ADHD से जूझने वाला एक बच्चा जो आगे चलकर ओलंपिक इतिहास का सबसे सफल खिलाड़ी बना। जानिए Michael Phelps की प्रेरणादायक कहानी, जिन्होंने 28 ओलंपिक पदक जीतकर इतिहास में अपना नाम दर्ज कराया।
नई दिल्ली: कुछ खिलाड़ी अपने दौर के सर्वश्रेष्ठ होते हैं। कुछ खिलाड़ी रिकॉर्ड बनाते हैं। और कुछ ऐसे होते हैं जो खेल की परिभाषा ही बदल जाती है। ओलंपिक इतिहास में Michael Phelps का नाम इसी तीसरी श्रेणी में आता है।
दुनिया में हजारों एथलीट ओलंपिक तक पहुंचने का सपना देखते हैं। सैकड़ों पदक जीतते हैं। लेकिन केवल एक खिलाड़ी ऐसा है जिसके नाम अकेले 28 ओलंपिक पदक दर्ज हैं। एक ऐसा खिलाड़ी जिसके 23 स्वर्ण पदक किसी भी देश के कुल ओलंपिक पदकों से भी ज्यादा हैं। एक ऐसा तैराक जिसने लगभग डेढ़ दशक तक दुनिया को यह यकीन दिलाया कि पानी में उसकी बराबरी करना लगभग असंभव है।
लेकिन Michael Phelps की कहानी केवल पदकों और विश्व रिकॉर्डों की कहानी नहीं है। यह उस लड़के की कहानी भी है जिसे बचपन में ADHD (Attention Deficit Hyperactivity Disorder) की समस्या थी, जो कक्षा में लंबे समय तक ध्यान केंद्रित नहीं कर पाता था, और जिसे कभी-कभी शिक्षक भी साधारण छात्र नहीं मानते थे। यही लड़का आगे चलकर ओलंपिक इतिहास का सबसे सफल खिलाड़ी बना।
माइकल फेल्प्स आज अपने 41वें जन्मदिन के मौके पर भी खेल जगत में प्रेरणा का प्रतीक बने हुए हैं। उनकी कहानी बताती है कि असाधारण प्रतिभा केवल शारीरिक क्षमता का परिणाम नहीं होती, बल्कि अनुशासन, मानसिक मजबूती और लगातार बेहतर बनने की भूख भी उतनी ही जरूरी होती है।
बाल्टीमोर का वह बच्चा जिसे पानी में मिली पहचान
Michael Fred Phelps II का जन्म 30 जून 1985 को बाल्टीमोर, मैरीलैंड में हुआ। उनके पिता फ्रेड फेल्प्स एक राज्य पुलिस अधिकारी थे जबकि मां डेबी फेल्प्स शिक्षा क्षेत्र से जुड़ी हुई थीं और बाद में स्कूल प्रिंसिपल बनीं।
माइकल परिवार के सबसे छोटे बच्चे थे। उनकी दो बड़ी बहनें हिलेरी और व्हिटनी पहले से तैराकी करती थीं। इन्हीं को देखकर माइकल ने भी स्विमिंग पूल में कदम रखा।
बचपन में उन्हें ADHD का निदान हुआ था। उस समय पढ़ाई के दौरान ध्यान केंद्रित करना उनके लिए बड़ी चुनौती थी। कई बार उन्हें कक्षा में शांत बैठना मुश्किल लगता था। लेकिन स्विमिंग पूल में कहानी बदल जाती थी।
जहां स्कूल में उनका ध्यान भटक जाता था, वहीं पानी में उतरते ही वे घंटों एक ही लक्ष्य पर केंद्रित रह सकते थे। यही गुण आगे चलकर उनकी सबसे बड़ी ताकत बना।

बॉब बोमन का साथ
Michael Phelps के जीवन में सबसे महत्वपूर्ण व्यक्तियों में एक नाम है Bob Bowman. जब माइकल लगभग 11 वर्ष के थे, तब बोमन ने उनकी प्रतिभा को पहचाना। उन्होंने महसूस किया कि यह बच्चा सामान्य तैराक नहीं है।
बोमन बाद में कई इंटरव्यू में कह चुके हैं कि फेल्प्स में सबसे खास बात उसकी जीतने की भूख थी। वह अभ्यास में भी हारना पसंद नहीं करता था।
यहीं से शुरू हुआ एक ऐसा कोच-एथलीट रिश्ता जिसने खेल इतिहास के सबसे बड़े रिकॉर्ड बनाए।
फेल्प्स का प्रशिक्षण बेहद कठोर था। वे सप्ताह के सातों दिन अभ्यास करते थे। कई वर्षों तक उन्होंने छुट्टियां लगभग छोड़ दी थीं। क्रिसमस हो, नया साल हो या जन्मदिन, उनका अधिकतर समय पूल में ही बीतता था।

15 साल की उम्र में ओलंपिक तक पहुंचने का सफर
साल 2000 में सिडनी ओलंपिक के लिए अमेरिकी टीम का चयन हुआ। महज 15 वर्ष की उम्र में Michael Phelps ने टीम में जगह बना ली।
वे 1932 के बाद अमेरिकी पुरुष तैराकी टीम के सबसे युवा ओलंपियन बने। हालांकि सिडनी ओलंपिक में वे कोई पदक नहीं जीत सके। 200 मीटर बटरफ्लाई स्पर्धा में वे पांचवें स्थान पर रहे। लेकिन यह असफलता नहीं थी।
दरअसल दुनिया ने पहली बार उस खिलाड़ी को देखा था जो अगले 16 वर्षों तक ओलंपिक तैराकी पर राज करने वाला था।

पहला विश्व रिकॉर्ड
सिडनी ओलंपिक के एक साल बाद 2001 में माइकल फेल्प्स ने 200 मीटर बटरफ्लाई में विश्व रिकॉर्ड तोड़ दिया। उस समय उनकी उम्र केवल 15 वर्ष थी।
वे इतिहास में सबसे कम उम्र में पुरुष तैराकी विश्व रिकॉर्ड बनाने वाले खिलाड़ी बने। यहीं से रिकॉर्डों का सिलसिला शुरू हुआ।
एथेंस 2004 में दुनिया को मिला नया सुपरस्टार
2004 ओलंपिक ग्रीस की राजधानी एथेंस में आयोजित हुए। फेल्प्स पहली बार ओलंपिक में पदक जीतने के बड़े दावेदार के रूप में पहुंचे।
उन्होंने कुल आठ स्पर्धाओं में हिस्सा लिया और छह स्वर्ण तथा दो कांस्य पदक जीते। उनकी सफलता ने दुनिया को चौंका दिया।
अब उनकी तुलना अमेरिकी तैराकी महानायक मार्क स्पिट्ज से होने लगी, जिन्होंने 1972 म्यूनिख ओलंपिक में सात स्वर्ण पदक जीते थे। लेकिन फेल्प्स के लक्ष्य इससे भी बड़े थे।

फेल्प्स को क्यों है नंबर-2 बनने से नफरत
Michael Phelps की मानसिकता उन्हें बाकी खिलाड़ियों से अलग बनाती थी। उनके करीबी बताते हैं कि उन्हें दूसरे स्थान पर रहना बिल्कुल पसंद नहीं था।
वे सिर्फ जीतना नहीं चाहते थे, बल्कि इतने अंतर से जीतना चाहते थे कि किसी को कोई संदेह न रहे।उनकी तैयारी का एक खास हिस्सा था विज़ुअलाइजेशन।
हर रेस से पहले वे अपनी पूरी प्रतियोगिता दिमाग में कई बार दोहराते थे। कौन-सा मोड़ कब लेना है, आखिरी स्ट्रोक कब लगाना है, फिनिश लाइन तक कितनी तेजी से पहुंचना है। सब कुछ पहले से कल्पना कर लेते थे।
कोच बॉब बोमन का मानना था कि जब फेल्प्स रेस शुरू करते थे, तब तक वे उसे अपने दिमाग में सैकड़ों बार जीत चुके होते थे।
बीजिंग 2008: जब इतिहास ने नया नाम लिखा
अगर किसी एक प्रतियोगिता ने Michael Phelps को अमर बना दिया, तो वह बीजिंग ओलंपिक था। 2008 में चीन की राजधानी बीजिंग में आयोजित खेलों में फेल्प्स ने आठ स्पर्धाओं में हिस्सा लिया।
आपको जानकर शायद हैरानी हो कि उन्होंने सभी आठ में स्वर्ण पदक जीते। यह उपलब्धि पहले कभी किसी एथलीट ने हासिल नहीं की थी। इसके साथ ही उन्होंने मार्क स्पिट्ज के सात स्वर्ण पदकों का रिकॉर्ड तोड़ दिया था।
विशेष रूप से 100 मीटर बटरफ्लाई का फाइनल खेल इतिहास की सबसे रोमांचक रेसों में गिना जाता है। सर्बिया के मिलोराद चाविच लगभग जीत चुके थे।
लेकिन अंतिम क्षणों में फेल्प्स ने अद्भुत वापसी करते हुए केवल 0.01 सेकंड के अंतर से स्वर्ण जीत लिया। यह बीजिंग ओलंपिक का सबसे यादगार क्षण बन गया।

वैज्ञानिकों में भी थी खास दिलचस्पी
Michael Phelps की सफलता ने वैज्ञानिकों का भी ध्यान आकर्षित किया।
विशेषज्ञों ने उनकी शारीरिक संरचना का अध्ययन किया। उनकी लंबाई लगभग 6 फीट 4 इंच थी लेकिन हाथों का फैलाव 6 फीट 7 इंच से अधिक था। उनके पैर सामान्य तैराकों की तुलना में बड़े थे और टखनों में असाधारण लचीलापन था।
इसके अलावा उनके शरीर में पानी के भीतर प्रतिरोध अपेक्षाकृत कम पैदा होता था। हालांकि विशेषज्ञों का निष्कर्ष यही था कि केवल शारीरिक बनावट उनकी सफलता की वजह नहीं थी। असली अंतर उनकी मानसिक तैयारी और अनुशासन ने पैदा किया।
लंदन 2012: सबसे सफल ओलंपियन बनने का क्षण
2012 में लंदन ओलंपिक आयोजित हुए। इस समय तक फेल्प्स पर भारी दबाव था। आलोचकों का मानना था कि उनका सर्वश्रेष्ठ दौर खत्म हो चुका है।
लेकिन उन्होंने चार स्वर्ण और दो रजत पदक जीतकर एक बार फिर दुनिया को गलत साबित कर दिया। इसी ओलंपिक में वे इतिहास के सबसे अधिक पदक जीतने वाले ओलंपियन बने। उन्होंने सोवियत जिमनास्ट लारिसा लैटिनिना का रिकॉर्ड पीछे छोड़ दिया।

पहली बार संन्यास
लंदन ओलंपिक के बाद फेल्प्स ने घोषणा की कि वे संन्यास ले रहे हैं। उन्हें लगता था कि उन्होंने खेल में सब कुछ हासिल कर लिया है। लेकिन खेल से दूरी बनाना उनके लिए आसान नहीं रहा।
संन्यास के बाद माइकल फेल्प्स मानसिक संघर्षों से गुजरने लगे। 2014 में शराब पीकर वाहन चलाने के मामले में उनकी गिरफ्तारी हुई। बाद में उन्होंने स्वीकार किया कि वे अवसाद और मानसिक दबाव से जूझ रहे थे।
उन्होंने कहा कि एक समय ऐसा भी आया जब उन्हें अपने भविष्य को लेकर गंभीर चिंता होने लगी थी। इसी दौर ने उन्हें मानसिक स्वास्थ्य के महत्व को समझाया।
वापसी जिसने दुनिया को चौंका दिया
कई लोगों को लगा था कि उनका करियर समाप्त हो चुका है। लेकिन इस सब के उलट फेल्प्स ने वापसी का फैसला किया। और फिर वही हुआ जो उनके पूरे करियर में होता आया था। उन्होंने फिर से जीतना शुरू कर दिया।
रियो 2016: आखिरी ओलंपिक से जुड़ा स्वर्णिम अध्याय
2016 में ब्राजील के रियो डी जेनेरियो में आयोजित ओलंपिक उनके करियर का अंतिम ओलंपिक साबित हुआ। 31 वर्ष की उम्र में उन्होंने पांच स्वर्ण और एक रजत पदक जीता।
उनकी सबसे चर्चित तस्वीरों में से एक सेमीफाइनल से पहले की है, जिसमें वे प्रतिद्वंद्वी चैड ले क्लोस को घूरते दिखाई देते हैं। यह तस्वीर बाद में “Phelps Face” के नाम से प्रसिद्ध हुई।
उस तस्वीर में वही आक्रामक फोकस दिखाई देता है जिसने उन्हें वर्षों तक नंबर-1 बनाए रखा।

रिकॉर्ड जो आज भी अटूट लगते हैं
अपने करियर के अंत तक Michael Phelps के नाम:
- 28 ओलंपिक पदक
- 23 स्वर्ण
- 3 रजत
- 2 कांस्य
- 39 से अधिक विश्व रिकॉर्ड
- चार ओलंपिक में लगातार पदक जैसे रिकॉर्ड दर्ज हो चुके थे।
कई खेल विशेषज्ञ मानते हैं कि इन रिकॉर्डों को तोड़ना आने वाले दशकों में भी बेहद कठिन रहेगा।
पूल के बाहर की जिंदगी
संन्यास के बाद फेल्प्स केवल खेल हस्ती बनकर नहीं रहे। उन्होंने मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता अभियानों में सक्रिय भूमिका निभाई। वे जल सुरक्षा (Water Safety) कार्यक्रमों से भी जुड़े हैं और बच्चों को तैराकी सीखने के लिए प्रेरित करते हैं।
इसके अलावा Special Olympics और कई सामाजिक अभियानों में भी उनकी भागीदारी रही है।
विरासत जो केवल पदकों से बड़ी है
Michael Phelps की सबसे बड़ी उपलब्धि शायद उनके 23 स्वर्ण पदक भी नहीं हैं। उनकी सबसे बड़ी विरासत यह है कि उन्होंने दुनिया को दिखाया कि महानता प्रतिभा और मेहनत के मेल से बनती है।
एक ADHD से जूझने वाला बच्चा, जिसने पूल में अपनी पहचान खोजी, आगे चलकर इतिहास का सबसे सफल ओलंपियन बना।
30 जून 1985 को बाल्टीमोर में जन्मे उस लड़के ने न केवल तैराकी बदली, बल्कि यह भी साबित किया कि इंसान का असली मुकाबला दूसरों से नहीं, बल्कि खुद से है।
और शायद यही कारण है कि आज, दशकों बाद भी, Michael Phelps का नाम केवल एक तैराक नहीं बल्कि खेल इतिहास की एक जीवित किंवदंती के रूप में लिया जाता है।
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