Tuesday, 08 September 2026
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Asha Bhosle 93rd Birth Anniversary: संगीत से लेकर कारोबार तक, आशा ताई की जिंदगी के 7 अनसुने किस्से

10 साल की उम्र में माइक्रोफोन थामने वाली आशा भोसले ने आठ दशक से ज्यादा लंबे सफर में संगीत की हर शैली को अपनी आवाज दी। 93वीं जयंती पर जानिए उनकी जिंदगी के 7 ऐसे किस्से, जो कम ही लोग जानते हैं।

नई दिल्ली: कुछ आवाजें सिर्फ गाने नहीं गातीं, वे अपने साथ एक पूरा दौर लेकर चलती हैं। आशा भोसले की आवाज भी ऐसी ही थी। कभी उसमें शोखियां थीं, कभी प्रेम की नर्मी, कभी विरह की टीस और कभी जिंदगी को खुलकर जीने का अंदाज। हिंदी सिनेमा में आठ दशक से ज्यादा लंबे सफर में उन्होंने सिर्फ गाने नहीं गाए, बल्कि अपनी आवाज को हर दौर, हर अभिनेत्री और हर संगीत शैली के हिसाब से ढाला।

8 सितंबर 1933 को महाराष्ट्र के सांगली में जन्मीं आशा भोसले ने बेहद कम उम्र में संगीत की दुनिया में कदम रखा था। पिता पंडित दीनानाथ मंगेशकर के निधन के बाद परिवार की जिम्मेदारियों ने उन्हें बचपन में ही काम की दुनिया में ला खड़ा किया। महज 10 साल की उम्र में उन्होंने मराठी फिल्म माझा बाळ के लिए ‘चला चला नव बाळा’ गाना रिकॉर्ड किया और यहीं से एक ऐसी यात्रा शुरू हुई, जो आठ दशक से अधिक समय तक चलती रही।

संगीत की हर विधा में आशा ताई

आशा ताई की खासियत यह थी कि उन्होंने खुद को कभी एक ही तरह के संगीत तक सीमित नहीं रखा। कैबरे और पॉप से लेकर गजल, शास्त्रीय, लोक, भजन और रोमांटिक गीतों तक उन्होंने अपनी आवाज के अलग-अलग रंग दिखाए। यही बहुमुखी प्रतिभा उन्हें भारतीय सिनेमा की सबसे विशिष्ट गायिकाओं में शामिल करती है। उन्हें दो राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार, कई फिल्मफेयर पुरस्कार, दादासाहेब फाल्के पुरस्कार और पद्म विभूषण जैसे सम्मान मिले।

12 अप्रैल 2026 को 92 वर्ष की उम्र में उनके निधन के बाद आज उनकी 93वीं जयंती का दिन भावुक कर देने वाला है। यह पहला जन्मदिन है जब आशा ताई हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी आवाज आज भी उतनी ही जीवंत है।

आशा भोसले की जिंदगी को सिर्फ उनकी फिल्मों और सुपरहिट गानों से समझना मुश्किल है। उनके जीवन में संघर्ष भी था, रिश्तों की मुश्किलें भी थीं, नए प्रयोग करने का साहस भी था और संगीत के बाहर अपनी पहचान बनाने की चाह भी। आइए, आज इस खास मौके पर आशा ताई को उनकी जिंदगी से जुड़े 7 दिलचस्प पहलुओं को याद करते हैं।

1. 10 साल की उम्र में शुरू हो गया था गायकी का सफर

आशा भोसले का संगीत से रिश्ता जन्म से ही जुड़ा था। उनके पिता पंडित दीनानाथ मंगेशकर खुद प्रसिद्ध शास्त्रीय गायक और रंगमंच कलाकार थे। घर में संगीत का माहौल था और आशा तथा उनकी बड़ी बहन लता मंगेशकर ने भी बचपन से ही संगीत का प्रशिक्षण लिया।

लेकिन पिता के निधन ने परिवार की जिंदगी बदल दी। आशा उस समय बेहद छोटी थीं। परिवार को संभालने के लिए उन्हें और लता मंगेशकर को कम उम्र में ही फिल्मों में काम करना पड़ा।

साल 1943 में महज 10 साल की उम्र में आशा ने मराठी फिल्म माझा बाळ के लिए ‘चला चला नव बाळा’ गाया। यह उनके रिकॉर्ड किए गए शुरुआती गीतों में से एक था। इसके कुछ वर्षों बाद उन्होंने हिंदी फिल्मों में भी अपनी जगह बनानी शुरू कर दी।

यानी जिस उम्र में ज्यादातर बच्चे स्कूल और खेल की दुनिया में होते हैं, उस उम्र में आशा भोसले स्टूडियो के माइक्रोफोन के सामने खड़ी होकर अपने परिवार के भविष्य में योगदान दे रही थीं।

2. गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज हुआ नाम

आशा भोसले की गायकी का पैमाना सिर्फ लोकप्रियता से नहीं समझा जा सकता। उन्होंने हजारों गाने रिकॉर्ड किए और 20 से ज्यादा भारतीय भाषाओं में अपनी आवाज दी।

गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड्स ने उन्हें ‘Most Recorded Female Artist’ के रिकॉर्ड से सम्मानित किया। गिनीज के अनुसार, उन्होंने 11,000 से ज्यादा सोलो, डुएट और कोरस वाले गीत रिकॉर्ड किए। उनके रिकॉर्डेड गीतों का सिलसिला 1947 से लेकर 2026 में उनके निधन तक चला।

उनकी आवाज का दायरा इतना व्यापक था कि एक तरफ ‘दम मारो दम’ जैसी ऊर्जा से भरी आवाज सुनाई देती है, तो दूसरी तरफ ‘मेरा कुछ सामान’ जैसे भावनात्मक गीत में वही आवाज बिल्कुल अलग रंग ले लेती है।

यही वजह है कि आशा भोसले को सिर्फ एक प्लेबैक सिंगर कहना उनके योगदान को छोटा कर देता है। वह अलग-अलग पीढ़ियों, संगीतकारों और शैलियों के साथ खुद को लगातार बदलती रहीं।

3. 16 साल की उम्र में किया था घर से भागकर विवाह

आशा भोसले की जिंदगी का सबसे कठिन अध्याय उनके पहले विवाह से जुड़ा रहा। उन्होंने महज 16 साल की उम्र में गणपतराव भोसले से शादी की। उस समय गणपतराव की उम्र उनसे काफी अधिक थी और वह उनकी बहन लता मंगेशकर के सचिव के रूप में काम करते थे।

यह विवाह परिवार की इच्छा के खिलाफ हुआ था। शुरुआती दौर में आशा ने गृहस्थ जीवन को प्राथमिकता देने की कोशिश की, लेकिन यह रिश्ता आगे चलकर बेहद मुश्किल भरा साबित हुआ और आखिरकार दोनों अलग हो गए।

इस विवाह से उनके तीन बच्चे हुए। बाद में आशा भोसले ने अपनी जिंदगी में दोबारा संगीत और करियर को पूरी ताकत से अपनाया।

उनकी निजी जिंदगी का यह दौर इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसके बाद उन्होंने जिस तरह अपने करियर को दोबारा खड़ा किया, वह उनकी दृढ़ता और आत्मनिर्भरता का उदाहरण बन गया।

4. ‘उमराव जान’ बनी अहम पड़ाव

आशा भोसले की आवाज को लंबे समय तक फिल्म इंडस्ट्री में चुलबुले, ग्लैमरस और पश्चिमी अंदाज वाले गीतों से जोड़कर देखा जाता था। लेकिन ‘उमराव जान’ ने उनकी गायकी का एक बिल्कुल अलग पक्ष सामने रखा।

1981 की इस फिल्म में उन्होंने ‘दिल चीज क्या है’, ‘इन आंखों की मस्ती’ और ‘ये क्या जगह है दोस्तों’ जैसे गीतों को अपनी आवाज दी। इन गानों में ठहराव, नजाकत, शास्त्रीयता और उर्दू शायरी की बारीकियां थीं।

Video Credit : ThodeSeAurGaane

इसी फिल्म के लिए आशा भोसले को अपना पहला राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला। यह सम्मान उनके करियर में एक महत्वपूर्ण मोड़ था क्योंकि इससे यह साबित हुआ कि उनकी आवाज केवल तेज-तर्रार या ग्लैमरस गीतों तक सीमित नहीं थी।

उन्होंने आगे भी गजल, भजन, शास्त्रीय और भावनात्मक गीतों में अपनी असाधारण क्षमता दिखाई।

5. ग्रैमी के लिए नामांकन

आशा भोसले का संगीत भारत की सीमाओं तक नहीं रुका। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय कलाकारों के साथ भी काम किया और पश्चिमी संगीत जगत में भारतीय आवाज की पहचान मजबूत की।

1997 में उस्ताद अली अकबर खान के साथ उनके एल्बम लिगेसी को Grammy Award के लिए नामांकन मिला। बाद में 2006 में ‘You’ve Stolen My Heart’ के लिए भी उन्हें ग्रैमी नॉमिनेशन मिला।

उनकी अंतरराष्ट्रीय यात्रा यहीं खत्म नहीं हुई। उन्होंने अलग-अलग विदेशी कलाकारों के साथ सहयोग किया और अपने लंबे करियर के अंतिम वर्षों तक नए संगीत प्रयोगों से जुड़ी रहीं।

गिनीज रिकॉर्ड्स के मुताबिक, उनके अंतरराष्ट्रीय सहयोगों में बॉय जॉर्ज (Boy George) और माइकल स्टाइप (Michael Stipe), पाकिस्तानी गायक जवाद अहमद और 2026 में Gorillaz के एल्बम ‘द माउंटेन’ से जुड़ा काम भी शामिल रहा।

6. सिर्फ संगीत नहीं, खाने की दुनिया में भी बनाया अपना ब्रांड

आशा भोसले की एक और दिलचस्प पहचान उनके खाने और खाना बनाने के शौक से जुड़ी थी। परिवार, दोस्तों और फिल्मी साथियों के लिए खाना बनाना उन्हें पसंद था। इसी रुचि ने आगे चलकर उन्हें रेस्टोरेंट व्यवसाय की ओर भी पहुंचाया।

उन्होंने दुबई में Asha’s नाम से अपना फाइन-डाइनिंग रेस्टोरेंट ब्रांड शुरू किया। यह ब्रांड बाद में मध्य-पूर्व और ब्रिटेन के अन्य शहरों तक पहुंचा। रेस्टोरेंट में भारतीय व्यंजनों को आशा भोसले के परिवार की रेसिपी और उनकी व्यक्तिगत पसंद से जोड़ा गया।

यानी जिस महिला की पहचान दुनिया एक महान गायिका के रूप में करती थी, उन्होंने संगीत से अलग एक सफल कारोबारी पहचान भी बनाई।

7. 79 साल की उम्र में फिल्मों में बतौर अभिनेत्री किया डेब्यू

आशा भोसले की जिंदगी में शायद सबसे खूबसूरत बात उनका लगातार खुद को नए रूप में आजमाना था। संगीत की दुनिया में दशकों बिताने के बाद उन्होंने अभिनय की तरफ भी कदम बढ़ाया।

2013 में आई मराठी फिल्म Mai में उन्होंने मुख्य भूमिका निभाई। फिल्म में उन्होंने एक ऐसी मां का किरदार निभाया जिसे उसके बच्चे अकेला छोड़ देते हैं।

उस समय उनकी उम्र करीब 79 वर्ष थी। यानी जिस उम्र में ज्यादातर कलाकार सक्रिय अभिनय से दूर हो जाते हैं, आशा भोसले ने एक बिल्कुल नया माध्यम चुना।

यह कदम उनकी प्रयोगधर्मी सोच को दर्शाता है। उनके लिए उम्र कभी नई चीजें सीखने या खुद को चुनौती देने में बाधा नहीं बनी।

लता मंगेशकर की बहन होने के बावजूद बनाई अपनी अलग पहचान

आशा भोसले की जिंदगी का एक बड़ा पहलू उनकी बड़ी बहन लता मंगेशकर से जुड़ा रहा। दोनों एक ही महान संगीत परिवार से आईं, दोनों ने प्लेबैक सिंगिंग में इतिहास बनाया और दोनों की आवाजों ने भारतीय सिनेमा को नई ऊंचाइयां दीं।

लेकिन आशा ने अपनी राह अलग बनाई। जहां लता की आवाज को अक्सर शास्त्रीयता, कोमलता और भावनात्मक गहराई से जोड़ा गया, वहीं आशा ने अपनी आवाज में चंचलता, आधुनिकता, पश्चिमी प्रभाव, कामुकता, हास्य, दर्द और प्रयोग जैसे तत्वों को जगह दी।

यही वजह है कि आशा भोसले की आवाज अलग-अलग अभिनेत्रियों और अलग-अलग किरदारों के लिए आसानी से ढल जाती थी।

संगीतकारों के साथ बनी खास साझेदारी

आशा भोसले के करियर को समझने के लिए उनके संगीतकारों के साथ रिश्ते भी बेहद अहम हैं। ओ.पी. नैयर के साथ उनकी साझेदारी ने हिंदी फिल्म संगीत में एक अलग तरह की लय और ऊर्जा पैदा की।

इसके बाद आर.डी. बर्मन के साथ उनका जुड़ाव भारतीय फिल्म संगीत के सबसे चर्चित अध्यायों में शामिल हुआ। दोनों की पेशेवर साझेदारी आगे चलकर निजी रिश्ते में भी बदली और उन्होंने शादी की।

‘पिया तू अब तो आजा’, ‘दम मारो दम’, ‘चुरा लिया है तुमने जो दिल को’ जैसे गीतों में आशा की आवाज और आर.डी. बर्मन की संगीत कल्पना का मेल सुनाई देता है।

उनकी आवाज ने 1960 और 1970 के दशक में हिंदी फिल्म संगीत को एक नया आधुनिक अंदाज दिया।

सम्मानों से भरा रहा आठ दशक का सफर

आशा भोसले को उनके योगदान के लिए भारत के कई बड़े सम्मान मिले। उन्हें दादासाहेब फाल्के पुरस्कार, पद्म विभूषण और राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों सहित अनेक सम्मान मिले। संसद में अप्रैल 2026 में उन्हें याद करते हुए भी उनके आठ दशक लंबे संगीत सफर और कई भारतीय भाषाओं में उनके योगदान का उल्लेख किया गया।

उनकी उपलब्धियों की सूची में फिल्मफेयर पुरस्कार भी खास जगह रखते हैं। वह रिकॉर्ड संख्या में सर्वश्रेष्ठ महिला पार्श्वगायिका के फिल्मफेयर पुरस्कार जीतने वाली गायिकाओं में शामिल रहीं।

आशा ताई की सबसे बड़ी खासियत

आशा भोसले की कहानी को अगर सिर्फ पुरस्कारों, रिकॉर्ड और सुपरहिट गानों की सूची बनाकर देखा जाए तो उनकी असली शख्सियत का बड़ा हिस्सा छूट जाएगा।

उनकी असली ताकत थी लगातार बदलते समय के साथ खुद को बदलने की क्षमता। 10 साल की बच्ची से शुरू हुआ सफर फिल्मों तक पहुंचा। फिर उन्होंने मुश्किल निजी जीवन से खुद को संभाला, अलग-अलग संगीत शैलियों को अपनाया, गजल गाई, पॉप और कैबरे गीत गाए, अंतरराष्ट्रीय कलाकारों के साथ काम किया, रेस्टोरेंट व्यवसाय में कदम रखा और लगभग 80 वर्ष की उम्र में अभिनय भी किया।

12 अप्रैल 2026 को जब आशा भोसले ने अंतिम सांस ली तो एक आवाज खामोश हुई, लेकिन उनका संगीत नहीं।

आज उनकी 93वीं जयंती पर उन्हें याद करने का सबसे सही तरीका शायद यही है कि उनके गीतों को किसी एक श्रेणी में बांधने के बजाय उस पूरी यात्रा को याद किया जाए, जिसमें उन्होंने हर बार खुद को नए अंदाज में पेश किया।

ये भी पढ़ें :- Mela First Look: मम्मूटी ने 75वीं सालगिरह पर अपने फैंस को दिया बड़ा सरप्राइज, ‘मेला’ का फर्स्ट लुक हुआ जारी!

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MD Faijan

MD Faijan

लेखक

मोहम्मद फैजान न्यूज़ ऑफ द डे में पत्रकार हैं, जहाँ वे खेल, मनोरंजन, राजनीति और अंतरराष्ट्रीय मामलों को कवर करते हैं। इससे पहले वे यूट्यूब चैनल स्पोर्ट्स यारी में सोशल मीडिया एग्जीक्यूटिव के रूप में कार्य कर चुके हैं, जहाँ उन्होंने डिजिटल कंटेंट मैनेजमेंट और ऑडियंस एंगेजमेंट का व्यावहारिक अनुभव प्राप्त किया। भारत के छत्तीसगढ़ राज्य के कोरिया जिले से संबंध रखने वाले फैजान आधुनिक मीडिया कार्यप्रणालियों की अच्छी समझ रखते हैं और कहानी कहने के विभिन्न रूपों में गहरी रुचि रखते हैं।

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