Thursday, 23 July 2026
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आजम खान की जौहर यूनिवर्सिटी पर मंडरा रहा बुलडोजर का खतरा! छात्रों ने कहा- नाम बदल दो, लेकिन संस्थान मत तोड़ो

रामपुर की जौहर यूनिवर्सिटी की 38 इमारतों पर बुलडोजर कार्रवाई का खतरा है। जानिए क्या है पूरा विवाद, छात्रों की मांग और आजम खान से इसका कनेक्शन।

रामपुर, उत्तर प्रदेश: उत्तर प्रदेश के रामपुर की मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी इन दिनों शिक्षा से ज्यादा राजनीतिक और कानूनी विवाद को लेकर चर्चा में है। समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री आजम खान से जुड़ी इस यूनिवर्सिटी की 38 इमारतों को लेकर रामपुर विकास प्राधिकरण (RDA) की ओर से जारी Demolition Order ने एक नया विवाद खड़ा कर दिया है। इसके बाद यूनिवर्सिटी के छात्र विरोध प्रदर्शन पर उतर आए हैं।

छात्रों का कहना है कि राजनीतिक विवाद अपनी जगह है, लेकिन उसका असर उनकी पढ़ाई और भविष्य पर नहीं पड़ना चाहिए। उनका तर्क है कि अगर सरकार को यूनिवर्सिटी के नाम या इससे जुड़े किसी पहलू पर आपत्ति है, तो नाम बदला जा सकता है, लेकिन पूरे संस्थान और उसके भवनों को नुकसान पहुंचाने से हजारों छात्रों का भविष्य प्रभावित हो सकता है।

दूसरी ओर, प्रशासन की कार्रवाई का आधार कथित तौर पर भवन निर्माण से जुड़े स्वीकृति और अनुमति संबंधी नियमों का उल्लंघन है। RDA के आदेश में यूनिवर्सिटी की 40 में से 38 इमारतों को लेकर आपत्ति जताई गई है। यही वजह है कि यह विवाद अब केवल आजम खान बनाम योगी आदित्यनाथ सरकार की राजनीतिक लड़ाई नहीं रह गया है। इसके केंद्र में अब छात्र, उनकी डिग्रियां, यूनिवर्सिटी का भविष्य और कानून के तहत निर्माण की वैधता जैसे सवाल भी हैं।

38 इमारतों पर कार्रवाई का मामला

मामला जुलाई 2026 में उस समय सुर्खियों में आया, जब रामपुर विकास प्राधिकरण ने मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी की 40 में से 38 इमारतों के खिलाफ Demolition Order जारी किया।

प्राधिकरण की ओर से उठाया गया मुख्य सवाल इन भवनों के निर्माण के लिए आवश्यक अनुमति और स्वीकृतियों से जुड़ा है। प्रशासन का दावा है कि संबंधित इमारतों का निर्माण जरूरी मंजूरियों के बिना किया गया था।

हालांकि, इस कार्रवाई को लेकर यूनिवर्सिटी से जुड़े पक्ष और विपक्षी राजनीतिक दलों ने गंभीर सवाल उठाए हैं। समाजवादी पार्टी और अन्य आलोचकों ने इसे राजनीतिक रूप से प्रेरित कार्रवाई बताया है, जबकि प्रशासनिक पक्ष से इसे नियमों और कानूनी प्रक्रिया से जुड़ा मामला बताया जा रहा है।

रिपोर्ट के मुताबिक, छात्रों ने 18-19 जुलाई के आसपास यूनिवर्सिटी के मुख्य द्वार के बाहर अनिश्चितकालीन धरना शुरू किया। प्रदर्शनकारियों का कहना था कि कार्रवाई से उनका भविष्य प्रभावित हो सकता है।

नाम बदल दो, यूनिवर्सिटी क्यों तोड़ना?

विवाद के बीच छात्रों की मांग ने इस पूरे मामले को एक अलग दिशा दे दी है। प्रदर्शन कर रहे छात्रों का कहना है कि यदि सरकार या प्रशासन को यूनिवर्सिटी के नाम ‘मोहम्मद अली जौहर’ को लेकर आपत्ति है, तो नाम बदलने पर विचार किया जा सकता है। लेकिन यूनिवर्सिटी की इमारतों को गिराने की कार्रवाई से उन छात्रों को नुकसान होगा, जिनका इस राजनीतिक विवाद से कोई लेना-देना नहीं है।

छात्रों के अनुसार, यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाले युवाओं ने यहां अपनी पढ़ाई और करियर के लिए समय और पैसा लगाया है। अगर कैंपस की इमारतों पर कार्रवाई होती है या संस्थान की गतिविधियां प्रभावित होती हैं, तो इसका सबसे बड़ा नुकसान विद्यार्थियों को होगा।

शशि थरूर ने जताई आपत्ति

इस विवाद में कांग्रेस नेता शशि थरूर का बयान भी चर्चा में आया है। थरूर ने यूनिवर्सिटी को लेकर की जा रही कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए कहा कि संस्थान को बर्बाद नहीं किया जाना चाहिए।

उन्होंने अपने एक्स हैंडल पर ट्वीट करते हुए लिखा कि – “उच्च शिक्षा के गुणवत्तापूर्ण संस्थानों की कमी वाले राज्य में, मोहम्मद अली जौहर विश्वविद्यालय की 40 में से 38 इमारतों को बुलडोजर से ढहा देना एक बेहद विकृत और गलत फैसला है। अगर निर्माण अवैध था, तो सजा के अन्य रास्ते तलाशे जाने चाहिए थे। जैसे जुर्माना, अन्य दंडात्मक कार्रवाई या फिर सरकार द्वारा नियंत्रण में ले लेना। लेकिन एक चलते हुए विश्वविद्यालय को नष्ट नहीं किया जाना चाहिए जिसकी उत्तर प्रदेश को सख्त जरूरत है”!

थरूर की टिप्पणी के बाद विवाद को लेकर राजनीतिक बहस और तेज हो गई। विपक्षी नेताओं का कहना है कि यदि किसी भवन के निर्माण में कानूनी उल्लंघन हुआ है तो कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए, लेकिन छात्रों की शिक्षा और संस्थान के भविष्य को सुरक्षित रखने के लिए वैकल्पिक रास्ते भी तलाशे जाने चाहिए।

क्या है मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी की कहानी?

मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी रामपुर में स्थित एक निजी विश्वविद्यालय है। इसकी स्थापना उत्तर प्रदेश विधानमंडल द्वारा पारित UP Act No. 19 of 2006 के तहत हुई थी। विश्वविद्यालय की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार, इस अधिनियम को राज्यपाल की मंजूरी 16 जून 2006 को मिली थी।

विश्वविद्यालय की आधारशिला 18 सितंबर 2006 को तत्कालीन उत्तर प्रदेश मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने रखी थी। इसके बाद विश्वविद्यालय ने अपनी शैक्षणिक गतिविधियां शुरू करने की दिशा में कदम बढ़ाया।

इसके बाद उत्तर प्रदेश सरकार से 30 जुलाई 2012 को अनुमति पत्र मिलने के बाद अकादमिक संचालन शुरू हुआ।

विश्वविद्यालय का औपचारिक उद्घाटन 18 सितंबर 2012 को तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने किया था। इस तरह जौहर यूनिवर्सिटी की कहानी केवल आजम खान की राजनीति से जुड़ी नहीं है, बल्कि इसकी स्थापना और उद्घाटन के दौरान उत्तर प्रदेश की अलग-अलग समाजवादी सरकारों की भूमिका भी रही है।

यूनिवर्सिटी किसने बनवाई?

आपको बता दें कि मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी का संचालन मौलाना मोहम्मद अली जौहर ट्रस्ट के तहत होता है। इसके चांसलर समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता मोहम्मद आजम खान हैं।

आजम खान ने इस विश्वविद्यालय को अपने राजनीतिक और सामाजिक जीवन की महत्वपूर्ण परियोजनाओं में से एक के रूप में विकसित किया। यूनिवर्सिटी का नाम स्वतंत्रता सेनानी और पत्रकार मौलाना मोहम्मद अली जौहर के नाम पर रखा गया है।

आजम खान ने मौलाना मोहम्मद अली जौहर के शिक्षा संबंधी सपने को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से संस्थान की स्थापना की। विश्वविद्यालय खुद को बहुविषयक उच्च शिक्षा संस्थान के रूप में प्रस्तुत करता है।

कौन थे मौलाना मोहम्मद अली जौहर?

मौलाना मोहम्मद अली जौहर भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के प्रमुख नेताओं में शामिल थे। उनका जन्म 10 दिसंबर 1878 को रामपुर में हुआ था। उन्होंने ऑक्सफोर्ड के लिंकन कॉलेज में आधुनिक इतिहास की पढ़ाई की। बाद में वे पत्रकारिता और राजनीति से जुड़े।

उन्होंने अंग्रेजी अखबार Comrade और उर्दू अखबार Hamdard शुरू किए। वे खिलाफत आंदोलन के प्रमुख नेताओं में रहे और महात्मा गांधी के साथ भी स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय रहे। 1923 में वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष बने।

मौलाना मोहम्मद अली जौहर का नाम जामिया मिल्लिया इस्लामिया की स्थापना से भी जुड़ा है। 1920 में अलीगढ़ में स्थापित यह संस्थान बाद में दिल्ली स्थानांतरित हुआ और आज केंद्रीय विश्वविद्यालय के रूप में जाना जाता है।

1930 में लंदन में आयोजित Round Table Conference के दौरान उन्होंने भारत की स्वतंत्रता को लेकर अपना प्रसिद्ध वक्तव्य दिया था। 4 जनवरी 1931 को लंदन में उनका निधन हुआ और उन्हें यरुशलम (फिलिस्तीन) में मस्जिद-ए-अक्सा के प्रांगण में दफनाया गया।

इसी स्वतंत्रता सेनानी की स्मृति में रामपुर में मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी की स्थापना की गई।

यूनिवर्सिटी बनाने का उद्देश्य क्या था?

यूनिवर्सिटी के आधिकारिक विवरण के अनुसार, इसका उद्देश्य उच्च शिक्षा को अधिक से अधिक युवाओं तक पहुंचाना और ऐसे छात्रों को अवसर देना था, जो सामाजिक, आर्थिक या भौगोलिक कारणों से उच्च शिक्षा हासिल करने में कठिनाई महसूस करते हैं।

250 एकड़ से भी अधिक क्षेत्र में फैली इस यूनिवर्सिटी में विज्ञान, मानविकी, कानून, शिक्षा, वाणिज्य, इंजीनियरिंग एवं टेक्नोलॉजी, फार्मेसी, पैरामेडिकल साइंसेज, नर्सिंग और कृषि सहित विभिन्न क्षेत्रों में पाठ्यक्रम संचालित किए जाते हैं।

यहां UG, PG और PhD स्तर पर कई कार्यक्रम उपलब्ध हैं। 2026-27 के लिए जारी पाठ्यक्रम सूची में B.Tech, M.Tech, BBA, MBA, B.Ed., B.Pharm/D.Pharm से जुड़े कार्यक्रम, कानून, विज्ञान, मानविकी और अन्य विषय शामिल हैं।

इसलिए छात्रों का कहना है कि अगर कैंपस की इमारतों पर कार्रवाई होती है, तो उसका असर सिर्फ एक राजनीतिक व्यक्ति या ट्रस्ट पर नहीं, बल्कि शिक्षा प्राप्त कर रहे छात्रों पर भी पड़ सकता है।

यूनिवर्सिटी पर पहले भी उठते रहे हैं सवाल

जौहर यूनिवर्सिटी पिछले कुछ वर्षों से विवादों में रही है। 2021 में उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से यूनिवर्सिटी को आवंटित जमीन को वापस लेने की कार्रवाई का मामला सामने आया था। बाद में यह विवाद अदालत तक भी पहुंचा।

2022 में सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार द्वारा यूनिवर्सिटी की जमीन वापस लेने के फैसले पर रोक लगाई थी। इससे पहले इलाहाबाद हाई कोर्ट ने राज्य सरकार की कार्रवाई में हस्तक्षेप करने से इनकार किया था।

इन कानूनी विवादों की पृष्ठभूमि में अब 2026 में 38 भवनों के खिलाफ RDA का Demolition Order सामने आया है। इसलिए मौजूदा विवाद को यूनिवर्सिटी से जुड़े पुराने कानूनी मामलों से अलग करके देखना भी मुश्किल है।

आजम खान की राजनीति और यूनिवर्सिटी का विवाद

जौहर यूनिवर्सिटी का नाम उसके चांसलर आजम खान की राजनीतिक यात्रा से भी जुड़ा हुआ है।

आजम खान उत्तर प्रदेश की राजनीति में लंबे समय से सक्रिय रहे हैं और रामपुर से उनका मजबूत राजनीतिक आधार रहा है। वे समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेताओं में शामिल हैं और उत्तर प्रदेश सरकार में कई बार मंत्री रह चुके हैं।

उनके समर्थक यूनिवर्सिटी को रामपुर में उच्च शिक्षा के विस्तार की महत्वपूर्ण परियोजना मानते हैं। वहीं विरोधी पक्ष लंबे समय से यूनिवर्सिटी से जुड़े जमीन, निर्माण और प्रशासनिक मामलों पर सवाल उठाता रहा है।

समाजवादी पार्टी और अन्य विपक्षी नेताओं का आरोप है कि कार्रवाई राजनीतिक बदले की भावना से प्रेरित है, जबकि सरकार और प्रशासन का पक्ष है कि कानून और निर्माण नियमों का पालन सभी संस्थानों के लिए जरूरी है।

AIMPLB ने भी कार्रवाई का विरोध किया

मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी के खिलाफ जारी demolition order पर All India Muslim Personal Law Board (AIMPLB) ने भी आपत्ति जताई।

बोर्ड ने कार्रवाई को पक्षपातपूर्ण और अन्यायपूर्ण बताया और उत्तर प्रदेश सरकार से आदेश वापस लेने की अपील की।

वहीं, समाजवादी पार्टी के नेताओं ने भी कार्रवाई पर सवाल उठाए और आरोप लगाया कि यूनिवर्सिटी को राजनीतिक रूप से निशाना बनाया जा रहा है।

हालांकि, प्रशासनिक पक्ष से मामला भवनों के निर्माण की अनुमति और कानूनी वैधता से जुड़ा हुआ बताया गया है। इसलिए इस विवाद में आगे की कानूनी प्रक्रिया बेहद महत्वपूर्ण होगी।

छात्रों का भविष्य कैसे बचेगा?

एक तरफ प्रशासनिक कार्रवाई और कानूनी नियमों का सवाल है। दूसरी तरफ हजारों छात्रों की पढ़ाई और भविष्य का सवाल है। यदि किसी भवन के निर्माण में वास्तव में कानूनी उल्लंघन हुआ है, तो उसका समाधान कानून के अनुसार होना चाहिए। लेकिन छात्रों का भविष्य प्रभावित न हो, यह सुनिश्चित करना भी सरकार और विश्वविद्यालय प्रशासन की जिम्मेदारी है।

छात्रों का कहना है कि उन्होंने यूनिवर्सिटी में दाखिला लेकर अपनी डिग्री और करियर की योजना बनाई है। यदि कैंपस की गतिविधियां बाधित होती हैं, तो उन्हें वैकल्पिक व्यवस्था, परीक्षा, कक्षाओं और डिग्री की मान्यता को लेकर चिंता हो सकती है।

यही कारण है कि छात्र चाहते हैं कि सरकार और प्रशासन कोई ऐसा समाधान निकाले जिसमें कानूनी प्रक्रिया भी जारी रहे और उनकी पढ़ाई भी प्रभावित न हो।

क्या नाम बदलने से खत्म हो सकता है विवाद?

छात्रों की ओर से सामने आया यह सुझाव कि नाम बदल दिया जाए, लेकिन यूनिवर्सिटी को न तोड़ा जाए, इस विवाद में एक संभावित राजनीतिक समाधान की ओर इशारा करता है।

हालांकि, यह स्पष्ट नहीं है कि सरकार इस विकल्प पर विचार कर रही है या नहीं। फिलहाल उपलब्ध रिपोर्टों में मुख्य विवाद भवन निर्माण की अनुमति और RDA की कार्रवाई से जुड़ा है।

नाम बदलना एक राजनीतिक या प्रशासनिक निर्णय हो सकता है, लेकिन इससे भवनों की वैधता से जुड़े कानूनी सवाल अपने आप खत्म नहीं होते।

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MD Faijan

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लेखक

मोहम्मद फैजान न्यूज़ ऑफ द डे में पत्रकार हैं, जहाँ वे खेल, मनोरंजन, राजनीति और अंतरराष्ट्रीय मामलों को कवर करते हैं। इससे पहले वे यूट्यूब चैनल स्पोर्ट्स यारी में सोशल मीडिया एग्जीक्यूटिव के रूप में कार्य कर चुके हैं, जहाँ उन्होंने डिजिटल कंटेंट मैनेजमेंट और ऑडियंस एंगेजमेंट का व्यावहारिक अनुभव प्राप्त किया। भारत के छत्तीसगढ़ राज्य के कोरिया जिले से संबंध रखने वाले फैजान आधुनिक मीडिया कार्यप्रणालियों की अच्छी समझ रखते हैं और कहानी कहने के विभिन्न रूपों में गहरी रुचि रखते हैं।

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