Tuesday, 29 September 2026
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PM Modi-Putin Talks: ब्रिक्स से पहले मोदी-पुतिन की मुलाकात, तेल से लेकर एसयू-57 तक कई मुद्दों पर होगी अहम बातचीत

मोदी-पुतिन बातचीत में रूसी कच्चे तेल का मुद्दा अहम हो सकता है। जानिए भारत की रूस से बढ़ती तेल खरीद, पश्चिमी प्रतिबंधों के दबाव और ऊर्जा सुरक्षा के बीच नई दिल्ली के सामने क्या चुनौतियां हैं।

नई दिल्ली: राष्ट्रीय राजधानी नई दिल्ली में होने वाले 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से पहले भारत और रूस के रिश्तों की दिशा तय करने वाली एक अहम मुलाकात होने जा रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन शुक्रवार को द्विपक्षीय बातचीत करेंगे।

क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने इस बात की पुष्टि की है। दोनों नेताओं की यह बैठक ऐसे समय हो रही है, जब भारत-रूस संबंध एक तरफ व्यापार, ऊर्जा और रक्षा के मोर्चे पर लगातार मजबूत हो रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिमी प्रतिबंधों और रूसी तेल की खरीद को लेकर भारत पर अंतरराष्ट्रीय दबाव भी बना हुआ है।

यह मुलाकात इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत इस समय ब्रिक्स की अध्यक्षता कर रहा है और 12-13 सितंबर को नई दिल्ली के भारत मंडपम में अठारहवें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेजबानी करेगा। विदेश मंत्रालय के अनुसार, भारत की 2026 की ब्रिक्स अध्यक्षता का विषय ‘लचीलेपन, नवाचार और सहयोग के लिए निर्माण’ रखा गया है।

ऐसे में मोदी-पुतिन बैठक केवल दो देशों के बीच नियमित बातचीत नहीं होगी, बल्कि इसके जरिए भारत अपनी रणनीतिक स्वायत्तता, ऊर्जा सुरक्षा और रूस के साथ दीर्घकालिक साझेदारी का संदेश भी देगा।

शुक्रवार की मुलाकात में किन मुद्दों पर होगी चर्चा?

क्रेमलिन के अनुसार, मोदी और पुतिन की बातचीत में द्विपक्षीय व्यापार और आर्थिक सहयोग प्रमुख मुद्दों में रहेंगे। इसके साथ रक्षा सहयोग, ऊर्जा, परमाणु परियोजनाओं और पश्चिमी प्रतिबंधों के असर पर भी चर्चा की संभावना है। रूस की पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान ‘एसयू-57’ को लेकर सहयोग भी संभावित एजेंडे में है।

भारत और रूस लंबे समय से रक्षा क्षेत्र में साझेदार रहे हैं। हालांकि पिछले कुछ वर्षों में दोनों देशों का रक्षा सहयोग केवल तैयार हथियार खरीदने तक सीमित रखने के बजाय संयुक्त अनुसंधान, तकनीक हस्तांतरण, सह-विकास और भारत में उत्पादन की दिशा में आगे बढ़ाने पर जोर दिया गया है।

दिसंबर 2025 में हुई भारत-रूस वार्षिक शिखर बैठक के संयुक्त बयान में दोनों देशों ने उन्नत रक्षा तकनीक और प्रणालियों में संयुक्त अनुसंधान, सह-विकास और सह-उत्पादन को बढ़ाने पर जोर दिया था।

एसयू-57 पर क्यों टिकी हैं निगाहें?

मोदी-पुतिन बैठक से पहले सबसे ज्यादा चर्चा रूस के एसयू-57 लड़ाकू विमान को लेकर हो रही है। यह रूस का पांचवीं पीढ़ी का लड़ाकू विमान है और इसे लेकर भारत और रूस के बीच सहयोग की संभावनाएं फिर चर्चा में हैं।

भारत लंबे समय से अपनी वायुसेना की लड़ाकू क्षमता को आधुनिक बनाने और स्वदेशी उत्पादन बढ़ाने पर काम कर रहा है। ऐसे में रूस की ओर से एसयू-57 से जुड़ी तकनीक, संभावित स्थानीय उत्पादन और औद्योगिक सहयोग की पेशकश भारत के लिए महत्वपूर्ण हो सकती है।

परमाणु ऊर्जा सहयोग भी अहम

भारत और रूस के बीच परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में सहयोग भी लंबे समय से रणनीतिक रिश्तों का महत्वपूर्ण हिस्सा है। रूस ने भारत में कुडनकुलम परमाणु ऊर्जा परियोजना के विकास में अहम भूमिका निभाई है।

आने वाले वर्षों में भारत की ऊर्जा जरूरतों को देखते हुए परमाणु ऊर्जा का महत्व बढ़ने वाला है। ऐसे में दोनों देश परमाणु ऊर्जा संयंत्रों से जुड़े नए सहयोग और मौजूदा परियोजनाओं को आगे बढ़ाने पर विचार कर सकते हैं। मोदी-पुतिन बैठक के संभावित एजेंडे में परमाणु ऊर्जा संयंत्रों से जुड़े संयुक्त प्रोजेक्ट भी शामिल बताए जा रहे हैं।

यह सहयोग भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से भी महत्वपूर्ण है। भारत एक ओर सौर और पवन ऊर्जा जैसे नवीकरणीय स्रोतों का विस्तार कर रहा है, वहीं दूसरी ओर परमाणु ऊर्जा को कम-कार्बन वाले स्थिर ऊर्जा स्रोत के रूप में बढ़ाने की कोशिश कर रहा है।

रूसी तेल पर भी हो सकती है चर्चा

मोदी-पुतिन बातचीत के दौरान ऊर्जा क्षेत्र पर सबसे ज्यादा ध्यान रूसी कच्चे तेल पर रह सकता है।

यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों के कारण रूस ने अपने तेल की बिक्री के लिए एशियाई बाजारों का रुख बढ़ाया। भारत ने भी बड़ी मात्रा में रूसी कच्चा तेल खरीदा। इससे दोनों देशों के बीच व्यापार तेजी से बढ़ा।

इस साल भारत की रूसी तेल पर निर्भरता एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। अगस्त 2026 की एक रिपोर्ट के अनुसार, रूस भारत को कच्चे तेल की आपूर्ति करने वाला सबसे बड़ा स्रोत बन गया था और भारत के कुल तेल आयात में उसकी हिस्सेदारी आधे से अधिक तक पहुंच गई थी।

हालांकि यह स्थिति भारत को अमेरिकी प्रतिबंधों और पश्चिमी दबाव के बीच मुश्किल संतुलन की स्थिति में भी रखती है।

भारत का तर्क लगातार यह रहा है कि उसकी ऊर्जा खरीद का फैसला राष्ट्रीय हित, ऊर्जा सुरक्षा और भारतीय उपभोक्ताओं की जरूरतों को ध्यान में रखकर किया जाता है। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने हाल में भी कहा है कि रूस-यूक्रेन युद्ध का समाधान तेल खरीदने वाले देशों पर बहस से नहीं, बल्कि संवाद और कूटनीति से निकलेगा।

अमेरिकी प्रतिबंधों का मंडराता साया

मोदी-पुतिन वार्ता ऐसे समय हो रही है जब रूस के साथ व्यापार करने वाले देशों पर अमेरिकी और पश्चिमी प्रतिबंधों का दबाव बना हुआ है।

भारत के लिए चुनौती यह है कि उसे एक तरफ रूस के साथ अपने दशकों पुराने रणनीतिक संबंधों को बनाए रखना है, तो दूसरी तरफ अमेरिका और यूरोप के साथ अपने आर्थिक, तकनीकी और रणनीतिक रिश्तों को भी आगे बढ़ाना है।

नई दिल्ली ने इसी को अपनी रणनीतिक स्वायत्तता की नीति के रूप में आगे रखा है। भारत किसी एक शक्ति समूह के साथ पूरी तरह जुड़ने के बजाय अलग-अलग देशों के साथ अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर संबंध बनाए रखने की कोशिश करता है।

व्यापार में तेजी, लेकिन असंतुलन बड़ी चुनौती

भारत और रूस के बीच व्यापार पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बढ़ा है। विदेश मंत्रालय के भारत-रूस संबंधों पर जारी दस्तावेज के अनुसार, दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार 2024-25 में रिकॉर्ड 68.7 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुंचा। 2025-26 में यह करीब 59.863 अरब डॉलर रहा।

लेकिन व्यापार बढ़ने के साथ एक बड़ी समस्या भी सामने आई है—दोनों देशों के बीच व्यापार संतुलन।

भारत रूस से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल, उर्वरक और अन्य वस्तुएं खरीदता है, जबकि रूस को भारत का निर्यात तुलनात्मक रूप से काफी कम है। इसलिए दोनों देश लंबे समय से भारतीय निर्यात बढ़ाने और व्यापार को अधिक संतुलित बनाने के उपाय तलाश रहे हैं।

दिसंबर 2025 की वार्षिक शिखर बैठक में दोनों देशों ने व्यापार और निवेश सहयोग को बढ़ाने के साथ आर्थिक संबंधों को और व्यापक बनाने की दिशा में काम करने पर जोर दिया था।

रुपये-रूबल में कारोबार से क्या बदला?

भारत और रूस के बीच भुगतान व्यवस्था भी हाल के वर्षों में महत्वपूर्ण मुद्दा रही है। पश्चिमी वित्तीय प्रतिबंधों के कारण दोनों देशों को वैकल्पिक भुगतान तंत्र विकसित करने की जरूरत पड़ी।

सितंबर 2026 की एक रिपोर्ट के अनुसार, रूस और भारत के बीच स्थानीय मुद्राओं यानी रुपये और रूबल के इस्तेमाल पर आधारित भुगतान व्यवस्था अब द्विपक्षीय व्यापार के करीब 96 प्रतिशत हिस्से को सुविधा दे रही है। रूस के एक वरिष्ठ बैंक अधिकारी के अनुसार, 22 रूसी और 17 भारतीय बैंक इस व्यवस्था में शामिल हैं।

यह व्यवस्था दोनों देशों के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे तीसरी मुद्रा और पश्चिमी वित्तीय ढांचे पर निर्भरता कम करने में मदद मिलती है।

क्रेमलिन ने भी हाल में कहा है कि रूस किसी खास मुद्रा से पूरी तरह बाहर निकलने की नीति नहीं अपना रहा और स्वीकार्य भुगतान माध्यमों के लिए खुला है।

क्या यूक्रेन युद्ध पर भी होगी चर्चा?

मोदी-पुतिन बैठक में यूक्रेन युद्ध भी स्वाभाविक रूप से महत्वपूर्ण विषय हो सकता है।

भारत ने शुरुआत से ही इस संघर्ष का समाधान बातचीत और कूटनीति के माध्यम से करने की वकालत की है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कई मौकों पर कह चुके हैं कि युद्ध के दौर में संवाद और कूटनीति ही आगे बढ़ने का रास्ता है।

हाल में विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने भी रूस और यूक्रेन दोनों के साथ बातचीत के जरिए संघर्ष समाप्त करने की संभावनाओं पर भारत के प्रयासों की बात कही है।

भारत रूस की आलोचना करने वाले पश्चिमी देशों की तरह कठोर रुख अपनाने से बचता रहा है। साथ ही नई दिल्ली ने यूक्रेन में युद्ध समाप्त करने और कूटनीतिक समाधान खोजने की जरूरत पर भी जोर दिया है।

इसलिए मोदी-पुतिन बातचीत में युद्ध की स्थिति, शांति प्रयास और बदलती वैश्विक राजनीति पर विचार-विमर्श की संभावना महत्वपूर्ण है।

ब्रिक्स के मंच पर क्या होगा?

भारत 12 और 13 सितंबर को नई दिल्ली में अठारहवें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेजबानी करेगा। बैठक भारत मंडपम में होगी।

भारत की अध्यक्षता का जोर लचीलेपन, नवाचार और सहयोग पर है। ब्रिक्स अब केवल ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका तक सीमित समूह नहीं रहा है। इसके विस्तार के बाद इसमें कई अन्य प्रमुख उभरती अर्थव्यवस्थाएं भी शामिल हुई हैं।

ऐसे में भारत के लिए इस मंच का महत्व बढ़ गया है। नई दिल्ली ब्रिक्स के माध्यम से वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में विकासशील और उभरती अर्थव्यवस्थाओं की भूमिका मजबूत करने, बहुपक्षीय संस्थाओं में सुधार, वित्तीय सहयोग और वैश्विक दक्षिण की आवाज को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहा है।

मोदी-पुतिन बैठक इस व्यापक ब्रिक्स एजेंडे के लिए भी जमीन तैयार कर सकती है।

आर्कटिक और नॉर्दर्न सी रूट पर भी नजर

भारत और रूस के बीच सहयोग का एक नया क्षेत्र आर्कटिक क्षेत्र भी बन रहा है। दोनों देश आर्कटिक में संसाधनों, ऊर्जा और परिवहन से जुड़े अवसरों पर बातचीत बढ़ा रहे हैं।

Northern Sea Root (उत्तरी समुद्री मार्ग) को लेकर भी दोनों देशों के बीच सहयोग की संभावनाएं हैं। यह मार्ग यूरोप और एशिया के बीच समुद्री परिवहन के लिए रणनीतिक महत्व रखता है।

दिसंबर 2025 की भारत-रूस वार्षिक शिखर बैठक में दोनों देशों ने रूसी सुदूर पूर्व और आर्कटिक क्षेत्र में व्यापार तथा निवेश सहयोग बढ़ाने और उत्तरी समुद्री मार्ग से जुड़े सहयोग को आगे बढ़ाने की प्रतिबद्धता जताई थी।

भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्या है?

रूस के साथ संबंध मजबूत होने के बावजूद भारत के सामने कई चुनौतियां हैं। इनमें सबसे बड़ी चुनौती व्यापार में असंतुलन, प्रतिबंधों का जोखिम और रूस के साथ ऊर्जा संबंधों को लेकर पश्चिमी देशों का दबाव है।

दूसरी ओर भारत को रक्षा क्षेत्र में रूस पर अपनी पारंपरिक निर्भरता को धीरे-धीरे कम करते हुए स्वदेशी उत्पादन और अलग-अलग देशों से तकनीकी साझेदारी बढ़ानी है।

इसके बावजूद रूस भारत के लिए महत्वपूर्ण बना हुआ है क्योंकि दोनों देशों के बीच दशकों से रक्षा और रणनीतिक सहयोग की मजबूत नींव मौजूद है।

कुल मिलाकर नई दिल्ली में होने वाला ब्रिक्स शिखर सम्मेलन इस पूरी तस्वीर को और व्यापक बनाएगा। एक तरफ भारत वैश्विक दक्षिण की आवाज को मजबूत करने की कोशिश करेगा, तो दूसरी तरफ मोदी-पुतिन वार्ता यह संदेश देगी कि बदलती विश्व व्यवस्था में भारत अपने पुराने रणनीतिक साझेदारों के साथ संबंधों को अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर आगे बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध है।

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MD Faijan

लेखक

मोहम्मद फैजान न्यूज़ ऑफ द डे में पत्रकार हैं, जहाँ वे खेल, मनोरंजन, राजनीति और अंतरराष्ट्रीय मामलों को कवर करते हैं। इससे पहले वे यूट्यूब चैनल स्पोर्ट्स यारी में सोशल मीडिया एग्जीक्यूटिव के रूप में कार्य कर चुके हैं, जहाँ उन्होंने डिजिटल कंटेंट मैनेजमेंट और ऑडियंस एंगेजमेंट का व्यावहारिक अनुभव प्राप्त किया। भारत के छत्तीसगढ़ राज्य के कोरिया जिले से संबंध रखने वाले फैजान आधुनिक मीडिया कार्यप्रणालियों की अच्छी समझ रखते हैं और कहानी कहने के विभिन्न रूपों में गहरी रुचि रखते हैं।

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