Thursday, 05 November 2026
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एक ऐसी फिल्म जो बनी सेंसर बोर्ड के लिए सिर दर्द, जाने 607 मिनट लंबी सबसे अनोखी डॉक्यूमेंट्री ‘Paint Drying’ की कहानी

फिल्मी जगत में कुछ फिल्में मनोरंजन से हटकर किसी संस्था से जुड़ी नाकामियों और खोखले नियमों पर सवाल उठाने के लिए बनाई जाती हैं। आज जानते हैं ब्रिटिश सेंसर बोर्ड के नियमों के विरोध में बनी 10 घंटे लंबी फिल्म ‘Paint Drying’ की कहानी।

अक्सर फिल्मों की दुनिया में रोमांस, एक्शन, थ्रिलर, साइंस फिक्शन और यहां तक कि बिना संवाद वाली फिल्मों के बारे में भी बात होती है। लेकिन क्या आपने कभी ऐसी फिल्म के बारे में सुना है जिसमें पूरे 10 घंटे तक सिर्फ एक दीवार पर लगा पेंट सूखता हुआ दिखाई देता हो? सुनने में यह एक मजाक  लग सकता है, लेकिन यह पूरी तरह सच है।

साल 2016 में ब्रिटेन के फिल्म निर्माता चार्ली लाइन (Charlie Lyne अब Charlie Shackleton) ने एक ऐसी डॉक्यूमेंट्री बनाई, जिसमें न कोई कहानी थी, न कोई अभिनेता, न कोई संवाद और न ही कोई संगीत। पूरी फिल्म में सिर्फ एक ही दृश्य दिखाई देता है, ईंटों की दीवार पर सफेद पेंट का धीरे-धीरे सूखना। इस डॉक्यूमेंट्री का नाम था “Paint Drying”.

पहली नजर में यह एक अजीब प्रयोग लग सकता है, लेकिन इसके पीछे एक बड़ा संदेश छिपा था, जिसने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया।

आखिर क्यों बनाई गई थी Paint Drying?

आपको जानकर हैरानी होगी कि इस फिल्म का उद्देश्य मनोरंजन करना नहीं था। इसे ब्रिटेन की फिल्म वर्गीकरण संस्था British Board of Film Classification (BBFC) के नियमों के खिलाफ एक प्रतीकात्मक विरोध के उद्देश्य से बनाया गया था।

ब्रिटेन में किसी भी फिल्म को सार्वजनिक रूप से सिनेमाघरों में दिखाने से पहले उसे BBFC से Certification प्राप्त करना पड़ता है। इसके लिए फिल्म निर्माताओं को शुल्क देना होता है, जो फिल्म की लंबाई के अनुसार बढ़ता जाता है। कई स्वतंत्र फिल्म निर्माताओं का मानना था कि यह प्रक्रिया छोटे बजट की फिल्मों के लिए महंगी साबित होती है।

नए फिल्म निर्माता जिन्हें किसी बड़ी निर्माता कंपनियों का सहयोग प्राप्त नहीं है, उनके लिए अपनी स्वतंत्र फिल्म के लिए Certificate प्राप्त करना बेहद कठिन है। चार्ली लाइन ने इसी व्यवस्था पर सवाल उठाने के लिए ऐसा तरीका चुना, जिसकी शायद किसी ने कल्पना भी नहीं की थी।

एक विरोध जिसने दुनिया को चौंका दिया

फिल्म निर्माता ने फैसला किया कि वह ऐसी फिल्म बनाएंगे जिसे BBFC के अधिकारियों को मजबूरी में पूरी देखनी पड़े। इसके लिए उन्होंने एक दीवार पर सफेद पेंट लगाया और उसके सूखने की प्रक्रिया को कैमरे में रिकॉर्ड करना शुरू कर दिया।

उन्होंने लगभग 14 घंटे का फुटेज शूट किया। बाद में उसमें से 607 मिनट यानी 10 घंटे 7 मिनट की फिल्म तैयार की गई। फिल्म में कोई कट, कोई ड्रामा और कोई विशेष दृश्य नहीं था। केवल एक स्थिर कैमरा और धीरे-धीरे सूखता हुआ पेंट।

क्राउडफंडिंग के जरिए जुटाए हजारों पाउंड

फिल्म बनाना एक बात थी, लेकिन उसे BBFC के पास जमा कराने के लिए शुल्क भी देना था। इसके लिए चार्ली लाइन ने Kickstarter पर एक क्राउडफंडिंग अभियान शुरू किया।

शुरुआत में उनका लक्ष्य केवल प्रतीकात्मक रूप से एक मिनट की फिल्म जमा कराने का था, लेकिन अभियान को अप्रत्याशित समर्थन मिला। सैकड़ों लोगों ने आर्थिक सहायता दी और लगभग 5,936 पाउंड (लगभग 7.50 लाख रुपये) जुटाए गए। इस धनराशि का उपयोग फिल्म को आधिकारिक प्रमाणन के लिए जमा कराने में किया गया।

जब सेंसर अधिकारियों को 10 घंटे तक देखना पड़ा पेंट

फिल्म जमा होने के बाद BBFC के अधिकारियों के सामने एक बड़ी ही दुविधाजनक स्थिति पैदा हो गई। नियमों के अनुसार किसी भी फिल्म को प्रमाणित करने से पहले उसकी पूरी सामग्री देखना आवश्यक होता है। इसका मतलब साफ था कि बोर्ड से जुड़े अधिकारियों को “Paint Drying” के सभी 607 मिनट देखने पड़ेंगे।

रिपोर्टों के अनुसार, BBFC के दो परीक्षकों ने फिल्म को दो दिनों में देखा क्योंकि एक दिन में 9 घंटे से अधिक सामग्री देखने की अनुमति नहीं थी। यानी एक तरह से फिल्म निर्माता चार्ली लाइन अपने उद्देश्य में सफल रहे। उन्होंने सेंसर बोर्ड को सचमुच 10 घंटे तक पेंट सूखते हुए देखने पर मजबूर कर दिया।

क्या था फिल्म का कंटेंट?

यदि कोई यह सोच रहा है कि शायद फिल्म में कहीं कोई छिपा हुआ संदेश, कहानी या अचानक कोई चौंकाने वाला दृश्य होगा, तो ऐसा नहीं था। BBFC के आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार फिल्म में वास्तव में केवल दीवार पर पेंट सूखता हुआ दिखाया गया था। बोर्ड ने अपने फिल्म देखने के बाद अपने मूल्यांकन में लिखा कि इसमें ऐसा कोई तत्व नहीं है जो किसी दर्शक को नुकसान पहुंचाए या आपत्तिजनक लगे।

फिल्म को मिला ‘U’ सर्टिफिकेट

फिल्म देखने के बाद BBFC ने “Paint Drying” को ‘U’ (Universal) प्रमाणपत्र दिया। इसका अर्थ है कि फिल्म सभी आयु वर्ग के दर्शकों के लिए उपयुक्त मानी गई। यह अपने आप में एक दिलचस्प घटना थी। दुनिया की सबसे उबाऊ कही जाने वाली फिल्मों में से एक को आधिकारिक रूप से ऐसा प्रमाणपत्र मिला जो बच्चों सहित सभी लोगों के लिए उपयुक्त माना गया। इस डॉक्यूमेंट्री को IMDB पर 1600 से अधिक लोगों ने 8.9 की रेटिंग दी है। फिल्म को यू-ट्यूब पर भी अपलोड किया गया है, जहां से दर्शक इसे आसानी से देख सकते हैं।

सोशल मीडिया पर छाई रही यह खबर

जब यह खबर सामने आई कि ब्रिटिश सेंसर बोर्ड के अधिकारियों ने दो दिन तक बैठकर पेंट सूखते हुए देखा, तो सोशल मीडिया पर लोगों ने इसे लेकर खूब चर्चा हुई और उनका मजाक भी उड़ाया गया। कई लोगों ने इसे रचनात्मक विरोध का शानदार उदाहरण बताया, जबकि कुछ लोगों ने इसे सरकारी व्यवस्था के खिलाफ एक व्यंग्यात्मक प्रदर्शन कहा। इंटरनेट पर हजारों लोगों ने इस प्रयोग की प्रशंसा की और इसे फिल्म इतिहास की सबसे अनोखी फिल्मों में से एक बताया।

क्या ‘Paint Drying’ दुनिया की सबसे लंबी फिल्म है?

कई लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि क्या Paint Drying दुनिया की सबसे लंबी फिल्म है? तो इसका जवाब है, नहीं। आपको बता दें कि दुनिया की सबसे लंबी फिल्म 2012 में बनी स्वीडिश प्रायोगिक फिल्म “लॉजिस्टिक्स” है। इस फिल्म की लंबाई 857 घंटे यानी लगभग 35 दिन और 17 घंटे है। फिल्म का निर्माण एरिका मैग्नसन और डैनियल एंडरसन ने किया था।

हालांकि Piant Drying की 607 मिनट की अवधि किसी भी सामान्य फिल्म से कई गुना अधिक है। यही लंबाई इस प्रोजेक्ट को खास बनाती है क्योंकि इसका उद्देश्य मनोरंजन नहीं बल्कि एक व्यवस्था पर सवाल उठाना था।

फिल्म जगत में क्यों महत्वपूर्ण मानी जाती है Paint Drying?

फिल्म समीक्षकों के अनुसार “Paint Drying” को पारंपरिक फिल्म की तरह नहीं देखा जाना चाहिए। इसे एक प्रोटेस्ट फिल्म (Protest Film) या कॉन्सेप्चुअल आर्ट प्रोजेक्ट के रूप में समझना अधिक उचित है।

इस फिल्म ने यह बहस छेड़ी कि क्या स्वतंत्र फिल्म निर्माताओं पर लगाए जाने वाले प्रमाणन शुल्क उचित हैं और क्या छोटे कलाकारों के लिए फिल्म उद्योग में प्रवेश पर्याप्त रूप से आसान है।

“Paint Drying” को कई लोग कला, व्यंग्य और सामाजिक टिप्पणी का मिश्रण मानते हैं। यह फिल्म दर्शाती है कि सिनेमा केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं है, बल्कि सामाजिक और संस्थागत मुद्दों पर सवाल उठाने का भी एक प्रभावी तरीका है।

चार्ली लाइन का यह प्रयोग भले ही देखने में बेहद साधारण लगे, लेकिन इसने दुनिया भर में सेंसरशिप, रचनात्मक स्वतंत्रता और फिल्म उद्योग की आर्थिक चुनौतियों पर चर्चा को नई दिशा दी।

ये भी पढ़ें :- विवाद के बीच ‘पेड्डी’ मेकर्स का यू-टर्न, जान्हवी कपूर के दृश्यों को किया जाएगा एडिट

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MD Faijan

लेखक

मोहम्मद फैजान न्यूज़ ऑफ द डे में पत्रकार हैं, जहाँ वे खेल, मनोरंजन, राजनीति और अंतरराष्ट्रीय मामलों को कवर करते हैं। इससे पहले वे यूट्यूब चैनल स्पोर्ट्स यारी में सोशल मीडिया एग्जीक्यूटिव के रूप में कार्य कर चुके हैं, जहाँ उन्होंने डिजिटल कंटेंट मैनेजमेंट और ऑडियंस एंगेजमेंट का व्यावहारिक अनुभव प्राप्त किया। भारत के छत्तीसगढ़ राज्य के कोरिया जिले से संबंध रखने वाले फैजान आधुनिक मीडिया कार्यप्रणालियों की अच्छी समझ रखते हैं और कहानी कहने के विभिन्न रूपों में गहरी रुचि रखते हैं।

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