12 जून 1975 को इलाहाबाद हाईकोर्ट के ऐतिहासिक फैसले ने Indira Gandhi की सत्ता को चुनौती दी और भारतीय राजनीति को ऐसे मोड़ पर पहुंचाया, जिसने आपातकाल की नींव रखी।
नई दिल्ली: भारत के राजनीतिक इतिहास में 12 जून 1975 का दिन एक बेहद महत्वपूर्ण मोड़ माना जाता है। इसी दिन इलाहाबाद हाईकोर्ट ने तत्कालीन प्रधानमंत्री Indira Gandhi के 1971 लोकसभा चुनाव को अवैध घोषित कर दिया था। यह फैसला सिर्फ एक चुनावी विवाद तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इस फैसले की चिंगारी देश की राजनीति में एक ज्वाला बनकर सामने आई और कुछ ही दिनों बाद 25 जून 1975 को देश में आपातकाल (Emergency) लागू कर दिया गया।
यह मामला भारत के लोकतांत्रिक इतिहास के सबसे चर्चित कानूनी मामलों में से एक माना जाता है, जिसमें चुनावी प्रक्रिया, सत्ता के इस्तेमाल और राजनीतिक नैतिकता को लेकर बड़े सवाल उठाए गए थे।
1971 का लोकसभा चुनाव और इंदिरा गांधी की बड़ी जीत
1971 में भारत में लोकसभा चुनाव हुए। उस समय तक देश की राजनीति में इंदिरा गांधी का प्रभाव काफी बढ़ चुका था। उनकी पार्टी कांग्रेस (आर) ने “गरीबी हटाओ” के नारे के साथ चुनाव लड़ा था।
इंदिरा गांधी ने उत्तर प्रदेश की रायबरेली लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा और भारी बहुमत से जीत हासिल की। उन्होंने अपने प्रमुख प्रतिद्वंद्वी राज नारायण को हराया था।
उस समय यह जीत इंदिरा गांधी के राजनीतिक कद को और मजबूत करने वाली मानी गई। इस जीत के बाद वह देश की सबसे शक्तिशाली राजनीतिक नेताओं में शामिल हो गईं। लेकिन इस चुनाव के बाद कुछ ऐसा हुआ, जिसकी उम्मीद न तो इंदिरा गांधी ने की थी, और न ही कांग्रेस पार्टी ने।
राज नारायण ने दी नतीजों को चुनौती
इंदिरा गांधी के विरोधी उम्मीदवार राज नारायण ने उनकी जीत को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी। उनका आरोप था कि इंदिरा गांधी ने चुनाव जीतने के लिए गलत तरीकों का इस्तेमाल किया और चुनाव नियमों का उल्लंघन किया।
उन्होंने इंदिरा गांधी पर सरकारी अधिकारियों की मदद, सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग, रिश्वत और प्रलोभन, चुनाव में सीमा मे अधिक खर्च और रैलियों में सेना के वाहनों के दुरुपयोग जैसे कई गंभीर आरोप लगाए। यह मामला “इंदिरा गांधी बनाम राज नारायण” के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
इंदिरा गांधी पर क्या आरोप लगाए गए थे?
इस केस में कई आरोप लगाए गए थे, जिनमें मुख्य रूप से दो आरोपों पर अदालत ने फैसला सुनाया।
1. सरकारी कर्मचारी की मदद लेने का आरोप
राज नारायण ने आरोप लगाया कि इंदिरा गांधी ने अपने चुनाव प्रचार में सरकारी अधिकारी यशपाल कपूर की मदद ली।
यशपाल कपूर उस समय प्रधानमंत्री कार्यालय में कार्यरत थे। आरोप था कि उन्होंने आधिकारिक रूप से इस्तीफा स्वीकार होने से पहले ही इंदिरा गांधी के चुनाव अभियान में काम करना शुरू कर दिया था।
चुनाव कानून के अनुसार किसी उम्मीदवार को सरकारी कर्मचारी की सहायता लेना प्रतिबंधित था।
2. चुनाव प्रचार में सरकारी संसाधनों के इस्तेमाल का आरोप
दूसरा आरोप था कि चुनावी रैलियों और प्रचार के दौरान सरकारी संसाधनों का इस्तेमाल किया गया। आरोप लगाया गया कि मंच, बिजली और अन्य सरकारी सुविधाओं का उपयोग चुनाव प्रचार के लिए किया गया।
हालांकि इंदिरा गांधी ने इन आरोपों को गलत बताया और कहा कि उनकी जीत जनता के समर्थन से हुई थी।
इलाहाबाद हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला
12 जून 1975 को इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति जगमोहन लाल सिन्हा ने इस मामले में फैसला सुनाया। अदालत ने इंदिरा गांधी के 1971 के चुनाव को रद्द कर दिया।
कोर्ट ने माना कि चुनाव प्रक्रिया में कुछ अनियमितताएं हुई थीं और उन्होंने चुनाव कानून का उल्लंघन किया था।
इसके साथ ही अदालत ने इंदिरा गांधी को लोकसभा सदस्य के रूप में अयोग्य घोषित कर छह साल तक उनके चुनाव लड़ने पर रोक लगा दी।
यह फैसला उस समय इंदिरा गांधी और कांग्रेस के लिए एक बड़ा राजनीतिक झटका था। क्योंकि वह उस समय देश की प्रधानमंत्री थीं।
विपक्ष का दबाव और जेपी आंदोनल की आवाज
इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के बाद विपक्ष ने इंदिरा गांधी से प्रधानमंत्री पद छोड़ने की मांग शुरू कर दी। विपक्षी नेताओं का तर्क था कि जब उनका चुनाव ही रद्द हो गया है तो उनका प्रधानमंत्री पद पर बने रहना नैतिक रूप से सही नहीं है।
उस समय देश में पहले से ही राजनीतिक असंतोष बढ़ रहा था। महंगाई, बेरोजगारी और सरकार विरोधी आंदोलन लगातार बढ़ते जा रहे थे। उसी दौरान समाजवादी नेता जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में सरकार विरोधी आंदोलन भी तेज हो गया था। इसे जेपी आंदोनल के नाम से भी जाना जाता है।
आपको बता दें कि 18 मार्च, 1974 को शुरू हुए जेपी आंदोलन की नींव पटना (बिहार) में एक छात्र आंदोनल के रूप में रखी गई थी। यह आंदोलन देश में बढ़ रहे भ्रष्टाचार, महंगाई और बेरोजगारी के खिलाफ शुरू किया गया था। लेकिन बाद में यह इंदिरा सरकार के खिलाफ एक राष्ट्रव्यापी क्रांति के रूप में तबदील हो गया।
सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा मामला
इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के बाद इंदिरा गांधी ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की। सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति वी. आर. कृष्ण अय्यर ने 24 जून 1975 को अंतरिम आदेश दिया।
इस आदेश के तहत इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री पद पर बने रहने की अनुमति मिली, लेकिन उनकी लोकसभा सदस्यता से जुड़े अधिकारों पर कुछ सीमाएं लगाई गईं। कोर्ट ने आदेश दिया कि इंदिरा बतौर सांसद, संसद की कार्रवाई में अपना वोट नहीं दे सकेंगी।
25 जून 1975: देश में लगा आपातकाल
इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के करीब दो हफ्ते बाद, 25 जून 1975 की रात भारत में आपातकाल घोषित कर दिया गया। तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सलाह पर आपातकाल की घोषणा की। सरकार ने इसका कारण देश की आंतरिक सुरक्षा को बताया।
आपातकाल के दौरान:
- नागरिक अधिकारों पर प्रतिबंध लगाए गए
- प्रेस की स्वतंत्रता सीमित कर दी गई
- कई विपक्षी नेताओं को गिरफ्तार किया गया
- राजनीतिक गतिविधियों पर रोक लगी
यह दौर भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में सबसे विवादित कालखंडों में से एक माना जाता है।
चुनाव के आगे झुके कानून और संविधान
इंदिरा गांधी के चुनाव मामले का असर सिर्फ राजनीति तक सीमित नहीं रहा। आपातकाल के दौरान सरकार ने चुनाव कानूनों में बदलाव किए। इसके बाद संसद ने कुछ ऐसे संशोधन किए जिनका उद्देश्य प्रधानमंत्री के चुनाव से जुड़े मामलों पर न्यायिक समीक्षा को सीमित करना था।
यह मामला बाद में भारतीय संविधान और न्यायपालिका की भूमिका को लेकर बड़े विमर्श का हिस्सा बना।
आपातकाल के खत्म होते ही बदला राजनीतिक इतिहास
करीब 21 महीने बाद, जनवरी 1977 में इंदिरा गांधी ने आम चुनाव कराने की घोषणा की। मार्च 1977 में हुए चुनाव में कांग्रेस को बड़ी हार का सामना करना पड़ा और पहली बार केंद्र में गैर-कांग्रेसी सरकार बनी।
जनता पार्टी सत्ता में आई और मोरारजी देसाई देश के प्रधानमंत्री बने। इस चुनाव को अक्सर आपातकाल पर जनता के फैसले के रूप में देखा जाता है।
इंदिरा गांधी की वापसी
हालांकि 1977 में हार के बाद इंदिरा गांधी की राजनीतिक यात्रा खत्म नहीं हुई।
1980 में हुए चुनाव में उन्होंने फिर से सत्ता में वापसी की और दोबारा प्रधानमंत्री बनीं। 14 जनवरी, 1980 को उन्होंने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। इससे यह साबित हुआ कि भारतीय राजनीति में उनका प्रभाव लंबे समय तक बना रहा।
हालांकि इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा सुनाए गए उस फैसले को आज भी भारत के राजनीतिक और संवैधानिक इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण अध्यायों में गिना जाता है।
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