Sunday, 02 August 2026
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MCD टेंडर शर्तों पर विवाद: 122 लेन का अनुभव मांगा, सिर्फ 2-3 कंपनियां ही क्वालिफाई, राजस्व के नुकसान का खतरा

देशभर में ज्यादातर टोल कॉन्ट्रैक्ट 3-12 महीने के, 2 साल का अनुभव बेहद कठिन, कार्टेल बनने का खतरा

नई दिल्ली: दिल्ली नगर निगम (MCD) द्वारा टोल और एनवायरनमेंट कम्पेनसेशन चार्ज (ECC) वसूली के लिए निकाले गए नए टेंडर की शर्तों ने फिर विवाद खड़ा कर दिया है। इस बार टेंडर में कंपनियों से कम से कम 122 लेन वाले एकल प्रोजेक्ट का लगातार 2 साल का संचालन अनुभव मांगा गया है। समस्या यह है कि देशभर में बहुत कम कंपनियां इस शर्त को पूरा करती हैं। नतीजतन, सिर्फ 2-3 बड़ी कंपनियां ही पात्र होंगी।

टेंडर में क्यों फंसा पेंच

जानकारों का कहना है कि भारत में ज्यादातर टोल कॉन्ट्रैक्ट्स छोटे समयावधि (3 महीने से 1 साल) के लिए दिए जाते हैं। बहुत ही कम मामलों में 2 साल या उससे ज्यादा का अनुभव कंपनियों के पास होता है। इसके अलावा, 122 लेन वाले बड़े प्रोजेक्ट्स भी गिने-चुने ही हैं। उदाहरण के लिए, ईस्टर्न पेरिफेरल एक्सप्रेसवे (141 लेन), वेस्टर्न पेरिफेरल (136 लेन) या आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे (165 लेन)। ऐसे बड़े प्रोजेक्ट्स की संख्या बेहद सीमित है।

यानी इस बार की शर्तों से केवल वही कंपनियां दौड़ में रहेंगी जिनके पास इतना बड़ा अनुभव पहले से है। 2024 में भी ऐसी ही सख्त शर्तों की वजह से सिर्फ सहाकार ग्लोबल लिमिटेड और ईगल इन्फ्रा लिमिटेड ही पात्र हो पाए थे। बाद में इस पर आपत्ति आने के बाद MCD को टेंडर की शर्तें बदलनी पड़ी थीं।

राजस्व पर असर का डर

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर पात्रता शर्तें इसी तरह सीमित रहीं तो सिर्फ 2-3 कंपनियां ही बोली लगाएंगी। इस स्थिति में इनके बीच कार्टेल बनने की संभावना बढ़ जाएगी और ये कंपनियां राजस्व साझा कर न्यूनतम बोली लगा सकती हैं। इसका सीधा नुकसान दिल्ली नगर निगम को होगा। एक अधिकारी ने बताया, “अगर प्रतिस्पर्धा कम होगी तो बोली भी कम आएगी। नतीजतन, MCD को अपेक्षित राजस्व नहीं मिलेगा और नुकसान का बोझ नगर निगम की योजनाओं पर पड़ेगा।”

कंपनियों की आपत्ति

एक कंपनी प्रतिनिधि के अनुसार, “दो साल लगातार 122 लेन का अनुभव मांगना अव्यावहारिक है। ज्यादातर प्रोजेक्ट्स में 3-6 महीने के कॉन्ट्रैक्ट ही दिए जाते हैं। ऐसी शर्तें सिर्फ गिनी-चुनी कंपनियों को ही फायदा पहुंचाती हैं।”

कंपनियों के सुझाव

• अनुभव की अवधि 2 साल से घटाकर 1 साल की जाए।

• लेन की संख्या 122 से घटाकर लगभग 60 की जाए, ताकि ज्यादा कंपनियां पात्र बन सकें।

• प्रतिस्पर्धा बढ़ाने के लिए ज्यादा खिलाड़ियों को मौका दिया जाए, जिससे MCD को भी ज्यादा राजस्व मिले।

आगे क्या

एक इंडस्ट्री एक्सपर्ट के अनुसार, “यह शर्तें बदलना सरकार के राजस्व हित में भी है। ज्यादा कंपनियां बोली में आएंगी तो प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी और MCD को भी उच्चतम राजस्व मिलेगा।”

टेंडर पर फिलहाल बोली की प्रक्रिया चल रही है। अब देखना होगा कि MCD इन आपत्तियों पर गौर करता है या नहीं। अगर शर्तों में बदलाव नहीं हुआ तो बोली केवल 2-3 कंपनियों के बीच सिमट जाएगी और राजस्व के नुकसान का खतरा बढ़ जाएगा।

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BN

Bureau NOTD

लेखक

NOTD News के लिए नियमित रूप से समाचार लिखते हैं।

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