Sunday, 02 August 2026
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क्रिप्टो पर टैक्स नीति की विफलता: अनुपालन के बजाय ऑफशोर पलायन क्यों बढ़ा?

ऑफशोर एक्सचेंजों की ओर यूजर्स का झुकाव, सरकार को राजस्व और निगरानी—दोनों में नुकसान

नई दिल्ली: केंद्र सरकार ने दिसंबर 2025 में लोकसभा में पूछे गए एक सवाल के जवाब में पहली बार यह स्वीकार किया कि भारतीय यूजर्स को सेवाएं प्रदान करने वाले कुछ ऑफशोर क्रिप्टो एक्सचेंज आयकर कानून के तहत टीडीएस प्रावधानों का पालन नहीं कर रहे हैं। यह बयान ऐसे समय आया है, जब 2022 के बजट में क्रिप्टो ट्रांजैक्शन पर 1% टीडीएस लागू हुए लगभग चार साल बीत चुके हैं। तब सरकार ने इसे निगरानी तंत्र को मजबूत करने और क्रिप्टो निवेश को नियंत्रित करने का कदम बताया था, लेकिन अब यह साफ हो रहा है कि नीति न केवल विफल रही बल्कि इसके प्रतिकूल प्रभाव भी सामने आए हैं।

उपलब्ध आंकड़े बताते हैं कि टीडीएस लागू होने के बाद बड़ी संख्या में भारतीय यूजर्स उन ऑफशोर एक्सचेंजों की ओर शिफ्ट हो गए, जो टीडीएस नहीं काटते थे। एक हालिया अध्ययन के मुताबिक, टैक्स अधिकारियों को करीब 11,000 करोड़ रुपए के टीडीएस का नुकसान हुआ है, जबकि अक्टूबर 2024 से 2025 के बीच भारतीय यूजर्स ने ऑफशोर प्लेटफॉर्म्स पर लगभग 5 लाख करोड़ रुपए का ट्रेडिंग वॉल्यूम पैदा किया। इससे पहले एस्या सेंटर और नेशनल एकेडमी ऑफ लीगल स्टडीज एंड रिसर्च के सेंटर फॉर टैक्स लॉज़ की रिपोर्ट्स में भी यही रुझान सामने आया था। इन अध्ययनों की सबसे अहम बात यह रही कि 2022 में टीडीएस लागू होने के बाद भारत का लगभग 90% क्रिप्टो ट्रेडिंग वॉल्यूम देश से बाहर शिफ्ट हो गया।

ये आंकड़े साफ तौर पर दिखाते हैं कि टीडीएस क्रिप्टो निवेश को रोकने में नाकाम रहा। उल्टा, इसने भारतीय नियमों का पालन करने वाले घरेलू एक्सचेंजों से यूजर्स को दूर कर दिया और उन्हें उन ऑफशोर प्लेटफॉर्म्स की ओर धकेल दिया, जो न तो टीडीएस काटते हैं और न ही लेनदेन की रिपोर्टिंग करते हैं। इससे सरकार की ट्रेडिंग गतिविधियों पर नजर रखने की क्षमता भी कमजोर पड़ी। मनी लॉन्ड्रिंग रोकथाम कानून के तहत पंजीकरण न कराने के चलते सरकार ने कुछ ऐसे प्लेटफॉर्म्स को ब्लॉक भी किया। हालांकि, इनमें से कुछ एक्सचेंज बाद में जुर्माना भरकर और FIU-India में रजिस्ट्रेशन कराकर वापस लौट आए, लेकिन वे अब भी टैक्स ढांचे से बाहर ही काम कर रहे हैं। नतीजतन, भारत में क्रिप्टो सर्विस प्रोवाइडर्स की दो अलग-अलग श्रेणियां बन चुकी हैं।

ऑफशोर प्लेटफॉर्म्स न तो भारत में भौतिक रूप से मौजूद हैं और न ही उनकी कार्यप्रणाली में पर्याप्त पारदर्शिता है। इससे सरकार की निगरानी और नियंत्रण की क्षमता बेहद सीमित हो जाती है। यही कारण है कि कई ऐसे एक्सचेंज अवैध लेनदेन के लिए इस्तेमाल होते रहे हैं। इस तरह का रेगुलेटरी आर्बिट्राज न सिर्फ यूजर्स को घरेलू एक्सचेंजों से दूर कर रहा है, बल्कि सरकार की निगरानी व्यवस्था को भी कमजोर कर रहा है।

सरकार लगातार यह कहती रही है कि वर्चुअल डिजिटल एसेट सेक्टर का प्रभावी नियमन अंतरराष्ट्रीय सहयोग के बिना संभव नहीं है। लेकिन मौजूदा हालात में इस नियामक खालीपन का नुकसान सभी को हो रहा है। नियमों का पालन करने वाले भारतीय कारोबार यूजर्स खो रहे हैं, सरकार को राजस्व और नियंत्रण दोनों में नुकसान हो रहा है, और भारतीय यूजर्स ऐसे हाई-रिस्क प्लेटफॉर्म्स के संपर्क में आ रहे हैं, जहां न तो उपभोक्ता सुरक्षा है और न ही शिकायत निवारण की ठोस व्यवस्था। दुनिया में सबसे ज्यादा क्रिप्टो यूजर्स भारत में हैं, ऐसे में उनके हितों की रक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। मौजूदा स्थिति, जिसमें जोखिम ज्यादा और सुरक्षा के उपाय बेहद सीमित हैं, लंबे समय तक टिकाऊ नहीं है।

ऑफशोर एक्सचेंजों के नियमन से बाहर होने की सरकारी स्वीकारोक्ति एक सकारात्मक कदम जरूर है और इससे यह संकेत मिलता है कि सेक्टर पर अब ज्यादा बारीकी से नजर रखी जा रही है। लेकिन सिर्फ स्वीकार करना काफी नहीं है। सरकार को अब यह सुनिश्चित करना होगा कि भारतीय यूजर्स को सेवाएं देने वाले सभी क्रिप्टो एक्सचेंजों पर समान अनुपालन नियम लागू हों, चाहे वे देश में स्थित हों या विदेश में। ऐसा करने से रेगुलेटरी आर्बिट्राज खत्म होगा, प्रतिस्पर्धा का असंतुलन दूर होगा, टैक्स बेस बढ़ेगा, राजस्व संग्रह सुधरेगा और निगरानी व्यवस्था मजबूत होगी। अंततः यही कदम उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा करेंगे और देश के व्यापक आर्थिक व नियामक उद्देश्यों को पूरा करने में मददगार साबित होंगे।

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BN

Bureau NOTD

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NOTD News के लिए नियमित रूप से समाचार लिखते हैं।

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