Tuesday, 11 August 2026
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केरल का नाम होगा ‘केरलम’, लोकसभा ने दी मंजूरी! जानिए नाम बदलने के पीछे की पूरी कहानी

लोकसभा ने केरल का नाम ‘केरलम’ करने वाले बिल को मंजूरी दे दी है। आखिर क्यों बदला जा रहा है राज्य का नाम और इसके पीछे क्या है भाषा, इतिहास और पहचान की पूरी कहानी?

तिरुवनंतपुरम/ नई दिल्ली: किसी राज्य का नाम सिर्फ नक्शे पर लिखा हुआ एक शब्द नहीं होता। उसके पीछे भाषा, संस्कृति, इतिहास और उस क्षेत्र की पहचान जुड़ी होती है। अब दक्षिण भारत का केरल भी अपनी आधिकारिक पहचान में एक बड़े बदलाव की ओर बढ़ रहा है।

लोकसभा ने मंगलवार, 11 अगस्त को ‘केरल (अल्टरेशन ऑफ नेम) बिल, 2026’ को मंजूरी दे दी, जिसके जरिए राज्य का नाम ‘केरल’ से बदलकर ‘केरलम’ करने का प्रस्ताव है। हालांकि, लोकसभा से पारित होना इस प्रक्रिया का एक अहम पड़ाव है और नाम परिवर्तन को पूरी तरह लागू होने के लिए संसद की आगे की प्रक्रिया और राष्ट्रपति की मंजूरी जरूरी होगी।

आपके बता दें कि मलयालम भाषा में राज्य को पहले से ही ‘केरलम’ कहा जाता है। ऐसे में इस बदलाव को मुख्य रूप से राज्य के स्थानीय भाषाई और सांस्कृतिक नाम को संवैधानिक पहचान देने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। इसकी मांग भी अचानक नहीं उठी। इसके पीछे संयुक्त केरल की मांग, भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन और पिछले कुछ वर्षों में केरल विधानसभा द्वारा पारित प्रस्तावों की लंबी प्रक्रिया है।

लोकसभा में पास हुआ बिल

केरल का नाम बदलने से जुड़ा बिल सोमवार को लोकसभा में पेश किया गया था और मंगलवार, 11 अगस्त को सदन ने इसे पारित कर दिया। केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने बिल को सदन में आगे बढ़ाया। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को इसे पेश करना था, लेकिन उनकी अनुपस्थिति में नित्यानंद राय ने बिल को आगे बढ़ाया।

लोकसभा में बिल पारित किए जाने के दौरान विपक्षी सांसदों का विरोध और नारेबाजी भी जारी रही। विपक्षी सदस्य केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की सदन में मौजूदगी की मांग कर रहे थे और कई मुद्दों पर सरकार के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे थे। इसी हंगामे के बीच बिल को वॉइस वोट के जरिए पारित किया गया। इस दौरान इस पर विस्तृत बहस नहीं हो सकी।

लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने सदन में लगातार हो रहे व्यवधान पर चिंता भी जताई और सरकार तथा विपक्ष से सदन की कार्यवाही सुचारू रूप से चलाने के लिए रास्ता निकालने की अपील की।

बिल के अहम प्रस्ताव

‘केरल (अल्टरेशन ऑफ नेम) बिल, 2026’ का मुख्य उद्देश्य संविधान में दर्ज राज्य के नाम को ‘Kerala’ से ‘Keralam’ करना है। इसके लिए संविधान की पहली अनुसूची में जरूरी बदलाव किए जाएंगे। बिल में इसके साथ जुड़े आवश्यक संवैधानिक और कानूनी प्रावधानों में भी बदलाव का प्रावधान है।

यानी यह केवल सरकारी बोर्ड, वेबसाइट या दस्तावेजों पर नाम बदलने का प्रशासनिक फैसला नहीं है। राज्य का आधिकारिक संवैधानिक नाम बदलने के लिए संविधान में दर्ज नाम में संशोधन करना होगा। यही वजह है कि इस प्रक्रिया में संसद की भूमिका महत्वपूर्ण है।

क्यों बदला जा रहा है नाम?

इस पूरे मामले की सबसे बड़ी वजह भाषा और स्थानीय पहचान है। मलयालम में राज्य का नाम ‘केरलम’ है, जबकि भारतीय संविधान की पहली अनुसूची में इसका नाम ‘केरल’ दर्ज है।

24 जून 2024 को केरल विधानसभा ने सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पारित करते हुए केंद्र सरकार से राज्य का आधिकारिक नाम ‘केरलम’ करने की मांग की थी। प्रस्ताव में कहा गया था कि राज्य का नाम मलयालम भाषा में ‘केरलम’ है और भाषाई आधार पर राज्यों के गठन की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को देखते हुए संवैधानिक नाम भी इसी रूप में होना चाहिए।

विधानसभा के प्रस्ताव में यह भी उल्लेख किया गया कि स्वतंत्रता आंदोलन के समय से ही मलयालम भाषी लोगों के लिए एक संयुक्त केरल के गठन की मांग रही थी।

सात दशक पुरानी केरल की कहानी

आज जिस क्षेत्र को केरल के नाम से जाना जाता है, उसका आधुनिक राज्य के रूप में गठन 1 नवंबर 1956 को हुआ था। यह राज्य पुनर्गठन के दौर में भाषाई आधार पर बनाए गए राज्यों में शामिल था। केरल सरकार के आधिकारिक पर्यटन विवरण के मुताबिक, आधुनिक केरल के गठन से पहले यह क्षेत्र मुख्य रूप से मालाबार, कोचीन और त्रावणकोर जैसे अलग-अलग प्रशासनिक क्षेत्रों में बंटा हुआ था।

आज के केरल का निर्माण मुख्य रूप से तत्कालीन त्रावणकोर-कोचीन क्षेत्र और मालाबार क्षेत्र के मलयालम भाषी इलाकों को मिलाकर हुआ। केरल लोक सेवा आयोग के आधिकारिक इतिहास के अनुसार, राज्य पुनर्गठन के बाद 1 नवंबर 1956 को केरल राज्य अस्तित्व में आया।

इसी दिन को हर साल केरल पिरवी दिवस के रूप में मनाया जाता है। ‘केरल पिरवी’ का अर्थ है केरल का जन्म। इसलिए 1 नवंबर का दिन राज्य की आधुनिक राजनीतिक और भाषाई पहचान में खास महत्व रखता है।

ऐक्य केरल’ आंदोलन से नाम की मांग तक

केरल के नाम परिवर्तन की मौजूदा मांग को समझने के लिए ऐक्य केरल आंदोलन यानी संयुक्त केरल की ऐतिहासिक मांग को समझना जरूरी है।

स्वतंत्रता से पहले और उसके बाद मलयालम भाषी क्षेत्रों को एक प्रशासनिक इकाई में लाने की मांग उठती रही। मालाबार तत्कालीन मद्रास प्रेसीडेंसी का हिस्सा था, जबकि त्रावणकोर और कोचीन अलग रियासतों के रूप में मौजूद थे। आज का केरल इन्हीं अलग-अलग क्षेत्रों के पुनर्गठन की प्रक्रिया से बना।

इसलिए 2024 के विधानसभा प्रस्ताव में भी इस ऐतिहासिक मांग का उल्लेख किया गया था। राज्य सरकार का तर्क था कि जब आधुनिक केरल की पहचान ही मलयालम भाषा और भाषाई पुनर्गठन से जुड़ी है, तो संवैधानिक नाम भी स्थानीय भाषा में इस्तेमाल होने वाले ‘केरलम’ के अनुरूप होना चाहिए।

पहली बार कब उठा था नाम बदलने का प्रस्ताव?

केरल का नाम बदलने की मांग 2026 में पहली बार नहीं उठी। विधानसभा ने इससे पहले भी इस संबंध में प्रस्ताव पारित किया था।

2023 में केरल विधानसभा ने पहली बार ‘केरलम’ नाम अपनाने के लिए केंद्र से आग्रह किया था। हालांकि, उस प्रस्ताव में तकनीकी खामी के कारण प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी। इसके बाद 24 जून 2024 को विधानसभा ने दोबारा प्रस्ताव पारित किया। इस बार प्रस्ताव को तकनीकी रूप से संशोधित कर केंद्र के पास भेजा गया।

2024 का प्रस्ताव मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने पेश किया था और इसे सदन ने सर्वसम्मति से मंजूरी दी थी। विधानसभा ने केंद्र से संविधान की पहली अनुसूची में ‘Kerala’ की जगह ‘Keralam’ दर्ज करने के लिए कदम उठाने की मांग की थी।

फरवरी 2026 में केंद्र सरकार ने दी मंजूरी

विधानसभा के प्रस्ताव के बाद मामला केंद्र सरकार के पास पहुंचा। लंबे प्रशासनिक और कानूनी विचार-विमर्श के बाद 24 फरवरी 2026 को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने केरल का नाम बदलकर ‘केरलम’ करने के प्रस्ताव को मंजूरी दी।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में यह फैसला लिया गया। सरकार ने कहा कि यह निर्णय राज्य के लोगों की इच्छा और उसकी भाषाई-सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा है।

गृह मंत्रालय ने प्रस्ताव पर कानूनी प्रक्रिया आगे बढ़ाने से पहले कानून मंत्रालय के संबंधित विभागों से राय ली। विधि विभाग और विधायी विभाग, दोनों ने इस प्रस्ताव पर सहमति जताई। इसके बाद ‘केरल (अल्टरेशन ऑफ नेम) बिल, 2026’ की प्रक्रिया आगे बढ़ी।

राष्ट्रपति की भूमिका

राज्य का नाम बदलने के मामले में संविधान का अनुच्छेद 3 महत्वपूर्ण है। इसके तहत संसद को मौजूदा राज्यों के नाम बदलने का अधिकार प्राप्त है। हालांकि, अगर किसी राज्य के नाम या क्षेत्र से जुड़ा बदलाव प्रस्तावित हो तो बिल संसद में पेश करने से पहले राष्ट्रपति की सिफारिश और संबंधित राज्य विधानसभा से उसके विचार लेना संवैधानिक प्रक्रिया का हिस्सा है।

इसी प्रक्रिया के तहत राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने 17 जून 2026 को प्रस्तावित बिल को केरल विधानसभा के पास उसकी राय के लिए भेजा। यह पहली बार था जब केरल विधानसभा को इस तरह का राष्ट्रपति संदर्भ मिला था।

इसके बाद 1 जुलाई 2026 को केरल विधानसभा ने बिल के सभी 10 प्रावधानों को सर्वसम्मति से मंजूरी दे दी। इसमें सत्तारूढ़ एलडीएफ के साथ यूडीएफ और बीजेपी के सदस्यों ने भी बिना आपत्ति के समर्थन किया।

आगे की रणनीति

लोकसभा से बिल पास होना निश्चित तौर पर एक बड़ा संवैधानिक पड़ाव है, लेकिन नाम परिवर्तन की प्रक्रिया अभी पूरी नहीं मानी जाएगी। बिल को संसद के दूसरे सदन यानी राज्यसभा से भी पारित होना होगा। इसके बाद राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने पर कानून प्रभावी हो सकेगा।

इसके बाद केंद्र और राज्य सरकारों को विभिन्न आधिकारिक दस्तावेजों, सरकारी रिकॉर्ड, संस्थानों और अन्य प्रशासनिक संदर्भों में नाम परिवर्तन लागू करने की प्रक्रिया शुरू करनी होगी।

क्या नाम बदल देने से बदल जाएगी राज्य की पहचान?

नाम बदलने से केरल की भौगोलिक सीमा, राजधानी या प्रशासनिक ढांचे में कोई बदलाव प्रस्तावित नहीं है। राज्य वही रहेगा, उसकी राजधानी तिरुवनंतपुरम ही रहेगी और उसकी प्रशासनिक व्यवस्था भी पहले की तरह चलेगी।

बदलाव मूल रूप से नाम का है। हालांकि, संवैधानिक नाम बदलने के बाद केंद्र और राज्य सरकार के आधिकारिक दस्तावेजों में इसके अनुरूप संशोधन करने होंगे।

यही वजह है कि नाम परिवर्तन को केवल एक शब्द में बदलाव के तौर पर देखने के बजाय इसे भाषा और संवैधानिक पहचान के बीच संबंध के रूप में भी देखा जा रहा है।

पहले भी बदले हैं राज्यों और शहरों के नाम

भारत में किसी राज्य या शहर के नाम में बदलाव पहली बार नहीं हो रहा है। स्वतंत्रता के बाद कई जगहों के नाम बदले गए हैं। इनमें बॉम्बे से मुंबई, मद्रास से चेन्नई, कलकत्ता से कोलकाता और बैंगलोर से बेंगलुरु जैसे उदाहरण शामिल हैं।

इनमें कई बदलाव स्थानीय भाषाई उच्चारण और ऐतिहासिक पहचान को आधिकारिक नाम में शामिल करने से जुड़े रहे हैं। इसलिए केरल से केरलम का मामला भी इसी व्यापक परंपरा के संदर्भ में देखा जा सकता है, हालांकि हर नाम परिवर्तन की अपनी अलग ऐतिहासिक और राजनीतिक पृष्ठभूमि होती है।

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MD Faijan

लेखक

मोहम्मद फैजान न्यूज़ ऑफ द डे में पत्रकार हैं, जहाँ वे खेल, मनोरंजन, राजनीति और अंतरराष्ट्रीय मामलों को कवर करते हैं। इससे पहले वे यूट्यूब चैनल स्पोर्ट्स यारी में सोशल मीडिया एग्जीक्यूटिव के रूप में कार्य कर चुके हैं, जहाँ उन्होंने डिजिटल कंटेंट मैनेजमेंट और ऑडियंस एंगेजमेंट का व्यावहारिक अनुभव प्राप्त किया। भारत के छत्तीसगढ़ राज्य के कोरिया जिले से संबंध रखने वाले फैजान आधुनिक मीडिया कार्यप्रणालियों की अच्छी समझ रखते हैं और कहानी कहने के विभिन्न रूपों में गहरी रुचि रखते हैं।

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