NCERT ने पहली बार कक्षा 9 की किताब में इमरजेंसी को विस्तार से शामिल किया है। जानिए क्यों आपातकाल को भारतीय लोकतंत्र का सबसे विवादित दौर में शामिल है।
नई दिल्ली: 25 जून 1975 की रात भारतीय लोकतंत्र के इतिहास की सबसे चर्चित और विवादास्पद रातों में गिनी जाती है। इसी रात तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार ने देश में आंतरिक आपातकाल (Emergency) लागू करने का फैसला लिया था। अगले 21 महीनों तक भारत की राजनीति, न्यायपालिका, मीडिया और नागरिक स्वतंत्रताओं पर इसका गहरा प्रभाव पड़ा।
आज, 25 जून 2026 को उस फैसले के 51 वर्ष पूरे हो गए हैं। इसी बीच राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (NCERT) ने पहली बार कक्षा 9 की नई सामाजिक विज्ञान पुस्तक “Understanding Society: India and Beyond” में इमरजेंसी को विस्तार से शामिल किया है।
पुस्तक में 1975-77 के दौर को भारतीय लोकतंत्र के सामने आई “सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक” बताया गया है। इसमें मौलिक अधिकारों के निलंबन, प्रेस सेंसरशिप, राजनीतिक गिरफ्तारियों और जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व वाले जन आंदोलन का भी उल्लेख किया गया है।
इस अध्याय में किन विषयों का ज़िक्र
NCERT की नई कक्षा 9 की सामाजिक विज्ञान पुस्तक “Understanding Society: India and Beyond” में Emergency का जिक्र केवल एक ऐतिहासिक घटना के रूप में नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र के सामने आई एक बड़ी चुनौती के रूप में किया गया है।
अध्याय में बताया गया है कि 1975-77 के दौरान अधिकांश मौलिक अधिकार निलंबित कर दिए गए थे, प्रेस पर सेंसरशिप लागू थी और बड़ी संख्या में राजनीतिक नेताओं व सामाजिक कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया था। पुस्तक में जयप्रकाश नारायण (जेपी) और उनके नेतृत्व में बिहार तथा गुजरात में चले जन आंदोलनों का भी उल्लेख है।
साथ ही यह बताया गया है कि 1977 में इमरजेंसी हटने के बाद हुए आम चुनावों में जनता ने मतदान के जरिए अपना फैसला सुनाया, जिसने भारतीय लोकतंत्र की मजबूती को साबित किया।
इसके अलावा अध्याय में फेक न्यूज, भ्रामक सूचनाएं, क्षेत्रवाद, सामाजिक भेदभाव, लैंगिक असमानता और लोकतंत्र में मीडिया की भूमिका जैसे विषयों को भी लोकतांत्रिक चुनौतियों के संदर्भ में शामिल किया गया है।
लेकिन आखिर इमरजेंसी की नौबत आई क्यों थी? किसने इसकी सलाह दी? उस दौरान क्या-क्या हुआ? और क्यों आज भी यह भारतीय राजनीति का सबसे बहस वाला अध्याय बना हुआ है?
1970 के दशक की शुरुआत: बढ़ता असंतोष और संकट
1971 के लोकसभा चुनाव में इंदिरा गांधी ने ऐतिहासिक जीत हासिल की थी। उसी वर्ष भारत ने पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध जीतकर बांग्लादेश के निर्माण में अहम भूमिका निभाई। इंदिरा गांधी की लोकप्रियता अपने चरम पर थी।
लेकिन अगले कुछ वर्षों में हालात बदलने लगे। देश में महंगाई तेजी से बढ़ रही थी। बेरोजगारी चिंता का विषय बन चुकी थी। 1973 के वैश्विक तेल संकट ने भारतीय अर्थव्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव डाला। कई राज्यों में भ्रष्टाचार और प्रशासनिक अक्षमता के आरोप लग रहे थे।
इसी माहौल में छात्रों और युवाओं के आंदोलन शुरू हुए। सबसे पहले गुजरात में नव निर्माण आंदोलन उभरा। इसके बाद बिहार में छात्रों ने सरकार के खिलाफ व्यापक आंदोलन शुरू किया।
जेपी आंदोलन और ‘संपूर्ण क्रांति’ का नारा
बिहार आंदोलन को नई दिशा तब मिली जब स्वतंत्रता सेनानी और समाजवादी नेता जयप्रकाश नारायण, जिन्हें देश ‘जेपी’ के नाम से जानता है, उससे जुड़ गए।
जेपी ने ‘संपूर्ण क्रांति’ का नारा दिया। उनका कहना था कि सिर्फ सरकार बदलने से काम नहीं चलेगा, बल्कि राजनीति, प्रशासन, शिक्षा और समाज में व्यापक परिवर्तन की जरूरत है।
NCERT की नई पुस्तक में भी उल्लेख किया गया है कि जयप्रकाश नारायण ने विशेष रूप से बिहार और गुजरात में छात्रों तथा नागरिकों को संगठित किया और सरकार के खिलाफ बड़े जन आंदोलन का नेतृत्व किया।
जेपी की रैलियों में लाखों लोग जुटने लगे। विपक्षी दल भी उनके साथ आ गए। धीरे-धीरे आंदोलन राष्ट्रीय स्वरूप लेने लगा।
इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले ने बदला सारा खेल
12 जून 1975 को इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति जगमोहनलाल सिन्हा ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया। अदालत ने 1971 के रायबरेली लोकसभा चुनाव में चुनावी अनियमितताओं के आरोपों को स्वीकार करते हुए इंदिरा गांधी के चुनाव को निरस्त कर दिया। साथ ही उनके चुनाव लड़ने पर भी रोक लगा दी गई।
यह फैसला इंदिरा गांधी के राजनीतिक भविष्य के लिए बड़ा झटका था। इसके लिए उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में अपील भी की। 24 जून 1975 को न्यायमूर्ति वी.आर. कृष्ण अय्यर ने उन्हें प्रधानमंत्री बने रहने की अंतरिम राहत तो दी, लेकिन सांसद के रूप में मतदान करने का अधिकार नहीं दिया। उधर विपक्ष भी उनके इस्तीफे की मांग तेज कर चुका था।
आखिर इमरजेंसी लगाने की सलाह किसने दी?
25 जून 1975 को घटनाक्रम तेजी से बदला। उस समय पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री और संवैधानिक मामलों के जानकार सिद्धार्थ शंकर रे ने इंदिरा गांधी को सलाह दी कि संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत ‘आंतरिक अशांति’ (Internal Disturbance) के आधार पर राष्ट्रीय आपातकाल लगाया जा सकता है।
इंदिरा गांधी ने यह प्रस्ताव तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद को भेजा। 25 जून की रात राष्ट्रपति ने आपातकाल की घोषणा पर हस्ताक्षर कर दिए। हस्ताक्षर के बाद आधी रात से ही देशभर में विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारियां शुरू हो गईं।
अगली सुबह देश ने रेडियो पर सुनी घोषणा
26 जून की सुबह ऑल इंडिया रेडियो पर इंदिरा गांधी का संदेश प्रसारित हुआ। उन्होंने कहा कि देश की स्थिरता और राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए यह कदम उठाया गया है। सरकार का तर्क था कि देश में व्यवस्था बनाए रखने और कथित साजिशों से निपटने के लिए असाधारण कदम जरूरी थे।
लेकिन आलोचकों का कहना था कि यह फैसला राजनीतिक संकट से निपटने के लिए लिया गया था। यहीं से भारतीय लोकतंत्र का सबसे विवादित दौर शुरू हुआ।
इमरजेंसी के दौरान देश में क्या हुआ?
Emergency लागू होने के बाद सरकार को असाधारण शक्तियां मिल गईं। देशभर में बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियां हुईं। विपक्षी नेताओं, छात्र नेताओं, ट्रेड यूनियन कार्यकर्ताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं को हिरासत में लिया गया।
गिरफ्तार किए गए प्रमुख नेताओं में अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, जॉर्ज फर्नांडिस, मोरारजी देसाई, चरण सिंह और स्वयं जयप्रकाश नारायण शामिल थे।
सरकार ने MISA (Maintenance of Internal Security Act) जैसे कानूनों का व्यापक उपयोग किया। इस कानून के तहत बिना मुकदमा चलाए लंबे समय तक हिरासत में रखा जा सकता था।
प्रेस सेंसरशिप से अखबारों पर पहरा
इमरजेंसी का सबसे चर्चित पहलू प्रेस सेंसरशिप थी। समाचार पत्रों को प्रकाशित करने से पहले कई खबरें सरकारी अधिकारियों को दिखानी पड़ती थीं। इसके तहत सरकार की आलोचना करने वाली सामग्री रोकी जा सकती थी।
कई संपादकों और पत्रकारों ने इसका विरोध किया, जबकि कुछ संस्थानों ने सरकारी निर्देशों का पालन किया। बाद के वर्षों में यह दौर भारतीय मीडिया इतिहास में प्रेस स्वतंत्रता पर सबसे बड़े प्रतिबंधों में से एक माना गया।
NCERT की नई पुस्तक भी सेंसरशिप को इमरजेंसी की प्रमुख घटनाओं में शामिल करती है।
मौलिक अधिकारों पर प्रभाव
इमरजेंसी के दौरान कई मौलिक अधिकार प्रभावी रूप से निलंबित कर दिए गए थे। नागरिक स्वतंत्रताओं पर प्रतिबंध लगाए गए। अदालतों में बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) जैसी याचिकाओं के अधिकार भी गंभीर रूप से प्रभावित हुए।
इसी दौर में सुप्रीम कोर्ट का चर्चित ADM जबलपुर मामला सामने आया, जिसमें व्यक्तिगत स्वतंत्रता और राज्य की शक्तियों को लेकर बड़ा संवैधानिक विवाद पैदा हुआ।
संजय गांधी का पांच सूत्रीय कार्यक्रम
Emergency के दौरान इंदिरा गांधी के छोटे बेटे संजय गांधी का प्रभाव तेजी से बढ़ा। उन्होंने पांच सूत्रीय कार्यक्रम को बढ़ावा दिया, जिसमें परिवार नियोजन, वृक्षारोपण, दहेज उन्मूलन, साक्षरता और पर्यावरण सुधार जैसे मुद्दे शामिल थे।
हालांकि सबसे ज्यादा विवाद परिवार नियोजन अभियान को लेकर हुआ। कई राज्यों में नसबंदी कार्यक्रम को लेकर जबरदस्ती और प्रशासनिक दबाव के आरोप लगे। यही मुद्दा बाद में सरकार के खिलाफ जन असंतोष का बड़ा कारण बना।
इमरजेंसी के दौरान हुए प्रमुख संवैधानिक बदलाव
इस अवधि में कई महत्वपूर्ण संवैधानिक संशोधन किए गए। सबसे चर्चित था 42वां संविधान संशोधन, जिसे अक्सर ‘मिनी संविधान’ भी कहा जाता है।
इसके माध्यम से संसद की शक्तियों का विस्तार किया गया, न्यायपालिका की भूमिका को सीमित करने की कोशिश हुई और संविधान की प्रस्तावना में ‘समाजवादी’ तथा ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द जोड़े गए।
आलोचकों का आरोप था कि इन संशोधनों ने सत्ता के केंद्रीकरण को बढ़ावा दिया, जबकि सरकार का तर्क था कि यह प्रशासनिक सुधारों के लिए आवश्यक थे।
आखिर इमरजेंसी खत्म कैसे हुई?
जनवरी 1977 में अचानक इंदिरा गांधी ने लोकसभा चुनाव कराने की घोषणा कर दी। कई राजनीतिक बंदियों को रिहा किया गया। विपक्षी दलों ने मिलकर जनता पार्टी का गठन किया।
मार्च 1977 में चुनाव हुए लेकिन परिणाम चौंकाने वाले थे। उत्तर भारत के अधिकांश हिस्सों में कांग्रेस को भारी हार का सामना करना पड़ा। जनता पार्टी सत्ता में आई और मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने। इंदिरा गांधी स्वयं रायबरेली से चुनाव हार गईं।
NCERT की नई पुस्तक भी इस तथ्य को रेखांकित करती है कि 1977 के चुनावों ने भारतीय लोकतंत्र की मजबूती को प्रदर्शित किया और दिखाया कि अंतिम निर्णय जनता के हाथ में होता है।
लोकतंत्र के लिए सबक
Emergency आज भी भारतीय राजनीति का सबसे विवादास्पद अध्याय है। इसके समर्थक दावा करते हैं कि उस दौरान प्रशासनिक अनुशासन, समयबद्धता और व्यवस्था में सुधार देखने को मिला। दूसरी ओर आलोचक इसे नागरिक स्वतंत्रताओं, प्रेस की आजादी और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर सबसे बड़ा हमला मानते हैं।
यही वजह है कि 51 वर्ष बाद भी आपातकाल सिर्फ इतिहास का विषय नहीं है, बल्कि लोकतंत्र, सत्ता और नागरिक अधिकारों पर चल रही बहस का महत्वपूर्ण हिस्सा बनी हुई है।
अब NCERT की नई पाठ्यपुस्तक में इसे शामिल किया जाना इस बात का संकेत है कि आने वाली पीढ़ियों को भी इस दौर के बारे में पढ़ाया जाएगा, ताकि वे समझ सकें कि लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं, बल्कि संस्थाओं, अधिकारों और नागरिक सतर्कता से मजबूत होता है।
ये भी पढ़ें :- PM इंटर्नशिप योजना से जुड़ेंगी CMA फर्में, युवाओं को मिलेगा वास्तविक औद्योगिक अनुभव: ICMAI की पहल
