दिल्ली कोर्ट ने कहा कि मजिस्ट्रेट ने पुलिस अधिकारी की दलीलों पर पर्याप्त विचार नहीं किया और पुलिस से स्टेटस रिपोर्ट भी नहीं मंगाई। अदालत ने इसे BNSS की धारा 175(3) के अनुपालन से जुड़ी कमी माना।
नई दिल्ली: कांग्रेस की वरिष्ठ नेता सोनिया गांधी से जुड़े वोटर लिस्ट मामले में सोमवार, 21 सितंबर को दिल्ली की अदालत में अहम सुनवाई हुई। अदालत ने उस मजिस्ट्रेट आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें सोनिया गांधी के खिलाफ मतदाता सूची में कथित तौर पर गलत तरीके से नाम शामिल किए जाने के मामले में एफआईआर दर्ज करने की मांग वाली शिकायत को खारिज कर दिया गया था। अब मामले को दोबारा मजिस्ट्रेट के पास भेजा गया है और शिकायत पर नए सिरे से सुनवाई करने का निर्देश दिया गया है।
यह मामला उस आरोप से जुड़ा है जिसमें सोनिया गांधी का नाम नई दिल्ली संसदीय क्षेत्र की मतदाता सूची में वर्ष 1980 में दर्ज था, जबकि उन्हें भारतीय नागरिकता 30 अप्रैल 1983 को मिली थी। शिकायतकर्ता विकास त्रिपाठी ने इसी आधार पर सवाल उठाते हुए पुलिस जांच और एफआईआर दर्ज करने की मांग की थी।
उनका आरोप है कि नागरिकता हासिल करने से पहले मतदाता सूची में नाम दर्ज कराने के लिए कथित तौर पर फर्जी दस्तावेजों का इस्तेमाल किया गया। हालांकि, यह आरोप अभी न्यायिक रूप से साबित नहीं हुआ है और मामले में आगे की सुनवाई बाकी है।
दिल्ली कोर्ट ने क्या कहा?
राऊज एवेन्यू कोर्ट के विशेष न्यायाधीश विशाल गोगने ने मजिस्ट्रेट के सितंबर 2025 के आदेश को रद्द करते हुए मामले को वापस भेज दिया। अदालत के मुताबिक, पहले दिया गये आदेश के कारण पर्याप्त नहीं थे। कोर्ट ने कहा कि मजिस्ट्रेट को शिकायत में लगाए गए आरोपों और संज्ञेय अपराध बनने के सवाल पर उचित तरीके से विचार करना चाहिए था।
अदालत ने यह भी कहा कि मजिस्ट्रेट के आदेश में पुलिस पक्ष की दलीलों पर पर्याप्त विचार नहीं किया गया और पुलिस से स्टेटस रिपोर्ट भी नहीं मांगी गई। कोर्ट ने इसे भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता यानी BNSS की धारा 175(3) के अनुपालन से जुड़ी कमी माना। इसी वजह से पुराने आदेश को कायम रखने के बजाय मामले को दोबारा विचार के लिए मजिस्ट्रेट के पास भेजा गया।
क्या है पूरा मामला?
मामले की शुरुआत अधिवक्ता विकास त्रिपाठी की शिकायत से हुई। उन्होंने दिल्ली की राऊज एवेन्यू कोर्ट में आवेदन देकर सोनिया गांधी के खिलाफ पुलिस जांच और एफआईआर की मांग की थी।
शिकायत में दावा किया गया कि उनका नाम नई दिल्ली निर्वाचन क्षेत्र की मतदाता सूची में 1980 में शामिल था, जबकि भारतीय नागरिकता से संबंधित रिकॉर्ड के मुताबिक उन्हें 30 अप्रैल 1983 को नागरिकता प्रदान की गई थी।
शिकायतकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता पवन नारंग ने अदालत में तर्क दिया था कि किसी व्यक्ति का नाम मतदाता सूची में शामिल होने से पहले यह जरूरी है कि वह भारतीय नागरिक हो। उन्होंने सवाल उठाया था कि अगर सोनिया गांधी को नागरिकता 1983 में मिली, तो उनका नाम 1980 की मतदाता सूची में कैसे दर्ज हुआ।
शिकायत में यह भी कहा गया कि सोनिया गांधी का नाम 1982 में मतदाता सूची से हटा दिया गया था और 1983 में दोबारा शामिल किया गया। याचिकाकर्ता ने इस बदलाव के आधार और उस समय चुनाव अधिकारियों के सामने पेश किए गए दस्तावेजों पर सवाल उठाया। उनके मुताबिक, इस पूरे घटनाक्रम की पुलिस जांच होनी चाहिए ताकि यह पता लगाया जा सके कि मतदाता सूची में नाम शामिल करने के लिए किन दस्तावेजों का इस्तेमाल हुआ था।
नागरिकता को लेकर क्या रिकॉर्ड है?
उपलब्ध न्यायिक रिकॉर्ड में सोनिया गांधी को भारतीय नागरिकता दिए जाने की तारीख 30 अप्रैल 1983 दर्ज है। इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक पुराने मामले में भी यह दर्ज किया गया था कि उन्हें Citizenship Act, 1955 की धारा 5(1)(c) के तहत पंजीकरण के माध्यम से भारतीय नागरिकता का प्रमाणपत्र दिया गया था। उस मामले में अदालत ने उनकी नागरिकता को चुनौती देने वाली याचिका को स्वीकार नहीं किया था।
हालांकि, मौजूदा शिकायत का सवाल अलग है। इसमें सोनिया गांधी की भारतीय नागरिकता की मौजूदा वैधता को सीधे चुनौती देने के बजाय यह सवाल उठाया गया है कि अगर नागरिकता 1983 में मिली, तो उससे पहले उनका नाम मतदाता सूची में कैसे दर्ज हुआ और इसके लिए कौन से दस्तावेज इस्तेमाल किए गए।
पहले मजिस्ट्रेट कोर्ट ने क्या फैसला दिया था?
सितंबर 2025 में अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट वैभव चौरसिया की अदालत ने सोनिया गांधी के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी थी। उस समय अदालत के सामने शिकायतकर्ता ने पुलिस जांच का निर्देश देने की मांग की थी।
मजिस्ट्रेट कोर्ट के फैसले के बाद शिकायतकर्ता विकास त्रिपाठी ने उस आदेश को चुनौती देते हुए सेशंस कोर्ट में रिवीजन याचिका दाखिल की। दिसंबर 2025 में अदालत ने सोनिया गांधी और दिल्ली पुलिस को नोटिस जारी किया था और मामले में दोनों पक्षों से जवाब मांगा गया था।
बाद में सोनिया गांधी की ओर से इस याचिका का विरोध किया गया। उनकी ओर से अदालत में इसे राजनीतिक रूप से प्रेरित, गलत और कानून की प्रक्रिया के दुरुपयोग का प्रयास बताया गया था।
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सेशंस कोर्ट के सामने मुख्य सवाल क्या था?
इस पूरे मामले में सेशंस कोर्ट के सामने मुख्य सवाल यह था कि क्या मजिस्ट्रेट ने एफआईआर की मांग वाली शिकायत पर कानून के मुताबिक पर्याप्त विचार किया था या नहीं। विशेष न्यायाधीश विशाल गोगने ने पाया कि निचली अदालत का आदेश इस महत्वपूर्ण सवाल पर पर्याप्त कारण नहीं देता था कि शिकायत में किसी संज्ञेय अपराध के आरोप बनते हैं या नहीं।
अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि ऐसे मामले में मजिस्ट्रेट के पास कानून के तहत उपलब्ध विकल्पों पर उचित तरीके से विचार होना चाहिए। इनमें पुलिस को एफआईआर दर्ज करने का निर्देश देना या कानून के अनुरूप आगे की प्रक्रिया अपनाना शामिल हो सकता है। कोर्ट ने माना कि पहले के आदेश में इन पहलुओं पर पर्याप्त विचार नहीं हुआ था।
इसी आधार पर अदालत ने पुराने आदेश को रद्द कर दिया और मामले को फिर से मजिस्ट्रेट के पास भेज दिया।
कब होगी अगली कार्यवाही?
मामले की अगली कार्यवाही 29 सितंबर 2026 को होने की जानकारी सामने आई है। अब शिकायत पर नए सिरे से सुनवाई होगी। मजिस्ट्रेट को शिकायतकर्ता और पुलिस पक्ष को सुनने के बाद कारणों के साथ नया आदेश देना होगा।
आगे की सुनवाई में यह तय किया जाना महत्वपूर्ण होगा कि शिकायत में लगाए गए आरोप पुलिस जांच या एफआईआर के लिए पर्याप्त आधार बनाते हैं या नहीं। यदि अदालत जांच का निर्देश देती है, तो उसके बाद पुलिस दस्तावेजों और मतदाता सूची से जुड़े रिकॉर्ड की जांच कर सकती है।
फिलहाल अदालत ने केवल पुराने मजिस्ट्रेट आदेश को रद्द करके मामले की दोबारा सुनवाई का रास्ता खोला है। इसलिए इसे सोनिया गांधी के खिलाफ एफआईआर दर्ज होने या आरोप साबित होने के रूप में पेश करना सही नहीं होगा।
मतदाता सूची की शुचिता पर अदालत की टिप्पणी
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने मतदाता सूची की विश्वसनीयता और लोकतांत्रिक व्यवस्था में उसके महत्व पर भी टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि चुनावी मतदाता सूची की पवित्रता संसदीय लोकतंत्र में हर नागरिक के लिए महत्वपूर्ण है। अदालत के अनुसार, मतदाता सूची में किसी गैर-नागरिक का नाम शामिल करने या गलत घोषणा के आरोप जैसे मुद्दों पर न्यायिक आदेश स्पष्ट कारणों के साथ होना चाहिए।
इस टिप्पणी का व्यापक संदर्भ यह है कि मतदाता सूची चुनावी प्रक्रिया का बुनियादी हिस्सा है। किसी व्यक्ति की पात्रता, नागरिकता और मतदाता के रूप में पंजीकरण से जुड़े सवालों का निपटारा निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के तहत होना जरूरी है।
फिलहाल इतना स्पष्ट है कि सोनिया गांधी से जुड़ा यह पुराना वोटर लिस्ट विवाद एक बार फिर अदालत के सामने आ गया है और 2025 में खारिज की गई एफआईआर की मांग वाली शिकायत पर अब नए सिरे से सुनवाई होगी।
