Monday, 03 August 2026
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3 जून 1947: जब रेडियो पर सुनाई गई भारत के बंटवारे की खबर, कैसे लॉर्ड माउंटबेटन के एक फैसले ने बदल दिया दक्षिण एशिया का इतिहास

3 जून 1947 वो ऐतिहासिक तारीख मानी जाती है जब लॉर्ड माउंटबेटन की एक घोषणा ने भारत के विभाजन की योजना पेश की। जानें बंटवारे की कहानी, वजह, रेडक्लिफ लाइन और मानवीय त्रासदी के बारे में।

आजादी की जंग अपने आखिरी मुकाम पर पहुंच चुकी थी, लेकिन देश में हिंदू-मुस्लिम राजनीतिक मतभेद, सांप्रदायिक तनाव और सत्ता हस्तांतरण को लेकर अनिश्चित्ताएं लगातार बढ़ती जा रही थीं। ब्रिटिश सरकार को यह स्पष्ट हो गया था कि भारत पर शासन जारी रखना अब उनके ‘बस की बंदूक’ नहीं रही। ऐसे माहौल में 3 जून 1947 के दिन रेडियो पर एक ऐसी घोषणा की गई, जिसने आगे चल कर भारत की राजनीतिक और भूवैज्ञानिक तस्वीर को हमेशा-हमेशा के लिए बदलकर रख दिया।

दरअसल, 3 जून 1947 के दिन भारत के अंतिम वायसराय लॉर्ड लुई माउंटबेटन ने भारत को दो हिस्सों में विभाजित कर एक नया राष्ट्र ‘पाकिस्तान’ बनाने की योजना पर आधिकारिक घोषणा की थी। सार्वजनिक तौर पर घोषित किए गए इस योजना को “माउंटबेटन प्लान” या “3 जून योजना” के नाम से भी जाना जाता है।

माउंटबेटन भारत क्यों भेजे गए थे?

फरवरी 1947 में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली ने घोषणा की थी कि जून 1948 तक भारत को सत्ता हस्तांतरित कर दी जाएगी। लेकिन इस घोषणा में कहीं भारत के बंटवारे का जिक्र नहीं था। इसके बाद लॉर्ड माउंटबेटन को भारत का अंतिम वायसराय बनाकर भेजा गया। उनका मुख्य उद्देश्य सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया को तेज करना और ऐसा राजनीतिक समाधान निकालना था जिसे सभी भारतीय दल स्वीकार कर सकें।

माउंटबेटन मार्च 1947 में भारत पहुंचे। यहां आने के बाद उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, मुस्लिम लीग, सिख नेताओं और अन्य प्रमुख राजनीतिक प्रतिनिधियों के साथ कई दौर की बातचीत की। माउंटबेटन को जल्द ही यह महसूस हो गया था कि कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच मतभेद इतने गहरे हो चुके हैं कि एक संयुक्त भारत के लिए तत्काल सहमति बना पाना करीब-करीब नामुमकिन है।

क्यों उठी विभाजन की मांग?

1940 के दशक में मुस्लिम लीग के नेता मोहम्मद अली जिन्ना (जो आगे चलकर पाकिस्तान के “बाबा-ए-कौम” और “राष्ट्रपिता” कहलाए) अलग मुस्लिम राष्ट्र की मांग को लगातार मजबूत कर रहे थे। दूसरी ओर कांग्रेस एक संयुक्त और लोकतांत्रिक भारत चाहती थी। 1946 के चुनावों और उसके बाद की राजनीतिक घटनाओं ने दोनों पक्षों के बीच की दूरी को और बढ़ा दिया। कई इलाकों में सांप्रदायिक हिंसा भी शुरू हो चुकी थी। इस बीच माउंटबेटन और ब्रिटिश प्रशासन को आशंका थी कि यदि सत्ता हस्तांतरण में अधिक देरी हुई तो देश व्यापक गृहयुद्ध की ओर बढ़ सकता है। इसी पृष्ठभूमि में विभाजन को एक व्यावहारिक राजनीतिक समाधान के रूप में देखा जाने लगा।

माउंटबेटन प्लान की प्रमुख बातें

इस योजना में पहली बार स्पष्ट रूप से स्वीकार किया गया कि ब्रिटिश भारत को दो अलग-अलग डोमिनियन भारत और पाकिस्तान के रूप में विभाजित किया जाएगा।

इस योजना के कुछ प्रमुख बिंदु भी थे जिसमें कहा गया कि –

  • ब्रिटिश भारत का विभाजन कर दो स्वतंत्र डोमिनियन बनाए जाएंगे।
  • पंजाब और बंगाल की विधानसभाओं को विभाजन पर मतदान का अवसर दिया जाएगा।
  • उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत (NWFP) में जनमत संग्रह कराया जाएगा।
  • असम के सिलहट जिले में भी जनमत संग्रह होगा।
  • यदि विभाजन स्वीकार किया जाता है तो सीमाएं तय करने के लिए सीमा आयोग (Boundary Commission) गठित किया जाएगा।
  • सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया को तेजी से पूरा किया जाएगा।

पंजाब और बंगाल का सवाल

विभाजन की प्रक्रिया में सबसे जटिल प्रश्न पंजाब और बंगाल का था। दोनों प्रांत धार्मिक रूप से मिश्रित आबादी वाले थे। इसलिए योजना में तय किया गया कि इन प्रांतों की विधानसभाएं अलग-अलग बैठकर यह निर्णय लेंगी कि वे विभाजन चाहती हैं या नहीं। आखिरकार दोनों प्रांतों का विभाजन हुआ। पश्चिमी पंजाब (जिसमें लाहौर, फैसलाबाद, रावलपिंडी, मुल्तान और गुजरांवाला जैसे प्रमुख शहर शामिल थे) पाकिस्तान में गया जबकि पूर्वी पंजाब भारत का हिस्सा बना। इसी तरह पूर्वी बंगाल (जिसमें ढाका और चटगांव जैसे प्रमुख शहर शामिल थे, जो आगे चलकर 1971 में बांग्लादेश का हिस्सा बने) पाकिस्तान का हिस्सा बना और पश्चिम बंगाल भारत में रहा।

सीमा आयोग और रेडक्लिफ लाइन

विभाजन के बाद नई सीमाएं तय करने की जिम्मेदारी ब्रिटिश न्यायविद सर सिरिल रेडक्लिफ को सौंपी गई। उनके नेतृत्व में सीमा आयोग का गठन किया गया। आयोग को बहुत कम समय में सीमांकन का काम पूरा करना था। रेडक्लिफ ने कुछ ही हफ्तों में नई सीमाएं तैयार कीं, जिन्हें बाद में “रेडक्लिफ लाइन” कहा गया। यह सीमा आज भी भारत और पाकिस्तान के बीच विभाजन रेखा का आधार मानी जाती है।

कांग्रेस ने विभाजन क्यों स्वीकार किया?

कांग्रेस का विभाजन के लिए हामी भरना आज भी इतिहासकारों के बीच चर्चा का विषय है। कांग्रेस लंबे समय तक विभाजन का विरोध करती रही थी। लेकिन 1947 तक हालात काफी बदल चुके थे। कांग्रेस नेतृत्व, विशेष रूप से जवाहरलाल नेहरू और सरदार वल्लभभाई पटेल इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि लगातार बढ़ती सांप्रदायिक हिंसा और राजनीतिक गतिरोध को देखते हुए विभाजन स्वीकार करना शायद सबसे व्यावहारिक विकल्प रह गया था। महात्मा गांधी व्यक्तिगत रूप से विभाजन से दुखी थे, लेकिन अंतिम राजनीतिक निर्णय कांग्रेस नेतृत्व ने लिया।

विभाजन की मानवीय त्रासदी

हालांकि, 3 जून योजना ने राजनीतिक समाधान दिया, लेकिन इसके परिणाम बेहद दर्दनाक रहे। विभाजन के दौरान लाखों लोग अपने घर छोड़ने को मजबूर हुए। इतिहासकारों के अनुसार यह मानव इतिहास के सबसे बड़े जन-स्थानांतरणों में से एक था। हिंसा, दंगे, विस्थापन और जान-माल के भारी नुकसान ने आजादी की खुशी को गहरे दुख में बदल दिया। लाखों परिवार हमेशा के लिए बिछड़ गए और दोनों देशों के बीच अविश्वास की एक लंबी विरासत छोड़ गए।

  •  विभाजन ने ली लाखों लोगों की जान, करोड़ों हुए बेघर

भारत-पाकिस्तान विभाजन सिर्फ एक राजनीतिक घटना नहीं, बल्कि 20वीं सदी की सबसे बड़ी मानवीय त्रासदियों में से एक थी। अगस्त 1947 में आजादी के साथ शुरू हुए बंटवारे ने करोड़ों लोगों की जिंदगी हमेशा के लिए बदल दी। इतिहासकारों के अनुसार, विभाजन के दौरान हुई सांप्रदायिक हिंसा में लगभग 2 लाख से 20 लाख लोगों के मौत का अनुमान लगाया गया है। इसके अलावा करीब 1.4 से 1.8 करोड़ लोगों को अपना घर छोड़कर नई सीमाओं के पार जाना पड़ा। इसे मानव इतिहास के सबसे बड़े जबरन जन-स्थानांतरणों (Mass Migration) में गिना जाता है। पंजाब और बंगाल सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्रों में शामिल थे, जहां लाखों परिवार रातों-रात शरणार्थी बन गए।

  • जब चलने लगीं मौत की ट्रेनें

विभाजन के दौरान सबसे दर्दनाक घटनाओं में से एक थी उन ट्रेनों का पहुंचना, जिनमें यात्रियों की जगह केवल शव मिले थे। भारत और पाकिस्तान के बीच शरणार्थियों को ले जाने वाली कई ट्रेनों पर हिंसक भीड़ ने हमला किया। कुछ मामलों में पूरी की पूरी ट्रेन के यात्रियों की हत्या कर दी गई थी। इतिहास में इन्हें “Ghost Trains” या “मौत की ट्रेनें” कहा जाता है। ऐसी घटनाओं ने दोनों देशों के लोगों के मन में गहरा भय और अविश्वास पैदा कर दिया था।

  • रावलपिंडी और पंजाब में भड़की भीषण हिंसा

मार्च 1947 में रावलपिंडी क्षेत्र (अब पाकिस्तान का हिस्सा है) में सांप्रदायिक हिंसा की कई घटनाएं सामने आईं। गांवों को जलाने, लोगों की हत्या और बड़े पैमाने पर पलायन की खबरों ने पूरे पंजाब को प्रभावित किया। इसके बाद पूर्वी और पश्चिमी पंजाब में बदले की कार्रवाई का सिलसिला शुरू हुआ, जिसने हजारों लोगों की जान ले ली।

आज भी जिंदा हैं विभाजन की यादें

अगले साल 2027 में विभाजन को पूरे आठ दशक हो जाएंगे, लेकिन इससे जुड़ी यादें आज भी भारत और पाकिस्तान के लाखों परिवारों के दिलों में मौजूद हैं। कई परिवारों के पास आज भी अपने पुराने घरों, गांवों और बिछड़े रिश्तेदारों की कहानियां हैं। यही कारण है कि इतिहासकार भारत-विभाजन को केवल राजनीतिक घटना नहीं, बल्कि एक मानवीय त्रासदी के रूप में भी देखते हैं।

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MD Faijan

लेखक

मोहम्मद फैजान न्यूज़ ऑफ द डे में पत्रकार हैं, जहाँ वे खेल, मनोरंजन, राजनीति और अंतरराष्ट्रीय मामलों को कवर करते हैं। इससे पहले वे यूट्यूब चैनल स्पोर्ट्स यारी में सोशल मीडिया एग्जीक्यूटिव के रूप में कार्य कर चुके हैं, जहाँ उन्होंने डिजिटल कंटेंट मैनेजमेंट और ऑडियंस एंगेजमेंट का व्यावहारिक अनुभव प्राप्त किया। भारत के छत्तीसगढ़ राज्य के कोरिया जिले से संबंध रखने वाले फैजान आधुनिक मीडिया कार्यप्रणालियों की अच्छी समझ रखते हैं और कहानी कहने के विभिन्न रूपों में गहरी रुचि रखते हैं।

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