कोर्ट बोला- प्रशासनिक नियम छात्रों के भविष्य से बड़े नहीं, कम हाजिरी पर डिटेंशन को लेकर उठाए सवाल
नई दिल्ली, न्यूज ऑफ द डे
दिल्ली में यूनिवर्सिटीज द्वारा कम अटेंडेंस के आधार पर छात्रों को परीक्षा में बैठने से रोकने की पुरानी व्यवस्था अब कानूनी जांच के घेरे में आ गई है। दिल्ली हाईकोर्ट ने हाल के कई मामलों में छात्रों को राहत देते हुए साफ संदेश दिया है कि किसी भी प्रशासनिक नियम का इस्तेमाल विद्यार्थियों के शैक्षणिक भविष्य को खत्म करने के लिए नहीं किया जा सकता।
6 से 8 मई के बीच सुनाए गए अलग-अलग आदेशों में जस्टिस Jasmeet Singh ने न केवल छात्रों को परीक्षा में शामिल होने की अनुमति दी, बल्कि विश्वविद्यालयों की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल उठाए। कोर्ट ने कहा कि शिक्षा संस्थानों को अनुशासन और संवेदनशीलता के बीच संतुलन बनाना होगा।
कम अटेंडेंस के नाम पर रोका गया एग्जाम
इन मामलों में सबसे ज्यादा चर्चा University of Delhi की लॉ स्टूडेंट अवंतिका सिंह के केस की रही। यूनिवर्सिटी ने सेकंड सेमेस्टर परीक्षा में बैठने से इसलिए रोक दिया क्योंकि उनकी अटेंडेंस निर्धारित सीमा से कम थी। छात्रा ने इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी।
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने माना कि सिर्फ हाजिरी कम होना किसी छात्र को पूरी तरह डिटेन करने का पर्याप्त आधार नहीं हो सकता। अदालत ने कहा कि अगर छात्र ने पढ़ाई जारी रखी है और परीक्षा देने की तैयारी की है, तो केवल तकनीकी आधार पर उसका एक साल खराब नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने यूनिवर्सिटी को निर्देश दिया कि छात्रा का रिजल्ट जारी किया जाए और उसे सभी शैक्षणिक लाभ दिए जाएं। फैसले के दौरान अदालत ने यह भी कहा कि नियमों का उद्देश्य शिक्षा को बेहतर बनाना होना चाहिए, न कि छात्रों के लिए बाधा खड़ी करना।
फीस वसूली पर भी कोर्ट की सख्त टिप्पणी
मामले की सुनवाई के दौरान फीस को लेकर भी अहम टिप्पणी की गई। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि कोई भी यूनिवर्सिटी ऐसे शैक्षणिक वर्ष की फीस लेने के लिए छात्र को मजबूर नहीं कर सकती, जिसमें उसने पढ़ाई ही न की हो।
अदालत ने माना कि कई बार प्रशासनिक फैसलों की वजह से छात्रों का पूरा अकादमिक सत्र प्रभावित हो जाता है। ऐसे में संस्थानों को यह समझना होगा कि उनके निर्णय का सीधा असर किसी छात्र के करियर, मानसिक स्थिति और आर्थिक स्थिति पर पड़ता है।
70 प्रतिशत अटेंडेंस को माना पर्याप्त
एक अन्य मामले में CHRIST (Deemed to be University) के छात्र श्रीश चौधरी को परीक्षा में बैठने से रोक दिया गया था। छात्र की अटेंडेंस 70.72 प्रतिशत थी, लेकिन यूनिवर्सिटी के आंतरिक नियम 85 प्रतिशत उपस्थिति की मांग कर रहे थे।
इस पर हाईकोर्ट ने कहा कि 70 प्रतिशत से अधिक उपस्थिति को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अदालत ने माना कि शिक्षा संस्थानों को नियम लागू करते समय व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। कोर्ट ने छात्र को राहत देते हुए परीक्षा प्रक्रिया में शामिल करने का निर्देश दिया।
‘अनुशासन’ के नाम पर बढ़ता दबाव
दिल्ली हाईकोर्ट की हालिया टिप्पणियों को सिर्फ दो छात्रों तक सीमित नहीं माना जा रहा। शिक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि देशभर की यूनिवर्सिटीज में अटेंडेंस नियमों को लेकर लंबे समय से विवाद रहा है। कई छात्र स्वास्थ्य समस्याओं, पारिवारिक कारणों, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी या इंटर्नशिप के चलते नियमित कक्षाओं में उपस्थित नहीं हो पाते।
इसके बावजूद कई संस्थान नियमों को बेहद कठोर तरीके से लागू करते हैं। इससे छात्रों पर मानसिक दबाव बढ़ता है और कई बार उनका पूरा शैक्षणिक वर्ष खतरे में पड़ जाता है। हाईकोर्ट ने अपने आदेशों में यह स्पष्ट संकेत दिया है कि विश्वविद्यालयों को संवेदनशील और न्यायसंगत रवैया अपनाना होगा। अदालत ने कहा कि नियम जरूरी हैं, लेकिन उनका इस्तेमाल हथियार की तरह नहीं होना चाहिए।
हजारों छात्रों के लिए राहत का संदेश
कानूनी जानकारों का मानना है कि दिल्ली हाईकोर्ट के ये आदेश आने वाले समय में दूसरे मामलों के लिए भी मिसाल बन सकते हैं। इससे उन हजारों छात्रों को उम्मीद मिली है जो कम अटेंडेंस या फीस विवादों के कारण अपने करियर को लेकर चिंता में रहते हैं। फिलहाल अदालत के रुख ने इतना जरूर साफ कर दिया है कि शिक्षा संस्थानों को अब सिर्फ नियमों की किताब देखकर नहीं, बल्कि छात्रों के भविष्य को ध्यान में रखकर फैसले लेने होंगे।
