कभी JEE में संघर्ष किया, आज उसी परीक्षा के चेयरमैन हैं प्रो. वी. कामकोटी। जानें IIT मद्रास निदेशक की प्रेरक यात्रा के बारे में।
देश में हर साल लाखों छात्र IIT-JEE जैसी प्रतिष्ठित परीक्षा में सफलता प्राप्त करने के सपने देखते हैं। कई छात्र सफल होते हैं, जबकि अनेक को असफलता का सामना करना पड़ता है। लेकिन क्या कोई ऐसा छात्र, जो कभी इसी परीक्षा में संघर्ष कर रहा था, आगे चलकर उसी परीक्षा का चेयरमैन बन सकता है? जी हां, IIT मद्रास के निदेशक प्रोफेसर वी. कामकोटी की प्रेरणादायक कहानी इस सवाल का जवाब देने के लिए काफी है।
प्रो. कामकोटी का जीवन इस बात का उदाहरण है कि किसी एक परीक्षा का परिणाम उस व्यक्ति की पूरी क्षमता या भविष्य का निर्धारण नहीं करता। आज वे देश के प्रमुख शिक्षाविदों और कंप्यूटर वैज्ञानिकों में गिने जाते हैं। लेकिन उनकी सफलता का सफर असफलताओं, संघर्ष और लगातार सीखने की प्रक्रिया से होकर गुजरा है। आज जानते हैं प्रोफेसर वी. कामकोटी के संघर्ष की कहानी।
1985 IIT-JEE में मिला था बड़ा झटका
IIT मदरास की आधिकारिक वेबसाइट पर प्रो. वी. कामकोटी ने अपनी जीवन यात्रा के अनुभव साझा किए। उन्होंने बताया कि वर्ष 1985 में जब उन्होंने JEE परीक्षा दी थी, तब केमिस्ट्री विषय में उन्हें सिर्फ 1 अंक प्राप्त हुआ था। अपने इस प्राप्त नतीजे से वे बेहद निराश भी हुए थे क्योंकि उस समय उनका प्रदर्शन उम्मीद के मुताबिक नहीं था।
हालांकि उन्होंने उस असफलता को अपनी पहचान नहीं बनने दिया। वे मानते हैं कि जीवन में आने वाली असफलताएं व्यक्ति को तोड़ने के बजाय आगे बढ़ने की सीख देती हैं। उनके अनुसार, यदि किसी परीक्षा में अपेक्षित परिणाम नहीं मिलता है तो इसका अर्थ यह बिलकुल नहीं है कि व्यक्ति में प्रतिभा की कमी है। बल्कि इसे सीखने और खुद को बेहतर बनाने के अवसर के रूप में देखा जाना चाहिए।
‘FAIL’ का मतलब क्या है?
प्रो. कामकोटी भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम से बेहद प्रभावित हैं। उनकी एक प्रसिद्ध व्याख्या का उल्लेख करते हुए प्रो. कामकोटी ने FAIL (असफलता) को “First Attempt In Learning” यानी “सीखने की दिशा में पहला कदम माना”।
उन्होंने कहा कि असफलता किसी यात्रा का अंत नहीं, बल्कि कुछ सीखने का पहला प्रयास है। प्रो. कामकोटी का मानना है कि अंक और रैंक किसी छात्र की पूरी क्षमता का पैमाना नहीं हो सकते। हर बच्चे की रुचि, सीखने की शैली और क्षमता अलग होती है। इसलिए केवल परीक्षा परिणामों के आधार पर किसी की प्रतिभा का आकलन करना उचित नहीं है। उन्होंने अभिभावकों से भी इस सोच को अपनाने की गुजारिश की है।
संघर्ष से सफलता तक का सफर
JEE में अपेक्षा के अनुरूप प्रदर्शन न होने के बावजूद प्रो. कामकोटी ने अपनी पढ़ाई जारी रखी। उन्होंने तकनीकी शिक्षा के क्षेत्र में गहरी रुचि दिखाते हुए कंप्यूटर विज्ञान तथा इंजीनियरिंग के क्षेत्र में अपनी एक अलग पहचान बनाई।
उन्होंने IIT मद्रास से उच्च शिक्षा प्राप्त की और कंप्यूटर साइंस में विशेषज्ञता हासिल की। इसके बाद शोध और अकादमिक क्षेत्र में उनका सफर लगातार आगे बढ़ता गया। उनकी उपलब्धियों ने उन्हें देश के अग्रणी कंप्यूटर वैज्ञानिकों की सूची में शामिल कर दिया।
IIT मद्रास से गहरा जुड़ाव
प्रो. कामकोटी का IIT मद्रास से रिश्ता केवल एक छात्र तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने संस्थान में शोध, शिक्षण और प्रशासनिक जिम्मेदारियों के विभिन्न क्षेत्रों में काम किया। वर्ष 2001 में वे IIT मद्रास में फैकल्टी सदस्य के रूप में जुड़े और इसके बाद संस्थान में उनकी भूमिका लगातार बढ़ती गई। शिक्षण और शोध के अलावा उन्होंने उद्योगों के साथ सहयोग, तकनीकी नवाचार और राष्ट्रीय परियोजनाओं में भी योगदान दिया।
2022 में IIT मद्रास के निदेशक बने
जनवरी 2022 में प्रो. वी. कामकोटी ने IIT मद्रास के निदेशक का पद संभाला। यह उपलब्धि केवल व्यक्तिगत सफलता नहीं थी, बल्कि उस लंबे सफर की पहचान थी। एक ऐसा सफर, जो उन्होंने एक छात्र से लेकर संस्थान के सर्वोच्च प्रशासनिक पदाधिकारी के तौर पर तय किया।
निदेशक बनने के बाद उन्होंने संस्थान की वैश्विक पहचान में मजबूती लाई। उन्होंने शोध को बढ़ावा देने के साथ-साथ नई तकनीकों की दिशा में भी काम किया। उन्होंने कई अवसरों पर कहा कि उनका लक्ष्य IIT मद्रास को शिक्षा, शोध और नवाचार के क्षेत्र में विश्वस्तरीय संस्थान बनाए रखना है।
संघर्ष करने वाला छात्र बना परीक्षा का चैयरमैन
प्रो. कामकोटी की कहानी का सबसे प्रेरक पहलू यह है कि जिस JEE परीक्षा में कभी उन्हें कठिनाइयों का सामना करना पड़ा था, बाद में वे उसी परीक्षा की प्रक्रिया से जुड़े। आगे उन्होंने महत्वपूर्ण पदों तक पहुंचकर JEE के चेयरमैन की जिम्मेदारी भी संभाली। यह उपलब्धि बताती है कि किसी परीक्षा में एक बार का परिणाम भविष्य की संभावनाओं को सीमित नहीं कर सकता।
भारत के स्वदेशी माइक्रोप्रोसेसर ‘SHAKTI’ से जुड़ा नाम
प्रो. कामकोटी केवल एक शिक्षाविद नहीं, बल्कि भारत के तकनीकी आत्मनिर्भरता अभियान के मिख्य वास्तुकार भी माने जाते हैं। उन्हें देश के पहले स्वदेशी ओपन-सोर्स माइक्रोप्रोसेसर SHAKTI परियोजना के प्रमुख चेहरों में माना जाता है। इस परियोजना का उद्देश्य भारत में स्वदेशी प्रोसेसर तकनीक विकसित करना था, जिससे देश की तकनीकी निर्भरता कम हो सके। तकनीकी क्षेत्र में उनके योगदान ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई।
परीक्षा के दबाव पर जताई चिंता
प्रो. कामकोटी कई बार प्रतियोगी परीक्षाओं के बढ़ते दबाव को लेकर चिंता जता चुके हैं। उन्होंने कहा है कि छात्रों की मानसिक मजबूती और सकारात्मक सोच उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी शैक्षणिक सफलता। जीवन केवल परीक्षा और अंकों तक सीमित नहीं हो सकता। यदि छात्र असफलता को सीखने के अवसर के रूप में देखना शुरू कर दें तो वे भविष्य में बेहतर प्रदर्शन कर सकते हैं।
क्यों चर्चा में है प्रो. वी. कामकोटी की कहानी
दरअसल, सोमवार (1 जून) को JEE Advanced परीक्षा के परिणाम घोषित हुए। परिणामों के बीच प्रो. कामकोटी की कहानी इसलिए चर्चा में है क्योंकि यह सफलता की गढ़ी हुई परिभाषा को चुनौती देती है। परीक्षा के परिणामों को देखते हुए जब कई छात्र कम अंक आने या मनचाहा संस्थान न मिलने पर निराश हो जाते हैं, तब IIT मद्रास के निदेशक की यात्रा यह संदेश देती है कि एक परीक्षा के परिणाम के आधार पर करियर का फैसला करना उचित नहीं है।
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