा बनाने में मदद मिल सकती है। CJI ने हल्के अंदाज में यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट में पेश होने वाले कुछ वकील भी अच्छे अभिनेता हैं और उन्हें फिल्म में लिया जा सकता है।
इसके जवाब में राजपाल यादव ने अपने लंबे संघर्ष का जिक्र करते हुए कहा कि वह इस पूरे अनुभव पर फिल्म बनाने के बारे में सोच रहे हैं। उन्होंने इसका नाम ‘16 सावन झेल के’ बताया। यह नाम 2010 से शुरू हुए विवाद और 2026 तक चले लंबे कानूनी संघर्ष की ओर इशारा करता है।
कोर्ट ने पहले 2 करोड़ जमा करने को कहा
बातचीत का यह हिस्सा भले ही हल्का रहा हो, लेकिन मामले में सुप्रीम कोर्ट का रुख सख्त रहा। अदालत ने राजपाल यादव को 13 अक्टूबर तक कुल 2 करोड़ रुपये जमा करने का निर्देश दिया है। राजपाल यादव सुनवाई के दौरान 1.15 करोड़ रुपये का डिमांड ड्राफ्ट लेकर पहुंचे थे। बाकी 85 लाख रुपये उनकी पैतृक संपत्ति खरीदने वाले संभावित खरीदार के जरिए जमा किए जाने हैं। वह खरीदार भी सुनवाई के दौरान अदालत में मौजूद था।
राजपाल यादव के वकील ने अदालत को बताया कि अभिनेता के पास 1.15 करोड़ रुपये की व्यवस्था हो चुकी है और उनकी पैतृक संपत्ति के लिए खरीदार भी मिल गया है। बाकी रकम संपत्ति के लेनदेन की प्रक्रिया पूरी होने के बाद जमा की जाएगी। रिपोर्टों के मुताबिक, खरीदार 85 लाख रुपये की राशि देने के लिए तैयार है। अदालत ने इस व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए 13 अक्टूबर की समयसीमा तय की।
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5 करोड़ रुपये से शुरू हुआ था विवाद
राजपाल यादव का यह कानूनी विवाद करीब 16 साल पुराना है। इसकी शुरुआत 2010 में उनकी फिल्म ‘अता पता लापता’ के निर्माण के लिए लिए गए वित्तीय सहयोग से हुई थी।
दिल्ली हाईकोर्ट के 10 जुलाई 2026 के फैसले के अनुसार, राजपाल यादव और उनसे जुड़ी कंपनियों ने मुरली प्रोजेक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड से फिल्म से संबंधित वित्तीय सहायता ली थी। शुरुआती समझौते में करीब 5 करोड़ रुपये की राशि शामिल थी। विवाद इस बात को लेकर आगे बढ़ा कि इस रकम को तय शर्तों के मुताबिक वापस नहीं किया गया।
इसके बाद दोनों पक्षों के बीच कई पूरक समझौते हुए। 21 सितंबर 2011 के एक समझौते में 8 करोड़ रुपये की मूल देनदारी के साथ करीब 1.38 करोड़ रुपये ब्याज जोड़ा गया और कुल राशि 9.38 करोड़ रुपये से अधिक हो गई।
इसके बाद 4 अप्रैल 2012 के समझौते में ब्याज समेत देनदारी करीब 10.72 करोड़ रुपये तय हुई। फिर 9 अगस्त 2012 के समझौते में कुल बकाया राशि करीब 11.10 करोड़ रुपये तय की गई। इसके लिए आठ पोस्ट-डेटेड चेक जारी किए गए थे। इनमें से सात चेक पर्याप्त धनराशि नहीं होने के कारण बाउंस हो गए। इसके बाद सात अलग-अलग शिकायतें दर्ज हुईं।
2013 में दर्ज हुए सात चेक बाउंस केस
दिल्ली हाईकोर्ट के रिकॉर्ड के मुताबिक, 2012 के अंतिम समझौते के तहत जारी आठ चेक में से सात के भुगतान में समस्या आई। चेक बाउंस होने के बाद शिकायतकर्ता मुरली प्रोजेक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड ने परक्राम्य लिखत अधिनियम (Negotiable Instruments Act) की धारा 138 के तहत सात मामले दर्ज कराए। ये मामले 2013 में दायर किए गए थे।
मामला सिर्फ आपराधिक शिकायतों तक सीमित नहीं रहा। इसी देनदारी को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट में सिविल कार्यवाही भी चली। बाद में दोनों पक्षों ने 21 अप्रैल 2013 को एक सहमति समझौता किया। इस समझौते में कुल 10.40 करोड़ रुपये का भुगतान करने पर सहमति बनी थी। दस्तावेज में उल्लेख था कि 40 लाख रुपये की राशि RTGS के माध्यम से पहले ही चुकाई जा चुकी थी, जबकि शेष 10 करोड़ रुपये का भुगतान चार अलग-अलग किस्तों में किया जाना था।
पहली किस्त 5 करोड़ रुपये 31 जुलाई 2013 तक, दूसरी 3 करोड़ रुपये 31 दिसंबर 2013 तक, तीसरी 1 करोड़ रुपये 30 जून 2014 तक और अंतिम 1 करोड़ रुपये 30 सितंबर 2014 तक देने की बात तय हुई थी। समझौते में यह भी था कि यदि भुगतान नहीं किया गया तो शिकायतकर्ता चेक बाउंस के मामलों में आगे कार्रवाई कर सकता है।
समझौते के बावजूद विवाद खत्म नहीं हुआ
2013 के समझौते के बाद भी तय भुगतान पूरी तरह नहीं हो सका। इसके बाद चेक बाउंस से जुड़े मामलों में कानूनी प्रक्रिया जारी रही। दिल्ली हाईकोर्ट के जुलाई 2026 के फैसले में कहा गया कि समझौते के तहत किए गए भुगतान संबंधी वादे पूरे नहीं हुए थे। इसी वजह से शिकायतकर्ता को आपराधिक मामलों में आगे बढ़ने का अधिकार था।
राजपाल यादव की ओर से अदालत में यह दलील भी दी गई कि बाद में हुए समझौते के कारण पहले वाले चेक और उनसे जुड़ी देनदारी का प्रभाव खत्म हो गया था। हालांकि, दिल्ली हाईकोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने रिकॉर्ड में मौजूद समझौतों और भुगतान की शर्तों को देखते हुए दोषसिद्धि को बरकरार रखा।
दिल्ली हाईकोर्ट ने सुनाई थी तीन महीने की सजा
10 जुलाई 2026 को दिल्ली हाईकोर्ट ने राजपाल यादव की ओर से दायर याचिकाओं पर फैसला सुनाया। जस्टिस स्वर्णा कांता शर्मा की पीठ ने सातों चेक बाउंस मामलों में उनकी दोषसिद्धि बरकरार रखी। अदालत ने प्रत्येक मामले में तीन महीने की साधारण कैद की सजा सुनाई और कहा कि सभी सजाएं एक साथ चलेंगी।
हाईकोर्ट ने प्रत्येक मामले में राजपाल यादव पर 1.05 करोड़ रुपये की राशि भी लगाई। यानी सातों मामलों में यह रकम अलग-अलग निर्धारित की गई थी। उनकी पत्नी राधा राजपाल यादव से जुड़ी वित्तीय जिम्मेदारियों को लेकर भी अदालत ने अलग आदेश दिया था।
इससे पहले मामले में राजपाल यादव को जेल भी जाना पड़ा था। फरवरी 2026 में वह तिहाड़ जेल से अंतरिम राहत के बाद बाहर आए थे। बाद की कार्यवाही में उनके द्वारा जमा की गई रकम को भी अदालत ने ध्यान में रखा। यही लंबी कानूनी प्रक्रिया आगे चलकर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंची।
अब 13 अक्टूबर पर टिकी नजर
फिलहाल इस मामले में अगली महत्वपूर्ण तारीख 13 अक्टूबर 2026 है। सुप्रीम कोर्ट ने राजपाल यादव को तब तक कुल 2 करोड़ रुपये जमा करने का निर्देश दिया है। 1.15 करोड़ रुपये की व्यवस्था हो चुकी है, जबकि बाकी 85 लाख रुपये संपत्ति के संभावित खरीदार के जरिए जमा किए जाने हैं।
अदालत ने यह भी संकेत दिया है कि भुगतान नहीं होने की स्थिति में राजपाल यादव के लिए मुश्किलें बढ़ सकती हैं। सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि अपील में सजा बढ़ाने का अधिकार भी उसके पास है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, कोर्ट ने सजा को दो साल तक बढ़ाए जाने की संभावना का भी उल्लेख किया।
इसलिए 7 अक्टूबर की सुनवाई में भले ही राजपाल यादव और CJI सूर्यकांत के बीच फिल्म को लेकर कुछ हल्के-फुल्के पल देखने को मिले, लेकिन मामले का कानूनी पक्ष बेहद गंभीर बना हुआ है।
16 साल पुराने इस विवाद में अब अदालत की नजर सबसे पहले तय भुगतान पर है। राजपाल यादव की ‘16 सावन झेल के’ वाली टिप्पणी सुनवाई का यादगार हिस्सा जरूर बन गई, लेकिन आगे की कानूनी राहत इस बात पर निर्भर करेगी कि 13 अक्टूबर तक अदालत के निर्देश के मुताबिक 2 करोड़ रुपये जमा किए जाते हैं या नहीं।



